May 15, 2024

भारत के विकलांगता कानून की एक झलक

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 विकलांग व्यक्तियों के लिए शिक्षा और रोजगार से लेकर स्वास्थ्य तक के अधिकार देता है।
13 मिनट लंबा लेख

साल 2016 तक, भारत में विकलांग व्यक्ति अधिनियम, 1995 के तहत ही विकलांग लोगों के अधिकार सुनिश्चित किए जाते थे। इस क़ानून को इसलिए बनाया गया था ताकि विकलांग लोग जीवन के सभी क्षेत्रों में भाग लेने का समान अवसर हासिल कर सकें। इस कानून ने शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में कुछ सकारात्मक बदलाव और भेदभाव को ख़त्म करने वाले कई प्रावधान किए। साथ ही, एक निवारक उपाय के तौर पर विकलांगों के लिए नियमित जांच की व्यवस्था की तथा विकलांगता नीतियों के कार्यान्वयन के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर निकायों की स्थापना की गई।

भारत ने 2007 में विकलांग लोगों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के बिंदुओं की पुष्टि की। विकलांगता कानून को इस संधि के अनुरूप लाने के लिए, 1995 अधिनियम को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 से बदल दिया गया।

इस क़ानून का लक्ष्य विकलांगता की कानूनी परिभाषा का विस्तार करके विकलांग लोगों के समावेश को बढ़ावा देना है। 1995 अधिनियम के अनुसार, विकलांगता का मतलब ‘अंधापन, आंखों का कमजोर होना, कुष्ठ रोग से ठीक हुआ, सुनने की क्षमता का ह्रास, लोकोमोटर विकलांगता, मानसिक मंदता और मानसिक बीमारी’ है। 2016 का अधिनियम 21 प्रकार की विकलांगताओं को मान्यता देता है, जिनमें पुराने कानून में सूचीबद्ध विकलांगताएं भी शामिल हैं। इसके अलावा, यह एसिड अटैक पीड़ितों को लोकोमोटर विकलांगता की मान्यता देता है। यह बौद्धिक अक्षमताओं को लेकर बेहतर और बारीक समझ को भी प्रदर्शित करता है। यह एक ऐसी श्रेणी है जिसमें अब सीखने की अक्षमताएं और ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार शामिल हैं। इसके अलावा, यह नया कानून लंबे समय से चली आ रही बीमारियों जैसे कि मल्टीपल स्केलेरोसिस और पार्किंसंस जैसे तंत्रिका संबंधी रोग और हीमोफिलिया, थैलेसीमिया और सिकल सेल रोग जैसे रक्त विकारों को भी विकलांगता की श्रेणी में रखता है। अंत में, यह अधिनियम बहु-विकलांगता वाले व्यक्तियों, जैसे बधिर-अंध (डेफब्लाइंड) लोगों को भी इस श्रेणी में शामिल करता है।

आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम के तहत कुछ अधिकार केवल बेंचमार्क विकलांगता वाले लोगों पर लागू होते हैं, इसमें उन लोगों को शामिल नहीं किया जाता है ‘जिनकी विकलांगता चालीस फ़ीसद से कम है।’ कोई भी विकलांग व्यक्ति एक प्रमाणित प्राधिकारी द्वारा बेंचमार्क विकलांगता वाले व्यक्ति के रूप में अर्हता प्राप्त कर सकता है। आमतौर पर यह काम एक अस्पताल या राज्य या जिला-स्तरीय मेडिकल बोर्ड का होता है।

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आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम के तहत किन चीजों की गारंटी दी गई है?

शिक्षा, कौशल विकास एवं रोजगार, स्वास्थ्य सुविधा एवं भत्ते, तथा मनोरंजन और सांस्कृतिक जीवन के संबंध में अधिनियम द्वारा किए गए कुछ प्रावधानों की जानकारी यहां दी जा रही है।

शिक्षा

अध्याय 3 के अनुसार, सरकार द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों को अपने परिसरों को सुलभ बनाना होगा और विकलांग लोगों को आवश्यक सुविधाएं प्रदान करनी होंगी। ऐसा ‘पूर्ण समावेशन के लक्ष्य के अनुरूप शैक्षणिक और सामाजिक विकास को अधिकतम करने के लिए’ सहायता प्रदान करने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए किया गया है। यह अधिनियम बच्चों में सीखने की अक्षमताओं का जल्द से जल्द पता लगाने और सीखने तथा विकास संबंधी विकलांगता वाले बच्चों को कक्षा में शामिल करने के लिए उचित कदम उठाने का भी आदेश देता है।

