आंगनवाड़ी: शिक्षा की नींव या सिर्फ पोषण का केंद्र?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा सरकारी और निशुल्क देखभाल (डे-केयर) नेटवर्क संचालित करता है। इसे आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से चलाया जाता है। अब सवाल यह है कि क्या यह नेटवर्क बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कर पा रहा है? जब देश में केवल 50 प्रतिशत कक्षा पांच के बच्चे ही कक्षा दो स्तर तक का पाठ पढ़ पाते हैं, तो यह चिंता केवल स्कूलों की ही नहीं, बल्कि शुरुआती शिक्षा ढांचे की भी है।
अक्सर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के काम को पोषण वितरण तक ही सीमित मान लिया जाता है। इसकी वजह से आंगनवाड़ी कार्यकर्ता गुणवत्तापूर्ण प्रांरभिक शिक्षा देने पर पूरी तरह ध्यान नहीं दे पाती हैं। भारत में लगभग 13.99 लाख आंगनवाड़ी केंद्र हैं, जो 3-6 वर्ष के आयु वर्ग के लगभग 4.42 करोड़ बच्चों को प्रांरभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ईसीसीई) उपलब्ध कराती हैं। ऐसे में यह समझना महत्वपूर्ण है कि जमीनी स्तर पर यह व्यवस्था कैसे काम कर रही है।
सेंटर फॉर रिसर्च इन स्कीम्स एंड पॉलिसीज (सीआरआईएसपी) ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और प्रारंभिक बाल शिक्षा को केंद्र में रखकर अध्ययन किया गया है। इस टाइम यूज स्टडी का उद्देश्य आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के दैनिक समय-प्रबंधन को समझना था। विशेष रूप से यह जानने के लिए कि अपने दैनिक कार्य दिवस में वह हर दिन बच्चों की देखभाल और शिक्षा के लिए कितना समय दे पाती हैं। यह अध्ययन आंध्र प्रदेश के अलग-अलग जिलों में ग्रामीण, शहरी और जनजातीय क्षेत्रों में किया गया है।
इस संदर्भ में यह अध्ययन महत्वपूर्ण संकेत देता है। इसके अंतर्गत ईसीसीई के लिए मुख्य भूमिका निभाने वाली आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के सामने आने वाली बाधाओं को चिन्हित किया गया है।
चुनौतियां:
1. प्रशिक्षण में कमियां
केवल 11.4 प्रतिशत कार्यकर्ताओं को प्रारंभिक स्कूली शिक्षा के लिए जरूरी इंडक्शन ट्रेनिंग (कार्यभार संभालने से पहले का प्रशिक्षण) मिली है। यह ईसीसीई के गुणवत्तापूर्ण क्रियान्वयन के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इसके अलावा, लगभग दो-तिहाई कार्यकर्ताओं को नवजात एवं बचपन की बीमारी के एकीकृत प्रबंधन (आईएमएनसीआई) की ट्रेनिंग मिली है। प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा की शैक्षणिक प्रणाली पर केंद्रित विशेष ट्रेनिंग की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है।
2. सहयोग का अभाव
वर्ष 2017 में सामंत एवं अन्य के द्वारा पश्चिम बंगाल में किए एक अध्ययन से पता चलता है कि जहां सुपरवाइजर हर महीने केंद्रों का दौरा करते थे, वहीं बाल विकास परियोजना अधिकारी ने तीन महीने में केवल 53 प्रतिशत केंद्रों का ही दौरा किया। यह स्थिति प्रशासनिक तंत्र की ओर से निगरानी और सहयोग की कमी को दर्शाती है।
3. काम का भार
