सामाजिक न्याय
नमस्कार, आज के मुख्य समाचार!
अगर सोशल सेक्टर की खबरें भी हिंदी के समाचारों की तरह छपती, तो शायद हर न्यूज़ ब्रेकिंग न्यूज़ होती!तारीख पर तारीख!
गांव और शहर के चुनाव में उतना ही फर्क है, जितना घर की दीवार और फेसबुक वॉल में।हमारे स्कूलों से क्यों नदारद है सावित्रीबाई फुले की कहानी?
क्या हमारे स्कूलों और विश्वविद्यालयों में सावित्रीबाई फुले के कद के मुताबिक उनकी बात की जाती है, उनसे हमारा परिचय बतौर देश की पहली शिक्षिका क्या हमारे स्कूलों और कॉलेजों में करवाया जाता है?एक समावेशी स्कूल कैसा होना चाहिए?
विकलांगता से प्रभावित बच्चों के लिए अलग-थलग समाधान की नहीं, बल्कि मौजूदा व्यवस्था में सुधार की जरूरत है ताकि समावेशन संभव हो सके।सरल कोश: कन्वर्जंस
कन्वर्जंस यानी साझा प्रयास—जहां योजनाएं, संस्थाएं और लोग मिलकर एक ही लक्ष्य के लिए काम करते हैं। इस एपिसोड में जानिए यह विकास सेक्टर में कैसे प्रभाव बढ़ाता है।स्वतंत्रता दिवस सेलः नो ऑफर ऑन रोटी!
स्वतंत्रता के आठ दशक बाद भी करोड़ों लोग भोजन जैसे मौलिक अधिकार से वंचित हैं। क्या आजादी का मतलब यही है?क्या जस्ट ट्रांजिशन और आजीविका में कोई संबंध है?
कार्बन कॉपी के इस पॉडकास्ट में जानें कि भारत के कोयला सम्पन्न इलाकों में जस्ट ट्रांजिशन लोगों की आजीविका और जीवन को कैसे बदल सकता है।नारीवादी नैतिकता और हालिया कानूनी नजरिए में क्या और कितना अंतर है?
नारीवादी नजरिया कहता है आरोपी, पीड़ित और समाज तीनों के लिए न्याय की भावना बनी रहे, यह सुनिश्चित करने के लिए सिस्टम और व्यक्ति को साथ मिलकर काम करने की जरूरत है।भारत के अपराध कानून अपने नागरिकों को सजा कैसे देते हैं?
सुधार के दावों के बावजूद, भारतीय अपराध कानून आज भी बहुत असंगत तरीके सजा देते, नागरिक मामलों का अपराधीकरण करते और अंग्रेजों के जमाने के मूल्यों को ढोते दिखते हैं।