अधिनियम के अनुसार, स्थानीय सरकार -पंचायत या नगर पालिका- को विकलांग बच्चों की पहचान करने के लिए हर पांच साल में एक सर्वेक्षण करना होता है। इस आंकड़े से पर्याप्त संख्या में शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान स्थापित करने में मदद मिलेगी। कक्षा को अधिक समावेशी स्थान बनाने के लिए, अधिनियम ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति का आदेश देता है जिन्होंने बौद्धिक क्षमता की विकलांगता से पीड़ित बच्चों के साथ काम करने का प्रशिक्षण हासिल किया हो। साथ ही, यह विकलांग शिक्षकों और ब्रेल तथा सांकेतिक भाषा में काम करने की योग्यता रखने वाले शिक्षकों को भी नियुक्त करने की बात कहता है। इसके अलावा, यह सांकेतिक भाषा (साइन लैंग्वेज) और ब्रेल लिपि जैसे संवाद के वैकल्पिक तरीक़ों के उपयोग को भी बढ़ावा देता है, ताकि बोलने, संवाद करने या भाषा-संबंधी विकलांगता से पीड़ित लोग भी इसमें हिस्सा ले सकें।

अध्याय 6 में, बेंचमार्क विकलांगता वाले बच्चों के लिए 18 वर्ष की आयु तक किसी भी सरकारी स्कूल या विशेष स्कूल में मुफ्त शिक्षा, मुफ्त शिक्षण सामग्री और छात्रवृत्ति दिए जाने जैसे कुछ विशेष प्रावधान शामिल किए गए हैं। उच्च शिक्षा के लिए सरकार द्वारा संचालित संस्थानों में, ऊपरी आयु सीमा में पांच साल की छूट के साथ, बेंचमार्क विकलांगता वाले छात्रों के लिए कम से कम 5 फ़ीसद सीटों के आरक्षण का प्रावधान है। यह अधिनियम विकलांग छात्रों को छात्रवृत्ति देने की बात पर भी जोर देता है।

कौशल विकास एवं रोजगार

अधिनियम का अध्याय 4, कौशल विकास और रोजगार के मामले में विकलांग लोगों की स्थिति के बारे में आंकड़े दर्ज किए जाने को अनिवार्य बनाता है। इसमें कहा गया है कि बहु-विकलांगता या बौद्धिक और विकासात्मक विकलांगता वाले लोगों के लिए, बाजार के साथ सक्रिय संबंध स्थापित कर विशेष कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित किए जाने चाहिए। इसके अलावा, इसमें यह भी कहा गया है कि विकलांग लोगों को व्यावसायिक पाठ्यक्रम या स्वरोजगार के विकल्प हासिल करने के लिए ऋण उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, गोवा में राज्य सरकार की एक योजना पारंपरिक पेशों और व्यवसायों में लगे लोगों को मासिक वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

शिक्षा की ही तरह, जहां तक ​​रोजगार का सवाल है, अधिनियम में रोज़गार के लिए दिये गये निर्देश सरकारी रोज़गारों पर भी समान रूप से लागू होते हैं। सेक्शन 20, बिना किसी भेदभाव के रोज़गार की मांग करता है। साथ ही सरकारी कार्यालयों से उम्मीद की जाती है कि वे उचित आवास और विभिन्न प्रकार की बाधाओं से मुक्त वातावरण मुहैया करायें ताकि विकलांग व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से निभा सकें। यदि कोई सरकारी कर्मचारी अपना कार्यकाल समाप्त होने से पहले अक्षम हो जाता है, तो उनके पद को कम करने या काम से हटाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें समान वेतनमान पर किसी अन्य भूमिका में स्थानांतरित किया जा सकता है।

धारा 21 में कहा गया है कि प्रत्येक सरकारी प्रतिष्ठान में समान अवसर वाली नीति का प्रावधान होगा। अधिक ज़िम्मेदारी के भाव को सुनिश्चित करने के लिए धारा 22 रोजगार से संबंधित सभी मामलों में रिकॉर्ड रखने का आदेश देती है, जिसमें रोजगार चाहने वाले विकलांग लोगों के बारे में जानकारी का दस्तावेजीकरण भी शामिल है। इन सभी रिकॉर्ड्स की जांच किसी भी समय की जा सकती है।