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं पर अनेक तरह की जिम्मेदारियां होती हैं। मैंगलौर में हुए एक अध्ययन में पाया गया है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने प्री-स्कूल शिक्षा, घरों के दौरे, सर्वे और रिकॉर्ड बनाने को अपने तीन सबसे बड़े काम माना है। स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े कामों को कम प्राथमिकता दी गई। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि अत्यधिक कार्यभार और नतीजतन तनाव, उन बड़ी परेशानियों में से एक है जो कि एकीकृत बाल विकास सेवाओं (आईसीडीएस) में निर्धारित काम की सीमा से ज्यादा है। आईसीडीएस में कई असंबंधित कामों को एक ही ईकाई में रखा गया है। अक्सर एक ही व्यक्ति को कई तरह की जिम्मेदारी सौंप दी जाती हैं। ये जिम्मेदारी हमेशा एक-दूसरे से जुड़ी नहीं होती है।
आंध प्रदेश में हुई टाइम यूज स्टडी में समय के आवंटन से जुड़ी कई जानकारी सामने आयी हैं। हालांकि, इसमें आंगनवाड़ी सेंटर के बाहर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा की जाने वाली गतिविधियां, जैसे यात्रा, घर-घर भ्रमण, टीकाकरण अभियान और जागरूकता अभियान को शामिल नहीं किया गया है। इस स्टडी में एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता द्वारा आमतौर पर की जाने वाली 25 मुख्य गतिविधियों में से केवल उन्हीं को चुना गया है, जो दिन का पांच फीसदी से अधिक समय लेती हैं।
समय का बंटवारा
एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के एक दिन के कार्य दिवस में आठ घंटे, यानी 480 मिनट होते हैं। उनके समय का सबसे बड़ा हिस्सा प्री-स्कूल के काम में खर्च होता है, जो औसतन 39.34 प्रतिशत यानी 189 मिनट है। यह काम अलग-अलग कार्यकर्ताओं के लिए 16.3 फीसदी से 62 फीसदी तक रहता है। इससे अलग प्रशासनिक और डिजिटल काम में वह 81 मिनट का समय बिताती हैं। इसमें रिकार्ड दर्ज करने, रजिस्टर भरने और अलग-अलग ऐप, जैसे पोषण ट्रैकर में डेटा एंट्री शामिल है। पूरक पोषण (सपलीमेंट्री न्यूट्रिशन) भोजन पकाने, परोसने पर हर रोज लगभग 70 मिनट, यानी कुल समय का 14.68 फीसदी समय खर्च होता है।
आंगनवाड़ी केंद्र के रखरखाव में औसतन 20 मिनट का समय लगता है, हालांकि इसमें काफी अंतर (0.4 प्रतिशत से 20.19 प्रतिशत) देखा गया है। वहीं, कुल समय का 62 मिनट व्यक्तिगत कामों में इस्तेमाल होता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्वतंत्र (स्टैंडअलोन) आंगनवाड़ी केंद्रों में प्री-स्कूल काम पर ज्यादा समय बिताया है, जो कि 3.6 घंटे था।
प्रांरभिक बाल शिक्षा की गुणवत्ता का विश्लेषण
रिपोर्ट में केवल समय को लेकर ही नहीं बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाया गया है। अधिकतर आंगनवाड़ी सेंटर में शिक्षा केवल रटने तक सीमित है। बच्चे वर्णमाला और संख्याएं तो दोहराते हैं, लेकिन उसके अर्थ, समझ और संज्ञात्मक विकास पर कम ध्यान दे पाते हैं। पेटिंग, मिट्टी के खिलौने बनाना या कहानी सुनाने जैसी गतिविधियां जो बच्चे की कल्पनाशीलता बढ़ाती हैं, बहुत कम देखी गई हैं। अभिभावक भी अक्सर आंगनवाड़ी को क्रेच या प्ले स्कूल की तरह देखते हैं और उनका जोर केवल यहीं तक सीमित रहता है कि बच्चे अंग्रेजी अक्षर बोलना सीख जाएं।
सिफारिशें
यह रिपोर्ट केवल समस्याएं ही सामने नहीं रखती है, बल्कि समाधान भी बताती है-
1. समय से संबंधित पहलू
- प्रांरभिक बाल शिक्षा (ईसीई) का व्यवस्थित समय निर्धारण और संरचित पाठ्यक्रम: आंगनवाड़ी केंद्रों में बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए सुबह का एक निश्चित समय (3-4 घंटे) पूरी तरह से पढ़ाई और विकासात्मक गतिविधियों के लिए तय होना चाहिए।
