पर्यावरण

वन प्रबंधन के लिए समुदाय व शासन में बेहतर समन्वय की जरूरत

झारखंड में सामुदायिक वन अधिकार के तहत ग्रामसभाएं जंगल के संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी निभा रही हैं। इससे जंगल बचाने के साथ ग्रामीणों की आजीविका भी मजबूत हो रही है।
एक हॉल में घेरा बनाकर बैठे कुछ लोग_सामुदायिक वन अधिकार
12 मार्च 2026 को प्रकाशित

वन अधिकार अधिनियम, 2006 (एफआरए) झारखंड में रहने वाले आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासी समुदायों के वन अधिकारों की रक्षा करता है। यह जंगल और उनकी आजीविका के बीच के संबंध को कानूनी मान्यता देता है। इसके तहत वे व्यक्तिगत अधिकार, सामुदायिक अधिकार और अन्य वन अधिकारों का दावा कर सकते हैं। वन अधिकार कानून के तहत ग्राम सभा को जंगल के संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग का अधिकार मिलता है। 

भारत सरकार के वन अधिकार कानून से जुड़े आधिकारिक डैशबोर्ड के अनुसार झारखंड में एक जून 2025 तक लगभग चार हजार सामुदायिक वन अधिकार दावे प्रस्तुत किए गए। इनमें से करीब दो हजार को मंजूरी दी गई है। राज्य में सामुदायिक वन अधिकार के तहत करीब 1.04 लाख एकड़ वन भूमि आदिवासी और परंपरागत वन आश्रित समुदायों को मिली है, जबकि 1.53 लाख एकड़ वन भूमि व्यक्तिगत अधिकारों के तहत मान्य की गई है। 

इन आंकड़ों के बीच कई गांव ऐसे हैं जहां लोग सामुदायिक वन अधिकार हासिल करने की प्रक्रिया में हैं। वहीं कई गांव ऐसे भी है जहां वन अधिकार हासिल हो जाने के बाद समुदाय स्वयं जंगल का प्रबंधन कर रहे हैं। 

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

जंगल के नक्शे के साथ बैठक 

झारखंड के बोकारो जिले की पेंक पंचायत के रानीकुरहा गांव के सामुदायिक भवन में वन प्रबंधन को लेकर एक बैठक आयोजित की गई। इसमें 25 से 30 लोग शामिल हुए। बैठक में ग्रामीण अपने गांव के वन क्षेत्र का नक्शा लेकर पहुंचे थे, जिस पर उन्होंने गंभीरता से चर्चा की। 

चर्चा का मुख्य विषय यह था कि गांव की ग्राम सभा की ओर से सामुदायिक वन अधिकार का दावा कैसे मजबूत किया जाए। साथ ही, इसके लिए आवेदन की प्रक्रिया को कैसे आगे बढ़ाया जाए। रानीकुरहा ग्राम की वन अधिकार समिति के अध्यक्ष बहाराम मुर्मू ने बताया, “इस तरह की बैठकों में ग्रामीणों को वनों के संरक्षण के महत्व के बारे में बताया जाता है। जमीन पर इसके काफी अच्छे नतीजे आए हैं। लोग पिछले कुछ सालों में जंगल को लेकर अधिक संवेदनशील हुए हैं। अब वे साझा सामुदायिक संपत्ति के रूप में उसकी रक्षा कर रहे हैं।” 

बैठक के दौरान ग्रामीणों ने बताया कि वे 2018-19 से ही आसपास के जंगल का सामुदायिक रूप से संरक्षण कर रहे हैं। उन्होंने गांव के आसपास मौजूद घने जंगल को इसका प्रमाण बताया।

मानचित्र के स्थानीय लोग_सामुदायिक वन अधिकार
रानीकुरहा गांव के ग्रामीण खुद के द्वारा तैयार किए गए गांव के आसपास के वन क्षेत्र के नक्शे पर चर्चा करते हुए।|चित्र साभार: राहुल सिंह

रांची से आई झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन की प्रतिनिधि और वन अधिकार कार्यकर्ता सूर्यमणी भगत कहती हैं, “वन अधिकार कानून के तहत जब हम ग्राम सभा की ओर से सामुदायिक वन अधिकार का दावा सरकार के समक्ष पेश करते हैं, तो उसी दिन से हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम जंगल को बचाएं।” उनके अनुसार, दावा करने की प्रक्रिया से ही समुदाय में यह भावना पैदा हो जाती है कि जंगल उनकी साझा संपत्ति हैं जिनकी रक्षा करना उनका दायित्व है। 

