आजीविका
खंडवा की रीठी बाई ने कोदो उगाना क्यों बंद कर दिया?
2016 में रीठी बाई के घर के लोग और मवेशी कोदो खाने से बीमार हो गए। जिसके बाद उन्होंने कोदो उगाना बंद कर दिया। उनके गांव के लोग चाहते हैं कि सरकार उन्हें कोदो के ‘सुरक्षित बीज’ दे ताकि वह इसे फिर से उगा सकें।बदलते मौसम और सिकुड़ती ज़मीन के बीच मामित के झूम किसान
मिज़ोरम के मामित में झूम किसान अनिश्चित मौसम, चूहों के बढ़ते हमलों और बागान खेती के असफल प्रयोग के बीच एक बड़े संकट का सामना कर रहे हैं। फोटो निबंध: मुनाफे के वादे और जोखिमों के बीच फूलों के किसान
लखनऊ के मलिहाबाद और काकोरी क्षेत्र में पारंपरिक रूप से फूलों की खेती करने वाले छोटे और सीमांत किसान आज भी मौसम, बाज़ार और बुनियादी ढांचे की चुनौतियों से जूझ रहे हैं। त्योहारों में फसलों के ऊंचे दाम मिलने के बावजूद सालभर अनिश्चितता बनी रहती है।शिक्षा से रोज़गार तक: युवा श्रम बल पर एपीयू रिपोर्ट के 6 मुख्य बिंदु
सामाजिक क्षेत्र की संस्थाओं के लिए यह रिपोर्ट विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि यह युवाओं, शिक्षा व रोज़गार को व्यापक संदर्भ में प्रस्तुत करती है। नीतिगत समझ बेहतर बनाने के साथ-साथ यह हस्तक्षेप की दिशा तय करने में भी सहायक है।कॉमन्स और बाजार के बीच कहां खड़े हैं वन आश्रित समुदाय?
समुदायों की बाज़ार में समान भागीदारी सुनिश्चित करने वाली व्यवस्थाओं को मजबूत करने के साथ यह तय करना भी जरूरी है कि वन और प्रकृति, बाजार की ताकतों के अधीन न हो जाएं।न छांव, न सुरक्षा: दिल्ली के लेबर चौकों पर मजदूरों का संघर्ष
दिल्ली के लेबर चौकों पर काम करने वाले मजदूरों को उम्र के आधार पर भेदभाव, कम मजदूरी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में संघर्ष करना पड़ता है। जानें, कैसे निष्क्रिय कल्याणकारी राशि के उपयोग से इन्हें बेहतर बनाया जा सकता है।वन प्रबंधन के लिए समुदाय व शासन में बेहतर समन्वय की जरूरत
झारखंड में सामुदायिक वन अधिकार के तहत ग्रामसभाएं जंगल के संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी निभा रही हैं। इससे जंगल बचाने के साथ ग्रामीणों की आजीविका भी मजबूत हो रही है।कड़े श्रम कानून कैसे बनते हैं प्रगति में बाधा?
पुलियाबाजी के इस पॉडकास्ट में जानिए कि श्रम कानूनों में आए बदलाव कौन से जरूरी सवाल उठाते हैं, जिनके जवाब तलाशा जाना महत्वपूर्ण है।जातिवाद और कच्ची नौकरियों से जूझते भारत के सफाई कर्मचारी
शहरी भारत में स्वच्छता सेवाओं के निजीकरण के साथ जातिवाद की जड़ें, मजदूरी में कटौती, और दलित कामगारों पर सामाजिक संकट गहराते जा रहे हैं।रोजगार के सवाल पर 2026 का बजट क्या कहता है?
बजट 2026 के रोजगार दावे मनरेगा, मजदूरी और सरकारी योजनाओं की जमीनी सच्चाइयों से मेल खाते नहीं दिखते। असंगठित श्रमिकों के हालात दर्शाते हैं कि कौशल विकास के बावजूद स्थायी रोजगार अब भी एक दूर का लक्ष्य है।कश्मीर घाटी से क्यों गुम हो रहे हैं पारंपरिक धान के खेत और उनकी खुशबू?
परंपरागत रूप से चावल की खेती करने वाले किसान, सेब की बागवानी की ओर रुख कर रहे हैं। खेती की जमीनों पर बनते रिहाइशी और गैर-रिहाइशी इलाके भी धान के रकबे को घटा रहे हैं।