May 13, 2024

एक युवा महिला के समाजसेवी संस्था से कॉर्पोरेट तक पहुंचने का सफ़र

समाजसेवी संस्था के साथ काम करने का अनुभव रखने वाली प्रतिभा सिंह अब उत्तर प्रदेश के एक ग्रामीण इलाक़े में बतौर सेल्स एग्जीक्यूटिव काम करती हैं, उनके एक दिन का हाल।
6 मिनट लंबा लेख

मेरा नाम प्रतिभा है और मैं पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले के जिगना गांव में पली-बढ़ी हूं। इलाक़े के बाक़ी लोगों की तरह मेरे पिता भी एक किसान हैं और मेरी मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं। मैं अपने माता-पिता और छोटे भाई के साथ जिगना में ही रहती हूं, और मेरा बड़ा भाई अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहता है।

पैसों की दिक़्क़त के बावजूद, मेरे परिवार ने हमेशा मेरी पढ़ाई-लिखाई पर खर्च किया। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद मेरे माता-पिता के पास मुझे आगे बढ़ाने के लिए पैसे नहीं थे। लेकिन मेरे मामा (मां के भाई) ने मेरी फीस के पैसे देने की बात कही ताकि मैं कॉलेज में जीवविज्ञान की पढ़ाई करके बीएससी की डिग्री ले सकूं। जब मैं कॉलेज के अंतिम वर्ष में थी तब मेरी मां ने आंगवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में काम करना शुरू कर दिया और उसके बाद से उन्होंने ही पढ़ाई का मेरा पूरा खर्च उठाया। बीएससी पूरी करने के बाद मैं फ़ार्मा या एमएससी में दाख़िला लेना चाहती थी लेकिन हमारे पास इससे आगे पढ़ने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे। टेलरिंग, ब्यूटी पार्लर आदि का कोई कोर्स करने और कंप्यूटर में डिप्लोमा की पढ़ाई करने के इरादे से मैं अपने बड़े भाई के पास दिल्ली आकर रहने लगी। मैं दिल्ली में ही रहकर काम करना चाहती थी लेकिन मेरी मां की तबियत ख़राब हो गई और उनकी देखभाल के लिए मुझे अपने गांव वापस लौट जाना पड़ा। उनके इलाज और घर के बाक़ी खर्च चलाने के लिए मुझे लगा कि मुझे भी कमाना चाहिए।

मेरी पहली नौकरी विज्ञान फाउंडेशन में थी। कुछ समय तक उनके साथ काम करने के बाद मैंने पीपल्स एक्शन फॉर नैशनल इंटीग्रेशन (पीएएनआई) के साथ काम करना शुरू कर दिया। यह पूर्वी उत्तर प्रदेश में काम करने वाली एक समाजसेवी संस्था है। वे बलरामपुर में ग्राम पंचायतों की कृषि और पानी की खपत के पैटर्न का सर्वेक्षण करने के लिए लोगों को काम पर रख रहे थे। मैंने पीएएनआई में चार साल तक काम किया। विभिन्न प्रकार के सर्वेक्षण करने के अलावा मैं किसानों -विशेष रूप से महिलाओं- को खेती की नई तकनीकों को सीखने में मदद भी करती थी ताकि वे पानी की कम खपत में अच्छी उपज हासिल कर सकें। हमने कई महिला किसान संगठन (महिला किसान समितियां) और किसान संसाधन केंद्र (एफ़आरसी) बनाए ताकि महिला किसानों को सही सूचना प्राप्त करने और खेती से जुड़ी सही जानकारियां मिलने में मदद मिल सके।

खेत में खड़े होकर बात करती दो महिलाएं_ग्रामीण कामकाजी महिला
पीएएनआई में मैंने किसानों -विशेष रूप से महिलाओं- को खेती की नई तकनीकों को सीखने में मदद भी करती थी ताकि वे पानी की कम खपत में अच्छी उपज हासिल कर सकें। | चित्र साभार: प्रतिभा सिंह

पीएएनआई में अक्सर अन्य समाजसेवी संस्थाओं के लोग, फंडर, और कॉर्पोरेट में काम करने वाले विभिन्न प्रकार के लोग आते थे। मैं हमेशा ही उन्हें अपने गांव में होने वाली गतिविधियों को दिखाने के लिए लेकर जाती थी। पीएएनआई हमारा प्रशिक्षण बहुत ही सख़्त था जिससे मुझे स्वतंत्र दौरे करने और नए लोगों के साथ बिना किसी हिचकिचाहट के बात करने का आत्मविश्वास मिला।

