प्रारंभिक शिक्षा की नींव पर पुनर्विचार
सुबह के तकरीबन 10 बज रहे हैं। मीता* कक्षा की शुरूआत करती हैं। सभी छात्र कतार में बैठे हैं और उनकी नोटबुक खुली हुई हैं। मीता ब्लैकबोर्ड पर एक छोटा-सा पैराग्राफ लिखती हैं, जिसे वह ज़ोर से पढ़ती जाती हैं। उनकी उंगली हर शब्द के साथ चलती जा रही है।
“अब मेरे बाद दोहराएं।” यह सुनते ही पूरी कक्षा एक साथ जवाब देती है। उनकी आवाज़ें एक लय में उठनी शुरू होती हैं। कुछ बच्चे थोड़ी देर से बोलते हैं; वे पहले मीता के होंठों की हरकत देखते हैं, और फिर साथ में बोलना शुरू करते हैं।
“कहानी में लड़के का नाम क्या है?” कई हाथ उठते हैं। वह इशारा करती हैं कि पूरी कक्षा मिलकर जवाब दे। छात्रों का स्वर एकसाथ गूंजता है और वह सहमति में सिर हिलाती हैं।
“अब कहानी को अपनी नोटबुक में कॉपी करिए।”
इस बहु-स्तरीय कक्षा (मल्टीग्रेड क्लासरूम) का हिस्सा बने कक्षा 1 के कुछ छोटे बच्चे इसी कमरे में पीछे की ओर अपनी स्लेट लेकर बैठे हुए हैं। मीता उनके पास जाती है और उन्हें गणित का एक सवाल समझाने लगती हैं। बड़े बच्चे लिखते रहते हैं। एक लड़की क्षणभर ऊपर देखती है, फिर नज़रें झुका लेती है। दो बच्चे अपनी घरेलू भाषा में धीरे से कुछ फुसफुसाते हैं और फिर चुप हो जाते हैं।
जैसे-जैसे सुबह बीतती है, कक्षा में कोई गहन विचार-विमर्श नज़र नहीं आता और न ही छात्र खुद से कुछ लिखते दिखाई देते हैं। कई बार कुछ छात्र काम कर रहे होते हैं, जबकि दूसरे लंबे समय तक अपनी बारी का इंतज़ार करते रहते हैं। ज़्यादातर छात्र तभी बोलते हैं जब उनसे कुछ पूछा जाता है, और वे अक्सर समूह में जवाब देते हैं। ऐसे ‘सामूहिक जवाबों’ से यह समझ पाना मुश्किल होता है कि हर छात्र वास्तव में क्या सोच रहा है, उसके मन में कौन-से सवाल अब भी बाकी हैं, या वह पढ़ाई जा रही बात को कितनी गहराई से समझ पा रहा है।
टीचिंग लर्निंग प्रैक्टिसेज़ सर्वे (टीएलपीएस) 2025 के दौरान देखी गयी कई बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान (एफएलएन) कक्षाओं में ऐसे दृश्य बार-बार सामने आए—जहां बच्चों की भागीदारी अक्सर सिर्फ सामूहिक जवाबों तक सीमित थी, लिखने का काम अधिकतर किताब या बोर्ड से नकल करने पर आधारित था, और पाठ (लेसन) के दौरान बच्चों को रुक-रुककर पढ़ाया जाता था।
पिछले कुछ वर्षों में एफएलएन भारत के शिक्षा सुधार एजेंडा के केंद्र में रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, निपुणभारत मिशन और बड़े पैमाने पर आकलनों के माध्यम से प्रारंभिक शिक्षा (अर्ली लर्निंग) को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में स्थापित किया गया है। लर्निंग परिणामों को लक्ष्यों के आधार पर मापा जा रहा है और इसमें हो रही प्रगति को रिपोर्ट किया जा रहा है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक अहम सवाल अब भी बना हुआ है: हमारी कक्षाओं की चारदीवारी के भीतर क्या हो रहा है?
