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हमारी ज़मीन पर तुम्हारी मनमानी नहीं चलेगी

छतरपुर ज़िला, मध्य प्रदेश
धरना प्रदर्शन में महिलाओं का हुजूम_केन-बेतवा परियोजना
धीरे-धीरे महिलाओं ने न सिर्फ आंदोलन को नई ऊर्जा दी, बल्कि उसकी कमान भी संभाल ली। | चित्र साभार: दिव्या अहिरवार

मैं मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले की बिजावर तहसील के वार्ड नंबर 9 से निर्वाचित पार्षद हूं और लंबे समय से अपने क्षेत्र में सामाजिक कार्य कर रही हूं। यह बुंदेलखंड का वही इलाका है, जहां केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत प्रस्तावित बांध और उससे होने वाले विस्थापन के खिलाफ ग्रामीण आंदोलनरत हैं।

इस आंदोलन के तहत लोगों ने नदी में खड़े होकर जल सत्याग्रह किया, शरीर पर मिट्टी पोती और चिताओं पर लेटकर विरोध दर्ज कराया। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि उनसे उनके गांव और घर न छीने जाएं। यह क्षेत्र वर्षों से सड़क, नेटवर्क, पेयजल और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं से जूझता रहा है। यहां के लोग लंबे समय से अभावों के साथ जीते रहे हैं। लेकिन विस्थापन के संकट ने उन्हें आंदोलन का रास्ता चुनने पर मजबूर कर दिया है।

कई साल पहले शुरू हुए इस आंदोलन की अगुवाई शुरुआत में पुरुषों ने की थी। लेकिन सर्वे सूची से नाम हटने, मुआवज़े के वितरण में खामियों और दूसरी प्रशासनिक चुनौतियों के चलते आंदोलन की रफ्तार धीमी पड़ गई। एक समय तो ऐसा भी आया जब लगा कि यह आंदोलन बिखर जाएगा। तभी गांव-गांव में महिलाओं के साथ संवाद और छोटी-छोटी बैठकों का सिलसिला शुरू हुआ। धीरे-धीरे महिलाओं ने न सिर्फ आंदोलन को नई ऊर्जा दी, बल्कि उसकी कमान भी संभाल ली। फरवरी 2026 में उन्होंने ढोड़न बांध का निर्माण कार्य रुकवा दिया। आज गांवों में महिलाएं केवल धरनों में शामिल नहीं होती, बल्कि बैठकों का संचालन करती हैं, रणनीति तय करती हैं और प्रशासन से बातचीत की ज़िम्मेदारियां भी निभाती हैं।

महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से प्रशासन असहज हो गया और आंदोलन के नेतृत्व पर कानूनी दबाव बढ़ा दिया गया। आंदोलन के शीर्ष नेता अमित भटनागर को पहले प्रशासनिक हिरासत में लिया गया, फिर दो बार गिरफ्तार कर उन्हें जेल भेजा गया। प्रशासन को लगा कि नेतृत्व के बिना आंदोलन बिखर जाएगा, लेकिन हुआ इसका ठीक उलट। 10 फरवरी 2026 को प्रभावित गांवों की हज़ारों महिलाएं अपने स्तर पर संसाधन जुटाकर बिजावर पहुंचीं। किसी ने गेहूं बेचकर यात्रा का खर्च निकाला, तो किसी ने उधार लेकर किराए की गाड़ी की व्यवस्था की। पुलिस की तमाम बाधाओं को पार करते हुए उन्होंने दोपहर तक तहसील कार्यालय का घेराव कर दिया और नेताओं की रिहाई के साथ-साथ उनकी मांगें पूरी किए जाने की हुंकार भरी।

उसी रात करीब 11 बजे, कड़ाके की ठंड में प्रशासन ने आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज किया और महिलाओं व छोटे-छोटे बच्चों पर वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया। इसके बावजूद वे अपनी जगह से नहीं हटे। देर रात भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 163 लागू कर आंदोलनकारियों को हटाने के लिए बल प्रयोग किया गया, जिसके चलते महिलाओं और बच्चों को अंधेरे में मीलों दूर जाने पर मजबूर होना पड़ा। इसके बाद भी आंदोलन शांतिपूर्ण ढंग से जारी है, जबकि गांवों को खाली कराने के लिए लोगों को लगातार नोटिस दिए जा रहे हैं। 14 मई को छतरपुर के ढोड़न गांव में जब प्रशासन मकान तोड़ने पहुंचा, तो ग्रामीणों के विरोध के बाद पुलिस को पीछे हटना पड़ा।

वर्तमान में कई प्रभावित गांवों में मकान खाली करने के नोटिस जारी किए जा रहे हैं। ढोड़न गांव में लगभग आधे मकान तोड़े जा चुके हैं, जबकि छतरपुर ज़िले के सबसे ज़्यादा प्रभावित गांवों में से एक पलकोहां में भी लोगों को नोटिस दिए गए हैं और कुछ मकान ढहा भी दिए गए हैं। पन्ना ज़िले का गहदरा गांव पूरी तरह उजाड़ दिया गया है। इन गांवों में 30 से 40 फीसदी परिवार ऐसे हैं, जिन्हें अब तक मुआवज़ा नहीं मिला है। बरसात के बीच कई परिवार अपने ही आंगन में तिरपाल डालकर रहने को मजबूर हैं। उनका राशन भीग रहा है, बिजली काट दी गई है और पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उन्हें उपलब्ध नहीं हैं। वहीं, मुआवज़े की प्रक्रिया में भी लगातार खामियां सामने आ रही हैं।

एक ओर प्रशासन की कार्रवाई जारी है, तो दूसरी ओर ग्रामीणों का आंदोलन भी लगातार जारी है। उदाहरण के लिए, रूंझ बांध क्षेत्र में महिलाएं नियमित बैठकें कर रही हैं और प्रशासन के सामने डटकर खड़ी हैं। घर की ज़िम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ वे आंदोलन का मोर्चा भी संभाल रही हैं। उनकी मांगें साफ हैं: उचित पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए और मुआवज़े की प्रक्रिया में मौजूद खामियों को दूर किया जाए।

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लेखक के बारे में

  • दिव्या अहिरवार मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले की बिजावर तहसील से हैं। वह जय किसान संगठन से जुड़ी हुई हैं और लंबे समय से लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने का काम कर रही हैं। वर्तमान में वह कानून की पढ़ाई भी कर रही हैं।