February 23, 2022

भारत के वित्तीय सेवाओं से जुड़े मुद्दों को उठाना इतना मुश्किल क्यों है

बैंकिंग क्षेत्र की डिजिटल शिकायत निवारण प्रणाली का लैंगिक बाधाओं और प्रौद्योगिकी तक सीमित पहुँच की समस्या को हल करना जरूरी है।
8 मिनट लंबा लेख

भारत सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिये पर जी रहे अपने लोगों तक आसानी से पहुँचने के लिए वित्तीय सेवाओं में नवाचार कर रहा है। उदाहरण के लिए यह सामाजिक कल्याण योजनाओं से सीधे बैंक खातों (नकद या इन हैंड सेवाओं के बजाय) में धन का हस्तानांतरण करके यूनीफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) जैसे तरीकों को बढ़ावा देता है। साथ ही यह सामाजिक कल्याण से जुड़े फ़ायदों के लिए हाल ही में शुरू किए गए ई-आरयूपीआई प्लैटफ़ार्म के माध्यम से डिजिटल टोकन भी मुहैया करवाता है। लेकिन जब लक्षित लोगों को इन सेवाओं तक पहुँचने में कठिनाई होती है तब वे खराब उपभोक्ता संरक्षण और शिकायत निवारण तंत्र (जीआरएम) के साथ जूझते हैं। इस तरह के अनुभवों से इस नए समाधान पर से उनका विश्वास घटता है और उनके लाभ को प्रभावित करता है। 

ग्राम वाणी जहां दोनों ही लेखक काम करते हैं और सावर्जनिक वित्त और नीति के लिए राष्ट्रीय संस्थान (एनआईपीएफ़पी) ने 2020–21 में बैंकिंग सेवाओं के संबंध में उपलब्ध जीआरएम की पहुँच, प्रभावशीलता और समावेशिता को सामने लाने के लिए एक शोध किया था। इस शोध को बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और तमिल नाडु में ग्राम वाणी के मोबाइल वाणी सामुदायिक मीडिया प्लैटफ़ार्म पर किए गए सर्वेक्षण के आधार पर संचालित किया गया था। इस सर्वेक्षण में 900 से अधिक लोगों ने जवाब दिया था जिसमें 80 प्रतिशत लोग 18–35 वर्ष की आयु सीमा वाले थे और जिनकी मासिक आय 5,000 रूपये से कम थी। 

शिकायत निवारण प्रणाली कैसे काम करती है?

हमारे सर्वेक्षणों ने इस तरफ इशारा किया कि बैंकिंग सेवाओं के साथ विभिन्न प्रकार के मुद्दों के बावजूद 69 प्रतिशत लोगों ने अपनी शिकायतें दर्ज नहीं कारवाई। 20 प्रतिशत लोग ऐसा इसलिए नहीं कर पाये क्योंकि वे नहीं जानते थे कि शिकायत कैसे दर्ज कारवाई जाती है।

बैंकिंग लोकपाल सेवाओं को प्राप्त शिकायतों में से केवल 10 प्रतिशत शिकायतें ही ग्रामीण इलाकों से है।

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

भारतीय नियामक प्राधिकरणों ने अपनी वित्तीय सेवाओं के लिए दो-स्तरीय शिकायत निवारण प्रणाली की स्थापना की है। पहले स्तर में वित्तीय संस्थानों के पास उपयोगकर्ताओं की शिकायतों पर काम करने के लिए औपचारिक माध्यम का होना आवश्यक है जिसे अक्सर ‘आंतरिक समाधान फोरम’ के नाम से जाना जाता है। दूसरे स्तर पर, क्षेत्र-विशिष्ट लोकपाल, उपभोक्ता निवारण फोरम या दीवानी अदालतों जैसे बाहरी विकल्प होते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंकों, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफ़सी) और डिजिटल भुगतान सेवा प्रदाताओं के लिए लोकपाल सेवाएँ शुरू की हैं। पीड़ित उपयोगकर्ता पत्रों या ऑनलाइन माध्यमों से अपने मुद्दे उठा सकते हैं। 