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ऐसी ही एक यात्रा हिंदुस्तान यूनिलीवर (एचयूएल) की थी और मैं स्वेच्छा से उन्हें महिला किसान संगठन की बैठक में लेकर गई थी। महिला किसानों के साथ बातचीत के दौरान, एचयूएल टीम ने उनसे पूछा कि उन्होंने मुझसे क्या सीखा है और मैंने कैसे उनकी मदद की है। उन्होंने मुझसे उन तकनीकों के बारे में पूछा जो मैंने किसानों को बताई थीं और मैंने प्रत्येक चरण की जानकारी उनसे साझा की। वहां दौरे पर आने वालों में से एक एचयूएल में ग्राहक विकास के कार्यकारी निदेशक थे। वे मेरे काम से बहुत प्रभावित थे और उन्होंने मेरे सहकर्मियों के सामने मेरी तारीफ़ भी की थी। पीएएनआई में काम करने वाले अनूप सर ने तो मज़ाक करते हुए उनसे यह भी पूछ लिया कि क्या वे मुझे एचयूएल में काम देना चाहते हैं। मैं उस समय हैरान हो गई जब एचयूएल ने मुझे रूरल सेल्स प्रोमोटर (आरएसपी) के पद पर नौकरी का प्रस्ताव दिया। यह एक ऐसा पद है जिसमें एचयूएल उत्पादों को गांवों की दुकानों में बेचना शामिल है।

पीएएनआई में अपने काम को लेकर मैं बहुत गंभीर थी लेकिन कुछ ही दिनों बाद मेरा छोटा भाई बहुत गंभीर रूप से बीमार हो गया। उसे न्यूरोलॉजिकल समस्या हो गई थी और इलाज के लिए लखनऊ लेकर जाना पड़ा। हमारे पूरे परिवार की कमाई भी उसके इलाज के ख़र्चों के लिए कम पड़ रही थी। पीएएनआई में मेरी पदोन्नति का समय नहीं आया था और आरएसपी की भूमिका में काम करने के लिए मुझे एचयूएल से अच्छे पैसे मिल रहे थे, इसलिए मैंने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

मैं सितंबर 2022 में एचयूएल के साथ काम करना शुरू किया। मुझे बताया गया कि पूरे देश में कुल 4 हजार आरएसपी काम करते हैं – उनमें से लगभग सभी पुरुष हैं- और मैं पहली महिला कार्यकर्ता हूं जिसे इस पद के लिए नियुक्त किया गया है।

सुबह 5.00 बजे: चाहे कोई सा भी मौसम क्यों ना हो मैं हमेशा इसी समय सोकर जागती हूं। सबसे पहले मैं घर की सफ़ाई करती हूं, वरना मेरी मां मुझे डांटती है – उनका कहना है कि यदि हमारा घर साफ़ नहीं हुआ तो लक्ष्मी माता (देवी) हमारे घर नहीं आयेंगी। उसके बाद मैं कुछ घंटे पूजा करने, अपनी मां के साथ सुबह का नाश्ता और दोपहर का खाना पकाने और उसके बाद काम के लिए तैयार होने में लगाती हूं।

सुबह 10:30 बजे: अपनी स्कूटी पर सवार होकर मैं अपने ‘प्वाइंट्स’ पर पहुंचने के लिए निकल जाती हूं। प्रत्येक आरएसपी को ‘प्वाइंट्स’ या ‘दुकानें’ आवंटित होती हैं, और हम नियमित रूप से उनका दौरा करते हैं। चूंकि मेरे काम के कारण मुझे बलरामपुर के आसपास के इलाक़ों की यात्रा करनी पड़ती है इसलिए एचयूएल की नियुक्ति के कुछ दिनों बाद ही मैंने स्कूटी खरीद ली थी। मैंने अपने नाम पर ऋण लिया और हर महीने अपनी तनख़्वाह के पैसों से किस्त भरती हूं।

