सामाजिक उद्यम

सुई और धागे से अवसर बुनने का सामाजिक उद्यम

क्या कारीगरों का हित और कारोबार, दोनों साथ चल सकते हैं? लखनऊ की चिकनकारी से निकला एक सामाजिक उद्यम बता रहा है कि स्थानीय स्तर पर रोज़गार की दिशा कैसे बदली जा सकती है।
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मैंने अपना पूरा जीवन लखनऊ में बिताया है। इसलिए हाथ से की जाने वाली चिकनकारी कढ़ाई मेरे लिए कोई नई चीज़ नहीं थी। लेकिन करीब छह साल पहले मुझे चिकनकारी कारीगरों के लिए एक कौशल-विकास कार्यक्रम और सामाजिक उद्यम शुरू करने की ज़िम्मेदारी मिली। तब मुझे एहसास हुआ कि जिन महीन डिज़ाइन वाले कपड़ों को पहनते हुए मैं बड़ी हुई थी, उनकी कारीगरी और निर्माण प्रक्रिया से मैं कितनी अनजान थी।

मेरे सामने दो बड़ी ज़िम्मेदारियां थी। एक, लखनऊ और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण देकर उन्हें आजीविका का एक भरोसेमंद ज़रिया उपलब्ध कराना। दूसरी, एक ऐसा कारोबारी मॉडल तैयार करना, जो कारीगरों के हितों को प्राथमिकता देते हुए लंबे समय तक टिकाऊ बना रहे।

इन्हीं उद्देश्यों के मद्देनज़र वर्ष 2019 में सेफ सोसाइटी ने श्वेत नाम से चिकनकारी का एक कौशल-विकास कार्यक्रम शुरू किया। लेकिन कुछ ही समय बाद कोविड-19 के कारण देशभर में लॉकडाउन लग गया और हमारा काम ठप पड़ गया। हालांकि, इस दौरान भी हमारा महिलाओं से जुड़ाव बना रहा। हम उन्हें सामाजिक सुरक्षा योजना और राशन जैसी ज़रूरी सुविधाएं मुहैया कराने में लगातार सहयोग देते रहे।

पाबंदियां हटने के बाद हमने दो बैचों में प्रशिक्षण शुरू किया, जिसमें लगभग 60–62 महिलाएं शामिल हुई। इनमें से ज़्यादातर महिलाएं घरेलू कामगार थी। कुछ पहले से काम कर रही थी और प्रशिक्षण के लिए दिन में केवल दो से तीन घंटे ही निकाल पाती थी। वहीं, कुछ ऐसी भी थी, जिन्होंने महामारी के दौरान अपनी नौकरी खो दी थी।

हमारे लिए यह शुरुआत से ही स्पष्ट था कि केवल प्रशिक्षण देना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ-साथ महिलाओं के लिए आय का एक भरोसेमंद स्रोत सुनिश्चित करना भी ज़रूरी था। इसके तहत वर्ष 2020 में हमारे कार्यक्रम से जुड़ी महिलाओं ने सुरक्षा मास्क बनाए और उन्हें श्वेत के कार्यालय के बाहर बेचकर 200–250 रुपये की कमाई की। दीपावली के आसपास हमने एक प्रदर्शनी भी आयोजित की, जिसमें लगभग 100 टॉप, कुर्ते और दुपट्टे बिके।

दूसरे वर्ष तक हमारे साथ जुड़ी महिलाओं की संख्या बढ़कर लगभग 240 हो गई और हमने उन्हें स्वयं सहायता समूहों में संगठित करना शुरू किया। तीसरे वर्ष तक 320 कारीगर महिलाएं 23 स्वयं सहायता समूहों से जुड़ चुकी थी। वर्ष 2025 तक एक हज़ार से अधिक महिलाएं इन समूहों से जुड़ चुकी थीं और उन्होंने बचत तथा आपसी ऋण (इंटर-लोनिंग) की अपनी व्यवस्था भी विकसित कर ली थी।

