
जूही मिश्रा
जूही मिश्रा आईडीआर में एडिटोरिएल एसोसिएट हैं। उन्हें पत्रकारिता का 14 साल का अनुभव है और उन्होंने पत्रिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, रोर मीडिया, दूता टेक्नोलॉजी और ग्राम वाणी के साथ काम किया है। जूही ने विकास संवाद संस्था से फेलोशिप पूरी की है, जहाँ उन्होंने बसोर समुदाय में खाद्य प्रणालियों और कुपोषण के कारणों पर शोध किया।
जूही मिश्रा के लेख
हल्का-फुल्का गर्मी में फील्ड ट्रिप की चुनौतियां और चाय
एसी दफ्तरों में बैठकर आदेश देने वाले मैनेजर क्या जानें, भीषण गर्मी में फील्ड पर दिन गुजारने वाले कर्मचारियों के दिल का हाल। ये तो चाय है जो सब करवा देती है।हल्का-फुल्का आईपीएल के बहाने फील्ड ट्रिप का किस्सा
जब कोई कर्मचारी फील्ड विजिट पर निकलता है, तो उसके हालात अक्सर एक आईपीएल मैच की तरह ही अनिश्चित, उतार-चढ़ाव से भरे और कभी-कभी रोमांचक भी होते हैं। कभी कोई मीटिंग सुपर ओवर जैसी होती है, तो कभी गांव की गली किसी स्लो पिच की तरह मुश्किल लगती है।हल्का-फुल्का ग्रांट गुरू- एआई जो फंडिंग दिलाए, चुटकियों में!
अप्रैल फूल के मौके पर लॉन्च हो रहा है ‘ग्रांट गुरू’ एआई टूल! जो संस्थाओं को फंडिंग दिलाने, फंडर से बातचीत करने और बेहतरीन प्रपोजल बनाने में मदद करता है– वह भी चुटकियों में!हल्का-फुल्का विकास सेक्टर की होली पार्टी के लिए बॉलीवुड प्लेलिस्ट
अगर आप विकास सेक्टर में अलग-अलग भूमिकाओं में काम करते हैं, तो आपके लिए बॉलीवुड का कौन सा गाना सबसे सटीक रहेगा?हल्का-फुल्का पाताल लोक गाइड: जमीनी कार्यकर्ता विशाल आयोजनों में हिम्मत कैसे बनाए रखें
जब एक जमीनी कार्यकर्ता महानगर में आयोजित किसी ‘लग्जरी’ कार्यशाला में पहुंचता है तो मन खुद को ‘इंस्पेक्टर हाथीराम’ और आयोजन को 'पाताल लोक' सा महसूस करता है।हल्का-फुल्का भारी प्रदूषण से बचने के कुछ हल्के-फुल्के उपाय!
प्रदूषण से जुड़े ये उपाय बचने के काम आएं या ना आएं, हंसने के काम जरूर आएंगे।हल्का-फुल्का ऑफिस का लंच ब्रेक = 10% खाना + 90% गप्पें!
कहते हैं हर लंच ब्रेक में एक ना एक राज जरूर निकलता है, वो भी टिफिन से नहीं बल्कि किसी के मुंह से!हल्का-फुल्का इस दीवाली जानिए आप विकास सेक्टर की कौन सी मिठाई हैं?
दीपावली की मिठाइयों और विकास सेक्टर के तमाम तबकों के बीच की इस तुलना में तुक-तान खोजना आपका काम है।हल्का-फुल्का महिला किसान और उनके अलग-अलग भाव
महिला किसान दिवस पर महिला किसानों की अलग-अलग भावनायें, जो अक्सर उनके भीतर दबी रहती हैं।अधिकार आईडीआर इंटरव्यूज | मधु मंसूरी हंसमुख
पद्मश्री सम्मान से नवाजे जा चुके लोकगीत कलाकार मधु मंसूरी हंसमुख ने आईडीआर के साथ अपनी बातचीत में बताया कि कैसे छोटी सी उम्र से ही इन्होंने लोकगीत को अपना हथियार बनाकर झारखंड आंदोलन को एक नई दिशा और चेतना प्रदान की।हल्का-फुल्का सपने ढोते हट्टे-कट्टे…पर नेतृत्व का कंधा न छूटे!
सामाजिक सेक्टर में काम करते हुए अक्सर जमीनी नेतृत्व को अहमियत दी जाती है, लेकिन हम इसे कितनी गंभीरता लेते हैं, यहां देखिए।










