October 25, 2023

क्यों सामाजिक संस्थाओं को लोकल और ग्लोबल स्तर पर साथ काम करना चाहिए

आने वाले समय में सामाजिक संस्थाओं की प्रासंगिकता इस बात से भी तय होगी कि छोटे स्तर पर किए जा रहे उनके प्रयास वैश्विक तस्वीर का हिस्सा किस तरह से बन रहे हैं।
4 मिनट लंबा लेख

सामाजिक विकास के कार्यक्षेत्र में काम कर रही स्वयंसेवी संस्थाओं की देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारत के संदर्भ में देखें तो समाज के वंचित वर्गों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने से लेकर, सरकारी योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन तथा नीतिगत स्तर पर सरकारों को जनहित में सुझाव देने तक सामाजिक संस्थाएं अपनी भूमिका का निर्वहन करती रही हैं। भारत में सूचना के अधिकार, शिक्षा के अधिकार, खाद्यान्न सुरक्षा के अधिकार, रोजगार और अन्य जनकल्याण से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनों के प्रति समाज में समझ बनाने और इन कानूनों के समुचित क्रियान्वयन के लिए वातावरण निर्माण करने में सामाजिक संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि सामाजिक संस्थाओं का जमीनी स्तर पर लोगों से सीधा जुड़ाव रहता है और इस कारण समाज के वंचित, पिछड़े वर्गों की जरूरतों की इन्हें बेहतर समझ होती है।

समाज, देश और दुनिया के बदलते संदर्भों के साथ सामाजिक संस्थाओं की प्राथमिकताओं और कार्यशैली में बदलाव होते रहे हैं। सामाजिक विकास के क्षेत्र में लम्बे समय तक काम करने और अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संदर्भ के अनुरूप प्रासंगिक बने रहना जरूरी भी है। अब इसके लिए बहुत छोटे स्तर के प्रयासों को इस तरह करते रहने की ज़रूरत है जिससे जिग्सॉ पहेली के हिस्सों की तरह हमारे बड़े और वैश्विक उद्देश्यों में फिट हो सकें। इस आलेख में हम बात करेंगे कि भारत में अलग-अलग कालखंडों में संदर्भों के अनुरूप सामाजिक संस्थाओं के स्वरूप और कार्यप्रणाली में क्या बदलाव हुए हैं। साथ ही, वर्तमान में किस प्रकार स्वयं को प्रासंगिक बनाए रखते हुए प्रभावशाली तरीके से विकास कार्यों में अपनी पहचान बनाई जा सकती है।

सामाजिक संस्थाओं की कार्यशैली में बदलाव का इतिहास

आजादी से पहले ज्यादातर सामाजिक संस्थाएं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी हुईं थीं। ये छुआछूत, सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ काम कर रहीं थीं। इन संस्थाओं में प्रमुख रूप से हरिजन सेवक संघ, प्रार्थना सभा, आर्य समाज, सत्य शोधन समाज और नेशनल काउंसिल फॉर वुमन वगैरह का नाम लिया जा सकता है। साथ ही, खादी के प्रचार या स्वदेशी चीजों को अपनाने जैसे रचनात्मक कामों में भी ये संस्थाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहीं थीं। 1950 से 1970 के दौर में, जब भारत तमाम तरह की सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा था और अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए प्रयासरत था। सामाजिक संस्थाएं भी इसी सोच से प्रेरित होकर सरकार का सहयोग कर रही थीं।

1970 से 1990 के कालखंड में सामाजिक संस्थाओं के स्वरूप व कार्यशैली में व्यापक स्तर पर बदलाव हुआ। इस समय हमारे देश में पाकिस्तान युद्ध, आपातकाल, सीमा पार आतंकवाद और बढ़ती ग़रीबी-बेरोज़गारी के चलते असंतोष और आक्रोश का वातावरण बन रहा था। यही वह समय था जब सामाजिक संस्थाएं सरकारों से प्रश्न करने लगीं, सरकारी नीतियों पर सवाल उठाने और उन पर बहस का चलन शुरू हुआ। लैंगिक समानता, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, स्वच्छता, वन अधिकार, शुद्ध पेयजल, बाल अधिकार जैसे मुद्दों पर मानव अधिकार के परिप्रेक्ष्य में संस्थाएं कार्य करने लगी। यह दौर ‘अधिकार आधारित’ दृष्टिकोण पर केंद्रित रहा और जन भागीदारी से सरकारों की जवाबदेही पर सवाल उठाए जाने लगे। 1990 के उपरांत हम पाते हैं कि सामाजिक संस्थाएं नीति निर्माण में सहयोग भी करने लगी और साथ ही साथ जन कल्याण के मुद्दों पर सरकारों का ध्यान भी खींचने लगीं।

