आजीविका

जिन साड़ियों को मैं रोज बुनती हूं, वे आज भी मेरी पहुंच से बाहर हैं

कोयंबटूर जिला, तमिलनाडु

“हमसे कहा गया था कि भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग मिलने के बाद हमारी जिंदगी बदल जाएगी। लेकिन आप ही बताइए न। हमारे लिए क्या बदला है?” तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के नेगमम कस्बे के तीसरी पीढ़ी के हथकरघा बुनकर नागराज सवाल करते हैं। नागराज पिछले 30 वर्षों से नेगमम की सूती साड़ियां बुन रहे हैं। उनके परिवार के अन्य सदस्य भी यही काम करते हैं।

कोयंबटूर जिले के पोलाची, नेगमम, किनाथुकडावु और सुलूर क्षेत्रों में हथकरघा बुनाई का परंपरागत काम दो सदियों से भी अधिक समय से फलता-फूलता रहा है। लगभग तीन दशक पहले इस क्षेत्र में 4,650 से अधिक हथकरघा यूनिट थी। लेकिन आज, जब युवा पीढ़ी स्थिर आजीविका की तलाश में इस पेशे से दूर जा रही है, यह संख्या घटकर लगभग 1,700 रह गयी है।

मार्च 2023 में नेगमम कॉटन हैंडलूम साड़ियों को ‘भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग’ प्राप्त हुआ। यह एक कानूनी मान्यता है, जो उन उत्पादों को दी जाती है जिनकी गुणवत्ता और प्रतिष्ठा किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती है। उस समय यह उम्मीद की जा रही थी कि इस टैग से साड़ियों की मांग बढ़ेगी, मजदूरी बेहतर होगी और बुनकरों को पहचान मिलेगी। लेकिन नागराज कहते हैं कि लगभग दो साल बाद, “हमारी आमदनी भी वही है और हमारी मुश्किलें भी वैसी ही हैं।”

एक नेगमम सूती साड़ी बुनने में नागराज को पूरे दो दिन लगते हैं। वह सुबह 7 बजे से लेकर शाम तक काम करते हैं। इस बीच वह केवल दोपहर के भोजन के लिए रुकते हैं। इसके बावजूद, उन्हें प्रति साड़ी केवल 1,000 से 1,250 रुपये ही मिलते हैं। उनके परिवार की मासिक आय, जो पूरी तरह बुनाई पर निर्भर है, 12,000 से 15,000 रुपये के बीच है।

सरकारी और सहकारी संस्थाओं से मिलने वाले ऑर्डर अनियमित रहते हैं, और भुगतान में भी अक्सर देरी हो जाती है। नागराज बताते हैं, “कुछ महीनों में तो बस सात या नौ साड़ियां ही बुनने को मिलती हैं। अब मैं निजी कपड़ा दुकानों पर निर्भर हो गया हूं। वे कभी-कभी थोड़ा कम दाम देते हैं, लेकिन कम-से-कम समय पर भुगतान तो करते हैं।”

इसी क्षेत्र की एक और बुनकर, दीपानंधिनी, बीते लगभग 20 वर्षों से नेगमम की सूती साड़ियां बुन रही हैं। यह हुनर उन्हें अपने परिवार की तीन पीढ़ियों से विरासत में मिला है। वह कहती हैं, “बुनाई हमारे लिए कोई पेशा नहीं है। यह तो हमारी नियति है। लेकिन इस काम को पूरी जिंदगी देने के बाद भी हम गरीबी से बाहर नहीं निकल पाए हैं।”

दीपानंधिनी और उनके पति दो दिन की साझा मेहनत के बाद एक साड़ी तैयार कर पाते हैं, जिसके एवज में उन्हें 1,100 रुपये मिलते हैं। वह कहती हैं, “इस पूरे काम में हमें छोड़कर सब अच्छी कमाई करते हैं।” उनकी बनायी साड़ियां बाजार में 2,500 से 4,000 रुपये के बीच बिकती हैं।

वह बताती हैं, “मैंने आज तक सिर्फ एक बार अपनी बेटी की शादी में नेगमम की सूती साड़ी पहनी है। तब भी हमने सबसे सस्ती साड़ी खरीदी थी। जिन साड़ियों को मैं रोज बुनती हूं, वे आज भी मेरी पहुंच से बाहर हैं।”

नागराज और दीपानंधिनी जैसे तमाम बुनकरों को जीआई टैग से काफी उम्मीदें थी। लेकिन चेन्नई में जीआई पंजीकरण प्रक्रिया से जुड़े एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी बताते हैं, “जीआई टैग केवल उत्पाद के भौगोलिक मूल की पुष्टि करता है। इससे न तो रातोंरात मजदूरी बढ़ती है, न ही बाजार खड़ा होता है। जब तक मजबूत ब्रांडिंग, खरीदारों से सीधा जुड़ाव और निरंतर सरकारी समर्थन न हो, तब तक जीआई टैग एक प्रतीक से ज्यादा कुछ नहीं है।”

इन्हीं परिस्थितियों के चलते अब बुनकर अपने बच्चों को इस पेशे में नहीं देखना चाहते। दीपानंधिनी कहती हैं, “हम अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं, ताकि वे हमारी तरह करघे से न बंधे रह जायें। यहां लगभग सभी बुनकरों के बच्चे अब दूसरे पेशों में जा चुके हैं।”

वह ठहरकर कहती हैं, “अगर हालात नहीं बदले, तो शायद हमारी पीढ़ी नेगमम के बुनकरों की आखिरी पीढ़ी साबित होगी।”

प्रशांत तमिलनाडु में स्थित एक मल्टीमीडिया पत्रकार हैं।

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लेखक के बारे में

  • प्रशांत शन्मुगसुंदरम तमिलनाडु के एक मल्टीमीडिया पत्रकार हैं। उन्होंने बीबीसी न्यूज और डॉयचा वेला जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है, और तमिलनाडु, केरल तथा कर्नाटक में राज्य संवाददाता की भूमिका भी निभायी है। प्रशांत जलवायु परिवर्तन, सामाजिक न्याय, राजनीति, समानता और अपराध जैसे विविध मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।