ये प्वाइंट्स आमतौर पर आसपास के इलाक़ों में चलने वाली छोटी-मोटी दुकानें होती हैं जो अन्य चीजों के अलावा एचयूएल द्वारा निर्मित साबुन और वाशिंग पाउडर जैसे उत्पाद बेचती हैं। इन दुकानों की मालिक या संचालक महिलाएं होती हैं जिन्हें शक्ति अम्मा के नाम से जाना जाता है। एक आरएसपी होने के नाते, मैं एचयूएल में दुकान मालिकों और वितरक के बीच एक पुल का काम करती हूं। एक बार जब कोई शक्ति अम्मा एचयूएल में शामिल हो जाती है, तो उसे एचयूएल उत्पादों को स्टॉक करने और बेचने के उसके चुने हुए लक्ष्य के आधार पर मासिक प्रोत्साहन मिलता है। उदाहरण के लिए, यदि उसका लक्ष्य छह हज़ार रुपये मूल्य के एचयूएल उत्पाद बेचना है, तो उसे मिलने वाली मासिक प्रोत्साहन की राशि 200 रुपये होगी। यदि वे अपना लक्ष्य बढ़ाती हैं तो उन्हें प्रोत्साहन में मिलने वाली राशि भी बढ़ जाती है। मैं उनकी ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया को संभालती हूं और एक मासिक लक्ष्य तय करने और उसे हासिल करने में उनकी मदद करती हूं, जो छह हज़ार से लेकर एक लाख रुपये (मुझे आवंटित प्वाइंट्स के लिए) तक हो सकती है। मैं हर हफ्ते उनके उत्पाद का ऑर्डर लेती हूं और उन्हें डिस्ट्रिब्यूटर तक पहुंचाती हूं।

जब मैं एक शक्ति अम्मा से मिलती हूं तो मैं उन्हें दो वीडियो भी दिखाती हूं। इन दोनों वीडियो में स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता और ऐसी ही कई जानकारियां होती हैं। आमतौर पर शक्ति अम्माओं के पास इन वीडियो में दिये गये संदेशों से जुड़े सवाल होते हैं और मैं अतिरिक्त समय लगाकर उन्हें गहराई से समझाने का पूरा प्रयास करती हूं। पीएएनआई में अपने काम के कारण मैंने लोगों से बातचीत करना और उनसे जुड़ना सीखा था जिससे एचयूएल में मेरा काम आसान हो गया। हालांकि इसमें से एक समाजसेवी संस्था और दूसरा कॉर्पोरेट, लेकिन दोनों जगहों पर मेरे काम में कई समानताएं हैं। सबसे पहले, मुझे इस बात की उम्मीद नहीं थी कि एचयूएल में मेरे काम में फ़ील्ड वर्क भी शामिल होगा। मुझे इस बात की जरा भी जानकारी नहीं थी कि निजी सेक्टर के कर्मचारियों को भी फ़ील्ड में इतना समय गुजारना पड़ता है – मुझे लगता था कि वे लगभग सारा समय अपने दफ़्तर में रहते हैं और काम करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे मैं अपनी जिम्मेदारियों से परिचित हुई, मुझे समझ आया कि कॉर्पोरेट में काम करने का यह एक महत्वपूर्ण आयाम क्यों है।

पीएएनआई में, मैंने बहुत ही निकटता से महिला किसानों के साथ काम किया था – उन्हें वीडियो दिखाना, खेती की नई तकनीकों को दिखाने के लिए उन्हें खेत पर ले जाना और उनके सवालों के जवाब देना – किसी भी नई चीज के उपयोग की प्रक्रिया को जितना संभव हो सके उतना आसान बनाना मेरा काम था। शक्ति अम्माओं के साथ भी मेरी भूमिका लगभग वैसी ही है। मैं उन्हें उनके लक्ष्यों को प्रबंधित करना सिखाती हूं या ऑर्डर देने के लिए ऐप आदि का उपयोग करने में उनकी मदद करती हूं। मुझे इन महिलाओं से बातचीत करने में बहुत मज़ा आता है और समय के साथ इनके साथ मेरे रिश्ते उतने ही अच्छे हो गए हैं जितने कि पीएएनआई में काम करने के दौरान महिला किसानों के साथ हो गए थे।