लैंग्वेज एंड लर्निंग फाउंडेशन के नेतृत्व में, टाटा ट्रस्ट्स की वित्तीय सहायता और साझेदार शैक्षिक संगठनों के सहयोग से किए गए टीएलपीएस 2025 का उद्देश्य इसी सवाल पर ठोस और व्यवस्थित समझ विकसित करना था। यह सर्वे भारत के नौ राज्यों की कक्षा 1 और 2 की 1,050 कक्षाओं में आयोजित किया गया। यह ज़मीनी स्तर पर बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान (एफएलएन) की पढ़ाई की एक व्यापक तस्वीर सामने लाता है। यह सर्वे इस बात पर ध्यान देता है कि कक्षा में पढ़ाई के दौरान शिक्षक और बच्चे वास्तव में क्या करते हैं—वे किस तरह बातचीत करते हैं, भाषा का उपयोग कैसे होता है, बच्चों को किस तरह की गतिविधियां दी जाती हैं, और कक्षा का समय किस तरह व्यवस्थित किया जाता है।
यह सर्वे एक बुनियादी सच्चाई को भी उजागर करता है: मौजूदा समय में कई कक्षाओं में वह संबंधपरक (रिलेशनल) और शिक्षणात्मक (पेडागॉजिकल) आधार कमज़ोर नज़र आता है, जिसकी मदद से बच्चे धीरे-धीरे स्वतंत्र रूप से पढ़ना, लिखना और सोचना सीखते हैं। आज जब भारत सभी बच्चों के लिए बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान (एफएलएन) सुनिश्चित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, ये निष्कर्ष हमें ठहरकर यह सोचने का अवसर देते हैं कि क्या हमारी शुरुआती शिक्षा की नींव वास्तव में पर्याप्त रूप से मज़बूत है?
सीखने की शुरुआत रिश्तों से होती है
विकास संबंधी शोध लगातार यह बताते रहे हैं कि छोटे बच्चे रिश्तों और जुड़ाव से भरे माहौल में सीखते और विकसित होते हैं। ये रिश्ते सीखने की प्रक्रिया (लर्निंग) के बाहर की चीज़ नहीं, बल्कि उसके सबसे अहम आधार हैं। सुरक्षित और संवेदनशील संवाद बच्चों के भावनात्मक सुख, सीखने की इच्छा, आत्मविश्वास और बौद्धिक भागीदारी को आकार देते हैं। इसलिए शुरुआती वर्षों की शिक्षा को उस संबंधपरक परिवेश से अलग करके नहीं देखा जा सकता, जिसमें वह घटित होती है।
टीएलपीएस ने इसी दृष्टिकोण से कक्षाओं के वातावरण का अध्ययन किया। इसमें शिक्षक-छात्र संवाद, भागीदारी के अवसर, और छात्रों के घरेलू भाषाओं के उपयोग पर विशेष ध्यान दिया गया। निष्कर्ष बताते हैं कि छात्रों की भागीदारी प्रायः छोटे या पूरे समूह द्वारा दिए जाने वाले सामूहिक उत्तरों तक सीमित थी। लगभग 66 प्रतिशत कक्षाओं में छात्र अधिकतर शांत थे, जहां बातचीत, चर्चा या एक-दूसरे से सीखने के अवसर बहुत सीमित थे। इसके अलावा, 73 प्रतिशत शिक्षकों के यह बताने के बावजूद कि वे छात्रों की घरेलू भाषा समझते हैं, केवल 10 प्रतिशत शिक्षक ही छात्रों की भागीदारी और समझ को बेहतर बनाने के लिए इन भाषाओं का लगातार उपयोग कर रहे थे।
कक्षा में शांत रहना अपने-आप में कोई समस्या नहीं है। लेकिन जब किसी छात्र की चुप्पी सीमित भागीदारी को दर्शाती हो, तो इसका अर्थ यह हो सकता है कि वह अर्थ-निर्माण (मीनिंग-मेकिंग) की प्रक्रिया में शामिल नहीं हो रहा है।
