May 1, 2024

देश का श्रमिक-वर्ग दस्तावेजों के मकड़जाल में उलझा क्यों दिखता है?

अपने देश के श्रमिक वर्ग के लिए सामाजिक कल्याण और योजनाओं के लाभ उपलब्ध करवाना तो दूर उन्हें उनके सरकारी पहचान दस्तावेज दिला पाने में भी हम बहुत पीछे हैं।
13 मिनट लंबा लेख

“मेरी पत्नी रिंकू सिलिकोसिस रोग से गुजर गई। पिछली सरकार ने भामाशाह कार्ड बनवाए थे मगर सरकार बदली तो उन्होंने जनाधार कार्ड बनवाने को कहा, उसमें पत्नी का नाम अपडेट नहीं हुआ और मुझे सरकारी सहायता नहीं मिल पाई। मिल जाती तो इतना कर्जा न होता।”

पत्थर क्रशर श्रमिक राजेन्द्र, अजमेर    

विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार साल 2023 में भारत में लगभग 59 करोड़ 37 लाख से अधिक श्रमिक थे। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी आर्थिक सर्वेक्षण 2021-22 बताता है कि केवल असंगठित क्षेत्र में 2019-20 में 43.99 करोड़ श्रमिक काम कर रहे थे। इतनी बड़ी श्रमिक संख्या को सामाजिक कल्याण एवं कौशल उपलब्ध करवाना हमेशा चर्चा और चिंता का विषय रहा है। लेकिन आंकड़ों पर गौर करने से पता चलता है कि श्रमिकों की पहचान कर पाना भी सरकारों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। भारत सरकार ने 26 अगस्त 2021 को श्रमिकों की पहचान एवं उनका राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने के उद्देश्य से श्रमिक स्व-घोषणा के आधार पर ई-श्रम कार्ड बनवाना शुरू किया था। अप्रैल 2024 तक के आंकड़ों के अनुसार श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, भारत सरकार के ई-श्रम पोर्टल पर करीबन 29 करोड़ 56 लाख श्रमिक रजिस्टर्ड हुए है।

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के वर्ष 2019-20 तक के आंकड़ों का ई-श्रम कार्ड के अप्रैल 2024 तक के आंकड़ों से तुलना करें तो पता चलता है कि लगभग एक तिहाई श्रमिक अब तक ये सामान्य पहचान दस्तावेज नहीं बनवा पाए हैं।

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श्रमिक कल्याण में राज्यों की स्थिति भी साफ नहीं है

श्रमिक कल्याण समवर्ती सूची का विषय है, केंद्र और राज्य सरकारें, दोनों ही इस पर कानून बना सकती हैं। राजस्थान में श्रमिकों के कल्याण हेतु ‘भवन एवं संनिर्माण श्रमिक कल्याण मंडल’ श्रमिक कार्ड जारी करता है। मंडल को श्रमिक कार्ड के लिए अब तक केवल 5 लाख 80 हजार के करीब आवेदन प्राप्त हुए हैं, वहीं राजस्थान में दिहाड़ी मजदूर, छोटे कारखानों, हम्माल आदि छोड़ भी दें तो अकेले मनरेगा से 2 करोड़ 24 लाख श्रमिक जुड़े हुए हैं (100 दिन मनरेगा में काम करना श्रमिक कार्ड के लिए एक पात्रता है)।

श्रमिक संघ का कार्यालय_श्रमिक कार्ड
राजस्थान में श्रमिकों के कल्याण हेतु ‘भवन एवं संनिर्माण श्रमिक कल्याण मंडल’ श्रमिक कार्ड जारी करता है।

‘दिल्ली संनिर्माण श्रमिक कल्याण मंडल’ के अनुसार सक्रिय भवन निर्माण श्रमिक कार्डों की संख्या केवल 95 हजार 518 है। वहीं, पंजाब में 2009 से अब तक 2 लाख 23 हजार श्रमिक रजिस्टर्ड हुए हैं। आंकड़े बताते हैं कि सभी राज्यों की स्थितियां कमोबेश एक सी हैं। हालांकि, इस लेख में हम राजस्थान के संदर्भ में अधिक वास्तविकताओं को जानेंगे।

