भारत में स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा मिले तीन दशक से भी ज़्यादा का समय बीत चुका है। 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों के ज़रिए ग्रामीण और शहरी निकायों को स्थानीय स्तर पर विकेंद्रीकरण, आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय से जुड़ी योजनाएं बनाने और उन्हें लागू करने की ज़िम्मेदारी दी गई। लेकिन इन ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए ग्रामीण निकायों और शहरी निकायों के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन होना भी उतना ही ज़रूरी है।
इस व्यवस्था में वित्त आयोग की भूमिका बहुत अहम है। एक ओर, राज्य वित्त आयोग यह सिफारिश करता है कि राज्य के संसाधनों में स्थानीय निकायों की क्या हिस्सेदारी होनी चाहिए। दूसरी ओर, केंद्रीय वित्त आयोग केंद्र के कर राजस्व में से राज्यों के माध्यम से पंचायतों और स्थानीय शहरी निकायों को अनुदान देने की सिफारिश करता है। इस तरह, वित्त आयोग केवल स्थानीय निकायों को पैसा उपलब्ध कराने का माध्यम नहीं है, बल्कि वह केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के बीच वित्तीय संबंधों को आकार देने वाली एक महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था भी है। देश में अब तक 16 केंद्रीय वित्त आयोगों का गठन हो चुका है।


16वां केंद्रीय वित्त आयोग
1 फरवरी 2026 को वित्त आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश की गई। इसमें आयोग ने अगले पांच साल (वित्त वर्ष 2026-27 से लेकर 2030-31 तक) की अवधि में ग्रामीण व शहरी स्थानीय निकायों के लिए 7,91,493 करोड़ रुपए के अनुदान की सिफारिश की है।
हालांकि यह समझना ज़रूरी है कि वित्त आयोग जितनी राशि की सिफारिश करता है, वह केंद्र सरकार द्वारा स्थानीय निकायों को वास्तव में हस्तांतरित की गई राशि से कम ही होती है। 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, 10वें वित्त आयोग (1995-2000) से अब तक शहरी निकायों को सिफारिश की गई राशि में से अधिकतम 89% और ग्रामीण निकायों को अधिकतम 95% ही जारी किया गया है। है। पंचायतों के मामले में जितनी राशि देने की सिफारिश की गई थी उसका अधिकतम हिस्सा 12वें वित्त आयोग (2005-10) के दौरान जारी किया गया।
16वें वित्त आयोग ने कुल अनुदान में से 4,35,236 करोड़ रुपए (60%) ग्रामीण निकायों और 3,56,257 करोड़ रुपए (40%) शहरी निकायों के लिए रखने की सिफारिश की है। 15वें वित्त आयोग की तुलना में 16वें वित्त आयोग ने पंचायतों को करीब 55% अधिक राशि उपलब्ध करवाने की सिफारिश की है, जबकि शहरी निकायों को देय अनुदान लगभग 2.3 गुना हो गया है।
पंचायतों को मिलने वाले अनुदान का राज्यों के बीच वितरण 2026 की अनुमानित ग्रामीण आबादी (90% भार) और राज्य के क्षेत्रफल (10% भार) के अनुसार किया जाएगा। वहीं, शहरी स्थानीय निकायों के लिए मिलने वाली राशि का राज्यों के बीच बंटवारा 2026 की अनुमानित शहरी आबादी को 90% और शहरी निकायों की अपनी आय को 10% भार देते हुए किया जाएगा।
सारणी 1: 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार देश के ग्रामीण निकायों को देय अनुदान (करोड़ रुपए में)