यह संभव है कि कक्षा के भीतर मौजूद संबंधों की बारीकियां, या जाति, वर्ग और जेंडर से जुड़े पूर्वाग्रह, टीएलपीएस 2025 जैसे सर्वे में पूरी तरह सामने न आ पाएं। फिर भी इतना साफ है कि जो छात्र खुद को सहज (विशेषकर जब उन्हें लगे कि उनकी बात नहीं सुनी जाती) महसूस नहीं करते, वे नए शब्दों को पढ़ने, सवाल पूछने या अपने विचार साझा करने जैसे बौद्धिक जोखिम लेने से कतराने लगते हैं। जब छात्रों की भागीदारी केवल सुनने और दोहराने तक सीमित हो जाती है, तो लर्निंग एक विचारपूर्ण प्रक्रिया बनने के बजाय एक यांत्रिक अभ्यास में बदल जाती है।
बच्चों की घरेलू भाषाओं का सीमित उपयोग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उभरती साक्षरता (इमर्जेंट लिटरेसी) का दृष्टिकोण यह बताता है कि पढ़ने और लिखने के कौशल, मौखिक भाषा की बुनियाद पर विकसित होते हैं। जब बच्चों की सबसे परिचित भाषा कक्षा से बाहर ही रह जाती है, तो वे ख़ुद को अलग-थलग महसूस कर सकते हैं, जिसका प्रतिकूल प्रभाव कक्षा में उनकी भागीदारी, जुड़ाव और समझ पर पड़ता है।
शिक्षक और छात्रों के बीच संबंधों को मज़बूत करना तथा छात्रों द्वारा भाषाई संसाधनों का उपयोग करना कोई वैकल्पिक बात नहीं है। ये मूलभूत लर्निंग की बुनियादी शर्तें हैं।
कक्षा में संवाद को सीखने की बुनियाद के रूप में स्थापित करना
कई स्कूलों में बातचीत को शायद ही कभी महत्व दिया जाता है। छोटे बच्चों के लिए इसे सुनियोजित तरीके से विकसित करना अभी दूर की बात है। संवाद बच्चों की तर्क क्षमता और समझ को विकसित करने में प्रमुख भूमिका निभाता है और उनके अधिकांश लर्निंग अनुभवों की नींव बनता है।
उद्देश्यपूर्ण चर्चा के माध्यम से बच्चे विचारों को जोड़ना और उन्हें परिष्कृत करना सीखते हैं, निष्कर्ष निकालते हैं, कारण प्रस्तुत करना सीखते हैं, और वाक्यों को अपने जीवन के अनुभवों से जोड़ते हैं। लेकिन जब वाक्यों और विचारों पर होने वाली बातचीत केवल छोटे तथ्यात्मक आदान-प्रदानों (जैसे प्रश्न–उत्तर–मूल्यांकन की प्रक्रिया) तक सीमित रह जाती है, और प्रमुख विचारों पर लंबी चर्चा नहीं होती, तब बच्चों में गहरी तर्क क्षमता विकसित नहीं हो पाती।
सर्वेक्षण के निष्कर्ष बताते हैं कि अधिकांश शिक्षण संवाद एक परिचित ढर्रे का पालन कर रहे थे: शिक्षक पूरी कक्षा से प्रश्न पूछते, बच्चे सामूहिक रूप से उत्तर देते, और फिर पाठ (लेसन) आगे बढ़ जाता। इस प्रकार के सामूहिक उत्तर छात्रों के मन में पैदा होने वाली शंकाओं को नज़रअंदाज़ करते हैं और व्यक्तिगत सोच को विकसित करने में कतई सहायक नहीं होते। जहां शिक्षक किसी एक छात्र से प्रश्न पूछते भी थे, वहां वे उसके उत्तर की प्रतीक्षा बहुत कम करते थे या छात्रों के उत्तर के आधार पर आगे चर्चा को नहीं बढ़ाते थे। शिक्षक कभी-कभी ओपन-एंडेड, यानी व्यापक सवाल (‘क्यों?’, ‘कैसे?’ या ‘तुम क्या सोचते हो?’) पूछते थे, लेकिन बच्चों की विस्तृत चर्चा में भागीदारी बहुत कम थी।