श्रमिक के लिए सरकारी कागज कीमती क्यों है

आधार कार्ड, पैन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, राज्यों के पहचान पत्र (राजस्थान मे जन-आधार, श्रमिक कार्ड), मनरेगा जॉब कार्ड, राशन कार्ड, ई-श्रम कार्ड जैसे कई सरकारी कागज, श्रमिक की आम जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बच्चे के स्कूल में दाखिले से लेकर राशन तक, बैंक से लोन लेने से कहीं काम मिलने तक ये तमाम दस्तावेज काम आते हैं। यहां तक कि किसी दुर्घटना में श्रमिक की मृत्यु होने पर भी इन दस्तावेज़ों के बग़ैर मुआवज़े का दावा नहीं किया जा सकता है।

इसके अलावा, श्रमिक कार्ड भी काफी अहम है। इसे हासिल करने के बाद ही कामगार समुदाय श्रमिक कल्याण विभाग द्वारा चलाई जा रही सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए शुरूआती आवेदन कर सकता है। इन योजनाओं में बच्चों की शिक्षा, परिवार स्वास्थ्य, आवास, प्रसव, कौशल निर्माण, आकस्मिक दुर्घटना बीमा वग़ैरह शामिल हैं।

आखिर श्रमिक सरकारी दस्तावेज क्यों नहीं बनवा पाते हैं

राजस्थान के चुरू में रहने वाले दिहाड़ी श्रमिक नरेंद्र कहते हैं कि “मेरा श्रमिक कार्ड बनना मुश्किल है। कार्ड बनवाने के लिए मुझे किसी ठेकेदार से सर्टिफिकेट बनवाना होगा जो बताएगा कि मैंने साल में कम से कम 90 दिन मज़दूरी का काम किया है जबकि मेरा काम भवनों में रंगाई-पुताई का है और मेरे ठेकदार खुद पढ़ें-लिखे एवं स्थायी नहीं है।”