सामुदायिक दावे और जंगल के प्रति जिम्मेदारी 

बहाराम मुर्मू बताते हैं कि गांव के लोगों ने वर्ष 2018 में 559 एकड़ वन भूमि के लिए सामुदायिक वन अधिकार का आवेदन किया था। वे आगे बताते हैं, “साल 2025 में हमें उम्मीद थी कि हमें पट्टा मिल जाएगा, लेकिन अभी तक नहीं मिला है। हालांकि इससे जंगल के संरक्षण के प्रति हमारे संकल्प पर कोई असर नहीं पड़ा है। अगर हमें वन पट्टा मिल जाए तो हम और बेहतर वन प्रबंधन कर सकेंगे।” 

गांव में करीब 100 परिवार आदिवासी समुदाय के हैं। वहीं लगभग 50 परिवार अन्य समुदायों के हैं जिनमें कुर्मी और मुस्लिम समुदाय के लोग शामिल हैं। 

बहाराम मुर्मू बताते हैं कि गांव की वन अधिकार समिति में फिलहाल 11 सदस्य हैं, जिनमें एक-तिहाई महिलाएं हैं। वन अधिकार कानून के तहत ग्राम सभा की ओर से गठित ऐसी समितियों में महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य होती है। हर महीने 25 तारीख को समिति की बैठक आयोजित की जाती है। इस बैठक में गांव के लोग जंगल से जुड़ी जरूरतों पर चर्चा करते हैं और सर्वसम्मति से निर्णय लेते हैं। यदि कोई व्यक्ति बिना अनुमति जंगल को नुकसान पहुंचाता है तो उस पर पांच हजार रुपये तक का जुर्माना लगाने का प्रावधान है। 

वनोपज से आजीविका 

गांव के लोग जंगल से मिलने वाले लघु वनोपज को अपनी आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत मानते हैं। सखुआ, पियार, करंज के बीज, महुआ और अन्य वनोपज से ग्रामीणों को आय होती है। गांव की उर्मिला देवी कहती हैं, “हम जंगल नहीं काटते और काटने वालों को भी रोकते हैं। जंगल से हमें ऑक्सीजन और बारिश तो मिलती ही है, साथ ही कई तरह के साग और वनोपज भी मिलते हैं।” 

गांव की महिलाओं ने यह भी बताया कि जंगल में केंद, पियार, महुआ और जामुन जैसे पेड़ भी हैं, जिनसे फल और अन्य वन उत्पाद मिलते हैं। वनोपज को इकट्ठा करने का काम मुख्य रूप से महिलाएं ही करती हैं और इससे होने वाली आय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 

ग्राम की वन अधिकार समिति के सचिव विजय सोरेन बताते हैं कि पहले जंगल में आग लगाने की घटनाएं होती थीं, खासकर महुआ बीनने के पहले। असल में महुआ बीनने के लिए पेड़ के नीचे गिरे सूखे पत्तों को साफ करने के लिए उन्हें जलाया जाता था। इससे जंगल में आग फैलने का खतरा बना रहता था। लेकिन लोगों को इसके नुकसान के बारे में समझाया गया और अब वे इस तरह से आग नहीं लगाते।

जहां समुदाय को मिल चुका है वन अधिकार 

रानीकुरहा गांव से करीब 15 किमी दूर नावाडीह प्रखंड की पोखरिया पंचायत के डेगागढ़ा गांव को सामुदायिक वन अधिकार पत्र मिल चुका है। डेगागढ़ा की वन अधिकार समिति के अध्यक्ष बुधन मुर्मू कहते हैं कि 1990 के दशक में उनके पिताजी की पीढ़ी के लोगों ने जंगल की रक्षा के लिए एक नियम बनाया था। इसके तहत सप्ताह में एक-एक दिन 10 से 15 लोगों को जंगल की रक्षा की जिम्मेवारी दी गई थी। वनों के संरक्षण की यह कोशिश बहुत दिनों तक चली। 

