January 20, 2022

वित्तपोषण के लिए योजनाएं

वित्तपोषण के पाँच तरीकों में से आपको किसका अनुसरण करना चाहिए?
8 मिनट लंबा लेख

भारत में वित्तपोषण परिस्थितिकी बहुत ही तेजी से बदल रहा है। ऐसे अंतर्राष्ट्रीय दानकर्ताओं को अपने कार्यक्रमों को वापस लेने के लिए कहा जा रहा है जिन्होंने कभी नए और कम सेवा देने वाले विषयगत क्षेत्रों का समर्थन किया था। वहीं घरेलू दानकर्ताओं का ध्यान विशिष्ट विषयगत और भौगोलिक क्षेत्रों पर अधिक केन्द्रित हो रहा है जो समय के साथ बदल सकते हैं, प्रदर्शित पैमाने की क्षमता पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है और प्रभाव मैट्रिक्स पर सावधानीपूर्वक नजर रखना अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। यह सब कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा सामना की जा रही प्रतिक्रिया और एफसीआरए नियमों में बदलाव के अतिरिक्त है।

यह कहने की जरूरत नहीं है कि स्वयंसेवी संस्थाओं को अपने वित्तपोषण के घरेलू स्त्रोतों में विविधता लाने की तत्काल आवश्यकता है। बीस वर्षों तक स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ काम करने से प्राप्त अनुभव के आधार पर हमनें यह देखा कि स्वयंसेवी संस्थाएं आमतौर पर दानकर्ताओं को अपने कार्यक्रम के समर्थन के लिए समझाने के काम में अच्छे होती हैं, लेकिन उस पहले तीन या पाँच वर्षीय अनुदान के समाप्ती पर पहुँचने के बाद उन्हें समर्थन लेने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

एक विविध वित्तपोषण रणनीति की आवश्यकता

संस्थाओं के लिए आवश्यक है कि वे वित्तपोषण को अपने कार्यक्रम को लागू करने के लिए आवश्यक धन जुटाने वाले तरीके के बजाय एक ऐसी रणनीतिक क्रियान्वयन के रूप में देखें जिनकी मदद से वे अधिक से अधिक कर सकने में सक्षम होंगे। उदाहरण के लिए, यह आत्मनिर्भर बनने, नवाचार करने, वित्तीय भंडार तैयार करने और समान विचारधारा वाले समर्थकों का एक समुदाय बनाने में इनकी मदद कर सकता है।

तो स्वयंसेवी संस्थाएं एक विविध फंडिंग पाइपलाइन बनाने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए क्या कर सकते हैं? पाँच प्रकार के वित्तपोषण और उनमें से प्रत्येक के लिए आवश्यक संशोधनों को समझना शुरू करें:

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

1. संस्थागत वित्तपोषण

यह क्या है: इस तरह के अनुदान आमतौर पर परोपकारी संस्थाओं और न्यासों (ट्रस्ट) द्वारा दिया जाता है। अक्सर उनके पास किसी न किसी प्रकार विषयगत फोकस होता है जिसके तहत वे परियोजनाओं की तलाश करते हैं। वे विशिष्ट कार्यक्रमों को गहराई से करने के लिए या उनके विस्तार के लिए उनमें बहुत अधिक मूल्य जोड़ते हैं और इनकी अवधि आमतौर पर तीन से पाँच वर्षों की होती है जो पूरी परियोजना के खर्च का वहन करने में सक्षम होती है।

जिसकी आपको आवश्यकता है: संस्थागत अनुदान के लिए प्रभावी रूप से धन उगाहने और निष्पादित करने के लिए, एक स्वयंसेवी संस्था को एक परियोजना प्रस्ताव लेखक की आवश्यकता होती है जिसके पास उनके कार्यक्रमों की अच्छी समझ है। ऐसा करने के लिए एक समर्पित संसाधन होने से संस्थाओं को निम्नलिखित कामों की अनुमति मिलेगी:

  • प्रासंगिक घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय अवसरों पर नजर रखना और समय-समय पर उनमें आवेदन करना
  • विभिन्न अनुदानों के लिए कार्यक्रमों के हिस्सों को तैयार करना
  • सभी प्रकार के दानकर्ताओं के लिए एक संपर्क बिन्दु तैयार करना
  • यह सुनिश्चित करना कि रिपोर्टिंग समय पर की जाती है और नियमित रूप से दानकर्ताओं को महत्वपूर्ण कामों और उपलब्धियों की सूचना प्रदान की जाती है