श्रमिकों के सामने दस्तावेज बनवाने के दौरान आने वाली बाधाएं कुछ इस तरह हैं –

  • कई तरह के दस्तावेज इकट्ठा करने में मुश्किल: एक दस्तावेज बनवाने से पहले श्रमिकों को कई तरह के दस्तावेज बनवाने होते हैं। मसलन, श्रमिक कार्ड बनाने के लिए आपको आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, बैंक पासबुक, राज्य के पहचान पत्र, राशन कार्ड, मनरेगा जॉब कार्ड, वर्ष में 90 दिन के मजदूरी करने का प्रमाण-पत्र आदि चाहिए। अगर इन दस्तावेजों में दर्ज नाम, उम्र आदि में कोई गड़बड़ी है तो उन्हें पहले ही सही करवाना होगा, नहीं तो आवेदन नहीं कर पाएंगे। चुरू में ही काम करने वाले श्रमिक शंकर बताते हैं कि “मुझे अकेले आधार कार्ड में नाम सही करवाने में एक बरस लग गया क्योंकि मेरे पास 10वीं की मार्कशीट, जन्म प्रमाण-पत्र, पासपोर्ट जैसा कोई दस्तावेज नहीं था।  मैं तो पढ़ा लिखा ही नहीं हूं। बाद में, किसी तरह जन्म प्रमाण-पत्र बन सका। ये तो भाग्य था कि मैं बहुत सालों पहले कुछ दिन स्कूल गया था, उन कुछ दिनों के बदले मुझे गांव के स्कूल से टीसी (ट्रांसफ़र सर्टिफिकेट) मिल गई और फिर उससे जन्म प्रमाण-पत्र बना और आधार में संशोधन हो पाया।” 
  • काम या कागज में से कोई एक चुनना: आवेदन प्रक्रिया के दौरान आय का नुकसान, मजदूरों के लिए एक बड़ा बोझ बन जाता है, खासकर जब वे कम आय या अनिश्चित रोजगार में हों। श्रवण, भवन निर्माण कार्य में मजदूरी का काम करते हैं। वे कहते हैं कि “यह काम ऐसा है कि एक दिन भी काम छोड़ो तो ठेकेदार कोई दूसरा ले आएगा, मैंने जैसे-तैसे आवेदन तो करा दिया पर आज तक किसी योजना का लाभ लेने के लिए आगे की कार्रवाई या दोबारा आवेदन नहीं कर पाया।”
  • दूसरे राज्यों में पलायन: बिहार, राजस्थान, उत्तरप्रदेश आदि कई राज्यों से श्रमिक पलायन कर गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली के बड़े शहरों में काम के लिए जाते हैं। उनके लिए गृह राज्य के जरूरी दस्तावेजों को बनवाना और भी मुश्किल हो जाता है क्योंकि अधिकतर राज्यों में अपने प्रवासी श्रमिकों के लिए वहां कोई सहायता केंद्र नहीं होता है। बिहार के समस्तीपुर से आने वाली हसबुल बानो, राजस्थान के ब्यावर में पत्थर क्रशर पर काम करती हैं। वे कहती हैं कि “एक देश-एक राशन योजना के तहत मुझे यहां राशन नहीं मिल रहा है क्योंकि आधार सीडिंग नहीं हुआ है। यहां का डीलर कहता है कि आपको बिहार जाकर आधार सीडिंग करवाना होगा, मैं अपना काम छोड़कर और 3-4 हजार रुपये लगाकर बिहार कैसे जाऊं?”        
दस्तावेज दिखाता श्रमिक परिवार_श्रमिक कार्ड
आवेदन प्रक्रिया के दौरान आय का नुकसान, मजदूरों के लिए एक बड़ा बोझ बन जाता है, खासकर जब वे कम आय या अनिश्चित रोजगार में हों।
  • योजनाओं में नीतिगत परिवर्तन: सरकारों के बदलने के साथ उनकी नीतियों मे बदलाव आता है, जैसे राजस्थान में पिछली सरकार मे परिवार पहचान कार्ड के रूप में जन-आधार कार्ड बनवाए थे तो उससे पिछली सरकार ने भामाशाह कार्ड। इससे श्रमिक वर्ग भ्रमित हो जाता है। दस्तावेज बनवाने के बाद लाभ लेने के लिए भी कुछ शर्तें निहित होती जाती हैं। जैसे एक महिला श्रमिक शारदा बताती हैं कि “मेरे पति की दुर्घटना में मृत्यु के बाद हमें पूरी सहायता राशि का लाभ सिर्फ इसलिए नहीं मिला क्योंकि मैंने 12 रुपये का सालाना अंशदान (प्रीमियम) नहीं जमा करवाया था, जिसके बारे में मुझे जानकारी नहीं थी।” एक अन्य महिला श्रमिक मंजू ने अपनी बेटी की शादी के लिए आर्थिक लाभ हेतु शुभशक्ति योजना में आवेदन करने के लिए श्रमिक कार्ड बनवाया। लेकिन उनका आवेदन निरस्त हो गया क्योंकि नियमों के मुताबिक़ इस योजना का लाभ लेने के लिए श्रमिक कार्ड कम से कम एक साल पुराना होना चाहिए।

सरकारों के पास योग्य को ही लाभ पहुंचाने की अपनी चुनौती

सरकारें चाहती हैं योजनाओं का लाभ योग्य लाभार्थियों तक ही पहुंचे। इसलिए सरकारें दस्तावेज़ों की अनिवार्यता को एक ऐसे तरीक़े की तरह अपनाती हैं जिससे लाभार्थी की पहचान सुनिश्चित करना और फ़र्ज़ी आवेदनों को रोकना संभव हो सके। लेकिन तमाम तरह के दस्तावेज और उनमें दर्ज जानकारी का सटीक होना, कई बार योग्य श्रमिकों के रास्ते की बाधा बन जाता है। इसके चलते वे ख़ुद योजनाओं में तब तक रुचि नहीं लेते हैं जब तक कि ऐसा करना अनिवार्य ना हो या फिर उनके पास और कोई रास्ता ना रह गया हो।

एक और कड़ी, ई-मित्र

सरकार और नागरिकों के बीच सामाजिक कल्याण एवं दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया में ई-मित्र ने भी अपनी जगह बना ली है। ई-मित्र के आने से, भले ही सरकारी महकमे को आराम मिला हो लेकिन नागरिकों के लिए उनके सामाजिक लाभ हासिल करने और दस्तावेज बनवाने की प्रक्रिया में एक और सीढ़ी जुड़ गई है।

