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शिक्षा से रोज़गार तक: युवा श्रम बल पर एपीयू रिपोर्ट के 6 मुख्य बिंदु

सामाजिक क्षेत्र की संस्थाओं के लिए यह रिपोर्ट विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि यह युवाओं, शिक्षा व रोज़गार को व्यापक संदर्भ में प्रस्तुत करती है। नीतिगत समझ बेहतर बनाने के साथ-साथ यह हस्तक्षेप की दिशा तय करने में भी सहायक है।
शिक्षा से रोज़गार तक: युवा श्रम बल पर एपीयू रिपोर्ट के 6 मुख्य बिंदु

भारत सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश होने के साथ-साथ, युवाओं की सबसे अधिक आबादी वाला देश भी है। इसे देश की एक बड़ी ताकत माना जाता रहा है। लेकिन युवाओं की क्षमताओं का सही उपयोग शिक्षा और रोज़गार तक उनकी विस्तृत पहुंच और इनकी गुणवत्ता पर निर्भर करता है।

अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की हाल ही में आई रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026’ इसी का विश्लेषण करती है। यह पिछले चार दशकों में भारत में शिक्षा और रोज़गार के बदलते संबंधों को समझने का प्रयास करती है और इन्हें जाति, वर्ग और लिंग (जेंडर) जैसी सामाजिक विषमताओं के परिप्रेक्ष्य में गहराई से परखती है।

रिपोर्ट, आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस), राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (एनएसएस) जैसे भारत सरकार के प्रमुख सर्वेक्षणों और ई-श्रम डेटाबेस जैसे आंकड़ों के द्वितीयक स्रोतों का इस्तेमाल करते हुए एक व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें 1983 से लेकर 2023 तक चार दशकों को समेटते हुए शिक्षा, रोज़गार और श्रम बाज़ार में हुए महत्वपूर्ण परिवर्तनों को समझने का प्रयास किया गया है।

सामाजिक क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं के लिए यह रिपोर्ट विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि यह युवाओं, शिक्षा और रोजगार से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को व्यापक संदर्भ में प्रस्तुत करती है। रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष नीतिगत समझ को मजबूत करने के साथ-साथ हस्तक्षेप की दिशा तय करने में भी सहायक हो सकते हैं।

इसमें वर्णित कई बिंदु ऐसे हैं, जो संस्थाओं को अपने लक्षित समूहों की जमीनी वास्तविकताओं को बेहतर तरीके से समझने का अवसर देते हैं। साथ ही, यह विश्लेषण संगठनों को अपने कार्यक्रमों और रणनीतियों को अधिक प्रभावी और संदर्भ-संगत बनाने में मदद कर सकता है। नीचे दिए गए बिंदु रिपोर्ट में प्रस्तुत विश्लेषण का सार हैं, जिन्हें प्रमुख निष्कर्षों के रूप में भी देखा जा सकता है:

युवा श्रम बल के लिए ज़रूरी हैं गुणवत्तापूर्ण रोज़गार के अवसर

2004 के बाद से हर वर्ष लगभग 1.3 करोड़ भारतीय देश के श्रम बल में शामिल हुए हैं। इस बढ़त को आर्थिक शक्ति में बदलने में रोज़गार की भूमिका महत्वपूर्ण है। 15 से 29 वर्ष के युवा इस श्रम बल का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अगर शिक्षार्थियों को छोड़ दें तो इन युवाओं की संख्या करीब 26.3 करोड़ है, जो देश के कार्यशील आयु वर्ग का लगभग एक तिहाई है।

