विविधता और समावेश

​सिस्टम में बदलाव: हकीकत से ज़्यादा भ्रम​ 

‘सिस्टम्स चेंज’ के प्रति बढ़ता आकर्षण संस्थाओं की प्राथमिकताओं को असंतुलित और ज़मीनी स्तर पर सार्थक प्रयासों को कमज़ोर बना सकता है।​
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जड़ के साथ एक पौधा_बदलाव

हम जैसे लोग अक्सर तीन प्रकार के भ्रम पालते हैं। पहला भ्रम स्केल से जुड़ा है—यानी यह सोच कि हर चीज़ का ‘स्केल’ होना ज़रूरी है, तभी वह सार्थक मानी जाएगी। दूसरा भ्रम निरंतरता (सस्टेनेबिलिटी) को लेकर है—यह धारणा कि हम कोई कार्यक्रम शुरू करेंगे, उससे बदलाव आएगा, लोग सशक्त हो जाएंगे, और फिर वे सुनिश्चित करेंगे कि यह बदलाव कायम रहे। तीसरा भ्रम ‘सिस्टम्स चेंज’ को लेकर है, जिसमें हम मान लेते हैं कि सरकारों के साथ छोटी-छोटी अवधियों में काम कर हम गहराई से जमी हुई व्यवस्थाओं (सिस्टम्स) को बदल सकते हैं।

मेरे लिए ये तीनों ही विचार अमूमन दुनिया और उसमें हमारी अपनी भूमिका से जुड़ी एक अवास्तविक समझ को दर्शाते हैं।

सिस्टम्स चेंज की अवधारणा

भारत में सिस्टम्स चेंज को सरकारों के साथ काम करने और उनके स्केल तथा नीतिगत प्रभाव का उपयोग करके समाधानों को सार्वजनिक व्यवस्था में समाहित करने के रूप में देखा जाने लगा है। इसमें ‘सह-निर्माण’ (को-क्रिएशन) के तरीके अपनाना और सरकारी संरचनाओं के भीतर संस्थागत क्षमता को मज़बूत करना शामिल है, ताकि ‘बड़े स्केल पर प्रभाव’ हासिल किया जा सके।

सच्चाई यह है कि नागरिक समाज में हम सब, या हममें से अधिकांश लोग, छोटे-छोटे तरीकों से सिस्टम्स चेंज में योगदान देते हैं। कोई भी व्यवस्था (सिस्टम) कई विभिन्न हिस्सों से जुड़कर बनती है। उसमें बदलाव या सुधार लाने के लिए हम सभी अपनी-अपनी भूमिकाओं में फंडर, गैर-लाभकारी संस्था, समुदाय और ज़मीनी टीम के रूप में योगदान देते हैं। निसंदेह हमें यह काम जारी रखना चाहिए।

लेकिन यह मान लेना एक ग़लतफ़हमी होगी कि हम एक बड़ी जनसंख्या के स्तर पर व्यापक प्रभाव पैदा कर सकते हैं। सिस्टम्स चेंज की अवधारणा के ताने-बाने को एक ऐसे रूप में फिर से समझने की ज़रूरत है, जहां हर पक्ष—फंडर, सरकार, गैर-लाभकारी संस्था और समुदाय—अपने संसाधनों, क्षमताओं और सामर्थ्य के अनुपात में ख़ुद यह तय करे कि वह तंत्र के किस हिस्से को बेहतर बनाने में कैसे योगदान दे सकता है। वास्तव में अधिकांश नागरिक समाज का यही काम होता है।

उदाहरण के लिए, यदि आप ब्लॉक स्तर पर काम कर रहे हैं, तो आपको ब्लॉक स्तर की व्यवस्था की क्षमता को समझना होगा, और उसके भीतर यह पहचानना होगा कि आप किन चीज़ों पर काम कर सकते हैं और क्या बदलने का प्रयास कर सकते हैं। लेकिन यदि आप यह कहते हैं कि आप राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पूरे सिस्टम को बदल देंगे, वह भी एक निश्चित समय सीमा में, जबकि राज्य की राजधानी में आपकी केवल 13 लोगों की टीम (जिसे अक्सर ‘प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट’ कहा जाता है) और कुछ ज़िलों में इक्का-दुक्का लोग हों, तो यह एक आत्म-सेवी भ्रम है। आत्म-सेवी इसलिए क्योंकि इससे आपको यह संतोष मिल सकता है कि आप कोई बहुत बड़ा काम कर रहे हैं; और भ्रम इसलिए, क्योंकि वास्तविकता में इससे कोई व्यवस्थागत बदलाव नहीं होता है।

सिस्टम्स चेंज के ज़रिए स्केल हासिल करने की भ्रांति

आज समस्या यह है कि कई फंडर, गैर-लाभकारी संस्थाएं और मध्यस्थ ‘बड़े स्केल पर सिस्टम्स चेंज’ के विचार को लगातार बढ़ावा दे रहे हैं। उनके पास शक्ति, प्रभाव और मज़बूत नेटवर्क हैं। इस कारण वे सरकारों के भीतर काम करने और ‘चरमराई व्यवस्था को ठीक करने’ वाले इस मॉडल में बड़ी मात्रा में निवेश कर रहे हैं, मानो यही बड़े स्केल पर प्रभाव पैदा करने का इकलौता तरीका हो।