- टीएचआर वितरण का मानकीकरण: टीएचआर, आंगनवाड़ी केंद्रों से गर्भवती, बच्चों और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को घर ले जाने पौष्टिक आहार देना। पोषाहार के लिए दिन और समय का एक निश्चित शेड्यूल बनाया जाए, ताकि आंगनवाड़ी की गतिविधियों में बाधा न आए। इसकी जिम्मेदारी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के मार्गदर्शन में आंगनवाड़ी सहायिका को दी जा सकती है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बचे समय को ईसीई के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं।
- विविध गतिविधियां: आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को बच्चों के समग्र विकास हेतु मोटर कौशल व रचनात्मक और सामाजिक कौशल की विभिन्न गतिविधियों के लिए समय निर्धारित करना चाहिए। खेल के विभिन्न रूप (मुक्त रूप से खेले जाने वाले और किसी की देखरेख में खेले जाने वाले खेल) के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
2. आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए आवश्यक सहयोग
- ईसीई संकेतकों पर सहयोगात्मक पर्यवेक्षण: सुपरवाइजर और बाल विकास परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ) की भूमिका को मजबूत किया जाए ताकि वे आंगनवाड़ी केंद्रों में प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा की गतिविधियों की नियमित निगरानी, मार्गदर्शन और समर्थन कर सकें।
- ईसीसी केंद्रित ट्रेनिंग और सहयोग: आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के लिए ईसीई पर आधारित ट्रेनिंग को नियमित और विस्तृत बनाया जाए। ट्रेनिंग में ऐसे व्यवहारिक उपाय और तकनीकें शामिल हों जिन्हें वे सीधे जमीन पर लागू कर सकें। साथ ही हर आंगनवाडी सेंटर पर पर्याप्त शिक्षण-अधिगम सामग्री यानी टीएलएम की उपलब्धता तय की जाए।
- मूल्यांकन और तकनीकी सहयोग: आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को उम्र के अनुसार विकासात्मक मापदंडों और उनसे जुड़ी गतिविधियों के बारे में ट्रेनिंग दी जाए, ताकि वे बच्चों की प्रगति का सही आकलन कर सकें। समय-समय पर तकनीकी ट्रेनिंग की जाएं। इससे उनकी कार्यकुशलता बढ़ेगी और डेटा संबंधी कामों में भी समय बचेगा।
- अन्य विभागों के साथ समन्वय: एएनएम, आशा कार्यकर्ता, महिला शक्ति केंद्र, सेकेंडरी ग्रेड टीचर आदि के साथ भूमिकाओं और जिम्मेदारियों में स्पष्टता लाई जाए। ओवरलैप को कम करने के लिए कामों के विभाजन, संरचना और निगरानी के लिए सिस्टम बनाया जाए।
3. आंगनवाड़ी सहायिका के लिए ईसीई ट्रेनिंग
आंगनवाड़ी सहायिका बच्चों के साथ प्राथमिक रूप से काम करती हैं और कविताएं, एक्शन सॉग्स और कहानी जैसी गतिविधियों में सहयोग देती हैं, इसलिए उन्हें भी ईसीई ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने भी संसाधन उपलब्ध कराने या आंगनवाड़ी सहायिकाओं के बेहतर प्रशिक्षण के माध्यम से ईसीई में अतिरिक्त सहयोग की जरूरत की बात कही है।
4. आधारभूत संरचना में सुधार
आंगनवाड़ी केंद्रों में शौचालय, चारदीवारी, खेलने की जगह तथा अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हों, ताकि सुरक्षित और अनुकूल वातावरण में बच्चे आराम से सीख और खेल सकें।
5. सह-स्थिति आंगनवाड़ी केंद्रों में व्यवस्थित ईसीसी व्यवस्था
- साझा दिशा-निर्देश जारी करना: स्कूल और आंगनवाड़ी केंद्र मिलकर काम कर सकें, इसके लिए दोनों के लिए स्पष्ट और समान दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