तमुकू नामक दिलचस्प पहल एक ऐसी सेवा देती है जहां वे संस्थागत वित्तपोषण के अवसरों को अन्य प्रकार के समर्थन के साथ क्यूरेट करते हैं और इन्हें ग्राहकों को भेजते हैं।

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संगठनों को एक रणनीतिक कार्य के रूप में धन उगाहने के बारे में सोचने की जरूरत है। चित्र साभार: रॉपिक्सेल

2. सीएसआर वित्त

यह क्या है: यह आमतौर पर छोटी अवधि (एक वर्ष) में होता है और कार्यक्रम/विषय पर केन्द्रित होता है। अक्सर, इस फंडिंग का ध्यान एक विशिष्ट क्षेत्र पर होता है और सेवा वितरण के आसपास केन्द्रित परियोजनाओं को प्राथमिकता देता है।

जिसकी आपको आवश्यकता है: सीएसआर फंडिंग के लिए सही कंपनी की खोज के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं को निगम के परिदृश्य और उन क्षेत्रों का नक्शा तैयार करने की जरूरत होती है जिनका वे आमतौर पर समर्थन करते हैं। यह या तो बाहर से लिया जा सकता है या बोर्ड के सदस्यों/कॉर्पोरेट मित्रों के माध्यम से किया जा सकता है जिनके नेटवर्क बेहतर हैं।

अगर आपकी संस्था सीएसआर फंडिंग के लिए शाखाओं की खोज में लगे हैं तो निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना मददगार साबित हो सकता है:

  • सीएसआर फंडिंग उन कार्यक्रमों (या कार्यक्रमों के पहलुओं) के लिए अच्छी तरह से काम करती है जिनका भौगोलिक परिदृश्य लोचदार होता है।
  • कॉर्पोरेट अपनी टीम के सदस्यों को स्वेच्छा से अवसर प्रदान करने में सक्षम होना पसंद करते हैं।
  • वे ऐसे कार्यक्रमों के लिए अनुकूल हैं जो बहुत ही सरलता से किसी व्यक्ति/जमीनी स्तर पर किए गए परिवर्तन को प्रदर्शित कर सकते हैं।
  • बहुत से कॉर्पोरेट अपने स्वयं के साइट कार्यालयों या कारखानों के आसपास कार्यक्रम स्थापित करना पसंद करते हैं। वैकल्पिक रूप से वे ऐसे कार्यक्रम पसंद करते हैं जो इन कार्यालयों और कारखानों में काम करने वाले लोगों को लाभान्वित कर सकें।

3. अधिक संपत्ति वाले व्यक्तियों (एचएनआई) और परोपकारी लोगों से मिलने वाले अनुदान

यह क्या है: इस तरह की फंडिंग एक ऐसे व्यक्ति द्वारा किए गए मध्यम आकार या बड़े दान का रूप लेती है जो कारण, परियोजना और इसमें शामिल लोगों से सहमत होते हैं।

जिसकी आपको आवश्यकता है: यहाँ मुख्य भूमिका एचएनआई (निर्दिष्टों के माध्यम से ऑफलाइन) की पहचान करना, उनकी रुचियों और फंडिंग की प्राथमिकताओं को समझना और उनसे मिलने की कोशिश करने की होती है। विश्वास बनाने और उनके साथ गहरे संबंध की स्थापना में बहुत समय खर्च होता है लेकिन एक बार हो जाने पर ये दानकर्ता किसी नवाचार वाले और जोखिम वाली पहल, नई व्यवस्था के विकास और गैर-परियोजना कर्मचारियों के वेतन में निवेश करने के लिए तैयार हो सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि एचएनआई के साथ संबंधों को विकसित करने का काम संस्थाओं और संगठनों के प्रमुख द्वारा किसी ऐसे आदमी की सहायता से की जाने की जरूरत होती है जिसके पास लोगों के प्रबंधन के कौशल और कार्यक्रम की अच्छी समझ हो।