अधिक लाभ कमाने की चाह में मनमर्जी आवेदन राशि की मांग करने और कई बार तो आवेदनकर्ता को गुमराह करने जैसी बातें भी अक्सर देखने को मिलती हैं। अप्रैल में ही जारी किए अपने सर्कुलर में(सर्कुलर दिनांक 22.04.2024 for Scheme Implement) श्रमिक कल्याण बोर्ड, राजस्थान ने श्रमिक संघों सावधान किया है कि कई ई-मित्र आवेदनकर्ताओं को गुमराह कर रहे हैं और उन्हें गलत जानकारियां दे रहे हैं। ऐसे तो आवेदन की प्रक्रिया ऑनलाइन है लेकिन तकनीकी ज्ञान न होने के चलते लोगों को ई-मित्र के पास जाना ही पड़ जाता है।

कार्यालय से गुजरता श्रमिक_श्रमिक कार्ड
आमतौर पर मजदूर वर्ग के पास इतना समय नहीं होता है कि वे बार-बार चक्कर काट सकें।

राजगढ़ के ई-मित्र संचालक नरेंद्र कहते हैं कि “सभी संचालक बेइमान नहीं हैं। अब सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने की बजाय अपने घर के पास ही श्रमिक आवेदन कर पाते हैं, यह तो उनके लिए सहूलियत ही है।” वे आगे जोड़ते हैं कि “ई-मित्रों की भी अपनी समस्याएं हैं, श्रमिक कार्ड का ही उदाहरण ले तो 50kb जैसे थोड़े से स्पेस में चार तरह के दस्तावेज जोड़ने होते हैं। अगर थोड़ा-बहुत भी साइज़ ऊपर हुआ तो आवेदन वापस भेज दिया जाता है। आमतौर पर मजदूर वर्ग के पास इतना समय नहीं होता है कि वे बार-बार चक्कर काट सकें।

गैर-सरकारी संगठन श्रमिकों की मदद कैसे कर सकते हैं

  • श्रमिकों के लिए मंच निर्माण हो: श्रमिकों के लिए ऐसे मंच बनाने की ज़रूरत है जहां वे संगठित होकर इन सरकारी योजनाओं के लाभ लेने में आने वाली चुनौतियों पर न केवल चर्चा कर सकें बल्कि संगठित होकर उनके विकल्प और हल भी तलाश सकें। अजमेर के ग्रामीण एवं सामाजिक संस्था में केंद्र प्रभारी राजेश कहते हैं कि “यह समझना होगा कि एक श्रमिक समाज में हाशिये पर खड़ा कोई व्यक्ति है जो आमतौर पर अपने अधिकारों के बारे में बात करने का साहस ही नहीं कर पाता है। लेकिन वही व्यक्ति अपने लोगों में, अपने संगठन में अपनी बात कहने से नहीं हिचकता है। हमने मनरेगा, हम्माल (ट्रकों में समान लादने वाले श्रमिक), दिहाड़ी श्रमिकों के संगठन बनाए हैं। हम इन्हें थोड़ा-बहुत तकनीकी सहयोग करते हैं बाक़ी सामाजिक योजनाएं, अधिकारों और नीतियों पर ये लोग खुद ही सरकार से बात कर लेते हैं।” 
  • तकनीकी कार्यों मे उनका सहयोग करें: आजकल लगभग सभी योजनाएं ऑनलाइन हैं। श्रमिक खुद ऑनलाइन आवेदन नहीं कर सकते हैं। न ही वे आवेदनों में त्रुटि-सुधार, योजनाओं का लाभ लेने की शर्तों में होने वाले बदलावों वग़ैरह को ठीक तरह से समझ पाते हैं। ऐसी स्थितियों में उनके साथ ठगी होने की संभावना भी बढ़ जाती है और ऐसे मामले देखने को मिलते रहे हैं, यहां संस्थाएं उनकी मदद कर सकती है। उदाहरण के लिए राजस्थान के राजसमंद का मजदूर किसान शक्ति संगठन अपना खुद का ई-मित्र केंद्र चलाता है। इससे वे न केवल नई योजनाओं के बारे श्रमिकों को बता पाते हैं बल्कि उनके आवेदनों पर उचित सहायता और लाभ दिलवा पाने में भी सक्षम होते हैं। 
  • सरकारी नीतियों के निर्माण में सहयोग करें: श्रमिक धरातल पर कैसी समस्याओं से जूझते हैं, इसे ध्यान में रखते हुए न केवल सरकारी योजनाएं बनाई जानी चाहिए बल्कि पहले से मौजूद योजनाओं में भी बदलाव किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों मे जमीनी दिक्कतों के बारे में जमीनी संस्थाएं सरकारी संस्थानों से इस पर संवाद तो कर ही सकती है। साथ ही, ऐसे संस्थानों की तलाश कर उनके साथ मुद्दे पर बात कर सकती हैं जो नीति निर्माणों, शोध संस्थानों के रूप में बड़े स्तर पर अपनी पहचान रखते हों। उदाहरण के लिए, राजस्थान में सक्रिय संस्था आजीविका ब्यूरो में प्रोग्राम मैनेजर के तौर पर काम करने वाली मंजू राजपूत कहती हैं कि “हम मजदूरों मे सिलिकोसिस रोग को लगातार बढ़ते हुए देख रहे हैं। राजस्थान में इस पर पॉलिसी बनी हुई है लेकिन यहां जो प्रवासी श्रमिक काम करते हैं, उनका क्या? हम कोशिश कर रहे हैं कि इस पर एक नैशनल पॉलिसी बन सके।”
  • मजदूरों को सशक्त और सजग करें: बदलते समय के अनुसार तकनीक को बाधा के रूप देखा जाना अब सही नहीं होगा। अब मजदूरों के कौशल निर्माण एवं तकनीक के प्रति उनकी समझ पर काम करने की जरूरत है। संस्थाओं को उन्हें खुद अपने पैरों पर खड़े होकर चलना सिखाना होगा। उन्हें अपना हिसाब-किताब करना, मोबाइल से योजना या आवेदन के बारे में जानकारी हासिल करना और इस तरह के अन्य कौशलों में खुद को बेहतर बनाना आदि में सहयोग देने की भी जरूरत है।

