फैक्ट्रियों के बीच घुटता भंडूरा गांव

मेरा नाम मोहम्मद अब्बास है। मेरा पूरा जीवन मेरे गांव भंडूरा में बीता है, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर जिले में भोपा और जौली रोड के बीच स्थित है। यह गांव कभी अपनी उपजाऊ मिट्टी और लहलहाती फसलों के लिए जाना जाता था, लेकिन आज यह अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
यह क्षेत्र कोई घोषित औद्योगिक ज़ोन नहीं है, फिर भी यहां टायर प्लांट, पेपर मिलें और स्टील के कारखाने बेतरतीब ढंग से फैल चुके हैं। इन फैक्ट्रियों ने हमारे जीवन, पर्यावरण और खेती को गहरे संकट में डाल दिया है।
इनसे हवा और पानी लगातार प्रदूषित हो रहे हैं। फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकलने वाली राख और कार्बन के महीन कण हवा में घुलकर खेतों और घरों पर काली चादर की तरह बिछ जाते हैं। यह राख फसलों की वृद्धि को रोक देती है, जिससे उत्पादन लगातार घटता जा रहा है।
हालात यह हैं कि पिछले 15 वर्षों में हमारे खेतों की उत्पादकता आधी से भी कम हो गई है। जो ज़मीन पहले प्रति बीघा पांच क्विंटल चावल देती थी, वह अब ढाई क्विंटल पर सिमट गई है। गन्ने की पैदावार भी लगभग आधी रह गई है। खेती में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक और उर्वरक भी अब पहले की तरह असरदार नहीं रहे। इसके बावजूद भी किसान और अधिक मात्रा में रसायनों का उपयोग कर रहे हैं, जिससे खेती की लागत बढ़ रही है और उनके स्वास्थ्य पर भी दुष्प्रभाव पड़ रहा है।
गांव में कुछ किसानों ने फसल बदलकर केले की खेती करने की कोशिश की, लेकिन इस सीजन में लगभग 50 बीघा की फसल उन्हें खुद नष्ट करनी पड़ी। अधिक खाद और पानी देने से पौधे सड़ने लगे, क्योंकि उन पर लगातार राख जमी रहती थी।
फैक्ट्रियों से निकलने वाले प्रदूषण का असर पशुओं पर भी पड़ रहा है। खेतों में खड़ी बरसी और चारे पर जमी राख और रसायन पशु सीधे खाते हैं, जिससे उनकी दूध देने की क्षमता और प्रजनन क्षमता दोनों प्रभावित हो रही हैं। इससे उनमें बीमारियां बढ़ती जा रही हैं।
फैक्ट्रियों ने न केवल हवा, बल्कि जल को भी प्रदूषित कर दिया है। वे पानी का उपयोग करने के बाद उसे नालों में छोड़ देती हैं। मेरे घर से मात्र 50 मीटर दूरी पर एक नाला है, जो पहले बरसाती पानी के निकास का माध्यम था। बच्चे उसमें नहाते थे और मछलियां तैरती दिखती थीं। आज उसकी हालत इतनी खराब हो चुकी है कि उसके पास खड़ा होना भी मुश्किल है।
नालों में जमा गंदगी और केमिकल के कारण पानी का बहाव रुक जाता है और गंदा पानी खेतों में भर जाता है, जिससे हमारी फसलें खराब हो जाती हैं। हमने इस समस्या को लेकर कई बार लिखित में शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। संबंधित विभाग निरीक्षण के लिए आते हैं, लेकिन स्थिति जस की तस बनी रहती है।
हमने इस मुद्दे को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) तक भी पहुंचाया, जिसके बाद कुछ फैक्ट्रियों पर जुर्माना लगाया गया। कुछ समय के लिए हालात सुधरे, लेकिन जल्द ही प्रदूषण फिर शुरू हो गया। खासकर रात आठ बजे से लेकर सुबह चार-पांच बजे तक चिमनियों से भारी मात्रा में धुआं और राख छोड़ी जाती है। इसकी वजह से सुबह उठते ही घरों और आंगन में राख की परत जमी मिलती है।
अब हालात इतने खराब हो चुके हैं कि लोग इस गांव में रहना ही नहीं चाहते। हवा में मौजूद हानिकारक कणों के कारण कई युवाओं की आंखें खराब हो चुकी हैं। बच्चों और बुज़ुर्गों को सांस लेने में दिक्कत होती है। खासकर शाम के समय, खुली हवा में एक मिनट भी सांस लेना मुश्किल हो जाता है।
बिना स्पष्ट योजना के औद्योगिक विस्तार और उससे फैलता प्रदूषण हमें हमारी ज़मीन, हमारी जड़ों और हमारे जीवन से दूर कर रहा है। हम भी अब गांव छोड़ने के बारे में सोचने लगे हैं।
आखिर ऐसे हालात में हम कब तक रह पाएंगे?
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लेखक के बारे में
- मोहम्मद अब्बास किसान हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला मुज़फ़्फ़रनगर के भंडूरा गांव में रहते हैं। पूर्व में वे दो बार गांव के प्रधान भी रह चुके हैं। गांव में बढ़ते प्रदूषण की समस्या को लेकर वे लगातार सक्रिय रहते हैं।