घर तो पहले ही नहीं था, अब क्या पुनर्वास का अधिकार भी छिन जाएगा?


मैं एक ट्रांसजेंडर महिला हूं। मैं मूल रूप से बिहार की रहने वाली हूं और फिलहाल दिल्ली में रहती हूं। एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के बहुत से लोगों की तरह मेरा संघर्ष भी बचपन से ही शुरू हो गया था।
हमें अक्सर अपनी पहचान की वजह से समाज में अपमान और हिंसा का सामना करना पड़ता है। कई लोग वर्षों तक इसी माहौल में रहते हैं, क्योंकि उनके पास घर के सिवाय कोई दूसरी जगह नहीं होती। वहीं घरों के भीतर भी वे लगातार हिंसा का सामना करते हैं।
कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान आर्थिक तंगी और पारिवारिक दबाव के चलते मैंने घर छोड़ने का फैसला लिया। लेकिन दिल्ली आने से पहले मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि मैं रहूंगी कहां?
अमूमन घर छोड़ने के बाद ट्रांस समुदाय के लोगों के पास रोज़गार के साधन नहीं होते। ऐसे में उन्हें मजबूरन देह-व्यापार या टोली-बधाई जैसे चुनिंदा कामों को अपनाना पड़ता है। मैं घर से हताश होकर निकली थी, लेकिन यह भी जानती थी कि मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना है। इसी दौरान, मुझे एक गरिमा गृह के बारे में पता चला।
मैंने देखा कि वहां हमारे समुदाय को आश्रय के साथ-साथ कौशल सीखने, रोज़गार पाने और सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिलता है। वहां सबकी कहानियां एक सी थीं। कोई घर से निकाला गया था, तो कोई टोली-बधाई छोड़कर नए विकल्प तलाशना चाहता था। धीरे-धीरे वह जगह मेरे लिए सिर्फ एक छत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत बन गई।
हम सुबह व्यायाम करते, फिर कंप्यूटर व अंग्रेज़ी सीखते, प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लेते और साथ में खाना खाते। धीरे-धीरे मेरी ज़िंदगी में एक अनुशासन आया। गरिमा गृह में रहते हुए मैंने अपनी छूटी हुई पढ़ाई पूरी की और यहीं से मुझे अपनी पहली नौकरी भी मिली। मुझे एहसास हुआ कि सुरक्षित जीवन के लिए अवसर मिलना भी ज़रूरी है। मेरे जैसे कई लोग यहां आकर अपने जीवन को नई दिशा दे पाए हैं। आज उनमें से कुछ अच्छी कंपनियों में काम कर रहे हैं। कई परिवारों ने भी उन्हें तब स्वीकार करना शुरू किया, जब उन्होंने देखा कि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं।
गरिमा गृह सिर्फ सिर पर छत देने की जगह नहीं है। यह एक ऐसा परिवेश है, जहां बहुत से ट्रांस लोग अपने जीवन को फिर से खड़ा करने की कोशिश करते हैं। जब नीतिगत समर्थन कमज़ोर होता है, तो उसका सबसे गहरा असर समुदाय के संवेदनशील तबके पर पड़ता है। पहले गरिमा गृह में प्रवेश के लिए आधार कार्ड, अन्य पहचान पत्र और व्यक्ति की स्व-पहचान पर्याप्त मानी जाती थी। यानी अगर कोई खुद को ट्रांस कहता था, तो उसकी बात मानी जाती थी। लेकिन अब ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 के तहत अपनी पहचान साबित करने के लिए मेडिकल बोर्ड, प्रमाणपत्र और चिकित्सीय साक्ष्य जैसी शर्तों की बात हो रही है।
पहले ही ट्रांसजेंडर प्रमाणपत्र बनवाने में लंबा समय लग जाता है। ऐसे में अगर अपनी पहचान साबित करने की प्रक्रिया और जटिल होगी, तो इसका सबसे ज़्यादा असर उन लोगों पर पड़ेगा, जो खुद को नॉन-बाइनरी/ ट्रांस मैन/ ट्रांस वुमन के रूप में पहचानते हैं और किसी पारंपरिक किन्नर समुदाय से नहीं जुड़े हैं।
मेरा डर कोई आशंका भर नहीं है, यह एक हकीकत है। जिस घर में मैं पिछले छह सालों से रहती आ रही हूं, वहां के मेरे मकान मालिक ने हाल ही में मुझसे दोबारा पहचान से जुड़े कागज़ मांगे। मेरे पास प्रमाणपत्र था, इसलिए मैं अपनी स्थिति स्पष्ट कर पाई। लेकिन हर किसी के पास यह सुविधा नहीं होती। जो लोग अभी भी प्रमाणपत्र बनवाने की प्रक्रिया में हैं, या जिनके पास किसी वजह से ये कागज़ नहीं हैं, उनके लिए घर से अलग एक सुरक्षित छत ढूंढ़ना मुश्किल हो सकता है।
मेरे लिए यह बहस कागज़ों और कानूनी प्रक्रियाओं से कहीं बड़ी है। गरिमा गृह जैसी जगहें इसलिए बनी थीं क्योंकि समाज हर किसी को बराबर सुरक्षा और स्वीकार्यता नहीं देता। अगर अब वहां तक पहुंचने के लिए भी नई बाधाएं खड़ी की जाएंगी, तो वह समस्या और गहरा जाएगी, जिसे हल करने का दावा किया जा रहा है।
हममें से बहुत से लोगों ने पहले ही परिवार और समाज में अपने घर खो दिए हैं। ऐसे में अगर हमारी पहचान को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाएगा, तो एक गरिमामयी जीवन जीने के अधिकार के हमारे लिए क्या मायने रह जाएंगे?
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अधिक जानें: जानिए, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को घर ढूंढने में किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
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लेखक के बारे में
- बेला, लंबे समय से मानसिक स्वास्थ्य, युवा विकास और एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के सशक्तीकरण के क्षेत्र में कार्यरत हैं। वह गरिमा गृह दिल्ली, ट्रांसजेंडर शेल्टर होम, एडाजियो वीआर (AdagioVR) और रिहा फाउंडेशन (Rihha Foundation) के साथ मिलकर मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता, आर्ट थेरेपी, सामुदायिक सहभागिता और युवा-केंद्रित कार्यक्रमों में काम करने का अनुभव रखती हैं। वह अपने काम के ज़रिए समावेशी और सुरक्षित समुदायों के निर्माण में योगदान देना चाहती हैं।