खेत में बातें कर रही महिलाओं का एक झुंड_ग्रामीण कामकाजी महिला
पीएएनआई में अपने काम के कारण मैंने लोगों से बातचीत करना और उनसे जुड़ना सीखा था जिससे एचयूएल में मेरा काम आसान हो गया। | चित्र साभार: प्रतिभा सिंह

दोपहर 1.00 बजे: मैं लगातार एक जगह से दूसरी जगह आती-जाती रहती हूं मुझे प्रति दिन प्वाइंट्स पर और वितरण एजेंसी के पास जाना होता है, नतीजतन एक दिन में मुझे 60–70 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे मैं सुबह 10 बजे अपनी स्कूटी पर बैठती हूं तो फिर शाम को ही उतरती हूं। इसलिए मैंने अपनी स्कूटी का नाम धन्नो रख दिया है! यह नाम मेरी पसंदीदा फिल्म शोले से आया है जिसमें बसंती ने अपनी घोड़ी का नाम धन्नो रखा था। दरअसल, प्रति दिन सुबह जब मैं अपने काम के लिए निकलती हूं तो स्कूटी स्टार्ट करते हुए कहती हूं, ‘चल मेरी धन्नो।’ जिसे सुनकर मेरे पिता हंसते हैं।

आवंटित प्वाइंट्स के दौरे के दौरान मेरी नज़र संभावित प्वाइंट्स पर भी होती है। हम जितने अधिक प्वाइंट्स का प्रबंधन करते हैं, हमारा लक्ष्य भी उतना ही बड़ा होता जाता है। जब मैंने आरएसपी के रूप में काम करना शुरू किया था तब मुझे 11 प्वाइंट्स की ज़िम्मेदारी दी गई थी और प्रति माह मुझे 70 हज़ार रुपये के उत्पाद बेचने होते थे। वर्तमान में 34 प्वाइंट के साथ मेरा मासिक लक्ष्य 3–4 लाख रुपये है। हमें आवंटित लक्ष्य का 103 फ़ीसद हासिल करना है और मैं गर्व से कह सकती हूं कि मैं केवल दो बार अपना लक्ष्य हासिल करने से पीछे रही हूं!

पहली बार एचयूएल में शामिल होने के बाद मैंने 300 विभिन्न उपभोक्ता उत्पादों के बारे में सीखा ताकि मैं दुकान मालिकों से आत्मविश्वास से बात कर सकूं और उनके किसी भी प्रश्न का उत्तर दे सकूं। संदीप सर भी एक डिस्ट्रिब्यूटर हैं, और उन्होंने विस्तार से ये सब कुछ सीखने में मेरी बहुत मदद की। शुरूआत के कुछ सप्ताह, मैं नियमित रूप से अपने हाथ में एक डायरी लेकर एजेंसी के दौरे पर निकली थी जिसमें सभी उत्पादों का विवरण दर्ज करती ताकि सब कुछ याद कर सकूं।

मुझे बहुत कुछ नया सीखना था और इस पूरे ज्ञान को हासिल करने की ज़िम्मेदारी मुझ पर ही थी। पीएएनआई की टीम में पुरुष एवं महिलाएं दोनों थे, इसलिए एचयूएल में जाने के बाद शुरुआती कुछ दिनों तक पुरुषों वाली टीम के साथ तालमेल बैठाने में मुझे थोड़ा समय लग गया। जहां पीएएनआई में टीम के सदस्यों को बोलने के लिए प्रोत्साहित करना मेरा काम था, वहीं अब पुरुषों से भरे एक कमरे में अपनी बात रखने या प्रश्न पूछने में मुझे झिझक होती थी। लेकिन मेरा पूरा ध्यान उस काम पर था जिसे करना था और मैंने बहुत जल्दी ही ख़ुद को उस हिसाब से ढाल लिया। शुरुआती दिनों में कुछ भी सीखने में परेशानी आती ही है। मैंने कभी ना तो हार मानी और ना ही सवाल का जवाब ना मिलने पर बुरा माना। इसके बदले, मैंने अन्य आरएसपी को देखकर जितना हो सका उतना सीखने की कोशिश की।