हालांकि, हमारे साथ काम करने की इच्छा के बावजूद कुछ महिलाएं स्वयं सहायता समूह से जुड़ने को लेकर हिचकिचा रही थी। उन्हें लगता था कि समूह की बैठकों में शामिल होना झंझट भरा होगा। कुछ महिलाओं में बचत व्यवस्था को लेकर संदेह था, जबकि कुछ के अपने इलाके की अन्य कारीगरों के साथ आपसी मतभेद थे। इसलिए हमने उन्हें यह विकल्प दिया कि वे चाहें तो स्वयं सहायता समूह से जुड़ें या फिर सीधे श्वेत के साथ व्यक्तिगत रूप से काम करें। लेकिन इससे भी समस्या का केवल एक हिस्सा ही हल हो पाया।

ज़मीन से एक सामाजिक उद्यम खड़ा करना

लखनऊ के बाहरी और आसपास के ग्रामीण इलाकों में शायद ही कोई ऐसा मोहल्ला या गांव हो, जहां हर घर में कम-से-कम एक-दो महिलाएं सामान्य सिलाई-कढ़ाई न जानती हों। लेकिन इसके बावजूद, उनके पास काम के अवसर नहीं हैं। जो महिलाएं चिकनकारी का काम करती भी हैं, उन्हें एक कुर्ते की कढ़ाई के बदले में केवल 20 से 50 रुपये तक ही मिलते हैं। इसकी वजह यह है कि उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा बिचौलियों के पास चला जाता है। वहीं, निर्माता भी कारीगरों के घर-घर जाकर उत्पाद इकट्ठा करने में अपना समय और संसाधन नहीं लगाना चाहते।

जब हमने महिलाओं को प्रशिक्षण के लिए जोड़ना शुरू किया, तो उनसे यह वादा किया कि श्वेत के साथ जुड़ने पर उन्हें साल भर लगातार काम मिलेगा। हमारा ध्यान कौशल-विकास कार्यक्रम से ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को जोड़ने पर था। इसके साथ ही, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही ज़रूरी था कि बाज़ार में हमारी एक पहचान बने और हमारे उत्पादों की नियमित बिक्री हो, जिससे कारीगरों के लिए आय का एक स्थायी स्रोत तैयार हो पाए। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए, वर्ष 2021 में हमने श्वेत को औपचारिक रूप से एक ब्रांड के रूप में लॉन्च किया। इस सफर में हमने कुछ अहम सबक सीखे:

1. बाज़ार को समझना

उत्पादों की कीमत तय करने के लिए सबसे पहले हमें चिकनकारी के काम को गहराई से समझना था। इसमें कढ़ाई के अलग-अलग टांकों की किस्म, उनकी जटिलता और यह जानना शामिल था कि मेहनताना फ्रेम के हिसाब से तय होता है या डिज़ाइन (मोटिफ़) के आधार पर। सामाजिक क्षेत्र में काम करने के कारण मुझे समुदायों के साथ काम करने का अनुभव तो था, लेकिन कारोबार की यह दुनिया मेरे लिए बिल्कुल नई थी। जब मैंने इस क्षेत्र के लोगों से जानकारी जुटाने की कोशिश की, तो अक्सर वे अधूरी जानकारी ही साझा करते थे।

इसके साथ ही हमें कारोबार के अलग-अलग मॉडल, जैसे बिज़नेस-टू-बिज़नेस (बी2बी) और बिज़नेस-टू-कंज़्यूमर (बी2सी) को भी समझना था। यही नहीं, गुणवत्ता नियंत्रण (क्वालिटी कंट्रोल), सैंपलिंग, प्रोटोटाइप और शुरुआती व इन-लाइन सैंपल जैसी तकनीकी प्रक्रियाओं के बारे में भी हमें बहुत कुछ सीखना पड़ा।

धीरे-धीरे, जैसे-जैसे बाज़ार में हमारी पहचान बनने लगी, हमारा अनुभव भी बढ़ता गया। इसी दौरान, सेवा जैसी स्थापित संस्थाओं के साथ काम कर चुके कारीगर और अनुभवी कारीगर हमारे दफ़्तर आने लगे। उनसे बातचीत करते हुए हमारी समझ और मज़बूत होती गई।