अध्याय 6 की धारा 33 के अनुसार, किसी भी सरकारी पद के लिए चार फ़ीसद तक पद बेंचमार्क विकलांगता वाले आवेदकों के लिए आरक्षित होने चाहिए। हालांकि अधिनियम में उल्लेख है कि ऐसा करने पर निजी कंपनियों के लिए प्रोत्साहन का प्रावधान होना चाहिए, लेकिन इसकी परिभाषा को स्पष्ट नहीं किया गया है।

इसके अतिरिक्त, सरकारी भवनों की योजनाओं को केवल तभी मंजूरी दी जानी चाहिए यदि वे विकलांगता-अनुकूल हों। अधिनियम पांच साल की समयावधि भी तय करता है जिसके भीतर सभी मौजूदा सरकारी भवनों को बुनियादी ढांचे के साथ विकलांगता-अनुकूल बनाया जाना चाहिए।

सांकेतिक भाषा में संवाद करती दो लड़कियां_विकलांगता कानून
बड़ी संख्या में विकलांगताओं को शामिल करना समावेशन की दिशा में एक आवश्यक पहला कदम है। | चित्र साभार: इंगमार ज़ोहोर्स्कीसीसी बीवाई

स्वास्थ्य देखभाल एवं भत्ते

अध्याय 5 में सूचीबद्ध स्वास्थ्य संबंधी कुछ विशिष्टताओं में विकलांग लोगों के आसपास मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रावधान, सरकारी और निजी अस्पतालों/स्वास्थ्य केंद्रों के सभी हिस्सों में बिना किसी बाधा के पहुंचने की सुविधा और उपस्थिति और उपचार को प्राथमिकता देने की शर्त शामिल है।

इसका एक प्रासंगिक उदाहरण राष्ट्रव्यापी रोग उन्मूलन कार्यक्रम है जिसे भारत सरकार ने मलेरिया, एलिफेंटियासिस (लिम्फेटिक फाइलेरियासिस), और काला-अजार को खत्म करने के लिए साल 2021 में शुरू किया था। विकलांगता की रोकथाम के लिए विकलांगता की घटना के संबंध में सर्वेक्षण, जांच और अनुसंधान करना और जोखिम वाले मामलों की पहचान करने के लिए बच्चों के लिए वार्षिक जांच आयोजित किए जाने जैसे उपायों की भी सिफ़ारिश की गई है।

अधिनियम में इस बात पर विशेष रूप से जोर दिया गया है कि किसी दिए गए आय वर्ग के लोगों को सहायता एवं उपकरण और सुधारात्मक सर्जरी मुफ्त में दी जा सकती है। दिल्ली और पंजाब जैसे कुछ राज्यों ने ऐसी योजनाएं शुरू की हैं जिसके तहत बेंचमार्क विकलांग लोगों को सहायक उपकरण प्राप्त हो सकते हैं। इसमें उच्च सहायता आवश्यकताओं वाले लोगों के लिए विकलांगता पेंशन और देखभालकर्ता भत्ते का भी उल्लेख किया गया है। किसी भी प्रकार की विकलांगता की स्थिति उस व्यक्ति विशेष को अधिक खर्च करना पड़ सकता है। इस अतिरिक्त लागत को ध्यान में रखते हुए, विकलांग लोगों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत अन्य लोगों की तुलना में 25 फ़ीसद अधिक भत्ता पाने का हक़ दिया गया है।

मनोरंजन और सांस्कृतिक जीवन

इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कि विकलांग लोगों को एक बेहतर जीवन स्तर और सांस्कृतिक जीवन का अधिकार है, अध्याय 5 की धारा 29 में कहा गया है कि मनोरंजक गतिविधियां उन्हें उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इसमें विकलांगता इतिहास संग्रहालय, विकलांग कलाकारों के लिए अनुदान और प्रायोजन, विकलांग लोगों के लिए कला को सुलभ बनाना, सहायक तकनीक का उपयोग और कला पाठ्यक्रम को फिर से डिज़ाइन करने जैसे प्रावधान दिये गये हैं ताकि विकलांग व्यक्ति भी इस प्रकार की गतिविधियों में भाग ले सके।

सरकार के क्या कर्तव्य हैं?