उनका बात रखने का तरीका बहुत सरल होता है। उदाहरण के लिए: हम एक राज्य की 17,000 आंगनवाड़ियों के साथ काम कर रहे हैं, इसलिए हम उस राज्य के आईसीडीएस सिस्टम को बदल रहे हैं। लेकिन उनकी टीम बहुत छोटी होती है (बमुश्किल कुछ दर्जन लोग)। इस तरह के सीमित मानव संसाधनों और इतने सतही जुड़ाव के साथ हम किसी भी तंत्र में बदलाव की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? इसी तरह, किसी राज्य की राजधानी में सरकारी शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम को फिर से डिज़ाइन कर देना भी सिस्टम्स चेंज के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जबकि असल में हमारे पास यह जांचने का कोई तरीका मौजूद नहीं है कि इससे कक्षाओं, छात्रों और व्यवस्था के स्तर पर क्या बदलाव आया।

यह एक सामान्य धारणा बन चुकी है कि यदि आप सरकार के साथ काम कर रहे हैं, तो आप सिस्टम्स चेंज ला रहे हैं। लेकिन हम यह सवाल नहीं पूछते कि काम की बुनियाद क्या है, या उसके तौर-तरीकों का वास्तविक प्रभाव क्या है।

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यह एक सामान्य धारणा बन गयी है कि यदि आप सरकार के साथ काम कर रहे हैं, तो आप सिस्टम्स चेंज ला रहे हैं। | चित्र साभार: पेक्सेल्स

ये संस्थाएं ख़ुद को यह विश्वास दिला सकती हैं कि उन्होंने सिस्टम को बदल दिया है। लेकिन कोई भी तंत्र कई दशकों में बनता है, और उसका अर्थ उसके ज़मीनी स्तर के वास्तविक अनुभवों से अलग नहीं किया जा सकता। जब कोई “शिक्षा व्यवस्था” कहता है, तो उसका मतलब पूरे देश की आबादी की शिक्षा से होता है। कोई यूं ही नहीं कह सकता कि “हमने इसे बदल दिया।”

फिर भी, आज कई संस्थाएं ऐसी बातों के ज़रिए धनराशि इकट्ठा कर रही हैं और फिलांथ्रॉपिक तथा सीएसआर फंड्स के प्रवाह को नियंत्रित कर रही हैं।

सिस्टम्स चेंज के भ्रम का अनदेखा पहलू

जब मैं देशभर में घूमता हूं, तो कई गैर-लाभकारी संस्थाओं के लीडर मुझसे कहते हैं कि उनसे प्रभाव (इंपैक्ट) पैदा करने के लिए सिस्टम्स चेंज पर काम करने को कहा जा रहा है। “आपको सिस्टम्स चेंज पर काम करना चाहिए”—जब किसी क्षेत्र में साख रखने वाले और तथाकथित बेहतर शिक्षा व पृष्ठभूमि वाले लोग यह बात बार-बार दोहराते हैं, तो कई बार वे लीडर भी प्रभावित होने लगते हैं जिनकी अपनी समझ कहीं अधिक गहरी होती है। वे सोचने लगते हैं कि अगर इतने प्रभावशाली लोग ऐसा कह रहे हैं, तो शायद हमें भी अपनी दिशा पर पुनर्विचार करना चाहिए। फिर यह धारणा बनने लगती है कि यदि वे भी यही भाषा अपनाएं और अपने काम के मॉडल को उसी अनुरूप ढालें, तो संभव है कि उन्हें भी फंडिंग मिल सके।

लेकिन इस कथानक का सबसे हानिकारक असर यह है कि ज़मीनी स्तर के लीडर अब ख़ुद पर और अपने काम पर संदेह करने लगे हैं। ये वे लोग हैं, जिन्होंने दशकों तक समुदायों के बीच रहकर काम किया है, रूढ़िवादी सामाजिक प्रथाओं को बदलने की कोशिश की है, और लैंगिक हिंसा, वन अधिकार, जलवायु तथा शिक्षा जैसे कठिन मुद्दों पर लगातार काम किया है। अब जब वे देखते हैं कि इस तरह के काम के लिए फंडिंग कम होती जा रही है और फंडर उस चीज़ का समर्थन करने के लिए कतार में खड़े हैं जिसे वे सिस्टम्स चेंज कहते हैं, तो उनमें से कई ख़ुद से पूछने लगे हैं कि क्या उनका मॉडल पुराना पड़ चुका है और क्या उनका काम अब मायने नहीं रखता?