हमारे लिए व्यावहारिक रूप से सीखने का सबसे बड़ा अवसर हमें फैबइंडिया से मिला पहला थोक ऑर्डर था। शुरुआत में हमारे अनुभवी कारीगर इसे लेकर हिचकिचा रहे थे। उनका कहना था कि फैबइंडिया के गुणवत्ता नियंत्रण के मानक बहुत सख्त हैं। अगर एक साथ 2000–3000 उत्पाद भी ख़ारिज हो गए, तो पूरा स्टॉक बेकार हो जाएगा। लेकिन मैं चाहती थी कि हम यह जोखिम उठाएं। इसलिए हमने लगभग 300-400 दुपट्टों का ऑर्डर स्वीकार किया। दुपट्टे बनाना अपेक्षाकृत आसान था, क्योंकि उनमें साइज़ या नाप से जुड़ी कोई जटिलता नहीं थी। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान फैबइंडिया के फील्ड क्वालिटी कंट्रोल मैनेजर ने भी हमारा काफ़ी मार्गदर्शन किया।

हमने पहले ही वर्ष यह ऑर्डर पूरा कर लिया। आर्थिक रूप से इसमें हमें न तो कोई विशेष मुनाफ़ा हुआ और न ही नुकसान। लेकिन इस अनुभव ने हमें थोक ऑर्डर पूरा करने की बारीकियां सिखाईं। साइज़िंग, कलर ग्रेडिंग और गुणवत्ता नियंत्रण जैसी कई तकनीकी बातें हमने इसी दौरान सीखीं। इतना ही नहीं, धागे और कपड़े के थोक आपूर्तिकर्ताओं से भी हमारी जान-पहचान हुई। आज हम श्वेत के उत्पादों के लिए कच्चा माल इन्हीं आपूर्तिकर्ताओं से ख़रीदते हैं।

2. सही विशेषज्ञों को टीम में शामिल करना

आज हमारी मर्चेंडाइज़िंग टीम में लगभग 18 लोग हैं और हमारे साथ मार्केटिंग विशेषज्ञ भी काम करते हैं। लोगों को भर्ती करते समय मेरा ध्यान इस बात पर नहीं होता कि किसी का अनुभव सामाजिक क्षेत्र का है या कारोबार का। मेरे लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण यह होता है कि वह अपने क्षेत्र का विशेषज्ञ हो।

हमारा लक्ष्य एक ऐसी सुचारू व्यवस्था विकसित करना है, जिसमें मर्चेंडाइज़िंग और मार्केटिंग की मज़बूत टीमें साथ मिलकर काम करें। यह सिर्फ़ काम के बेहतर संचालन के लिए ही नहीं, बल्कि ऑर्डर और स्टॉक पर नज़र रखने के लिए भी ज़रूरी है। उदाहरण के लिए, पिछले वर्ष तक श्वेत के उत्पाद मिंत्रा और नायका जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध थे। लेकिन जब किसी उत्पाद का स्टॉक ख़त्म हो जाता था, तो उसे दोबारा उपलब्ध कराने में हमें दो से तीन महीने लग जाते थे। इसकी वजह यह थी कि उसी दौरान हमें बड़े थोक ऑर्डर भी पूरे करने होते थे और श्वेत की अपनी वेबसाइट से आने वाले ऑर्डर भी संभालने पड़ते थे। अब, जब हमारे उत्पादों की लगातार मांग बनी हुई है, तो हम अलग-अलग टीमों की निगरानी और समन्वय की क्षमता को मज़बूत कर रहे हैं, ताकि भविष्य में ऐसी देरी न हो।

महिला कारीगर कढ़ाई करते हुए_चिकनकारी
लखनऊ के बाहरी और आसपास के ग्रामीण इलाकों में हर घर में महिलाएं सामान्य सिलाई-कढ़ाई जानती हैं। लेकिन इसके बावजूद, उनके पास काम के अवसर नहीं हैं। | चित्र साभार: सेफ सोसाइटी

3. बजट और फंडिंग की योजना बनाना

कपड़े और परिधान का कारोबार बहुत अधिक पूंजी की मांग करता है। इसमें लागत तथा मुनाफे के बीच का अंतर भी काफी बड़ा होता है। उदाहरण के लिए, यदि हमें 10000 उत्पाद तैयार करने हों, तो केवल कच्चे माल और उत्पादन पर ही लगभग 1 करोड़ रुपये की लागत आ सकती है। दूसरी ओर, भले ही फंडिंग एजेंसियां सेफ सोसाइटी के अन्य कामों, जैसे स्वास्थ्य, आजीविका, समुदाय और जेंडर के लिए सहयोग देती हों, लेकिन वे आमतौर पर तय गतिविधियों के लिए ही राशि मुहैया कराती हैं। यानी वे किसी सामाजिक उद्यम के रूप में श्वेत का विस्तार करने के लिए अलग से पूंजी उपलब्ध नहीं करातीं।

