अधिकार

पहचान पर ताला: बदलाव की दहलीज़ पर वन गुज्जर समुदाय

नैनीताल जिला, उत्तराखंड

उत्तराखंड के नैनीताल जिले के टोमड़िया खत्ता गांव में एक घर है, जिसमें कोई दरवाज़ा नहीं है। इस घर में दीवारें हैं, त्रिकोणीय खिड़कियां हैं और बीच में खुला आंगन है। लेकिन यहां न तो दरवाज़ा है और न ही ताला। ऐसे घर स्थानीय वन गुज्जरों की बेपरवाही नहीं, बल्कि उनकी जीवनशैली का एक अहम हिस्सा हैं।

वन गुज्जर एक पशुपालक समुदाय है, जिसकी पहचान गोजरी भैंसों के पालन से गहराई से जुड़ी हुई है। इस समुदाय का नाम भी पशुधन और जंगल से जुड़े उनके पुराने और गहरे संबंधों को दर्शाता है। वन गुज्जरों का अधिकांश हिस्सा उत्तराखंड में रहता है, जबकि कुछ आबादी हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में भी बसी हुई है। उत्तराखंड में यह समुदाय मुख्य रूप से जिम कॉर्बेट और राजाजी राष्ट्रीय उद्यानों के बफर ज़ोन के आसपास निवास करता है। वन गुज्जर अपनी भैंसों के साथ मौसम के अनुरूप प्रवास करते हैं। यह समुदाय घास और पानी की खोज में हिमालय की तलहटी के जंगलों में निरंतर घूमता रहता है, जहां उनका पीढ़ियों से ठिकाना रहा है।

50 वर्षीय सफी भाई कहते हैं, “आज़ादी से घूमना और अपने जानवरों को चराना ही हमारी पहचान है। हमारे घरों में कभी दरवाज़े नहीं रहे। दरवाज़ा लगाने का मतलब होगा स्थायी रूप से एक जगह बस जाना।”

वन गुज्जरों के लिए कई पीढ़ियों तक बिना दरवाज़े का घर कोई वास्तुशिल्प शैली नहीं, बल्कि उनके जीवन-दर्शन का प्रतीक था। दरवाज़ा न होने का मतलब था एक ऐसा जीवन, जिसमें आवाजाही पर कोई बंदिश नहीं थी। आज भी जब कुछ परिवार सीमेंट के पक्के घर बनाते हैं, तो इस परंपरा की झलक साफ दिखाई देती है। लेकिन समय के साथ यह चलन बदल रहा है।

45 वर्षीय आसिफ भाई बताते हैं, “जब से हमारे आसपास जिम कॉर्बेट की सीमाएं सख्त हुई हैं, हम जंगलों में पहले की तरह स्वतंत्र रूप से नहीं जा पाते हैं। कई रास्ते बदल गए हैं, और उनके साथ ही हमारा जीवन भी बदल गया है।” जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना और अन्य संरक्षण मुहिमों ने वन गुज्जरों को उनके पारंपरिक चरागाहों से काफी हद तक दूर कर दिया है।

नतीजतन, उनके प्रवास मार्ग बाधित हो गए हैं। आसिफ बताते हैं कि कई परिवार अब गांवों में बसने को मजबूर हो गए हैं और खेती या अन्य स्थायी आजीविका अपनाने लगे हैं। नई पीढ़ी इस बदलाव का सामना अपने तरीके से कर रही है। शिक्षा, जो पहले एक खानाबदोश जीवन के लिए महत्व नहीं रखती थी, अब धीरे-धीरे मूल्यवान बनती जा रही है। समुदाय के कुछ युवा स्कूल और उच्च शिक्षा की ओर बढ़ रहे हैं। बहुत सारे लोग कानून की पढ़ाई भी कर रहे हैं।

मोहम्मद मीर हमज़ा, जो वन गुज्जर ट्राइबल युवा संगठन के संस्थापक हैं, उन्हीं में से एक हैं। वह कहते हैं, “2017 में वन विभाग ने हमारे गांव सहित कई गांवों को अवैध रूप से खाली करवा दिया था। इस पूरी प्रक्रिया और संघर्ष से हमें यह समझ में आया कि कानून को समझना बहुत ज़रूरी है, ताकि हम अपनी बात को मज़बूती से रख सकें। मैंने कानून पढ़ने का निर्णय लिया, ताकि हमारी परंपरागत प्रणालियों और अधिकारों को मान्यता मिल सके, हमारा समुदाय अपनी आवाज़ उठा सके और अपना हक हासिल कर सके।”

समुदाय की 16 वर्षीय मेहरुन्निसा अभी अपने भविष्य को लेकर विचार कर रही हैं। वह कहती हैं, “मुझे गाना पसंद है। अगर मौका मिला, तो मैं गायिका बनना चाहती हूं। मुझे नहीं पता कि पशुपालन में कोई भविष्य है या नहीं।”

ये परिवर्तन उन अनेक जुड़ी हुई चुनौतियों को रेखांकित करते हैं, जिनके चलते समुदाय के लिए अपनी पारंपरिक पहचान और जीवनशैली को बचाए रखते हुए जीवनयापन करना दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है। वन प्रतिबंधों का विस्तार, भूमि से जुड़ी अस्थिरता और आजीविका में बदलाव के बीच, दरवाज़े-रहित घर (उनकी संस्कृति का एक अहम प्रतीक) धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर हैं।

फिर भी, राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के भीतर 30 वर्षीय नज़ाकत चेची आज भी एक छान (घास-फूस से बना पारंपरिक घर) में रहते हैं, जो उन्हें अपने बुज़ुर्गों से विरासत में मिला है। इस घर में हर लकड़ी के टुकड़े और बीम का अपना एक नाम है। नज़ाकत के लिए छान बनाना और उसकी देखभाल करना एक आस्था का विषय है। यह घर आज भी बिना दरवाज़ों और खिड़कियों के खड़ा है।

वह कहते हैं, “आज तक हमारा वन्यजीवों से कोई टकराव नहीं हुआ। यही हमारे और जानवरों के रिश्ते का सबसे बड़ा प्रमाण है। हमें अपनी छान पर गर्व है। अगर हमें वन कानूनों के तहत मान्यता मिल जाए, तो वह हमारे लिए सबसे कीमती बात होगी।”

आस्था चौधरी उत्तर प्रदेश में मानव-वन्यजीव संबंधों पर अध्ययन कर रही एक शोधार्थी हैं। वह कोएग्ज़िस्टेंस कंसोर्टियम से जुड़ी हुई हैं।

यह लेख अंग्रेजी में पढ़ें

अधिक जानें: पढ़ें, वन अधिकार अधिनियम, 2006 (एफआरए) के क्या मायने हैं?

अधिक करें: लेखक से जुड़ने और उनके काम को सहयोग देने के लिए उनसे [email protected] पर संपर्क करें।​

लेखक के बारे में

  • आस्था चौधरी वर्तमान में कोएग्जिसटेंस कंसोर्टियम के सहयोग से उत्तर प्रदेश में मानव-सारस क्रेन इंटरैक्शन पर शोध कर रही हैं। उनका शोध मानव और गैर-मानव के बीच अंतःक्रिया और सह-अस्तित्व को समझने पर आधारित है। इससे पहले उन्होंने पक्षी प्रजातियों की जनसंख्या पारिस्थितिकी और समुदाय-आधारित संरक्षण पर काम किया है।