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रजिस्टर को भरने का काम करती महिला_सतत विकास लक्ष्य
अब वैश्विक स्तर पर ‘जवाबदेही’ या वैश्विक विकास में ‘सामूहिक भागीदारी’ पर बात की जाने लगी। | चित्र साभार: फ़्लिकर 

समाजसेवी संस्थाओं की वर्तमान कार्यशैली

पिछली सदी का आख़िरी दशक, वह समय था जब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वैश्वीकरण के चलते बदले परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र संघ सहित दुनिया के तमाम मंचों पर सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दों पर गंभीर चिंतन शुरू हुआ। अब वैश्विक स्तर पर ‘जवाबदेही’ या वैश्विक विकास में ‘सामूहिक भागीदारी’ पर बात की जाने लगी। इसे एक उदाहरण से समझें तो साल 1992 और 2012 के पृथ्वी सम्मेलन (रियो समिट) के अंतर्गत वैश्विक सामूहिक भागीदारी पर संवाद शुरू हुआ। इसमें सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) को केन्द्र में रखकर दुनिया को एक मंच पर लाने के प्रयास शुरू हुए। यही वह समय था जब जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या पर सभी राष्ट्रों से मिलकर सामूहिक रणनीति बनाने का आह्वान किया गया। विकसित, विकासशील और गरीब राष्ट्रों की अलग-अलग जिम्मेदारियों पर बहस शुरू हुई। इस प्रकार अब व्यापक संदर्भों के साथ सामाजिक मुद्दों पर कार्य करने की आवश्यकता महसूस हुई।

इस समयकाल में हमने देखा के वे मुद्दे जो कल तक सामाजिक थे, या पिछले दशक में राजनीतिक हुए थे, वे अब वैश्विक होने की तरफ बढ़ने लगे। हमने पाया कि अब जिस प्रकार विकास की प्रक्रियाएं वैश्विक स्तर पर चल रही हैं, उनके साथ कदम-ताल मिलाकर चलना भी जमीनी स्तर की संस्थाओं के लिए जरूरी हो गया है। समाजिक संस्थाओं के लिए जरूरी हो गया है कि यदि इन वैश्विक प्रक्रियाओं को नहीं समझेंगे तो हम शायद एक दायरे तक सीमित रह जाएंगे और स्वयं को वर्तमान समय के अनुकूल प्रासंगिक बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो जाएगी। इस दौरान संस्थाओं ने साझा उद्देश्यों के लिए साथ आने, समुदाय की समस्याओं के हल समुदाय से ही निकालने पर ज़ोर देने और आर्थिक-सामाजिक-वैचारिक स्तर पर लगातार बदलते रहने की तैयारी रखने जैसे गुर सीखे।

एक बार फिर बदलाव की जरूरत

आज वैश्वीकरण के युग में यह बात स्थापित हो चुकी है कि केवल आर्थिक ही नहीं सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विषय भी अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय से लेकर जमीनी स्तर तक प्रभाव डालते हैं। जलवायु परिवर्तन, सतत विकास लक्ष्य, लैंगिक समानता जैसे मुद्दे वैश्विक मंचों से लेकर स्थानीय स्तर तक, एक बराबर प्रासंगिक हैं। विकास के मुद्दों को वैश्विक संदर्भों के चश्मे से देखते हुए अपने काम के दायरे में लाने के लिए जमीन पर काम कर रही संस्थाओं की क्षमता बढ़ाए जाने की जरूरत है। सरल शब्दों में कहा जाए तो छोटे प्रयास करते हुए बड़े उद्देश्यों और बड़े निर्णय लेते हुए उसके ज़मीनी प्रभावों पर साथ-साथ विचार किया जाना चाहिए।

कुछ उदाहरणों पर गौर करें तो, यदि कोई संस्था खेती-किसानी के मुद्दों पर काम करती है तो उसके लिए यह समझना जरूरी है कि जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर किस प्रकार दिखाई दे रहा है। वह इसका सामना करने के लिए किस तरह के बदलाव और इसका असर कम करने के लिए क्या तरीके अपना सकती है। बीजों, कीटनाशकों, सिंचाई के तरीके और यहां तक कि कौन सी फसल बोई जाएगी, यह तय करते हुए भी संस्थाएं वैश्विक जलवायु उद्देश्यों को ध्यान में रख सकती हैं। साथ ही, उन्हें यह भी समझना होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित किए गए सतत विकास लक्ष्यों में उनका काम किस लक्ष्य को संबोधित करता है।

लैंगिक बराबरी का लक्ष्य, संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय किए गए 17 सतत विकास लक्ष्यों में पांचवें नंबर पर आता है।