संवाद की संस्कृति विकसित करने के लिए केवल सवाल पूछना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए शिक्षकों को छात्रों को सोचने का समय देना होगा, ‘क्यों’ और ‘कैसे’ जैसे सवालों के माध्यम से उनकी प्रतिक्रियाओं को और गहराई से समझना होगा, विविध प्रतिक्रियाओं और दृष्टिकोणों को स्वीकार करना होगा (जो वाक्य, कहानी या गणितीय तथ्यों पर आधारित हों); और बच्चों को एक-दूसरे के विचारों पर प्रतिक्रिया देकर अपनी सोच विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा।
यदि बुनियादी लर्निंग में समझ, अनुप्रयोग और आलोचनात्मक तर्क जैसे उच्च-स्तरीय वैचारिक कौशल शामिल करने हैं—जैसा कि वर्तमान नीतिगत ढांचे संकेत देते हैं—तो कक्षाओं में लंबे और अर्थपूर्ण संवाद के लिए अधिक सुनियोजित परिवेश तैयार करना होगा।
अभिव्यक्ति के लिए लिखना, सीखने की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है
सर्वेक्षण का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष छात्रों को दिए जाने वाले लेखन कार्यों से जुड़ा था। तीन-चौथाई से अधिक शिक्षक छात्रों को ब्लैकबोर्ड या पाठ्यपुस्तक से अक्षर और शब्द उतारने को कहते थे। छात्रों के पास अपने खुद के बनाए हुए वाक्य, चाहे वे छोटे या प्रारंभिक प्रकृति के ही क्यों ना हों, लिखने के अवसर बहुत सीमित थे।
यह पैटर्न दो सामान्य धारणाओं पर आधारित नज़र आता है:
● लिखने से पहले पढ़ना आवश्यक है: बच्चों को अर्थपूर्ण तरीके से लिखने के लिए पहले पूरी लिपि सीखनी चाहिए और धाराप्रवाह पढ़ना आना चाहिए।
● लिखना केवल सोचने के बाद की प्रक्रिया है: अक्सर यह मान लिया जाता है कि विचार पूरी तरह मन में बनते हैं और लिखना बस उन्हें दर्ज करने का एक तरीका भर है। जबकि वास्तव में लिखना स्वयं सोचने और विचारों को आकार देने की एक सक्रिय प्रक्रिया है।
कई शोध इन दोनों धारणाओं को चुनौती देते हैं। पढ़ना और लिखना भले ही अलग-अलग प्रक्रियाएं हों, लेकिन दोनों के बीच बुनियादी स्तर से ही गहरा संबंध होता है। उदाहरण के लिए, जिस ज्ञान-आधार (नॉलेज बेस) का उपयोग बच्चे शब्दों की वर्तनी / स्पेलिंग लिखने में करते हैं, वही आधार पढ़ते समय शब्दों की पहचान में भी सहायता करता है। जुड़े हुए वाक्य और पाठ लिखना, पढ़ने की समझ को मज़बूत करता है। वहीं पढ़ना बच्चों की लिपि, शब्दावली, वाक्य संरचना और विचारों से जुड़े ज्ञान को समृद्ध करता है, जो उनके लेखन को आकार देती हैं।


उभरती साक्षरता (इमर्जेंट लिटरेसी) का दृष्टिकोण यह मानता है कि पढ़ना और लिखना बच्चों में धीरे-धीरे विकसित होने वाली प्रक्रियाएं हैं, जो लिखित शब्दों के साथ उनके अर्थपूर्ण जुड़ाव से आकार लेती हैं। ऐसे अनुभव कई तरह के हो सकते हैं—जैसे शिक्षक को चित्रों वाली किताब ज़ोर से पढ़ते हुए सुनना; एक शिक्षक को बच्चों के अनुभव के आधार पर बाज़ार की यात्रा का विवरण लिखते देखना; अटेंडेंस दर्ज करने के लिए अपना नाम-पत्र सही ट्रे में रखना; या बिंदुओं, आकृतियों और शुरुआती अक्षरों की मदद से कोई कहानी या निजी अनुभव व्यक्त करना।