इसी वजह से, अब तक हमने एक अलग रणनीति अपनाई है। हमारे उत्पादों की बिक्री से जो आय होती है, उसी को धीरे-धीरे दोबारा कारोबार में निवेश किया जाता है। इसी पैसे से हमने पिछले कुछ वर्षों में अपना स्टॉक और मार्केटिंग पर होने वाला ख़र्च भी धीरे-धीरे बढ़ाया है। पिछले पांच वर्षों में इस तरह काम करते हुए हम एक करोड़ रुपये के उत्पादन की क्षमता तक पहुंच चुके हैं।

4. प्रमाणन और ट्रेडमार्क

चूंकि हमारी कारीगर महिलाएं पारंपरिक हस्तशिल्प तैयार करती हैं, इसलिए यह ज़रूरी था कि उनके काम को आधिकारिक मान्यता भी मिले। इसी उद्देश्य से हमने ‘क्राफ्टमार्क’ प्रमाणन हासिल किया और अपने ब्रांड का ट्रेडमार्क भी पंजीकृत कराया।

इसके साथ ही, हमने ‘आर्टिज़न आइडेंटिटी कार्ड’ बनवाने में भी महिलाओं का सहयोग किया। शुरुआत में कई कारीगर इसके लिए तैयार नहीं थी। बैंक खाते की जानकारी साझा करने को लेकर उन्हें धोखाधड़ी और जानकारी के गलत इस्तेमाल का डर था। इसके अलावा, आवेदन की पूरी प्रक्रिया में आमतौर पर छह से आठ महीने लग जाते हैं। अधिकांश महिलाओं को इस योजना के लाभों की जानकारी भी नहीं थी। इसी वजह से उनके बीच यह धारणा बन गई थी कि इस कार्ड का कोई विशेष फायदा नहीं है।

इन चुनौतियों को दूर करने के लिए हम गांवों में जागरूकता सत्र आयोजित करते हैं। इन बैठकों में एक ज़िला, एक उत्पाद (वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट) पहल और विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) कार्यालय के अधिकारियों को भी आमंत्रित किया जाता है। वे महिलाओं को इस योजना के लाभों और इसकी प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं।

5. इनक्यूबेटर और कोहॉर्ट-आधारित कार्यक्रमों में हिस्सा लेना

क्राफ्टमार्क प्रमाणन मिलने के बाद हमें कारोबार से जुड़े कई वेबिनार और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में जाने का अवसर मिला। इनमें बौद्धिक संपदा (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी), बड़े ऑर्डरों का प्रबंधन और उत्पादों की पेशेवर फ़ोटोग्राफी जैसे विषय शामिल थे।

मैंने कई कोहॉर्ट-आधारित शिक्षण कार्यक्रमों में भी हिस्सा लिया। इनमें आईआईएम बेंगलुरु का एक कार्यक्रम शामिल था, जिसमें बिज़नेस मॉडल, ग्राहक वर्गों की पहचान और किसी उत्पाद की विशिष्ट पहचान (यूनीक सेलिंग पॉइंट) जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। इसी तरह, नीति आयोग के एक कार्यक्रम से मुझे हस्तशिल्प उत्पादों के निर्यात की प्रक्रिया को समझने का अवसर मिला।

इन कार्यक्रमों ने मुझे अपने जैसे दूसरे उद्यमियों और पेशेवरों से सीखने का मौका दिया। वहां से मिली सीख को मैं श्वेत की कार्यप्रणाली में शामिल करती हूं। साथ ही, मैं हमारी साप्ताहिक और मासिक बैठकों में इन्हें टीम के साथ साझा करती हूं, ताकि उनकी राय और सुझावों के आधार पर हम अपने काम को और बेहतर बना सकें।

