मैंने कई सालों तक वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं के साथ काम किया है। मेरा मानना था कि अगर हम उनके अंदर जीवन कौशल (लाइफ स्किल्स) विकसित कर सकें, तो वे अपनी ज़िंदगी में सही मायनों में आगे बढ़ सकेंगे और फल-फूल सकेंगे। अंग्रेज़ी में हम इसके लिए ‘थ्राइविंग’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं। मेरी राय थी कि अगर कोई युवा अच्छे से संवाद कर पाए, समस्याओं का हल निकाल सके, अपनी भावनाओं को समझे, और पहल करने की क्षमता रखता हो, तो वह ज़िंदगी की कई चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना कर सकेगा।
ड्रीम ए ड्रीम में हमारे शुरुआती काम का एक बड़ा हिस्सा युवाओं के लिए ऐसे अवसर तैयार करने पर केंद्रित था। हमें इसके नतीजे भी मिल रहे थे। हमने देखा कि कई युवा अधिक आत्मविश्वासी और मुखर हो रहे थे और नए अनुभवों को अपनाने के लिए तैयार थे। हमें लगता था कि हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन फिर कुछ ऐसे अनुभव भी हुए, जिन्होंने हमें ठहरकर सोचने के लिए मजबूर किया।
मुझे एक युवा लड़की याद है, जिसका चयन एक अंतरराष्ट्रीय एक्सचेंज कार्यक्रम के लिए हुआ था। उसमें काबिलियत और आत्मविश्वास की कोई कमी नहीं थी। लेकिन वह विदेश नहीं जा पाई, क्योंकि उसके परिवार ने उसका पासपोर्ट अपने पास रख लिया था। उनका मानना था कि “लड़कियों को अपने दायरे से बाहर नहीं निकलना चाहिए।”
इस घटना और ऐसी ही कई दूसरी स्थितियों ने हमारी सोच में मौजूद एक बड़ी कमी को उजागर किया। हमें एहसास हुआ कि किसी युवा के ‘थ्राइव’ करने का संबंध सिर्फ उसकी अपनी क्षमताओं से नहीं है। यह इस बात से भी तय होता है कि उसके आसपास की दुनिया उसे क्या बनने और क्या करने की इजाज़त देती है। हम युवाओं के भीतर बदलाव लाने पर काम कर रहे थे, लेकिन उनके आसपास मौजूद उन सामाजिक और संरचनात्मक स्थितियों को नहीं देख रहे थे, जो उनकी क्षमताओं और विकल्पों को सीमित कर सकती थी।
क्षमता से परिस्थितियों तक
यह एहसास सिर्फ हमारे काम तक सीमित नहीं रहा। धीरे-धीरे मैंने अपने भीतर मौजूद उन धारणाओं को भी देखना शुरू किया, जिन्हें मैं लंबे समय तक पहचान ही नहीं पाया था। मैं एक ऐसे माहौल में बड़ा हुआ, जो पितृसत्ता और कई तरह के विशेषाधिकारों से बना था। एक सवर्ण हिंदू युवक के रूप में मुझे ऐसी आज़ादी और अवसर सहज रूप से मिले, जिन पर मैंने लंबे समय तक सवाल नहीं उठाया। मेहनत और अनुशासन को लेकर मेरी अपनी कुछ धारणाएं थी, जिनके आधार पर मैं तय करता था कि ज़िंदगी में सफल होना किसे कहते हैं। मैंने कभी गंभीरता से यह समझने की कोशिश नहीं की कि ये धारणाएं मेरे भीतर कहां से आई थी? लेकिन जब ड्रीम ए ड्रीम में युवाओं के साथ काम करते हुए मुझे यह महसूस हुआ कि हम उनकी ज़रूरतों और उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं, तब मेरा ख़ुद से सवाल पूछना ज़रूरी हो गया।
धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा कि हम अपने काम के बावजूद क्या नहीं बदल पा रहे थे। मसलन, हमारे कार्यक्रमों में सक्रिय रहने वाला कोई युवा नौकरी के इंटरव्यू में अपनी बात नहीं रख पाता था। गुस्से से जूझ रहे किसी युवा लड़के के व्यवहार में उसके घर के हिंसक माहौल की छाप दिखाई देती थी। अपनी समझ बना रही किसी युवा लड़की को उसके जेंडर से जुड़ी सामाजिक बेड़ियां आगे बढ़ने से रोक देती थी।