- स्कूल स्टाफ की भागीदारी निभाना: सह-स्थिति (एक ही परिसर में स्कूल और आंगनवाड़ी केंद्र होना) का उद्देश्य और लाभ सेकेंड ग्रेड टीचर, हेडमास्टर और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को सरल और स्पष्ट रूप से समझाया जाए, ताकि सभी इसे समझकर काम कर सकें।
- समय-सारिणी का तालमेल: स्कूल और आंगनवाड़ी केंद्र के समय और छुट्टियों में आपसी तालमेल रखा जाए, ताकि बच्चों के लिए एक समान और व्यवस्थित वातावरण बना रहे।
6. सह-स्थित आंगनवाड़ी केंद्र में व्यवस्थित सहयोग
सह-स्थित केंद्रों में साझा गतिविधियां आयोजित की जाएं। सेकेंड ग्रेड टीचर और हेडमास्टर की भागीदारी बढ़ाई जाए। इससे बच्चों को विभिन्न शिक्षकों और वयस्कों के संपर्क में आने, सीखने का मौका मिलेगा जो उनके सामाजिक और बौद्धिक विकास में सहायक होगा।
7. डेटा संग्रह में दोहराव को कम करना
केंद्र और राज्य स्तर पर अलग-अलग मोबाइल ऐप के जरिए कई बार एक ही तरह की जानकारी यानी डेटा इकट्ठा किया जाता है। इससे समय और मेहनत दोनों ज्यादा लगते हैं। इसलिए ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जिसमें इन ऐप्स को एक साथ जोड़ दिया जाए, ताकि एक ही जानकारी बार-बार भरने की जरूरत न पड़े।
8. ईसीई संकेतकों की मजबूत निगरानी व्यवस्था
ईसीई से जुड़े सभी प्रमुख संकेतकों की नियमित निगरानी और ट्रैंकिंग तय की जाए। ऐसा ट्रैकिंग सिस्टम विकसित किया जाए, जिससे सटीक और अपडेटेड डेटा प्राप्त हो। इससे नीतिगत और प्रशासनिक निर्णय के लिए सटीक जानकारी मिल सकेगी।
9. समुदाय की भागीदारी
माता-पिता, अभिभावकों, आशा कार्यकर्ताओं, एएनएम और अन्य हितधारकों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए। विशेष रूप से अभिभावकों के लिए नियमित संवाद, गतिविधि मार्गदर्शिका और वीडियो साझा किए जाएं, ताकि घर पर भी सीखने का वातावरण बने और ईसीई के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़े। चिकित्सीय सहयोग या परामर्श जैसी जिम्मेदारियों में एएनएम और आशा कार्यकर्ताओं का सहयोग लिया जाए, जिससे आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का भार कम हो सके।
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लेखक के बारे में
- पूजा राठी आईडीआर हिंदी में संपादकीय विश्लेषक (एडिटोरियल एनालिस्ट) हैं। इससे पहले, उन्होंने फेमिनिज़्म इन इंडिया में सह-संपादक के रूप में काम किया है, जहां उन्होंने जेंडर, पर्यावरण और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को कवर किया। पूजा को यूएन लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित किया गया है और वह 2024 की लाडली मीडिया फैलो भी रह चुकी हैं। इसके अलावा, वह खबर लहरिया की रूरल मीडिया फेलोशिप और एटलस फॉर बिहेवियर चेंज इन डेवलपमेंट की बिहेवियरल जर्नलिज़्म फेलोशिप की पूर्व फेलो रह चुकी हैं। पूजा ने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है।
- जूही मिश्रा आईडीआर में एडिटोरिएल एसोसिएट हैं। उन्हें पत्रकारिता का 14 साल का अनुभव है और उन्होंने पत्रिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, रोर मीडिया, दूता टेक्नोलॉजी और ग्राम वाणी के साथ काम किया है। जूही ने विकास संवाद संस्था से फेलोशिप पूरी की है, जहाँ उन्होंने बसोर समुदाय में खाद्य प्रणालियों और कुपोषण के कारणों पर शोध किया।