1. विकलांग लोगों के बारे में जानकारी एकत्रित करना

जैसा कि कई अलग-अलग एजेंसी द्वारा डेटा संग्रह पर निर्धारित शर्तों से प्रमाणित होता है, इस अधिनियम में विकलांगता के लिए डेटा-केंद्रित दृष्टिकोण को अपनाया गया है। उदाहरण के लिए, अधिनियम स्थानीय सरकारों, सरकारी कार्यालयों और स्वास्थ्य सेवा अधिकारियों द्वारा डेटा संग्रह की बात करता है। इसके अलावा यह राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) को विकलांग लोगों का रिकॉर्ड बनाए रखने का निर्देश देता है ताकि आपात स्थिति के दौरान सुरक्षा उपायों तक उनकी पहुंच की गारंटी दी जा सके। एनडीएमए से यह भी अपेक्षा की जाती है कि वह जानकारी को ऐसे रूपों में प्रसारित करे जो विकलांग लोगों के लिए सुलभ हो। साथ ही, पुनर्निर्माण गतिविधियों की योजना बनाते समय भी उनकी जरूरतों का ध्यान रखा जाए।

2. सुलभता और समावेशन को सक्षम बनाना

अधिनियम निर्धारित करता है कि सभी सार्वजनिक स्थानों – जिनमें स्कूल, सरकारी कार्यालय, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सार्वजनिक परिवहन शामिल हैं – को सभी के लिए सुलभ बनाया जाना चाहिए। इसमें मतदान केंद्रों और किसी भी सरकारी कागजात या प्रकाशन की पहुंच सुनिश्चित करने के साथ-साथ न्याय तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करना भी शामिल है, जिसमें विकलांग व्यक्तियों की गवाही दर्ज करने की सुविधा भी शामिल है।

3. अधिकारियों, सलाहकार इकाइयों और विशेष अदालतों की नियुक्ति करना

अधिनियम इसका पालन सुनिश्चित करने के लिए कई सरकारी पदों की स्थापना की बात करता है। उदाहरण के लिए, प्रत्येक सार्वजनिक संस्थान में एक शिकायत निवारण अधिकारी होना आवश्यक है। कोई भी व्यक्ति जो किसी पद के लिए आवेदन करते समय अपने साथ भेदभाव महसूस करता है, वह इस कार्यालय के माध्यम से निवारण प्राप्त कर सकता है।

अधिनियम के तहत विकलांगता पर एक केंद्रीय सलाहकार बोर्ड और विकलांगता पर राज्य सलाहकार बोर्ड भी स्थापित किए गए हैं। इन दोनों ही बोर्डों के सदस्य, केंद्र और राज्य स्तर पर विकलांगता से संबंधित मंत्रालयों और विभागों से संबंधित, और, स्वास्थ्य और शिक्षा सहित कई विभागों के संयुक्त सचिव और विकलांगता विशेषज्ञ होते हैं। इन सदस्यों की नियुक्ति में भी विकलांग, महिलाओं और अनुसूचित जाति और जनजाति का प्रतिनिधित्व किया जाना भी अनिवार्य है। इन इकाइयों के सदस्य प्रत्येक छह माह में एक बार बैठक करते हैं ताकि विभिन्न नीतियों में शामिल विकलांगता क़ानून के क्रियान्वयन के स्तर की समीक्षा एवं जांच की जा सके।

अधिनियम के तहत विकलांग लोगों के लिए एक मुख्य आयुक्त और राज्य आयुक्तों (जिन्हें शिकायत निवारण अधिकारी रिपोर्ट करते हैं) की नियुक्ति को निर्धारित किया गया है। इन आयुक्तों को सिविल न्यायालय के समान शक्तियां प्रदान की जाती हैं। उनका काम अनुसंधान को बढ़ावा देना और यह देखना है कि मौजूदा कानून और प्रावधान विकलांग लोगों के लिए उपयोगी हैं या नहीं। साथ ही यदि ये क़ानून उपयोगी नहीं हैं तो इन्हें उसके लिए सिफारिशें भी करनी होगी। मुख्य या राज्य आयुक्त द्वारा दिए गए किसी भी सुझाव पर तीन महीने के भीतर कार्रवाई किए जाने का प्रावधान है।

अधिनियम यह भी निर्देश देता है कि विकलांग लोगों के खिलाफ अपराधों की सुनवाई के लिए एक विशेष अदालत की स्थापना की जाए और इसके लिए विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति की बात कही गई है।

साल 2016 का अधिनियम अलग कैसे है?