| अनुदान का प्रकार | 2026-27 | 2027-28 | 2028-29 | 2029-30 | 2030-31 | कुल (2026-31) |
| मूल अनुदान | 55,909 | 62,059 | 68,885 | 76,462 | 84,873 | 348,188 |
| निष्पादन अनुदान – निकाय आधारित | 0 | 0 | 13,023 | 14,445 | 16,046 | 43,524 |
| निष्पादन अनुदान – राज्य आधारित | 0 | 9,241 | 10,258 | 11,386 | 12,639 | 43,524 |
| कुल अनुदान | 55,909 | 71,300 | 92,166 | 102,303 | 113,558 | 435,236 |
पंचायतों को मिलने वाले कुल अनुदान का 80% मूल अनुदान और 20% प्रदर्शन या निष्पादन अनुदान होगा।
शहरी निकायों को अनुदान
शहरी स्थानीय निकायों को मिलने वाले कुल अनुदान में से 65% राशि मूल अनुदान के रूप में दी जाएगी। इसके अलावा, 16% राशि प्रदर्शन या निष्पादन अनुदान, 16% विशेष बुनियादी ढांचा अनुदान और लगभग 3% शहरीकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रीमियम के रूप में दी जाएगी।
सारणी 2: 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार 2026-31 के दौरान देश के शहरी निकायों को मिलने वाला अनुदान (करोड़ रुपए में)
| अनुदान का प्रकार | राशि (करोड़ रुपए में) | प्रतिशत |
| मूल अनुदान | 232,125 | 65.15 |
| प्रदर्शन या निष्पादन अनुदान | 58,032 | 16.28 |
| विशेष बुनियादी ढांचा अनुदान | 56,100 | 15.74 |
| शहरीकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रीमियम | 10,000 | 2.80 |
| कुल अनुदान | 356,257 | 100 |
प्रदर्शन या निष्पादन अनुदान
इस अनुदान का 20% हिस्सा राज्य और स्थानीय निकायों के प्रदर्शन के आधार पर दिया जाएगा। यानी, उन्हें यह राशि इस आधार पर मिलेगी कि वे अपना काम और वित्तीय प्रबंधन कितनी अच्छी तरह कर रहे हैं। इसमें से 10% राशि उन राज्यों के प्रदर्शन के आधार पर दी जाएगी, जो अपने संसाधनों में से स्थानीय निकायों को न्यूनतम राशि समय पर देते हैं। बाकी 10% राशि स्थानीय निकायों के प्रदर्शन के आधार पर दी जाएगी। इसके लिए उन्हें स्वयं की आय बढ़ाने से जुड़े मानदंड पूरे करने होंगे। ग्रामीण और शहरी निकायों के लिए ये मानदंड अलग-अलग हैं।
स्थानीय निकायों को अनुदान जारी करने के लिए बुनियादी शर्तें
16वें वित्त आयोग ने राज्यों द्वारा स्थानीय निकायों को देय अनुदान के लिए तीन बुनियादी शर्तें निर्धारित की हैं, जो इस प्रकार हैं:
- राज्य में स्थानीय निकायों का गठन संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार होना चाहिए।
- जिस वर्ष (T) के लिए अनुदान दिया जाना है, उससे ठीक पहले वाले वर्ष (T-1) के सभी स्थानीय निकायों के अनंतिम खाते (provisional accounts) और उससे एक वर्ष पहले (T-2) के अंकेक्षित खाते (audited accounts) ऑनलाइन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने चाहिए।
- राज्य को समय पर राज्य वित्त आयोग का गठन करना होगा।
इन शर्तों का उद्देश्य स्थानीय निकायों का गठन, उनके वित्तीय लेन-देन में पारदर्शिता और उनके पास पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। राज्य वित्त आयोग का काम भी इसी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि वह राज्य और स्थानीय निकायों के बीच वित्तीय संसाधनों के बंटवारे से जुड़ी सिफारिशें करता है।
अगर खातों की शर्त पूरी न हो तो क्या होगा?