6. नेतृत्व की आगामी पंक्ति (सेकंड लाइन लीडरशिप) का सहज रूप से आकार लेना

श्वेत को खड़ा करने के लिए हमें कई बार तय दायरे से बाहर जाकर सोचना और काम करना पड़ा। कभी देर रात तक बैठकर नई चीज़ें सीखनी पड़ीं, तो कभी कारीगरों से मिलने के लिए लंबी यात्राएं करनी पड़ीं।

वर्ष 2025 में जब मैं गर्भवती हुई, तब श्वेत की शुरुआत के बाद पहली बार मुझे कुछ समय के लिए काम से पूरी तरह दूर होना पड़ा। उस समय मेरी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि कारोबार की ज़िम्मेदारी कौन संभालेगा। उसी साल हमारा लक्ष्य 10000 उत्पाद तैयार करने का था। कच्चा माल खरीदा जा चुका था, मार्केटिंग टीम तैयार थी और अब पीछे हटने का कोई विकल्प नहीं था।

जब किसी संस्था के विस्तार की बात होती है, तो अक्सर नेतृत्व की आगामी पंक्ति तैयार करने की ज़रूरत सामने आती है। लेकिन हमें यह नेतृत्व अलग से तैयार नहीं करना पड़ा। जिन महीनों में मैं काम से दूर रही, उन दिनों हमारी मार्केटिंग और मर्चेंडाइज़िंग मैनेजर ने पूरी ज़िम्मेदारी संभाली और श्वेत ने तय समय पर ऑर्डर पूरा किया।

हालांकि, इस अनुभव ने मुझे एक और बात सिखाई। जैसे-जैसे टीमें बड़ी होती हैं, वैसे-वैसे उभरते नेतृत्व में कई बार कुछ अहम फैसले लेने को लेकर झिझक भी होती है। इसलिए अब हमारा लक्ष्य इस नेतृत्व को और मज़बूत बनाना है। इसके लिए हम टीम के सदस्यों को मार्गदर्शन (मेंटरशिप), सीखने के अवसर और ज़्यादा ज़िम्मेदारियां सौंप रहे हैं। हमारे लिए एक सामाजिक उद्यम होने के नाते ज़िम्मेदारी का मतलब सिर्फ़ कारोबार को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि कारीगरों का हित हमेशा सबसे आगे रहे।

कारीगरों को तरजीह देना

एक अनुमान के अनुसार लखनऊ में चिकनकारी उद्योग से लगभग 10 लाख लोग जुड़े हुए हैं। इनमें कपड़े की कटाई, रंगाई, ब्लॉक प्रिंटिंग और कढ़ाई जैसे अलग-अलग काम करने वाले लोग शामिल हैं। अगर हम इस पूरी संख्या का केवल 10 प्रतिशत भी देखें, तब भी यह हज़ारों महिलाओं का समूह बनता है। हमारा लक्ष्य ज़्यादा से ज़्यादा कारीगरों को अपने नेटवर्क से जोड़ना है।

यह हमारे सामाजिक उद्यम को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखने के लिए भी ज़रूरी है। आज श्वेत से जुड़ी महिलाएं अलग-अलग स्तर पर काम करती हैं। कुछ महिलाएं महीने में केवल एक-दो उत्पाद ही तैयार कर पाती हैं, क्योंकि उनके पास समय सीमित होता है और वे इसे अतिरिक्त आमदनी की तरह देखती हैं। वहीं, त्योहारों या पारिवारिक आयोजनों के दौरान कई महिलाओं को घरेलू ज़िम्मेदारियों के कारण काम से विराम लेना पड़ता है। ऐसे में, जैसे-जैसे अधिक महिलाएं हमारे साथ जुड़ेंगी, हमारे लिए उत्पादन और बिक्री की निरंतरता बनाए रखना भी आसान होगा।

हम महिलाओं को केवल श्वेत के साथ काम करने के लिए बाध्य नहीं करते। अगर उन्हें कहीं और बेहतर अवसर मिलते हैं, तो हम उसका भी स्वागत करते हैं। हमारी ज़िम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि उन्हें बाज़ार में मिलने वाली उचित कीमत की पूरी जानकारी हो और उनके काम का सही मूल्य मिले। उदाहरण के लिए, अगर किसी महिला को यह पता है कि श्वेत एक कुर्ते के लिए 500 रुपये देगा, तो वह वही काम किसी दूसरे ख़रीदार या संस्था को उससे कम कीमत पर नहीं बेचेगी।