साल 1995 और 2016 दोनों अधिनियमों में विकलांगता कानून के कार्यान्वयन को देखने के लिए डेटा संग्रह और रिकॉर्ड कीपिंग, सुलभ शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, रोजगार, आरक्षण और विशेष सरकारी कार्यालयों के प्रावधान किए गए हैं। दोनों अधिनियमों में नियमित जांच आयोजित करने और विकलांगता को रोकने के लिए कुछ उपाय करने की भी आवश्यकता का भी उल्लेख है।

हालांकि साल 2016 का अधिनियम कुछ मामलों में अलग है:

1. अधिकारआधारित फोकस

यह अधिनियम न केवल विकलांग लोगों को समावेशन और पहुंच के अधिकारों की गारंटी देता है, बल्कि कला और संस्कृति तथा मनोरंजक गतिविधियों का आनंद लेने, स्वतंत्र रूप से या एक समुदाय के साथ रहने और अपनी देखभाल करने वालों को चुनने के अधिकार की भी बात करता है। ये प्रावधान विकलांग लोगों को अधिक एजेंसी देने के लिए बनाये गये हैं।

लिंग, आयु और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के आधार पर विकलांगता समुदाय के भीतर विविधता की स्वीकृति का भी उल्लेख है। इसके अलावा, हालांकि विकलांगता पर समझ को बढ़ावा देने और उचित नीतियां बनाने के लिए अनुसंधान और डेटा संग्रह पर बहुत जोर दिया गया है। लेकिन अधिनियम में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जानकारी-पूर्ण सहमति के बिना किसी भी विकलांग व्यक्ति को अनुसंधान के अधीन नहीं किया जाएगा।

2. ठोस प्रावधान और शिकायत निवारण तंत्र

जहां एक ओर साल 1995 के अधिनियम में पहुंच और समावेशन पर विशेष जोर दिया गया था, जिसमें सरकारी इमारतों को विकलांगता-अनुकूल बनाना और नियमित स्क्रीनिंग आयोजित करना शामिल था, वहीं साल 2016 का अधिनियम एक समय अवधि तय करके अपेक्षाकृत अधिक ठोस प्रावधान की बात करता है जिसके तहत ऐसी गतिविधियां की जानी हैं।

जहां 1995 के अधिनियम के तहत किसी भी अपराध के लिए स्पष्ट दंड नहीं था और इसे किसी विशेष मामले की देखरेख करने वाले न्यायिक प्राधिकरण के विवेक पर छोड़ दिया गया था, साल 2016 का अधिनियम स्पष्ट रूप से अपराधों के बाद जुर्माने और कारावास जैसे दंड की बात करता है। उदाहरण के लिए, एक अपराधी पर अधिनियम के तहत अपने पहले अपराध के लिए दस हज़ार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा, और बाद के अपराधों के लिए पचास हज़ार से पांच लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा। इस अधिनियम के तहत धोखाधड़ी से लाभ प्राप्त करने पर जुर्माना के साथ-साथ कारावास भी हो सकता है

वर्तमान स्थिति

अधिनियम में इमारतों के अपडेट की आवश्यकता पर जोर दिया गया है, वहीं हाल ही में केंद्रीय सलाहकार बोर्ड की बैठक से यह निष्कर्ष निकला कि मौजूदा इमारतों की रेट्रोफिटिंग जैसे कामों की प्रगति धीमी है। बजट का आवंटन दर भी कम ही रहा है। इसी तरह, विकलांग व्यक्ति के रूप में पहचान का मतलब हमेशा सरकारी योजनाओं तक पहुंच नहीं है। उदाहरण के लिए, एसिड हमले के पीड़ितों को अधिनियम द्वारा विकलांग व्यक्तियों के रूप में मान्यता दी गई है, लेकिन विकलांगता प्रमाण पत्र, रोजगार, विकलांगता सहायता और सब्सिडी तक पहुंच की वास्तविकता के आंकड़ें कुछ और ही बयान करते हैं। सरकारी अधिकारी भी हमेशा विकलांग व्यक्तियों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील नहीं होते हैं, और विकलांगता पेंशन ऐसी योजनाओं द्वारा लक्षित लोगों की जरूरतों को पूरा करने में विफल रहती है।

यह बड़ी संख्या में विकलांगताओं के समावेशन की दिशा में एक आवश्यक पहला कदम है। जन शिक्षा और संवेदीकरण के लिए जहां निरंतर प्रयास करने होंगे, वहीं मुख्य आयुक्त, चुनाव आयोग और बॉम्बे उच्च न्यायालय के हालिया निर्णय और दिशानिर्देश बताते हैं कि विकलांग लोगों की चिंताओं को अधिक गंभीरता से लिया जा रहा है।

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ें

अधिक जानें

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