अपनी जमीन बचाने के लिए लड़ता सहरिया समुदाय

मैं उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के एक छोटे से गांव पाली डेली में रहती हूं। हमारा गांव जिला मुख्यालय से मात्र 15 किलोमीटर दूर है। यह क्षेत्र कभी जमींदारों के वर्चस्व में था। उन्हीं के बीच हमारे सहरिया समुदाय के 68 परिवार भी रहते थे। यह समुदाय आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है।
मैं वर्ष 2016 से एकता परिषद के साथ हूं, जो जल, जंगल और जमीन के मुद्दों पर काम करने वाली संस्था है। यहां कई समस्याएं हैं, जैसे महिलाओं को पंचायत में जाने की अनुमति न होना, शिक्षा, काम के लिए बाल पलायन और पानी एवं आवास की कमी। इन अनुभवों ने मुझे अपनी ही नहीं, दूसरों की आवाज बनने की भी ताकत दी। आज मैं दस गांवों में महिला सशक्तिकरण, वन अधिकार और शिक्षा के मुद्दों पर काम करती हूं।
वर्ष 1999 की ओर मुड़कर देखें तो सहरिया समुदाय की स्थिति और भी खराब थी। हम आदिवासी जंगलों में रहने वाले लोग हैं, लेकिन जमींदार हमें बंधुआ मजदूरी के लिए मजबूर करते थे। कई परिवार एक कमरे के मकान में साथ रहते थे। हमारी जमीन का इस्तेमाल अवैध खनन के लिए किया जाता था।
खनन से तंग आकर समुदाय ने एक खाली ग्राम सभा की जमीन तलाशी और जन कल्याण के लिए एक समिति का गठन किया। इसका नेतृत्व समुदाय के वरिष्ठ सदस्य केसर भाई ने किया। हम सबने मिलकर वहां अपनी झोपड़ियां बनाई।
वर्ष 2007 में हमने एकता परिषद द्वारा आयोजित एक आंदोलन में हिस्सा लिया था। यह आंदोलन हमारे वन अधिकारों, आवास, पानी और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाओं तथा बंधुआ मजदूरी से मुक्ति पाने के लिए था।
यह आसान नहीं था। नजदीकी पत्थर की खदानों में काम करने वाले कुछ लोगों और सरकारी अधिकारियों द्वारा हमें धमकाया गया। पत्थर तोड़ने के लिए डायनामाइट और विस्फोटकों का इस्तेमाल किया जाता था, जिससे समुदाय के परिवारों को परेशानी का सामना करना पड़ता था।
तब ग्राम समिति ने विरोध करने का फैसला लिया। एक दिन जब उप जिला अधिकारी (एसडीएम) गांव पहुंचे, तो केसर भाई ने उन्हें खदान के गड्ढे के में उतरने को कहा और बोले, “अब आप खुद देखिए सर यहां क्या होता है।” तभी अचानक से विस्फोटक धमाकों की तेज आवाज सुनाई दी। प्रशासन को तुरंत समझ आ गया कि यहां रहना कितना खतरनाक है और एसडीएम ने तत्काल पत्थरों की ब्लास्टिंग रोकने का आदेश दिया।
क्षेत्र में खनन अभी भी जारी है और हमारे वन अधिकारों को भी मान्यता नहीं मिली है। आज लगभग 30 गांवों में रहने वाले सहरिया समुदाय के परिवारों, जो वन भूमि पर रहते और खेती करते हैं, को जबरन बेदखल किया जा रहा है। ललितपुर जिले में पड़ोसी गांव झावर में जिन लोगों को व्यक्तिगत वन अधिकारों की मान्यता मिल चुकी थी और जो 100 एकड़ से अधिक जमीन पर खेती कर रहे थे, उनके घर भी वन विभाग द्वारा जला दिए गए। जब समुदाय ने विरोध किया, तो उल्टा उन्हीं पर मुकदमें दर्ज कर दिए गए।
अन्य गांवों के लोग अक्सर हमारा साथ नहीं देते हैं। उनका कहना है कि आदिवासियों के पास अब लाखों की जमीन है और वे खेती से अच्छी कमाई कर रहे हैं। इतना ही नहीं, पुलिस को भी वन अधिकार अधिनियम की पूरी जानकारी नहीं है। हमें बार-बार उन्हें समझाना पड़ता है कि हम जिस जमीन पर रह रहे हैं, वह पीढ़ियों से हमारी है।
हमारा समुदाय कभी भी कानून की बारीकियां नहीं जानता था। हम बस इतना जानते हैं कि यह जमीन हमारा अधिकार है। यहां हमारे पूर्वज बसे और आज हमारे परिवार रहते हैं। यह हमें जान से प्यारी है और हम इसे किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। हमने पहले कभी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष नहीं किया। यहां तक कि जब हमारे पास हमें बुनियादी सुविधाएं नहीं थी, तब भी नहीं। लेकिन इस मुद्दे पर समुदाय एकजुट होकर लड़ने के लिए तैयार है। वन विभाग हमें समय-समय पर धमकियां देता है कि बुलडोजर आकर हमारे घर तोड़ देगा।
सरकार हमें वृक्षारोपण अभियानों के नाम पर हटाना चाहती है। लेकिन उन खेतों का क्या, जिन पर हम वर्षों से खेती करते आ रहे हैं?
मेवा सहरिया, एकता परिषद की अंतरराष्ट्रीय समिति की सदस्य हैं।
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लेखक के बारे में
- मेवा सहरिया उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड, झांसी की एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वह पिछले 10 वर्षों से एकता परिषद से जुड़ी हुई हैं और वर्तमान में संगठन की अंतरराष्ट्रीय समिति की सदस्य के रूप में काम कर रही हैं। वह लगातार हाशिए पर रहे समुदायों के अधिकारों के लिए काम करती रही हैं और अपनी नेतृत्व क्षमता और जमीनी अनुभव के साथ स्थानीय स्तर और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सामाजिक परिवर्तन और नीति सुधार के लिए आवाज उठाती रही हैं।