किसी युवा के ‘थ्राइव’ करने का संबंध सिर्फ उसकी अपनी क्षमताओं से नहीं है। यह इस बात से भी तय होता है कि उसके आसपास की दुनिया उसे क्या बनने और क्या करने की इजाज़त देती है।
इन अनुभवों ने मुझे एक गहरी सच्चाई से रूबरू कराया। जब सबके लिए शुरुआत ही बराबर न हो, तो ‘थ्राइविंग’ का मतलब क्या है? यहां से हमने बदलाव की प्रक्रिया को एक नए नज़रिए से देखना और अपनी संस्था के तौर-तरीकों पर भी सोचना शुरू किया।
एक समय था जब हमें लगता था कि किसी संस्था के काम को बड़े स्तर पर ले जाने का मतलब है अपने कार्यक्रमों को ज़्यादा से ज़्यादा जगहों तक पहुंचाना। जैसे-जैसे हमारा काम फैला, उससे जुड़ने वाले युवाओं की संख्या भी बढ़ती गई। लेकिन फिर एक सवाल सामने आया। हमारे कार्यक्रम तो नई जगहों तक पहुंच रहे थे, लेकिन शायद हमारे काम की मूल सोच पीछे छूटने लगी थी—यानी युवा अपने फैसले खुद कर सकें, अपनी गरिमा को बरकरार रखें और खुद को बेहतर ढंग से समझ सकें।


हमें समझ में आया कि बदलाव सिर्फ किसी कार्यक्रम को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने से नहीं आता। इसके लिए युवाओं को देखने और समझने का हमारा नज़रिया भी बदलना ज़रूरी है। करीब एक दशक तक सहयोगी स्कूलों में लाइफ स्किल प्रोग्राम चलाने के बाद हमने युवाओं से बात की और उनसे पूछा कि इन कार्यक्रमों में उन्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरी क्या लगा? उनका कहना था कि फैसिलिटेटर उनके लिए किसी भी प्रोग्राम का सबसे बेशकीमती हिस्सा थे। ऐसा इसलिए, क्योंकि फैसिलिटेटर बिना किसी जजमेंट के उनकी बात सुनते हैं और उन्हें पूरा सम्मान देते हैं। यह हमारे लिए एक अहम सीख थी। कोई भी प्रोग्राम युवाओं के लिए अवसर तो पैदा कर सकता है, लेकिन उन अवसरों को वे किस तरह अनुभव करते हैं, इसमें संवेदनशील वयस्कों की बड़ी भूमिका होती है।
इस समझ ने हमारे काम का फोकस बदल दिया। हमने सिर्फ कार्यक्रमों पर नहीं, बल्कि युवाओं के साथ रिश्तों पर ध्यान देना शुरू किया। सिर्फ हम क्या पढ़ा या सिखा रहे हैं, इस पर नहीं, बल्कि उस माहौल पर भी, जिसमें युवा रह रहे हैं। इस प्रक्रिया से हमें जो सीख मिली है, उसे हम सेक्टर में काम करने वाले लोगों और संस्थाओं के साथ साझा करना चाहते हैं:
1. आत्म-मंथन
युवाओं को क्या चाहिए, यह पूछने से पहले हमें अपने पूर्वाग्रहों पर गौर करना चाहिए। लेकिन यह सिर्फ एक बार की कवायद नहीं हो सकती। इसे फैसिलिटेशन से जुड़े प्रशिक्षण का हिस्सा बनाना ज़रूरी है। वर्ष 2011 में हमने पीवायई ग्लोबल के साथ मिलकर शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए एक फैसिलिटेशन-आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार किया था। इसमें हम सिर्फ़ काम करने के तरीकों पर नहीं, बल्कि समानुभूति, देखभाल और सुनने की क्षमता पर भी ज़ोर देते हैं। शिक्षक/फैसिलिटेटर जब अपने व्यवहार और खुद को देखने के नज़रिए में बदलाव लाते हैं, तभी वे छात्रों के लिए एक बेहतर माहौल बना पाते हैं।
साथियों से बातचीत और अनुभव साझा करने की जगहें इस प्रक्रिया को आसान बनाती हैं। जब कोई शिक्षक अपनी किसी चुनौती या पूर्वाग्रह को ईमानदारी से स्वीकार करता है, तो दूसरों को भी अपनी धारणाओं पर खुलकर बात करने का हौसला मिलता है। हम ऐसा ही माहौल अपने सालाना आयोजन ‘चेंज द स्क्रिप्ट’ में देखते हैं। जब किसी प्रभावशाली पद पर मौजूद व्यक्ति अपनी कमी या उस बात को स्वीकार करता है जिसे वह पहले नहीं देख पा रहा था, तो दूसरों के लिए भी सच्चाई से अपनी बात कहना आसान हो जाता है।