सामाजिक-आर्थिक रूप से हाशिये पर रहने वाले और ग्रामीण समुदायों में इन प्रणालियों की जानकारी और इनके इस्तेमाल के प्रति जागरूकता न्यूनतम स्तर पर है। आरबीआई के लोकपाल सेवाओं के 2019–20 के वार्षिक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि बैंकिंग लोकपाल सेवाओं को प्राप्त शिकायतों में से केवल 10 प्रतिशत शिकायतें ही ग्रामीण इलाकों से आई है। ज़्यादातर शिकायतें ऑनलाइन दर्ज की गई थीं जो इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि इस सुविधा का ज्यादा लाभ ऐसे समुदायों के सदस्य उठाते हैं जिन्हें डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध हैं। जहां एक तरफ हमारे सर्वेक्षण में भाग लेने वाले हर पाँच में से एक उत्तरदाता को यह नहीं पता था कि शिकायत कहाँ करनी है वहीं अन्य उत्तरदाताओं ने शिकायत न करने के कई कारणों के बारे में हमें बताया। इस मामले में भी 30 प्रतिशत लोगों ने बैंक के अधिकारियों के साथ उनकी बातचीत से पैदा हुए असंतोष को ही शिकायत न करने का कारण बताया। 

उपयोगकर्ता शिकायत क्यों नहीं करते हैं?

ये संख्या पूरी तरह से इस ओर इशारा करते हैं कि शिकायत पंजीकरण की वर्तमान प्रणाली समावेशी, आसानी से पहुँच में आने वाली या उपयोगकर्ताओं को ध्यान में रख कर बनाई गई प्रणाली नहीं है। हमनें उन कुछ प्राथमिक कारणों की खोज की है जिनकी वजह से लोग वर्तमान में प्रयुक्त होने वाले वित्तीय शिकायत प्रणाली का उपयोग नहीं करते हैं:

1. खराब व्यवहार वाले बैंक अधिकारी, काम न करने वाली स्वचालित टेलर मशीनें (एटीएम) 

जहां पैसों का डिजिटल लेनदेन व्यापक रूप से उपलब्ध हैं वहीं नकद आज भी वित्तीय लेनदेन के केंद्र में बना हुआ है—जिसके लिए बैंक या एटीएम तक जाने की जरूरत होती है। हालांकि, कई उत्तरदाताओं ने यह बताया कि बैंक के अधिकारी उनके साथ अच्छा बर्ताव नहीं करते हैं जिसके कारण उन्हें बैंक जाने में डर लगता है या वे वहाँ जाना टाल देते हैं। अन्य लोगों ने कहा कि उन्हें बैंक या एटीएम के माध्यम से अपने खातों से पैसे निकालने में मुश्किल होती है।

एक औरत मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हुए_बिल & मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन/संजीत दास-शिकायत निवारण प्रणाली बैंक
शिकायत निवारण तंत्र का मूल्यांकन लिंग के आधार पर किया जाना चाहिए ताकि यह समझा जा सके कि महिलाओं और अन्य लिंगों के लिए उन्हें कैसे सुलभ बनाया जा सकता है। | चित्र साभार: बिल & मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन/संजीत दास

2. महिलाओं के लिए डिजिटल पहुँच का अभाव

बैंकिंग सुविधाओं का महिला उपयोगकर्ताओं तक पहुँचने के लिए हम लोगों ने उन उत्तरदाताओं से संपर्क किया जिन्होनें ग्राम वाणी के महिला-केन्द्रित मंचों के माध्यम से जवाब दिया था। लेकिन अक्सर परिवार के पुरुष सदस्य ही फोन उठाते थे। ज़्यादातर मामलों में जब महिलाओं ने फोन उठाया तब उन्होनें अपने बैंक के खातों से जुड़ी शिकायतों के बारे में बताने के लिए परिवार के पुरुष सदस्य को फोन दे दिया। भले ही व्यापक आर्थिक विकास में महिलाओं के वित्तीय समावेशन की भूमिका पर काफी चर्चा हो रही है लेकिन इसे हासिल करने के लिए वित्तीय सेवाओं को महिलों की जमीनी हकीकत में निहित सूक्ष्म समाधानों की जरूरत है। और भारत में लैंगिक आधार पर महिलाओं के पास मोबाइल की उपलब्धता और डिजिटल साक्षरता को देखते हुए डिजिटल समाधान सबसे उपयुक्त समाधान नहीं हो सकते हैं। 