एक कपड़े पर कढ़ाई करता हुआ हाथ_चिकनकारी
एक अनुमान के अनुसार लखनऊ में चिकनकारी उद्योग से लगभग 10 लाख लोग जुड़े हुए हैं। | चित्र साभार: सेफ सोसाइटी

हमारे लिए यह सिर्फ़ बिक्री बढ़ाने या कारोबार फैलाने का सवाल नहीं है। हमारा उद्देश्य यह भी है कि महिलाएं नियमित रूप से काम करें और एक स्थिर आय अर्जित करें। हम उनसे इस बारे में भी बात करते हैं कि अपनी कमाई होने से आर्थिक स्वतंत्रता कैसे बढ़ती है और घर के फैसलों में उनकी भागीदारी कैसे मज़बूत होती है। यह सोच मेरे और श्वेत टीम के दूसरे सदस्यों के घरों और समुदायों के अनुभवों से भी आती है। यही वजह है कि हम हस्तशिल्प के काम के साथ-साथ महिलाओं के लिए डिजिटल और वित्तीय साक्षरता, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे विषयों पर जागरूकता और प्रशिक्षण भी आयोजित करते हैं, ताकि वे अपने रोज़मर्रा के जीवन में ज़्यादा आत्मनिर्भर होकर फैसले ले सकें।

हर दिन लगभग 10-12 महिलाएं हमारे दफ़्तर आती हैं। इनमें से कुछ कच्चा माल लेने आती हैं, तो कुछ अपनी समस्याएं साझा करने। इन्हीं बातचीतों से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि हमारे सामाजिक उद्यम और हमारी फील्ड टीमों को उन्हें किस तरह का सहयोग देना चाहिए। कभी हम उनके जन धन बैंक खाते खुलवाने में मदद करते हैं, ताकि वे अपनी कमाई सुरक्षित रख सकें, तो कभी उन्हें सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और ई-श्रम कार्ड से जोड़ते हैं। वहीं, समय-समय पर स्वास्थ्य शिविर, कानूनी सहायता से जुड़े प्रशिक्षण और उनके बच्चों के लिए शैक्षिक सत्र भी आयोजित किए जाते हैं। इस तरह, हमारा काम आजीविका और महिलाओं के जीवन को प्रभावित करने वाले सामाजिक मुद्दों के बीच एक सेतु का काम करता है।

इसीलिए, श्वेत की स्थापना केवल एक सामाजिक उद्यम खड़ा करने की कहानी नहीं है। यह लगातार सीखने और कई स्तरों पर नई क्षमताएं विकसित करने का सफर भी है। इस सफर में हमें कारीगरों के लिए सम्मानजनक और स्थायी आजीविका सुनिश्चित करनी थी, उनके श्रम का उचित मूल्य दिलाना था और उनकी सामाजिक ज़रूरतों के प्रति संवेदनशील बने रहना था। साथ ही, कच्चे माल की ख़रीद से लेकर बिक्री और मार्केटिंग तक एक ऐसा कारोबार भी खड़ा करना था, जो लंबे समय तक टिकाऊ रह सके।

यह सफ़र हमने वाकई एक-एक टांके से तय किया है।

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  • जानिए, हम स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देने में कहां पिछड़ रहे हैं?
  • जानिए, एक महिला कैसे डोरमैट से उद्यमिता का उदाहरण पेश कर रही है?
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लेखक के बारे में

  • विभा मिश्रा श्वेत की निदेशक तथा सेफ सोसाइटी में कार्यक्रम प्रबंधक हैं। उन्हें जेंडर न्याय, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक विकास के क्षेत्र में काम करने का एक दशक से अधिक का अनुभव है। उन्होंने पूर्व में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय तथा दिल्ली पुलिस के साथ महिलाओं के विरुद्ध हिंसा से संबंधित मुद्दों पर काम किया है। विभा ने मेडिकल एवं साइकियट्रिक सोशल वर्क में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है। वह महिलाओं के अधिकारों, आजीविका संवर्धन तथा समावेशी सामाजिक बदलाव की पक्षधर हैं और इन विषयों पर सक्रिय रूप से काम कर रही हैं।
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