फिर साल 2018-19 में झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन की ओर से यहां के ग्रामीणों को वन अधिकार कानून, 2006 के बारे में और उसके तहत दावा करने की प्रक्रिया के बारे में बताया गया। इस सन्दर्भ में बुधन कहते हैं, “इसके आधार पर हम ग्रामीणों ने सामुदायिक वन पट्टा का दावा किया। हमारे दावे पर ब्लॉक की ओर से स्थल निरीक्षण किया गया और हमें पुराने फार्मेट की जगह नए फार्मेट में आवेदन करने को कहा गया। हमने वैसा ही किया। फिर साल 2024 में ‘सरकार आपके द्वार’ कार्यक्रम के दौरान सीओ (अंचल अधिकारी) ने हमें वन अधिकार कानून के तहत डेगागढ़ा में 300 एकड़ का सामुदायिक वन पट्टा प्रदान किया।” डेगागढ़ा के साथ ही उसके पास के गोलाडीह गांव को भी उसी वर्ष 375 एकड़ भूमि का सामुदायिक वन अधिकार मान्य हुआ। 

एक साइन बोर्ड_सामुदायिक वन अधिकार
डेगागढा गांव के आरंभ में लगा सामुदायिक अधिकार से संबन्धित बोर्ड।|चित्र साभार: राहुल सिंह

वन अधिकार मिलने के बाद क्या बदला है 

डेगागढ़ा गांव में सामुदायिक वन अधिकार मिलने के बाद ग्राम सभा ने जंगल के उपयोग के लिए नियम तय किए हैं। मसलन, अगर किसी परिवार को लकड़ी की जरूरत होती है तो उसे ग्रामसभा की बैठक में अनुमति लेनी पड़ती है। इसका रिकॉर्ड रजिस्टर में दर्ज किया जाता है। इसके साथ ही लोगों को नए पेड़ लगाने की जिम्मेदारी भी दी जाती है। 

गांव के जंगल में सखुआ, पियार, भेलवा और महुआ जैसे पेड़ों की भरपूर मौजूदगी है। इनसे मिलने वाली वनोपज से ग्रामीणों को अतिरिक्त आय होती है। बुधन मुर्मू कहते हैं, “सखुआ का बीज 20–25 रुपये किलो, पियार 200–250 रुपये किलो और भेलवा का बीज 30–40 रुपये किलो तक बिकता है। सीजन में व्यापारी खुद गांव आकर वनोपज खरीद कर ले जाते हैं।” 

वनोपज का मौसम आम तौर पर ठंड के बाद शुरू होता है और यह गर्मियों के अंत तक चलता है। इस दौरान एक परिवार औसतन तीन से चार हजार रुपये तक की कमाई कर लेता है। 

जंगल और समुदाय का संबंध 

डेगागढ़ा गांव में वन संबंधी कार्य के लिए दो समितियां काम कर रही हैं। पहली, वन अधिकार समिति जिसमें 15 सदस्य हैं और दूसरी वन पालन समिति जिसमें 12 सदस्य हैं। ग्राम सभा के लोग जंगल को लेकर काफी सचेत हैं। गांव में जंगल में आग लगने की घटनाएं न के बराबर होती हैं। इसके अलावा, अगर कभी हाथी जैसे जंगली जानवर गांव में आ जाते हैं तो लोग उन्हें नुकसान पहुंचाए बिना बाहर निकालने की कोशिश करते हैं। इसी कड़ी में जनवरी 2026 में एक हाथी के गांव में आने पर ग्रामीणों ने उसे सुरक्षित तरीके से जंगल की ओर लौटा दिया था। 

इसके अलावा, अब वन विभाग को लेकर लोगों के मन से डर भी दूर हुआ है। इस बारे में बुधन मुर्मू कहते हैं, “पहले लोगों को डर रहता था कि कहीं उन पर कोई केस न हो जाए। लेकिन अधिकार मिलने के बाद से लोगों में आत्मविश्वास बढ़ा है।” हालांकि गांव के एक ग्रामीण शनिचर तूरी का कहना है कि वन अधिकार कानून के प्रावधानों और ग्राम सभा और समुदायों की जिम्मेदारियों के बारे में लोगों को अभी और अधिक जानकारी दिए जाने की जरूरत है। 

परंपरा, संस्कृति और वन संरक्षण 

वन संरक्षण में आदिवासी समाज की परंपराओं और सांस्कृतिक मान्यताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। इन्हीं में से एक बाल अखड़ा है। सूर्यमणी भगत बताती हैं कि गांवों में बाल अखड़ा आयोजित किए जाते हैं। इनमें बच्चों को जंगल और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बारे में बताया जाता है। राज्य के करीब 400 गांवों में छुट्टी के दिनों में ऐसे आयोजन किए जाते हैं। इनके लिए ऐसे अगुवा लोगों की तलाश होती है जो बच्चों का नेतृत्व कर सकें। रानीकुरहा ग्राम वन अधिकार समिति के अध्यक्ष बहाराम मुर्मू भी बताते हैं कि बाल अखड़ा में गांव के 15 साल तक के लड़के-लड़कियों को शामिल किया जाता है। उन्हें वनों व प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ अपनी सभ्यता व संस्कृति के संरक्षण व संवर्द्धन की सीख भी दी जाती है। 

