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जंगल के देवताओं से शहर के भगवान तक

बेंगलुरु शहरी ज़िला, कर्नाटक
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एक स्थानीय मंदिर, जिसकी छत पर लकड़ियों का ढेर रखा हुआ है_मौखिक इतिहास
आज लांबानी समुदाय के देवी-देवता उनकी सांस्कृतिक स्मृतियों और बढ़ते शहरी प्रभावों के बीच की जीवंत कड़ी हैं। | चित्र साभार: अनुष कुमार

बेंगलुरु के दक्षिणी बाहरी इलाके में स्थित बन्नेरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान आदिवासी, कृषक और पशुपालक समुदायों का घर है, जो सदियों से इस इलाके में एक-दूसरे के साथ घुल-मिलकर रहते आए हैं।

मैं बीते तीन सालों से लैंड बॉडी इकोलॉजीज़ नेटवर्क के साथ अपने काम के सिलसिले में इस क्षेत्र का दौरा करता रहा हूं। हमारा उद्देश्य यह समझना है कि विस्थापन और जलवायु परिवर्तन समुदायों के भूमि से संबंधों और उनके मानसिक स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित करते हैं। इन संवादों के दौरान यह भी सामने आया कि सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक बदलाव तेज़ी से बन्नेरघट्टा के उन समुदायों के सांस्कृतिक ताने-बाने को बदल रहे हैं, जिनकी आजीविका ज़मीन पर निर्भर है। इनमें लांबानी समुदाय भी शामिल है, जो रमणायकना डोड्डी नामक एक छोटे से गांव में रहता है।

ब्रिटिश हुकूमत के दौरान नमक और अन्य सामान ढोने का काम करने वाला लांबानी समुदाय पारंपरिक रूप से घुमंतू था। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, यह समुदाय पीढ़ियों पहले बन्नेरघट्टा में आकर बस गया, जहां जंगल उनकी आजीविका का स्रोत बना। लांबानी अपने साथ कई रीति-रिवाज, पहनावा, खानपान और देवी-देवताओं की एक अलग दुनिया साथ लेकर आए थे। लेकिन समय के साथ उन्हें बाहरी लोगों के हाथों अपमान और बहिष्कार झेलना पड़ा, जिसने इस समुदाय के पारंपरिक तौर-तरीकों को ख़ासा प्रभावित किया।

समुदाय के एक बुज़ुर्ग थिमरायप्पा बताते हैं, “इतिहास हमें डकैत का नाम देता है। लोग हमारे गुस्से और हमारे समूह से डरते थे। वे (समुदाय के बाहर के लोग) हमें चोर मानते हैं। पहले हम अपने कपड़ों, शरीर पर गुदे निशान और कंगनों से आसानी से पहचाने जा सकते थे। हम हिंदू देवी काली का वेश धारण करते थे। इसी वजह से लोग हमारा अपमान करते थे। आखिरकार हमने तंग आकर अपना पहनावा छोड़ दिया।”

हालांकि लांबानी खुद को लंबे समय से हिंदू मानते रहे हैं, लेकिन उनकी धार्मिक परंपराएं मुख्यधारा की हिंदू प्रथाओं से अलग रही हैं। समय के साथ उनकी यह अलग पहचान कमज़ोर हुई, जिससे उनकी अपनी मौखिक परंपराएं धीरे-धीरे पीछे छूटती चली गयी।

उदाहरण के लिए, कर्नाटक सरकार द्वारा 1971 में प्रकाशित एक गज़ेट में उल्लेख है: “उनके (लांबानियों के) प्रमुख देवता कृष्ण हैं। वे अन्य हिंदू देवताओं के साथ-साथ बालाजी की भी पूजा करते हैं। प्रत्येक बस्ती में सेवाभाया का एक मंदिर होता है, जिन्हें सेवालाल के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि वे विष्णु के अवतार थे।”

हालांकि, कई लांबानी परिवार इस बात से असहमत नज़र आते हैं। स्कूल शिक्षिका सुशीला कहती हैं, “नहीं, नहीं! हम कृष्ण की पूजा नहीं करते। हमारे मुख्य देवता बालाजी हैं। हम सेवाभाया की भी पूजा करते हैं, लेकिन मैं उनके बारे में बहुत अधिक नहीं जानती। इतना जानती हूं कि वे हमारे ही समुदाय के थे और उन्होंने मुश्किल समय में हमारे समुदाय को बचाया था।”

थिमरायप्पा इस वर्णन की पुष्टि करते हैं, “सेवालाल विष्णु के अवतार नहीं थे। उनसे (सरकार) यह बात किसने कही? वे धर्मिनीभाई और भीमनायक के पुत्र थे। उनका जन्म अलौकिक था और उन्होंने अपना पूरा जीवन काली की उपासना और लांबानी समुदाय के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया था।”

यह प्रसंग दिखाता है कि दर्ज इतिहास और मौखिक स्मृतियों के बीच अक्सर बड़ा अंतर होता है। सरकारी ब्योरा अमूमन स्थानीय मान्यताओं को मुख्यधारा के धार्मिक-सांस्कृतिक ढांचों में समेटने की कोशिश करता है। वहीं समुदाय के लोग अपने बीत चुके कल को विविध किस्से-कहानियों में दर्ज करते हैं।

लांबानी समुदाय के बुज़ुर्ग आज भी अपने देवी-देवताओं के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं। लेकिन बेहतर अवसरों की तलाश में बेंगलुरु का रूख कर रही नई पीढ़ी अलग रास्ते पर है। मौजूदा दौर में लांबानी युवा एक बड़े शहर की सांस्कृतिक परंपराओं के अनुरूप ढलने के लिए तैयार नज़र आते हैं। उनका यह कदम सामाजिक स्वीकृति और आर्थिक अवसरों को हासिल करने के सवाल से जुड़ा हुआ है।

रमणायकना डोड्डी के युवा किसान रवि कहते हैं, “देखिए सर, हम इन्हें वोट देते हैं (फोन पर एक व्यक्ति की तस्वीर दिखाते हुए), क्योंकि हमें लगता है कि यह पार्टी हिंदुओं की परवाह करती है। अगर वे कहते हैं कि सेवालाल विष्णु के अवतार थे, तो इससे मुझे कोई परेशानी नहीं है। बल्कि फायदा ही है। कम-से-कम सबको यह लगेगा कि मैं भी उसी भगवान की पूजा करता हूं, जिसकी वे करते हैं। शायद इससे मेरे लिए नौकरी ढूंढ़ना आसान हो जाए।”

बहरहाल, आज लांबानी समुदाय के देवी-देवता उनकी सांस्कृतिक स्मृतियों और बढ़ते शहरी प्रभावों के बीच एक जीवंत कड़ी बने हुए हैं।


अनुष कुमार क्विकसैंड में वरिष्ठ डिज़ाइन शोधकर्ता हैं।

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लेखक के बारे में

  • अनुष कुमार क्विकसैंड में वरिष्ठ डिज़ाइन शोधकर्ता हैं। उन्होंने मुंबई स्थित टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से सामाजिक कार्य में परास्नातक की डिग्री प्राप्त की है। उनका काम हाशियाकरण, पहचान और सततता जैसे विषयों में उनकी रुचि से प्रभावित है। अनुष अपने शोध और डिज़ाइन के ज़रिए सामाजिक और विकास संबंधी पहलों को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाने का प्रयास कर रहे हैं।