समाजसेवी संस्था
सिस्टम में बदलाव: हकीकत से ज़्यादा भ्रम
‘सिस्टम्स चेंज’ के प्रति बढ़ता आकर्षण संस्थाओं की प्राथमिकताओं को असंतुलित और ज़मीनी स्तर पर सार्थक प्रयासों को कमज़ोर बना सकता है।एक लड़की, जिसने हर हाल में शिक्षा को चुना
कर्नाटक के रायचूर की एक युवा फील्ड कोऑर्डिनेटर के जीवन का एक दिन। उसकी उस यात्रा के साथ, जहां वह कभी स्कूल छोड़ने की कगार पर थी, लेकिन आज अपने साथ-साथ अपने परिवार और समुदाय का सहारा बन चुकी है।आया मौसम, अप्रेज़ल का!
तेरा करूं…तेरा करूं दिन-गिन-गिन के इंतजार…महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा रोकने की स्थायी राह कैसे खुलेगी?
लैंगिक असमानताएं सामाजिक और संस्थागत ढांचों में गहराई से जड़ें जमाए हैं। अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाली महिलाएं और लड़कियां हर रोज इसका सामना करती हैं।ग्रामीण भारत में प्लास्टिक कचरे का हिसाब करना क्यों जरूरी है?
ग्रामीण भारत में हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जिसका आकलन नहीं होता। ऐसे में ग्रामीण स्तर के आंकड़ों को जोड़कर एक सर्कुलर इकॉनमी की नींव रखी जा सकती है।क्या क्षेत्रीय भाषाएं क्राउडफंडिंग को ज़्यादा प्रभावी बनाती हैं?
स्थानीय भाषा और संस्कृति को दर्शाने वाले फंडरेजिंग कैंपेन डोनर्स का विश्वास जीतने में बेहतर साबित हो सकते हैं।देखो, देखो, वो आ गयी!
“वेबसाइट मोबाइल पर क्यों नहीं खुलती?” से शुरू होने वाली इस कहानी का कोई अंत नहीं है। कृपया अपने जोखिम पर लॉग-इन करें।शादी का कार्यक्रम: नॉनप्रॉफिट स्टाइल में
पूरे कार्यक्रम की मिनट-दर-मिनट योजना (बस अप्रूवल बाकी है!)तुम करते क्या हो…हैं?
वह देश बदल सकता है, सिस्टम जगा सकता है, आंदोलन कर सकता है। बस अपना काम समझाने के सिवा सोशल सेक्टर का योद्धा सब कर सकता है।फोर-लेन रिट्रीट की सिंगल-लेन रिएलिटी
सोशल सेक्टर रिट्रीट का हाल किसी मल्टी-लेन हाईवे जैसा नजर आता है—कागज़ पर कई रास्ते, जमीन पर एक!सोशल सेक्टर कॉन्फ्रेंस: समान मंच की असमान सच्चाई
भारत में विकास सेक्टर के सम्मेलन अक्सर भाषा, विविधता और समावेशन की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं। क्या यह सच में एक समान मंच हैं?