2. सिर्फ़ युवाओं पर नहीं, फैसिलिटेटर पर भी ध्यान दें
अधिकतर प्रशिक्षण कार्यक्रमों में केवल पढ़ाने के तरीकों और पाठ्यक्रम पर ध्यान दिया जाता है। लेकिन शिक्षक खुद को और युवाओं को किस नज़र से देखते हैं, इस पर बहुत कम बात होती है। यह आसान भी नहीं है, क्योंकि शिक्षक अक्सर ऐसे तंत्र में काम करते हैं, जहां अनुशासन, नियम और पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन सबसे ज़्यादा मायने रखता है। ऐसे में उनसे बच्चों के लिए संवेदनशील माहौल बनाने की उम्मीद की जाती है, जबकि पूरे तंत्र से उन्हें अक्सर इसके उलट निर्देश मिलते हैं।
हमने पाया है कि सिर्फ़ यह बताना कि समानुभूति और पूर्वाग्रहों को समझना क्यों ज़रूरी है, लंबे समय तक बदलाव लाने के लिए काफी नहीं है। इसके साथ ही हम ऐसा माहौल बनाने की कोशिश करते हैं, जहां शिक्षकों की बात भी बिना किसी जजमेंट के सुनी और समझी जाये। जब वे खुद समानुभूति और ध्यान से सुने जाने के असर को महसूस करते हैं, तब वे समझ पाते हैं कि युवाओं को भी इसकी ज़रूरत क्यों है। यह बदलाव समय लेता है। इसके लिए निरंतर सहयोग ज़रूरी है—खासकर तब, जब उन्हें वापस ऐसे तंत्र में लौटना होता है, जहां इन तरीकों को हमेशा प्रोत्साहन नहीं मिलता।


3. सरकार के साथ साझेदार की तरह काम करें
व्यवस्था में स्थायी बदलाव के लिए सिर्फ़ सबूत (एविडेंस) नहीं, अपनी हिस्सेदारी भी ज़रूरी है। एजेंसी, अपनेपन और थ्राइविंग जैसे विचार अक्सर उन शिक्षा व्यवस्थाओं से मेल नहीं खाते, जो सख़्त नियमों और तय लक्ष्यों के इर्द-गिर्द बनी होती हैं। हमारा अनुभव बताता है कि इसका रास्ता इन व्यवस्थाओं से अलग काम करना नहीं, बल्कि इनके साथ मिलकर काम करना है। हम सरकारों के पास कोई तय कार्यक्रम लेकर नहीं जाते, बल्कि पहले उनकी प्राथमिकताओं और सीमाओं को समझते हैं और फिर उनके साथ मिलकर कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करते हैं।
कम लागत वाले प्रोग्राम भी मुश्किल परिस्थितियों से जूझ रहे युवाओं के संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक जीवन कौशल में मापने योग्य सुधार ला सकते हैं।
दिल्ली का हैप्पीनेस करिकुलम इसकी एक अच्छी मिसाल है। वर्ष 2016 से हमारी संस्था ने दिल्ली सरकार के साथ मिलकर इसे तैयार करने पर काम किया। इस पाठ्यक्रम में बच्चों को बिना किसी ग्रेड या अंक के अपने अनुभवों पर सोचने और चर्चा करने की जगह दी गई। लेकिन इसे अपनाया जाना सिर्फ़ इसके मूल विचार की वजह से नहीं था। समय के साथ सरकार ने ज़मीनी स्तर पर इसका असर देखा—शिक्षक अपने काम में अधिक रुचि लेने लगे, छात्रों में सीखने और सवाल पूछने की जिज्ञासा बढ़ी और कक्षाओं में आक्रामक व्यवहार में कमी आई। इस अनुभव से हमें झारखंड, तेलंगाना, उत्तराखंड और नागालैंड समेत अन्य राज्यों की सरकारों के साथ भी भरोसे का रिश्ता बनाने में मदद मिली। इसी तरह वर्ष 2019 से हमने उत्तराखंड सरकार के साथ आनंदम पाठ्यचर्या तैयार करने और उसे लागू करने में भी सहयोग दिया। यहां भी सिर्फ़ जीवन कौशल सिखाने के बजाय सामाजिक-भावनात्मक कौशल पर ज़ोर दिया गया, ताकि बच्चे अपनी भावनाओं को समझ और व्यक्त कर सकें। इन सभी कार्यक्रमों को राज्य सरकारों के साथ मिलकर स्थानीय ज़रूरतों और परिस्थितियों के मुताबिक़ ढाला गया।
4. जो मायने रखता है, उसे मापें