बच्चों के लेखन पर अपने काम के लिए प्रसिद्ध साक्षरता विशेषज्ञ ऐन डायसन बताती हैं कि छोटे बच्चे अर्थ-निर्माण के लिए बोलचाल, खेल और प्रिंट को प्रतीकात्मक संसाधनों की तरह एक साथ बुनते हैं। जब बच्चे अपने विचार व्यक्त करने का प्रयास करते हैं—जैसे नाम सहित चित्र बनाकर, अपनी उभरती अक्षर और ध्वनि-समझ के आधार पर अनुमानित वर्तनी लिखकर, या छोटे कथन शिक्षक या अभिभावक को बोलकर—तो वे केवल पहले से ज्ञात बातों को दर्ज नहीं कर रहे होते, बल्कि अपनी सोच को आकार दे रहे होते हैं और उसे आगे बढ़ा रहे होते हैं।
यही होता है जब छोटे बच्चों को कहानियों, कक्षा की चर्चाओं या अपने जीवन की घटनाओं की प्रतिक्रिया में अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों के बारे में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, भले ही उन्होंने अभी वर्तनी, हस्तलेखन और व्याकरण में पूर्ण दक्षता हासिल न की हो।
राजस्थान के ओईएलपी से लिए गए यह लेखन नमूने (नीचे) दिखाते हैं कि बच्चों को शुरुआत से ही ऐसे अवसर कैसे दिए जा सकते हैं। शुरुआती चरण में शिक्षक बच्चों द्वारा लिखे गए पाठ का विवरण स्वयं लिख सकते हैं, जिससे बच्चों को अर्थ व्यक्त करने के प्रयास में सहयोग मिले। यहां ज़ोर भाषा या लिखावट की शुद्धता पर नहीं, बल्कि बच्चों के विचारों, कल्पना और भावनाओं की अभिव्यक्ति पर होता है।
इसके विपरीत, जब लिखना केवल नकल करने तक सीमित रह जाता है, तो वह प्रतीकों के माध्यम से सोचने और अर्थ बनाने की व्यापक प्रक्रिया से अलग हो जाता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि अक्षरों और शब्दों के अभ्यास को, जो व्यवस्थित डिकोडिंग शिक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, कम महत्व दिया जा रहा है। ध्वनि और अक्षरों के बीच संबंध को मज़बूत करना अब भी बेहद आवश्यक है। लेकिन यदि डिकोडिंग सिखाने की प्रक्रिया में बच्चों को अर्थपूर्ण ढंग से लिखने के अवसर नहीं मिलते, तो शायद बच्चे ऐसे पाठक बन जाएंगे जो शब्दों का उच्चारण और वर्तनी तो जानते हैं, लेकिन विचारों को विकसित करने और व्यक्त करने में संघर्ष करते हैं। यदि हमारा लक्ष्य बच्चों को स्वतंत्र पाठक और विचारक बनाना है, तो लिखने को आधारभूत शिक्षा के हाशिए पर नहीं, बल्कि उसके केंद्र में रखना होगा।
सीखने के लिए समय के उपयोग और एंगेजमेंट में सुधार