इनमें से कई मेरे मित्र हैं, और कई ऐसे लीडर हैं जिनके काम को मैंने पिछले 30 वर्षों में बहुत करीब से देखा है। इस नए माहौल में वे अब सोचने लगे हैं कि क्या उन्होंने समुदायों के साथ गहराई से काम करने में अपना जीवन व्यर्थ कर दिया है? यह चिंताजनक है, क्योंकि वे वर्षों से अपने काम में समुदायों की ज़रूरतों के साथ कदम मिलाकर चलते रहे हैं।

इसका नतीजा यह हो रहा है कि उनमें से कुछ अब यह कहने लगे हैं, “अगर अपने काम को बनाए रखने के लिए यही ज़रूरी है, तो मैं भी फंडर मीटिंग्स, कॉन्फ्रेंसों और आयोजनों में यही भाषा बोलूंगा।”

कई ऐसे लीडर हैं जिनके काम को मैंने पिछले 30 वर्षों में बहुत करीब से देखा है। इस नए माहौल में वे अब सोचने लगे हैं कि क्या उन्होंने समुदायों के साथ गहराई से काम करने में अपना जीवन व्यर्थ कर दिया है?

लेकिन यह स्थिति दुखद है, क्योंकि धीरे-धीरे वे उस रास्ते से दूर होते जा रहे हैं जिसने वास्तव में उनके समुदायों और व्यापक समाज के लिए ठोस काम किया है। उसकी जगह वे ऐसे विचारों और शब्दावली को अपनाने लगते हैं, जो कई बार केवल काम करने वाले व्यक्ति को यह एहसास दिलाते हैं कि उसने ‘कुछ बहुत बड़ा हासिल कर लिया’। जबकि वास्तविक बदलाव लाने और तंत्रों को बेहतर बनाने में उसका योगदान सीमित ही रहता है।

युवाओं पर इसका चिंताजनक प्रभाव

इस क्षेत्र में आने वाले युवाओं पर भी ‘सिस्टम्स चेंज’ के इस ढर्रे का गहरा और कई बार नुकसानदेह प्रभाव पड़ता है। ये वे युवा हैं जो अच्छे इरादों, गहरी संवेदनशीलता और भरपूर ऊर्जा के साथ नागरिक समाज में योगदान देना चाहते हैं। लेकिन जब वे उन लोगों से, जिनका वे सम्मान करते हैं, बार-बार इस दृष्टिकोण के बारे में सुनते हैं, तो वे यह मानने लगते हैं कि सार्थक योगदान देने के लिए उन्हें अनिवार्य रूप से ‘सिस्टम्स चेंज’ और बड़े स्केल पर काम करना होगा।

इसका असर स्वाभाविक रूप से उनके इस निर्णय पर पड़ता है कि वे किस तरह का काम चुनेंगे। जब वे लगातार यही सुनते हैं, तो वे उन्हीं संस्थाओं या कार्यक्रमों की ओर आकर्षित होने लगते हैं जो खुद को ‘सिस्टम्स चेंज’ के ढांचे में प्रस्तुत करते हैं। यह केवल अधिक वेतन या बेहतर अवसरों का सवाल नहीं होता। उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि दीर्घकालिक और गहरा सामाजिक बदलाव लाने का यही सबसे प्रभावी और एकमात्र रास्ता है।

वे उन लीडरों को, जिन्हें वे अपना आदर्श मानते हैं, विभिन्न मंचों पर ‘सिस्टम्स चेंज’ की भाषा बोलते हुए सुनते हैं। वे यह भी देखते हैं कि ज़मीनी स्तर पर लंबे समय से काम कर रहे अनुभवी लोग अपनी कार्यक्रम रणनीतियों को धीरे-धीरे इसी मॉडल की ओर मोड़ रहे हैं, और उनके साथी भी उसी दिशा में बढ़ रहे हैं। सबसे अहम बात यह है कि गहरे, जमीनी और वास्तविक प्रभाव पैदा करने वाले काम को सीखने और उसका अनुभव हासिल करने के बजाय, वे अपने करियर की शुरुआत ही ऐसे काम से करने लगते हैं जो बदलाव की भाषा तो बोलता है, लेकिन कई बार समुदायों की वास्तविकताओं से उतना गहराई से जुड़ा नहीं होता।

जैसा कि जीवन की कई दूसरी परिस्थितियों में होता है, यहां भी हमें बार-बार कुछ सीधे लेकिन व्यावहारिक सवाल पूछने चाहिए—क्या वास्तव में लोगों के जीवन और ज़मीनी हकीकत में कोई बदलाव आया है? क्या केवल कुछ दस्तावेज़ तैयार कर देने या नीतिगत भाषा गढ़ देने भर से यह कहा जा सकता है कि सिस्टम बदल गया है? जब स्वयं तंत्रों और राज्यों के शीर्ष स्तर पर बैठे लोगों को भी सार्थक बदलाव लाने में संघर्ष करना पड़ता है, तो क्या छोटी-छोटी टीमों के सहारे इतने व्यापक बदलाव संभव हैं?

इन सवालों पर लगातार और दृढ़ता से टिके रहना ज़रूरी है, खासकर उन युवाओं के लिए जो सामाजिक क्षेत्र में कदम रख रहे हैं।

इस लेख का अनुवाद शब्द एआई द्वारा किया गया है।

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लेखक के बारे में

  • अनुराग बेहर अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के सीईओ और अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति हैं। वह सार्वजनिक प्रणालियों, विशेष रूप से सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था, के निर्णायक महत्व के मुखर समर्थक हैं।