हमने शोधकर्ताओं के साथ मिलकर एक लाइफ़ स्किल्स असेसमेंट स्केल विकसित करने में सात साल लगाए। इसे 1,000 से अधिक युवाओं के साथ आज़माया गया और बाद में एक शोध पत्रिका में प्रकाशित किया गया। आगे चलकर जो शोध हुए, उनसे पता चला कि कम लागत वाले प्रोग्राम भी मुश्किल परिस्थितियों से जूझ रहे युवाओं के संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक जीवन कौशल में मापने योग्य सुधार ला सकते हैं। दिल्ली के हैप्पीनेस करिकुलम पर ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के स्वतंत्र शोध से भी इस बात के प्रमाण और मज़बूत हुए।
अगर हमारा लक्ष्य युवाओं को बेहतर ढंग से आगे बढ़ने में मदद करना है, तो सिर्फ़ पढ़ाई के नतीजों से यह पता नहीं चल सकता कि वे सचमुच अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं या नहीं। हमें यह भी समझना होगा कि क्या उन्हें अपनेपन का एहसास होता है, क्या वे अपनी बात खुलकर कह पाते हैं और क्या उनमें जटिल परिस्थितियों से निपटने का आत्मविश्वास और ज़रूरी कौशल विकसित हो रहे हैं। कई बार इन पहलुओं को यह कहकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है कि इन्हें मापना बहुत मुश्किल है। लेकिन हमारे अनुभव ने हमें इसके उलट तस्वीर दिखाई है।
हम किस तरह के बदलाव की कल्पना करते हैं?
अपनी इस यात्रा में हमने सीखा है कि हमें फिर से सोचना होगा कि हम शिक्षा के क्षेत्र में आखिर किस तरह का बदलाव लाना चाहते हैं? क्या शिक्षा का काम सिर्फ़ युवाओं को भविष्य के लिए तैयार करना है? या उन्हें अपनी गरिमा और संभावनाओं को अनुभव करने का मौका देना भी है?
क्या कक्षाएं ऐसी जगहें बन सकती हैं, जहां युवाओं को अपनी पहचान के किसी हिस्से को छिपाना न पड़े?
क्या सफलता का मतलब यह होना चाहिए कि कोई व्यक्ति तय ढांचे में कितना फिट बैठता है? या यह कि वह अपने लिए सफलता का रास्ता कितनी आज़ादी से चुन सकता है?
जब भी मैं इनमें से किसी सवाल पर अटकता हूं, तो एक बात पर वापस लौटता हूं—हम ऐसा समाज कैसे बना सकते हैं, जहां हमारे युवा सच में ‘थ्राइव’ कर सकें?
इसका कोई एक जवाब नहीं है। लेकिन धीरे-धीरे मैं समझ रहा हूं कि यह सिर्फ़ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम उनके लिए कैसे प्रोग्राम बनाते हैं या उन्हें कौन से कौशल सिखाते हैं। इससे कहीं ज़्यादा मायने रखता है कि हम उनके साथ कैसे पेश आते हैं, उनकी बात कैसे सुनते हैं, उनके लिए किस तरह का माहौल बनाते हैं और एक-दूसरे को किस नज़र से देखते हैं।
सबसे अहम बात यह है कि युवाओं के लिए ‘थ्राइव’ करने लायक समाज बनाने से पहले, हमें अपने अंदर उन सभी बातों पर गौर करने की कोशिश करनी होगी, जिन्हें हम अब तक नज़रअंदाज़ करते आए हैं। यह काम असहज है, लेकिन ज़रूरी है।
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लेखक के बारे में
- विशाल तलरेजा एक सामाजिक उद्यमी, शिक्षक, कवि, लेखक और ड्रीम ए ड्रीम के सह-संस्थापक हैं। विशाल ने 10 अन्य सह-संस्थापकों के साथ मिलकर ड्रीम ए ड्रीम की सह-स्थापना की है। उन्होंने डॉ. डेविड पियर्सन और डॉ. फियोना कैनेडी के साथ मिलकर भारतीय संदर्भ में जीवन कौशल से जुड़े चार शोध-पत्रों का सह-लेखन किया है। इसके अलावा, उन्होंने शिक्षा में बदलाव से जुड़े कई लेख, श्वेत पत्र और नीति संक्षेप लिखे हैं। उन्होंने डॉ. कोनी के. चुंग और ड्रीम ए ड्रीम के कर्मचारियों और प्रतिभागियों के साथ मिलकर व्हेन वी थ्राइव, आवर वर्ल्ड थ्राइव्स पुस्तक का सह-लेखन किया है। इसके अलावा, उनकी कविताओं की एक पुस्तक ‘माय सोल स्टरिंग’ भी प्रकाशित हो चुकी है।