भारत में जनसंख्या के तेज़ी से बदलते हुए पैटर्न के कारण आने वाले समय में बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ेगी। इसके साथ ही युवाओं पर बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी की ज़िम्मेदारी भी बढ़ेगी। ऐसा अनुमान है कि 2011 से 2036 के बीच कुल जनसंख्या में 60 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों की संख्या 8.4% से बढ़कर 14.9% हो जाएगी। वहीं कार्यबल में 15–59 वर्ष के कार्यशील आयु वर्ग की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत धीमी गति से 60.7% से बढ़कर 64.9% तक ही पहुंचेगी। इसका सीधा-सा अर्थ है कि कामकाजी लोगों पर निर्भर लोगों की संख्या बढ़ेगी। साथ ही, आज के युवाओं की वृद्धावस्था में उनका सहारा बन सकने वाले कमाने वाले युवा भी कम होते जा रहे हैं।

इस संदर्भ में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि युवाओं को अपने करियर की शुरुआत में ही सुरक्षित, स्थिर और सम्मानजनक आय वाले रोज़गार मिलें, ताकि वे अपने जीवन की स्थिरता सुनिश्चित करने के साथ-साथ उन पर निर्भर लोगों की जिम्मेदारियां भी उठा सकें। वर्तमान में रोज़गार की स्थिति कमज़ोर होना, भविष्य की आर्थिक वृद्धि पर नकारात्मक असर डाल सकता है।

साइकिल की गद्दी पर कॉपी में कुछ लिखते हुए एक व्यक्ति_युवा श्रम बल
वर्तमान में रोज़गार की स्थिति कमज़ोर होना, भविष्य की आर्थिक वृद्धि पर नकारात्मक असर डाल सकता है। | चित्र साभार: पेक्सेल्स 

जनसांख्यिकीय लाभांश और शिक्षा, कौशल व रोज़गार के बीच हो बेहतर तालमेल

किसी भी देश के आर्थिक विकास और जनसंख्या के बीच गहरा संबंध होता है, जिसे नीतिगत फैसले प्रभावित करते हैं। सही नीतियां उच्च आर्थिक वृद्धि, स्वास्थ्य व शिक्षा की बेहतर सुविधाओं को बढ़ावा दे सकती हैं और जनसंख्या वृद्धि को संतुलित कर सकती हैं। आबादी की आयु संरचना भी आर्थिक विकास की दिशा तय करती है। कुल आबादी में आश्रित लोग (जैसे कि बच्चे या बुज़ुर्ग) ज़्यादा होने पर उपभोग बढ़ता है और बचत कम होती है। वहीं आबादी में कार्यशील आयु वर्ग के अधिक होने और उन्हें गुणवत्तापूर्ण उत्पादक रोज़गार मिलने से बचत में इज़ाफा होता है। इससे उत्पादकता बढ़ती है और बेहतर आर्थिक वृद्धि का रास्ता तैयार होता है।

इसी संदर्भ में ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ (डेमोग्राफिक डिविडेंड) की अवधारणा सामने आती है, जो उस अस्थायी स्थिति को दर्शाती है जब किसी देश या क्षेत्र में कार्यशील आयु वर्ग की हिस्सेदारी बढ़ती है और उन पर निर्भर लोगों का अनुपात घटता है।

हालांकि, यह लाभांश स्वतः प्राप्त नहीं होता। यह संभावित विकास का एक घटक है, जो इस पर निर्भर करता है कि अर्थव्यवस्था अतिरिक्त कार्यबल को कितने प्रभावी और उत्पादक तरीके से रोज़गार दे पाती है। शिक्षा, कौशल, रोज़गार सृजन और सुशासन में पर्याप्त निवेश नहीं किए जाने से यह अवसर व्यर्थ भी हो सकता है। इसके अलावा, यह अवसर एक सीमित अवधि के लिए ही होता है। विशेष रूप से विकासशील या मध्यम आय वाले देशों में जनसंख्या वृद्धि के पैटर्न में बदलाव आने और बुज़ुर्गों की आबादी बढ़ने पर यह लाभांश घटता जाता है।