वित्त मंत्रालय द्वारा जारी ग्रामीण स्थानीय निकायों को देय अनुदान के दिशानिर्देशों के अनुसार अगर किसी राज्य में सभी ग्रामीण स्थानीय निकायों के अनंतिम खाते (provisional accounts) और उससे पहले के वर्ष (T-2) के अंकेक्षित खाते (audited accounts) सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं, तो जितने प्रतिशत स्थानीय निकायों के खाते उपलब्ध हैं उसी अनुपात के आधार पर राशि दी जाएगी। वित्त मंत्रालय के दिशानिर्देश में राज्य वित्त आयोग के मामले में भी केवल उसका गठन पर्याप्त नहीं माना गया है। उसकी रिपोर्ट और उस पर राज्य सरकार द्वारा की गई कार्यवाही की रिपोर्ट (action taken report) को भी ज़रूरी बताया गया है।
ग्राम पंचायतों के लिए 16वें वित्त आयोग के अनुदान का वितरण
वित्त मंत्रालय द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देशों के अनुसार हर राज्य में ग्रामीण स्थानीय निकायों, यानी पंचायतों, को 16वें वित्त आयोग के तहत मिलने वाला अनुदान पंचायतों के तीनों स्तरों (ग्राम पंचायत, ब्लॉक पंचायत तथा जिला पंचायत/परिषद) में बांटा जाएगा। इसका बंटवारा राज्य वित्त आयोग की स्वीकार्य सिफारिशों के आधार पर होगा। ऐसी सिफारिशें उपलब्ध न होने पर अनुदान का 80% हिस्सा ग्राम पंचायत, 10% ब्लॉक पंचायत तथा शेष 10% जिला पंचायत/परिषद के लिए निर्धारित है। जिन राज्यों में ब्लॉक पंचायत नहीं है वहां 90% राशि ग्राम पंचायत को और शेष राशि जिला पंचायत/परिषद को दी जाएगी। वहीं, जिन राज्यों में केवल ग्राम पंचायत ही हैं वहां अनुदान की पूरी राशि ग्राम पंचायतों को जाएगी।
16वें वित्त आयोग के तहत पंचायतों को मिलने वाले अनुदान का उपयोग
वित्त मंत्रालय ने 16वें वित्त आयोग के तहत पंचायतों को मिलने वाले अनुदान के इस्तेमाल के संबंध में दिशानिर्देश जारी किए हैं। इनके अनुसार, अनुदान की अलग-अलग मदों का इस्तेमाल तय नियमों के अनुसार किया जाएगा।
वित्त मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अनुसार 16वें वित्त आयोग के अनुदान के इस्तेमाल के निम्न प्रावधान होंगे:
- मूल अनुदान की 50% राशि का इस्तेमाल स्वच्छता एवं ठोस कचरा प्रबंधन और जल प्रबंधन पर ही किया जा सकेगा। इस राशि का इस्तेमाल इन दो विषयों से संबंधित पंचायतों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जा सकता है। इसमें इन दो सेवाओं के संचालन और रखरखाव (O&M) का खर्च भी शामिल है।
- मूल अनुदान का आधा अबंधित (untied) अनुदान है, जिसका इस्तेमाल संविधान की 11वीं अनुसूची में सूचीबद्ध 29 विषयों पर किया जा सकता है। लेकिन अबंधित (untied) अनुदान का 20% से अधिक हिस्सा सड़क या गली के निर्माण और रखरखाव पर खर्च नहीं किया जा सकता। साथ ही, अबंधित (untied) अनुदान का इस्तेमाल वेतन और अन्य प्रकार के संस्थापना व्यय (establishment expenses) के लिए भी नहीं किया जा सकता है।
प्रदर्शन अनुदान भी अबंधित (untied) (ऐसा धन या अनुदान, जिसे स्थानीय ज़रूरत के अनुसार खर्च किया जा सकता है) अनुदान होगा। पंचायतें इसे अपने क्षेत्र की ज़रूरतों के अनुसार खर्च कर सकती हैं। हालांकि इसके इस्तेमाल पर भी अबंधित अनुदान से जुड़ी ऊपर बताई गई शर्तें लागू होंगी।
शहरी निकायों को मिलने वाले अनुदान का उपयोग