इसके अलावा, वनाश्रित महिला समूह भी बनाए जाते हैं, जिनमें महिलाओं को वनोपज के संरक्षण और उपयोग के बारे में प्रशिक्षित किया जाता है। 

सूर्यमणी भगत बताती हैं कि जंगल में कई औषधीय पौधे भी होते हैं। उदाहरण के लिए – 

  • रोहिणी पेड़ की छाल डायबिटीज में उपयोगी मानी जाती है।
  • केरकेट्टा पेड़ की छाल हड्डी के इलाज में इस्तेमाल होती है।
  • मुंजनी का तेल कई बीमारियों में काम आता है।

ऐसी जानकारियां साझा करके भी समुदाय को जंगल के महत्व के बारे में जागरूक किया जाता है। 

वन अधिकार कानून को लागू करने की चुनौतियां 

वन अधिकार कानून को लागू करना संबंधित अधिकारियों के लिए कई किस्म की चुनौतियां भी लेकर आता है। बेरमो (तेनुघाट) के राजस्व विभाग के एसडीओ मुकेश मछुआ बताते हैं कि उनके अनुमंडल में साल 2025 में कई सामुदायिक वन पट्टों को मंजूरी दी गई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में बेरमो अनुमंडल में 21 सामुदायिक वन अधिकार के दावे प्राप्त हुए। इनमें से 10 दावों को स्वीकृति दी गई। इनका कुल रकबा 1422.7 एकड़ है। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार सामुदायिक वन पट्टा क्षेत्र का सटीक सीमांकन (डिमार्केशन) कई बार चुनौती बन जाता है। 

झारखंड सरकार के वन विभाग में एफआरए के नोडल अधिकारी पी राजेंद्र नायडू के अनुसार,“समुदाय को वन पट्टा देना वनों के प्रबंधन के लिए अच्छा कदम है, लेकिन कई बार यह सुनिश्चित करना जरूरी होता है कि अधिकार क्षेत्र का सही उपयोग हो।” 

झारखंड में वन अधिकार कानून के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए सरकार ने साल 2023 में ‘अबूआ बीर दिशोम’ अभियान शुरू किया। इसका उद्देश्य आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासी समुदायों को वन अधिकार दिलाने की प्रक्रिया में मदद करना है। 

झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के प्रमुख संजय बसु मल्लिक के अनुसार, “वन अधिकार कानून की धारा 3(1)(i) समुदायों को अपने पारंपरिक जंगलों की रक्षा, पुनर्जीवन और प्रबंधन का अधिकार देती है। लेकिन अभी भी कई जगहों पर समुदायों के अधिकार वनोपज तक ही सीमित हैं।” 

झारखंड के कई गांवों में सामुदायिक दावे की प्रक्रिया ने एक महत्वपूर्ण बदलाव पैदा किया है। ग्रामीणों और विशेषज्ञों से हुई बातचीत से यह समझ आता है कि दावा करने से ही लोगों में यह भावना मजबूत होती है कि जंगल सिर्फ संसाधन नहीं बल्कि उनकी साझा विरासत है। रानीकुरहा गांव की बैठक में शामिल लोग भी शायद इसी उम्मीद के साथ अपने जंगल का नक्शा देख रहे थे कि एक दिन उन्हें भी सामुदायिक वन संसाधन अधिकार मिलेगा, और वे अपने जंगल की रक्षा और प्रबंधन का अधिकार पूरी तरह अपने हाथों में ले सकेंगे। 

इस लेख को प्रॉमिस ऑफ कॉमन्स फेलोशिप के सहयोग से तैयार किया गया है। 

अधिक जानें 

  • जानें, नदियों की कहानी, समुदायों की जुबानी: पूर्वोत्तर जनस्मृति का डिजिटल अभिलेख। 
  • जानें, छत्तीसगढ़ का पारंपरिक त्योहार छेरछेरा क्यों खत्म होता जा रहा है?
  • जानें, एक पुस्तक के जरिए कि जंगल बिना हम भी नहीं बच पाएंगे।

लेखक के बारे में