श्रम बाज़ार में संरचनात्मक बदलाव का अभाव

भारत में पिछले चार दशकों में श्रम बाज़ार में वैसा बड़ा संरचनात्मक बदलाव नहीं हो पाया है जैसा अपेक्षित था। कृषि से निकलने वाले श्रमिक उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्रों में जाने के बजाय निर्माण और कम उत्पादक सेवाओं जैसे असंगठित कामों में ही केंद्रित हो गए हैं। वैतनिक रोज़गार का हिस्सा बढ़ा तो है, लेकिन आय में ठहराव और काम की अस्थिरता भी बढ़ी है। आज के युवा पहले से अधिक स्वस्थ और शिक्षित हैं, जिससे उनकी उत्पादकता और आकांक्षाएं दोनों बढ़ी हैं। वे कम गुणवत्ता वाले कामों के बजाय बेहतर अवसरों की तलाश में अधिक समय तक इंतजार कर सकते हैं। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ने पर उन्हें जो रोज़गार उपलब्ध होता है उसे ही अपनाना पड़ता है।

सड़क किनारे खड़े ट्रक और रेहड़े के बराबर में छोटे स्टूल पर आराम की मुद्रा में बैठा एक व्यक्ति_युवा श्रम बल
वर्तमान में रोज़गार की स्थिति कमज़ोर होना, भविष्य की आर्थिक वृद्धि पर नकारात्मक असर डाल सकता है। | चित्र साभार: पेक्सेल्स

लिंग, जाति, वर्ग और धर्म जैसे सामाजिक कारक अब भी रोज़गार के अवसरों और काम के प्रकार को प्रभावित करते हैं, हालांकि समय के साथ इनमें कुछ ढील भी आई है। हाल के वर्षों में कृषि में रोज़गार की हिस्सेदारी और कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि जैसे नए रुझान भी सामने आए हैं। तकनीकी बदलाव और एआई रोज़गार की प्रकृति को बदल रहे हैं, जिससे युवाओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।

उच्च शिक्षा की उपलब्धता और रोज़गार के सीमित अवसर

शिक्षा को अक्सर बेहतर रोज़गार और अधिक आय प्राप्त करने के साधन के रूप में देखा जाता है। लेकिन यह एक ज़रूरी सवाल है कि किसे, किस तरह की शिक्षा तक पहुंच मिलती है। श्रम के बाज़ार में आने से पहले लिए गए निर्णय, जैसे क्या पढ़ें, कहां पढ़ें और कितने समय तक पढ़ें, एक व्यक्ति के जीवन भर के रोज़गार और आय को गहराई से प्रभावित करते हैं।

पिछले चार दशकों में भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव आया है। 1990 के दशक से पहले तक यह मुख्यतः सरकारी संस्थानों तक ही सीमित थी। लेकिन 1990 के दशक के बाद बड़ी तादाद में निजी संस्थान खुले। आज यह दुनिया की सबसे बड़ी शिक्षा प्रणालियों में से एक है, जिसके 58,000 से अधिक संस्थानों में 4.3 करोड़ से अधिक छात्र नामांकित हैं। इनमें से लगभग दो-तिहाई निजी संस्थान हैं।

लेकिन यह विस्तार भी समान नहीं रहा है। भौगोलिक, सामाजिक और संस्थागत स्तर पर इसमें असमानताएं स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। कॉलेजों की संख्या में तो कई गुना वृद्धि हुई है, लेकिन यह सवाल अब भी जस का तस बना हुआ है कि इस प्रणाली तक किसकी पहुंच है और कौन इसका खर्च उठा सकता है।

इस संदर्भ में उच्च शिक्षा के परिदृश्य को तीन प्रमुख आयामों में समझा जा सकता है। पहला, संस्थानों की उपलब्धता, जिसमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की भूमिका शामिल है। दूसरा, नामांकन के पैटर्न जो यह दर्शाते हैं कि लिंग, जाति, क्षेत्र और आर्थिक वर्ग के आधार पर शिक्षा तक पहुंच किस प्रकार भिन्न है। और तीसरा, शिक्षा की लागत जो यह तय करती है कि कौन किस प्रकार की शिक्षा प्राप्त कर सकता है।