बेशक उस भूमिका को निभाने वाली एक मात्र महिला होने के नाते मेरे सामने कई तरह की चुनौतियां आईं लेकिन मैंने पूरी कोशिश की कि यह बात मेरी इस यात्रा में किसी तरह की बाधा ना बने। यदि इस इलाक़े में महिलाओं को आरएसपी के पद पर नियुक्त किया जाता है तो मुझे उम्मीद है कि मैं उनके सामने आने वाली चुनौतियों से निपटने में उनकी मदद कर सकती हूं। मैं नहीं चाहूंगी कि वे लंबी दूरी की यात्रा, सीमित सहायता के साथ काम को सीखने या लोगों की जबरन की हंसी-ठिठोली जैसी मुश्किलों के सामने घुटने टेक दें। मुझे याद है कि पीएएनआई में जब पहली बार हमने किसानों के साथ काम करना शुरू किया था तब वे -ख़ासतौर पर पुरुष- यह कह कर हमारा मज़ाक बनाते थे कि ‘ये छोटी लड़कियां हमें क्या सिखाएंगी?’ लेकिन हमारे दृढ़ संकल्प और ज्ञान को देखकर उनका संदेह दूर हो गया। मैंने उसी दृढ़ विश्वास को एचयूएल में कायम रखा और हर दिन अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया ताकि मैं आगे बढ़ती रह सकूं।

किराना स्टोर के सामने सेल्फ़ी लेती दो महिलाएं_ग्रामीण कामकाजी महिला
मैं शक्ति अम्माओं को नई स्थितियों से निपटने में मदद करती हूं जैसे कि उनके लक्ष्यों को प्रबंधित करना या ऑर्डर देने के लिए ऐप का उपयोग करना। | चित्र साभार: प्रतिभा सिंह

शाम 6.00 बजे: मैं घर पहुंचती हूं और कई घंटे अपनी स्कूटी के साथ बिताने के बाद मुझे उससे उतरने का मौक़ा मिलता है। मेरी मां घर साफ-सुथरा रखने को लेकर बहुत पक्की हैं इसलिए मैं एक बार फिर पूरे घर में झाड़ू लगाती हूं। उसके बाद मेरा पूरा परिवार एक साथ बैठकर चाय पीता है और फिर हम रात के खाने की तैयारी में लग जाते हैं। इस समय तक मेरे पिता भी खेत में अपना काम पूरा करके लौट आते हैं। हालांकि वे जिसका पालन करते हैं मुझे खेती के उस पारंपरिक तरीक़ों के बारे में कुछ ज़्यादा पता नहीं है। लेकिन मेरे पीएएनआई में काम शुरू करने के बाद मैंने उन्हें खेती के उन नए और जैविक तरीक़ों के बारे में बताया जिससे खेत की उत्पादन क्षमता भी बेहतर होती है। हम अक्सर इस बात पर हंसते हैं कि मैं बहुत आसानी से ये बता सकती हूं कि हमारे गांव का कौन सा खेत किसका है।

रात 10.00 बजे: रात का खाना खाने के बाद मैं कुछ समय पढ़ाई में लगाती हूं। आमतौर पर मैं रात के एक बजे तक अपनी पढ़ाई करती हूं। मैं हमेशा ही अधिक से अधिक सीखने के अवसर तलाशती रहती हूं, इसलिए मैं सहायक नर्स मिडवाइफ (एएनएम) का कोर्स कर रही हूं। इस पढ़ाई का खर्च मैं अपने वेतन से भरती हूं और थोड़ी बहुत मदद मेरे मामा भी करते हैं।
मुझे काम करते हुए लगभग छह साल हो चुके हैं और फ़ील्ड में जाना हमेशा मेरे काम का मुख्य हिस्सा रहा है। मुझे इन भूमिकाओं में काम करने में मज़ा आता है और इसलिए हमेशा ही मैं अपने काम में पूरी ऊर्जा लगाती हूं और अच्छा करने का प्रयास करती हूं। इसके अलावा मेरा सपना है कि एक दिन मैं दफ़्तर में बैठ कर काम करूं।

जैसा कि आईडीआर को बताया गया।

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लेखक के बारे में
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प्रतिभा सिंह

प्रतिभा सिंह उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में हिंदुस्तान यूनिलीवर के साथ ग्रामीण बिक्री प्रमोटर के रूप में काम करती हैं। इससे पहले वे पहले पीपुल्स एक्शन फॉर नेशनल इंटीग्रेशन (पीएएनआई) के साथ फील्ड कॉर्डिनेटर के रूप में काम कर चुकी हैं।

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