4. खुदरा वित्तपोषण

यह क्या है: इसमें आमतौर पर बड़ी संख्या में लोगों से नियमित रूप से 500–1000 रुपए की धनराशि दान के रूप में मिलती है। यह एक दिन में असंख्य लोगों से बातचीत करके (सड़क पर, संदेश, फोन या ज़ूम के माध्यम से) और उन्हें दानकर्ताओं के समूह में शामिल होने के लिए प्रभावित करके किया जाता है। इस प्रकार के फंडरेजिंग का सबसे कीमती पहलू यह है कि इससे प्राप्त धन अप्रतिबंधित होता है—यह किसी भी क्रियाकलाप या परियोजना से बंधा हुआ नहीं होता है।

जिसकी आपको आवश्यकता है: इसमें संसाधन का आकार बहुत बड़ा होता है। इसमें आपको निम्नलिखित चीजों की आवश्यकता होती है:

  • एक प्रशिक्षित फंडरेजिंग समूह जो संभावित दानकर्ताओं तक पहुँच सके और मासिक स्तर पर पहले से मौजूद दानकर्ताओं को प्रभावशाली तरीके से बनाए रखने का काम कर सके।
  • एक आंकड़ों का विश्लेषण करने वाली टीम हो जो जानकारी का पता लगाती है और बताती है कि दानकर्ताओं के अधिग्रहण और प्रतिधारण के काम को कैसे बेहतर बनाया जाए।

ज़्यादातर स्वयंसेवी संस्थाएं इस काम की शुरुआत बाहरी मदद से करती हैं। और एक बार जब वे इसके क्रियान्वयन को अच्छे से सीख जाते हैं तब वे इस काम को आंतरिक रूप से करने का चुनाव भी कर सकते हैं। टीम का आकार आपके द्वारा निवेश की जाने वाली धनराशि पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, ग्रीनपीस जैसे संगठन के पास 506 शहरों में लगभग 10 ऐसे फंड उगाहने वाले लोग हैं जो सड़कों पर काम करते हैं (स्ट्रीट फंडरेज़र), जिसमें उनकी सहायता के लिए संवाद और आंकड़ों की टीम भी शामिल होती है।

बड़ी मात्रा में निवेश की आवश्यकता के कारण खुदरा फंडरेजिंग के मूल्य का अनुमान निवेश पर मिलने वाले धन के आधार पर नहीं किया जाता है बल्कि इससे मिलने वाले लाइफटाइम मूल्य (दानकर्ताओं की संख्या x औसत दान का आकार) के माध्यम से लगाया जाता है। जहां शुरुआत में यह महंगा होता है वहीं इस तरह के फंडरेजिंग में लगने वाली कीमत अमूमन वसूल हो जाती है। हमारे अनुभव के आधार पर हमनें यह देखा है कि तीन साल की अवधि के बाद संगठनों में तेजी से वृद्धि होती है।

5. डिजिटल वित्तपोषण

यह क्या है: ये ऐसी फंडरेजिंग रणनीतियां हैं जो डिजिटल माध्यमों (सोशल मीडिया, केट्टो और मिलाप जैसे वैबसाइटों के माध्यम से चलाये जाने वाले अभियानों, और संगठनों के वेबसाइट) का इस्तेमाल करके धन एकत्रित करती हैं। इसमें ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों ही तरीकों से लोगों को उस मंच तक लाने का काम किया जाता है जिस पर आपका दान अभियान है।

जिसकी आपको आवश्यकता है: फंडरेजिंग का यह स्वरूप तभी काम करता है अगर संगठन इस तरह के अभियान बनाने में सक्षम हो जो शक्तिशाली कहानियाँ कहने और लोगों को काम पर लगाये। संसाधनों के संदर्भ में, इस तरीके में आमतौर पर एक ऐसे रचनात्मक लेखक की जरूरत होती है जो विषय पर लिख सके और इसके अलावा एक डिजिटल मार्केटिंग टीम की जरूरत होती है जो सोशल मीडिया जैसे मंचों पर इन संदेशों को पहुंचाने का काम करे।

फंडरेजिंग रणनीति का निर्माण

जब आप अपने फंडरेजिंग के लिए रणनीति निर्माण की तैयारी में जुटें हैं तो कुछ बातें आपको ध्यान में रखनी चाहिए:

1. अपने विचार को ध्यान में रखें: इससे आपको उन सिद्धांतों और मूल्यों को तय करने में मदद मिलेगी जो फंडरेजिंग की आपकी कोशिशों को संचालित करेंगे। उदाहरण के लिए, आप अपने कार्यक्रम या अभियान को किसी भी शक्तिशाली राजनीतिक आवाज़ से स्वतंत्र रख सकते हैं या श्रम क़ानूनों का उल्लंघन करने के लिए मशहूर कंपनियों या उद्योगों के साथ साझेदारी करने से बच सकते हैं। इससे आपको मिलने वाले पैसों के ऐसे स्त्रोतों की पहचान करने में आसानी होगी जिसे आपको स्वीकार करना है और जिसे आपको स्वीकार नहीं करना है।

2. कार्यक्रम की महत्वाकांक्षा का आकलन: इससे आपको पाँच वर्षों के बजट की रूपरेखा तैयार करने में मदद मिलती है। यह एक बार-बार दोहराई जाने वाली प्रक्रिया है जो आमतौर पर बड़ी महत्वाकांक्षा के साथ शुरू होती है और फिर इसे आंतरिक क्षमताओं, बाहरी संदर्भ और संभावनाओं के अनुसार परिवर्तित किया जाता है या छोटा किया जाता है। ऐसा करने से आपको उन कमियों का वास्तविक ज्ञान होगा जिन्हें आपके फंडरेजिंग के प्रयासों (वर्तमान के वादे और भविष्य में किए जाने वाले निवेश के आधार पर) को बेहतर करने के लिए दूर करना आवश्यक है।

3. अपने फंडरेजिंग मिक्स के बारे में सोचें: एक ऐसी मिश्रित स्थिति की दिशा में प्रयास और काम करें जिसमें विविध परियोजनाओं वित्तपोषण के साथ ही (दानकर्ताओं के बीच विभाजित कार्यक्रमों के साथ) अप्रतिबंधित वित्त का एक छोटा सा समूह भी हो। इसके अतिरिक्त, ऐसे दानकर्ताओं की खोज करना भी एक अच्छा अभ्यास है जो स्वयं भी फंडरेजिंग की प्रक्रिया में निवेश करने के लिए राजी होंगे।

4. समूह को शामिल करें: एक मजबूत फंडरेजिंग रणनीति वह होती है जिसमें पूरे संगठन की भूमिका होती है और जहां कार्यक्रम समूह भी अपनी भूमिका जानते हैं और असफल होने और दोबारा कोशिश करने में सक्षम होते हैं।

अर्थन के फ्यूचर ऑफ फंडरेजिंग सम्मेलन में दिव्या रघुनंदन ने रिटेल फंडरेजिंग की स्थापना पैनल में ये बातें कहीं थीं।

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लेखक के बारे में
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अरुणभा भट्टाचार्य

अरुणभा भट्टाचार्य वर्तमान में रूटब्रिज में मिशन एडवांसमेंट के पार्टनर हैं। वह उन लोगों की कहानियों को बताने पर ध्यान केंद्रित करते है जो कार्रवाई नहीं कर सकते हैं, नई संभावनाओं की कल्पना नहीं कर सकते हैं और परिवर्तन के लिए संसाधन नहीं जुटा सकते हैं। इससे पहले उन्होंने वृत्ती में अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, आईसीआईसीआई बैंक, ड्यूश बैंक और इंफोसिस के साथ पार्टनरशिप और फंडरेजिंग में काम किया है। वह गोआ इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के पूर्व छात्र हैं। उनसे [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है।

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दिव्या रघुनंदन

दिव्या रघुनंदन रूटब्रिज में मिशन एडवांसमेंट की निदेशक हैं। वह पहले अजीम प्रेमजी परोपकारी पहल (एपीपीआई) में एक कार्यक्षेत्र का नेतृत्व कर रही थीं, जिसने मध्यम आकार के संगठनों की संस्थागत क्षमता निर्माण को सक्षम किया जो कि विस्तार और पैमाने के लिए तैयार हैं। एपीपीआई से पहले, दिव्या ने कॉमन ग्राउंड कलेक्टिव की सह-स्थापना की और ग्रीनपीस में 15+ वर्ष भी बिताए, जहाँ वह प्रोग्राम डायरेक्टर थीं। दिव्या टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस), मुंबई की पूर्व छात्र हैं। इनसे [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है।

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