इसी प्रकार, यदि कोई संस्था लैंगिक समानता व महिला सशक्तिकरण पर केंद्रित होकर काम करती है तो इस विषय पर किए गए कार्य लैंगिक बराबरी के लक्ष्य को लेकर किए प्रयासों में आते हैं। लैंगिक बराबरी का लक्ष्य, संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय किए गए 17 सतत विकास लक्ष्यों में पांचवें नंबर पर आता है। इसमें महिलाओं और बच्चियों के साथ भेदभाव को मिटाने, उनके खिलाफ हिंसा को रोकने, उनके नेतृत्व विकास, निर्णय में भागीदारी, आर्थिक स्वावलंबन, प्रजनन स्वास्थ्य तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करने को शामिल किया जाता है। यदि कोई जमीनी संगठन ग्रामीण क्षेत्र में घरेलू हिंसा के खिलाफ कोई अभियान चला रहा है तो उसका अपने इस अभियान को सार्वभौमिक सतत विकास लक्ष्यों से जोड़कर देख पाना, इस कार्य को एक व्यापक संदर्भ प्रदान कर देता है। यदि संस्थाएं अपने कार्यों को वैश्विक विकास की प्रक्रियाओं व संदर्भों से जोड़ते हुए अपने दस्तावेज तैयार करेंगी तो उनके द्वारा दाता संस्थाओं पर बेहतर प्रभाव छोड़ सकने की संभावना भी बढ़ जाती है।

माइक्रो और मैक्रो स्तरों पर साथ काम करना

सामाजिक विकास के मुद्दों पर, विभिन्न वैश्विक मंचों पर चल रही चर्चा-प्रक्रिया को समझकर उनका स्थानीय स्तर के सामाजिक सरोकारों से संबंध को देख पाना इसका पहला कदम है। दूसरा कदम, स्थानीय मुद्दों को वैश्विक मंचों तक पहुंचाने की प्रक्रिया को जानना व उनमें भागीदार होने के लिए क्षमताओं का विकास करना है। आज के तकनीकी युग में यह काम बहुत मुश्किल भी नहीं है, बस हमें ग्लोबल से लोकल और लोकल से ग्लोबल के अंर्तसंबंधों पर समझ बनाने की जरूरत है। यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो हमारी पहचान के साथ-साथ, काम करने के बेहतर अवसर भी खुलेंगे।

संस्थाएं जो विभिन्न समुदायों के साथ जुड़कर शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण और कृषि जैसे विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर कार्य कर रही है, मगर संसाधनों व जानकारी के अभाव में अपने कार्यों को व्यापक संदर्भों के साथ नहीं जोड़ पाती है, उनकी क्षमताओं के विकास के लिए अन्य संस्थाओं का आगे आना होगा। ये अन्य संस्थाएं वे हैं जिनके पास माइक्रो-मैक्रो स्तर पर एक साथ समांतर कार्य करने का अनुभव है। अपने अनुभव के साथ ये संस्थाएं जमीनी स्तर की संस्थाओं के लिए प्रशिक्षण और कार्यशालाएं आयोजित कर उनका क्षमतावर्धन कर सकती हैं।

बेहतर तो यह होगा कि प्रत्येक राज्य में सामाजिक विकास की संस्थाओं का एक ऐसा मंच तैयार हो जहां संवाद के जरिए सीखने-सिखाने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहे। इस सहभागी मंच में विकास की वैश्विक प्रक्रियाओं, अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों, संस्थागत विकास, वैश्विक व स्थानीय मुद्दों में अंतर्संबंध और संसाधन जुटाने की बेहतर रणनीति जैसे विषयों पर निरंतर संवाद होता रहे । इस तरह के प्रयासों से निश्चित तौर पर बेहतर परिणाम मिलेंगे और सामाजिक संस्थाओं में आत्मविश्वास भी जागृत होगा। साथ ही, ये संस्थाएं स्वयं को आज के संदर्भों में गतिशील व प्रासंगिक बनाए रख पाने में सक्षम हो सकेंगी।

अधिक जानें

  • पढ़ें कि सतत विकास लक्ष्य क्या है और इसकी जरूरत क्यों है।
  • वैश्विक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए समाजसेवी संस्थाओं द्वारा की जाने वाली साझेदारी के तरीकों के बारे में जानें

लेखक के बारे में
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आलोक व्यास

डॉ आलोक व्यास, सामाजिक विकास कार्यक्षेत्र में पिछले 18 वर्षों से काम कर रहे हैं। आलोक समाज के विभिन्न वर्गों से संवाद करते हुए सामाजिक विकास की चिंताओं और विभिन्न समुदायों के परंपरागत ज्ञान को समझने में रुचि रखते हैं। वर्तमान में स्वयंसेवी संस्था सिकोईडिकोन में उपनिदेशक पद पर कार्य करते हुए संस्थागत विकास कार्यक्रम से जुड़े हुए हैं। जलवायु परिवर्तन, सतत विकास जैसे वैश्विक विकास के विषयों पर ज़मीनी स्तर के जन संगठनों का क्षमतावर्धन का कार्य कर रहे हैं।

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