निश्चित रूप से, इतने बड़े श्रमिक संसाधन का बेहतर उपयोग न होना राष्ट्र के लिए सही नहीं है। लेकिन संसाधन से इतर, श्रमिको का निजी जीवन भी है। उन्हें भी बेहतर जीवन और सुविधाएं मिलनी चाहिए। बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य, आवास देश के प्रत्येक नागरिक का मूलभूत अधिकार है और इन्हें हासिल करने में श्रमिक वर्ग को आज भी मदद की दरकार है।

अधिक जानें

  • पढ़ें कि ई-श्रम पोर्टल को प्रवासी मज़दूरों पर अलग-अलग आँकडें क्यों मुहैया करना चाहिए।
  • जानिए क्यों भारत को अधिक युवा उद्यमियों की जरूरत है।

लेखक के बारे में
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रजिका सेठ

रजिका सेठ आईडीआर हिंदी की प्रमुख हैं, जहां वह रणनीति, संपादकीय निर्देशन और विकास का नेतृत्व सम्भालती हैं। राजिका के पास शासन, युवा विकास, शिक्षा, नागरिक-राज्य जुड़ाव और लिंग जैसे क्षेत्रों में काम करने का 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने रणनीति प्रशिक्षण और सुविधा, कार्यक्रम डिजाइन और अनुसंधान के क्षेत्रों में टीमों का प्रबंधन और नेतृत्व किया। इससे पहले, रजिका, अकाउंटेबिलिटी इनिशिएटिव, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में क्षमता निर्माण कार्य का निर्माण और नेतृत्व कर चुकी हैं। रजिका ने टीच फॉर इंडिया, नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी और सीआरईए के साथ भी काम किया है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में बीए और आईडीएस, ससेक्स यूनिवर्सिटी से डेवलपमेंट स्टडीज़ में एमए किया है।

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राकेश स्वामी

राकेश स्वामी आईडीआर में सह-संपादकीय भूमिका मे हैं। वह राजस्थान से जुड़े लेखन सामग्री पर जोर देते है और हास्य से संबंधित ज़िम्मेदारी भी देखते हैं। राकेश के पास राजस्थान सरकार के नेतृत्व मे समुदाय के साथ कार्य करने का एवं अकाउंटेबलिटी इनिशिएटिव, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च मे लेखन एवं क्षमता निर्माण का भी अनुभव है। राकेश ने आरटीयू यूनिवर्सिटी, कोटा से सिविल अभियांत्रिकी में स्नातक किया है।

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