कक्षा में समय सबसे सीमित संसाधन होता है। सर्वेक्षण में पाया गया कि लगभग 66 प्रतिशत शिक्षण का समय शिक्षक-केंद्रित गतिविधियों में व्यतीत हो रहा था (जैसे कॉन्सेप्ट समझाना, बच्चों से प्रश्न पूछना, ब्लैकबोर्ड पर लिखना या होमवर्क देना)। इसके मुकाबले केवल लगभग 15 प्रतिशत समय ही ऐसी गतिविधियों में जाता है, जिनमें बच्चों की सक्रिय भागीदारी होती है— जैसे ग्रुप वर्क को सुपरवाइज़ करना, बच्चों के सवालों का जवाब देना या उन्हें फीडबैक देना। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि कक्षा के लगभग 27 प्रतिशत समय में बच्चे किसी सीखने की गतिविधि में शामिल ही नहीं थे। इसके अलावा, बचे हुए समय का एक बड़ा हिस्सा सामूहिक दोहराव और नकल जैसी यांत्रिक गतिविधियों में व्यतीत हुआ। इन सभी बातों को साथ रखकर देखें, तो यह संकेत मिलता है कि कक्षा का लगभग 45 प्रतिशत समय या तो बिना किसी भागीदारी के बीत रहा था, या फिर बहुत सीमित भागीदारी के साथ।
कई कक्षाएं चल तो रही हैं, लेकिन अभी उस अर्थ में विकसित नहीं हो पाई हैं जहां सीखने की प्रक्रिया वास्तव में फल-फूल सके।
यदि कक्षा की व्यावहारिक चुनौतियों को ध्यान में रखा जाए, तब भी यह स्थिति गंभीर चिंतन और बदलाव की मांग करती है। शुरुआती कक्षाओं में—जहां बच्चों का ध्यान, भाषा और आत्म-नियंत्रण विकसित होता है—लर्निंग सक्रिय भागीदारी और उद्देश्यपूर्ण जुड़ाव पर निर्भर करती है। लंबे समय तक निष्क्रियता या यांत्रिक गतिविधियों में लगे रहने से कॉन्सेप्ट की समझ कमज़ोर हो सकती है।
बहु-स्तरीय कक्षाएं (मल्टीग्रेड क्लासरूम) इस चुनौती को और जटिल बना देती हैं। लगभग दो-तिहाई स्कूलों में देखी गई बहु-स्तरीय शिक्षण व्यवस्था कई सरकारी स्कूलों की एक सामान्य वास्तविकता है। फिर भी, ऐसे संदर्भों में स्वतंत्र और छोटे समूहों के कार्यों की योजना बनाने में शिक्षकों की तैयारी सीमित दिखाई दी। इस संदर्भ से निपटने के लिए पाठ्यक्रम के संसाधनों और शिक्षक पुस्तिकाओं से भी बहुत कम सहायता मिल रही थी।
इसलिए समय के बेहतर उपयोग का अर्थ केवल दक्षता बढ़ाना नहीं है। इसके लिए शिक्षण पद्धतियों में संतुलन स्थापित करना, अधिक शिक्षार्थी-केंद्रित गतिविधियों को शामिल करना, और बहु-स्तरीय कक्षाओं की वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए योजनाबद्ध तरीके से काम करना आवश्यक है, ताकि बच्चों का समय ज़ाया न हो और वे भटकने के बजाय अर्थपूर्ण रूप से सीखने की प्रक्रिया से जुड़े रहें।
नींव को मज़बूत करना
टीएलपीएस 2025, एफएलएन मिशन की एक महत्वपूर्ण कड़ी को उजागर करता है: सीखने के परिणामों में निरंतर सुधार तभी संभव है, जब कक्षा के व्यवहार (क्लासरूम प्रैक्टिस) में भी निरंतर सुधार हो।
निष्कर्ष यह बताते हैं कि कई कक्षाएं चल तो रही हैं, लेकिन अभी उस अर्थ में विकसित नहीं हो पाई हैं जहां सीखने की प्रक्रिया वास्तव में फल-फूल सके। शिक्षक और बच्चों के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण हैं, पर वे हमेशा बच्चों में आत्मविश्वास और भागीदारी की भावना नहीं जगा पाते। कक्षा में बातचीत होती है, लेकिन वह अक्सर संवादात्मक नहीं होती। लिखने का काम दिया जाता है, लेकिन वह अक्सर सिर्फ एक यांत्रिक अभ्यास बनकर रह जाता है। कक्षा का समय व्यवस्थित तो होता है, पर उसका इस्तेमाल हमेशा सीखने को गहराई देने के लिए नहीं किया जाता।