कौशल प्रशिक्षण और आईटीआई का विस्तार व चुनौतियां

उच्च शिक्षा के समान ही कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों का भी तेज़ी से विस्तार हुआ है, जिसमें औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) महत्वपूर्ण हैं। 1950 में शुरू की गई क्राफ्ट्समैन ट्रेनिंग स्कीम के तहत स्थापित आईटीआई का उद्देश्य उद्योगों के लिए प्रशिक्षित कार्यबल तैयार करना, उत्पादकता बढ़ाना और युवाओं में बेरोज़गारी कम करना था।

आज़ादी के बाद तेज़ी से विकसित होते उद्योगों को कुशल श्रमिक चाहिए थे, लेकिन पारंपरिक शिक्षा प्रणाली से ऐसे श्रमिक नहीं मिल पा रहे थे। ऐसे में आईटीआई को औद्योगीकरण और रोज़गार से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के रूप में देखा गया था। आज देशभर में लगभग 15,000 आईटीआई संस्थान हैं, जो 150 से अधिक ट्रेड्स में प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।

मिट्टी की ईंटों को लगाते हुए चार श्रमिक_युवा श्रम बल
वर्तमान में रोज़गार की स्थिति कमज़ोर होना, भविष्य की आर्थिक वृद्धि पर नकारात्मक असर डाल सकता है। | चित्र साभार: पेक्सेल्स 

इस विस्तार के बावजूद कई चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। जैसे, प्रशिक्षण की गुणवत्ता, प्रशिक्षकों की कमी, और आईटीआई से निकले श्रमिकों में उद्योग द्वारा वांछित कौशलों का ना होना। इस प्रकार, आईटीआई प्रणाली ने अवसरों का विस्तार तो किया है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए संरचनात्मक सुधार की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है।

आसान नहीं है शिक्षा से रोज़गार तक का सफर

स्कूल या कॉलेज से निकलकर रोज़गार में प्रवेश का चरण व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यह युवाओं को आय और अनुभव अर्जित करने का अवसर देता है। भारत में शिक्षित युवाओं में बेरोज़गारी की उच्च दर यह दर्शाती है कि यह संक्रमण (ट्रांज़िशन) अक्सर सहज और प्रभावी नहीं है, और कई स्नातक लंबे समय तक बेरोज़गार रहते हैं।

इस प्रक्रिया को समझना जटिल है क्योंकि यह मापना आसान नहीं है कि कौन सचमुच में बेरोज़गार है और कौन रोज़गार के लिए अनुपलब्ध है। सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले युवा, खुद को बेरोज़गार कहने के बजाय या तो छात्र कहते हैं या खुद को श्रम बल से बाहर बताते हैं। यह ‘इंतज़ार’ आज के युवा श्रम बाज़ार की एक महत्वपूर्ण विशेषता बन चुका है।

लेकिन सभी युवाओं के पास बेहतर नौकरी के लिए प्रतीक्षा करने की सुविधा नहीं होती है। आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के युवा अक्सर किसी भी काम को स्वीकार कर लेते हैं, जिससे ‘अल्प-रोज़गार’ (अंडरएम्पलॉयमेंट) की स्थिति उत्पन्न होती है। इसके तहत भविष्य में बेहतर अवसर मिलने की उम्मीद में वे अपनी योग्यता से कम स्तर के काम स्वीकार कर लेते हैं। हालांकि, यह हमेशा बेहतर अवसरों तक पहुंच का मार्ग नहीं बन पाता।

महिलाओं के संदर्भ में यह स्थिति और भी जटिल है क्योंकि वे अक्सर खुद को बेरोज़गार न बताकर, श्रम बल से बाहर बताती हैं। इस तरह भारत में शिक्षा से रोज़गार तक पहुंच पाना बहु-आयामी चुनौतियों से घिरा हुआ है, जिसके लिए बेहतर नीतिगत समझ और हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

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