हालांकि अभी तक वित्त मंत्रालय ने 16वें वित्त आयोग के तहत शहरी निकायों को मिलने वाले अनुदान के संबंध में दिशानिर्देश जारी नहीं किए हैं। लेकिन सामान्य निर्देशों के अनुसार शहरों में भी मूल अनुदान का आधा बंधित (ऐसा धन या अनुदान, जिसे तय काम पर ही खर्च करना है) अनुदान और शेष आधा अबंधित अनुदान होगा। यानी, शहरों में भी कुल मूल अनुदान का 50% बंधा हुआ और 50% अपनी ज़रूरत के अनुसार खर्च करने के लिए होगा।
शहरी निकायों के मामले में 2011 की जनगणना के अनुसार 10 से 40 लाख की आबादी वाले शहरों के लिए विशेष बुनियादी ढांचा अनुदान एक बद्ध अनुदान होगा। इसका इस्तेमाल इन शहरों में व्यापक अपशिष्ट जल प्रबंधन व्यवस्था बनाने के लिए किया जाएगा।
वहीं, शहरीकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रीमियम (लाभ) राज्यों को एक बार दिया जाने वाला अनुदान है। इसका इस्तेमाल शहरों के आसपास के गांवों को शहरी निकाय में सम्मिलित करने और ग्रामीण क्षेत्रों के शहरीकरण की नीति बनाने के लिए किया जाएगा।
16वें वित्त आयोग ने न केवल स्थानीय निकायों, विशेषकर शहरी निकायों, को पहले से अधिक राशि उपलब्ध करवाई है, बल्कि मूल अनुदान में अबंधित राशि का हिस्सा भी बढ़ाकर 50% कर दिया है। 15वें वित्त आयोग में निर्बंध राशि का हिस्सा 40 प्रतिशत था। इससे स्थानीय निकायों को अपनी स्थानीय ज़रूरतों के अनुसार खर्च की अधिक स्वायत्तता मिली है।
लेकिन अनुदान के साथ कुछ शर्तें भी रखी गई हैं। राज्यों को स्थानीय निकायों के चुनाव नियमित और समय पर करवाने, राज्य वित्त आयोग के समय पर गठन करने और स्थानीय निकायों के खाते सार्वजनिक करने जैसे दायित्व भी सौंपे गए हैं। कई राज्यों में पंचायतों के और शहरी निकायों के चुनाव और राज्य वित्त आयोग के गठन में देरी को देखते हुए 16वें वित्त आयोग में इन शर्तों को ज़रूरी माना गया है। साथ ही, आयोग ने निष्पादन अनुदान को इससे भी जोड़ा है कि स्थानीय निकायों ने स्वयं की आय बढ़ाने में कैसा प्रदर्शन किया है।
आयोग ने स्थानीय निकायों के खातों में सुधार, उनका समय पर ऑडिट कराने, उनकी स्वयं की आय बढ़ाने जैसे लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उनके चुने हुए प्रतिनिधियों व कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाने को भी ज़रूरी माना है। इसमें पंचायती राज मंत्रालय, आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय एवं राज्य सरकारों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
16वें वित्त आयोग ने पिछले वित्त आयोगों की अपेक्षा शहरी निकायों के लिए अनुदान में बढ़ोतरी की है। साथ ही, शहरीकरण को बढ़ावा देने के लिए 10,000 करोड़ रुपए का अनुदान रखा है। शहरीकरण को बढ़ावा देने पर भले ही अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन 16वें आयोग की तीन बुनियादी शर्तें केंद्र और राज्य सरकारों के सामने स्थानीय स्वशासन को मज़बूत करने का अवसर पेश करती हैं। इन शर्तों को लागू करके संविधान की भावना के अनुरूप विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा देते हुए भारतीय लोकतंत्र को और अधिक मज़बूत किया जा सकता है।
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लेखक के बारे में
- नेसार अहमद बजट एनालिसिस एंड रिसर्च सेंटर ट्रस्ट के संस्थापक निदेशक हैं। उन्हें सार्वजनिक वित्त, नीति अनुसंधान, जेंडर रिस्पॉन्सिव बजट, चाइल्ड बजट, तथा भूमि और अनैच्छिक विस्थापन जैसे विषयों पर काम करने का लंबा अनुभव है। इन विषयों पर उनके कई शोध और प्रकाशन भी प्रकाशित हो चुके हैं।