हालांकि, इन स्थितियों का यह मतलब नहीं है कि शिक्षक में उत्साह की कमी है या वे मेहनत नहीं कर रहे हैं। अक्सर ये चुनौतियां उन व्यवस्थागत सीमाओं से पैदा होती हैं, जिनके भीतर उन्हें काम करना पड़ता है, जैसे एक ही कक्षा में अलग-अलग स्तर के बच्चों को पढ़ाना, पाठ्यक्रम पूरा करने का दबाव, सीमित प्रशिक्षण, और असमान शैक्षणिक सहयोग का अभाव। इसलिए शिक्षण को बेहतर बनाने के लिए केवल कक्षा के भीतर बदलाव लाना ही काफी नहीं है। उन व्यवस्थागत परिस्थितियों पर भी ध्यान देना ज़रूरी है, जो शिक्षकों को ऐसे बदलाव करने में सक्षम बनाती हैं।
हालांकि टीएलपीएस 2025 कक्षा और शिक्षा व्यवस्था—दोनों स्तरों पर विस्तृत सुझाव प्रस्तुत करता है, फिर भी यह ज़रूरी है कि इस क्षेत्र में काम करने वाले शिक्षक, प्रैक्टिशनर और लीडर ठहरकर उन बुनियादी पहलुओं को फिर से मज़बूत करने पर ध्यान दें, जिन पर मूलभूत अधिगम की पूरी प्रक्रिया आधारित होती है। इसके लिए कुछ अहम कदम हो सकते हैं:
- यह सुनिश्चित करना कि शिक्षक और छात्रों के बीच भरोसे और आत्मीयता से भरे संबंध बनें।
- छात्रों को खुलकर बोलने और अपनी सोच व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करना।
- लिखने को केवल अभ्यास नहीं, बल्कि अर्थ गढ़ने और अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में इस्तेमाल करना।
- पढ़ाई के समय को इस तरह व्यवस्थित करना कि छात्रों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित हो, खासकर बहुस्तरीय कक्षाओं में।
स्वतंत्र पाठक और विचारक उन कक्षाओं में विकसित होते हैं, जहां मानवीय रिश्ते संवेदनशील और सहयोगी हों, बातचीत उद्देश्यपूर्ण हो, लिखने का संबंध अर्थ और अभिव्यक्ति से हो, और समय का इस्तेमाल सोच-समझकर किया जाए।
*गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदला गया है।
*इस अनुवाद में मूल लेख के अधिकांश हायपरलिंक बिना किसी परिवर्तन के शामिल किए गए हैं।
इस लेख का अनुवाद शब्द एआई द्वारा किया गया है।
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लेखक के बारे में
- अखिला पायडा लैंग्वेज एंड लर्निंग फाउंडेशन में सलाहकार (अनुसंधान और शैक्षणिक व्यवहार) के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने ऑक्सफॉर्ड विश्वविद्यालय से शिक्षा में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है और वे प्रारंभिक भाषा एवं साक्षरता, शिक्षक एजुकेशन, बाल साहित्य तथा प्रोग्राम डेवलपमेंट के क्षेत्र में 14 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं। उन्होंने टाटा ट्रस्ट्स, सेंट्रल स्कवेयर फाउंडेशन और आईआईएम अहमदाबाद जैसी संस्थाओं के साथ काम किया है, तथा टीआईएसएस हैदराबाद की अर्ली लिटरेसी इनिशिएटिव और यूएसएड की रीड अलायंस जैसी पहलों में योगदान दिया है। उन्होंने प्रारंभिक साक्षरता पर आधारित ओपन लर्निंग संसाधनों का सह-संपादन भी किया है।