3. जटिल, तेजी से बदलती हुई तकनीक 

कई उत्तरदाताओं ने बैंकिंग मुद्दों के कारण उन्हें नहीं मिलने वाली कल्याणकारी लाभों से संबंधित शिकायतों को उठाने के लिए मदद की मांग की। जब हम लोगों ने इन उत्तरदाताओं से बातचीत की तब हमें इस बात का एहसास हुआ कि ज़्यादातर लोग अपने बैंक खातों में आने वाले लाभों की जटिलता को नहीं समझ पाये हैं। लगभग 15 प्रतिशत शिकायतें ऐसी थी जिनका बैंकिंग मुद्दों से कोई लेनादेना नहीं था बल्कि उन मामलों में उपयोगकर्ता किसी खास कल्याणकारी योजना का लाभ उठाने के योग्य नहीं था। इसके अलावा, एक्सेस चैनल, प्रपत्रों की भाषा और शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया के अन्य पहलू तकनीकी हैं। यह कम वित्तीय साक्षरता वाले लोगों के लिए जीआरएम को मुश्किल बनाता है, खासकर जब वित्तीय उपकरण और सेवाएं तेजी से बदल रही हैं।

4. जटिल प्रक्रिया, न्यूनतम सफलता दर 

बैंकिंग-संबंधित शिकायत निवारण पर एनआईपीएफ़पी द्वारा प्रशिक्षित मोबाइल वाणी के स्वयंसेवकों ने ऐसे 235 सर्वेक्षण उत्तरदाताओं से संपर्क किया जो अपने बैंकिंग की समस्या के लिए शिकायत दर्ज करवाने में सहायता चाहते थे। लेकिन उनमें से कईयों ने विपरीत या नकारात्मक प्रभाव के डर से प्रक्रिया को जारी रखने से मना कर दिया। इसलिए स्वयंसेवकों ने सिर्फ उन्हीं 74 उत्तरदाताओं के लिए सरकारी पोर्टल पर ऑनलाइन प्रक्रिया के तहत शिकायत दर्ज करने की शुरुआत की जिन्होनें सहमति जताई थी। जब हम लोगों ने 30 दिनों बाद दोबारा उनसे संपर्क किया तब उनमें से केवल एक उत्तरदाता ने अपने शिकायत के संबंध में बैंक से फोन आने की बात बताई। इसके बाद स्वयंसेवकों ने 42 उपयोगकर्ताओं के लिए आरबीआई लोकपाल में शिकायत दर्ज कारवाई। फिर भी शिकायत ऑनलाइन शुरू करने के 60 दिनों के बाद भी केवल 6 उपयोगकर्ताओं को अपने शिकायत के संबंध में प्रतिक्रियाएँ मिली थीं।

प्रशिक्षित और डिजिटल रूप से साक्षर लोगों के लिए भी इन सरकारी पोर्टलों पर शिकायत दर्ज करना एक जटिल काम है।

2019–20 की आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट में बताया गया है कि पंजीकृत शिकायतों में से लगभग 32 प्रतिशत को खारिज कर दिया गया था क्योंकि उनकी व्याख्या अच्छी तरह से नहीं की गई थी। मोबाइल वाणी के स्वयंसेवकों ने यह बात स्पष्ट की कि प्रशिक्षित और डिजिटल रूप से साक्षर लोगों के लिए भी इन सरकारी पोर्टलों पर शिकायत दर्ज करना एक जटिल काम है। इसके लिए आपके पास स्मार्टफोन/इंटरनेट से जुड़े उच्च स्तर का कौशल चाहिए ताकि आप इन पोर्टलों तक पहुँच सकें। आवेदन पत्रों को सही ढंग से समझने के लिए वित्तीय शब्दावलियों की गहरी जानकारी होनी चाहिए, शिकायत को विस्तार से बताने की योग्यता होनी चाहिए और एक ऐसा मोबाइल होना चाहिए जिसपर वन-टाइम पासवर्ड (ओटीपी) प्राप्त किया जा सके। और बेशक उपयोगकर्ता के पास शिकायत दर्ज करने का समय भी होना चाहिए।

भारत के सामाजिक कल्याण वितरण की एक रिपोर्ट से यह बात सामने आई है कि ज़्यादातर लोगों को बिना किसी बाहरी मदद के यह व्यवस्था और प्रणाली जटिल लगती है, जो इस क्षेत्र में नागरिक समाज के हस्तक्षेप की जरूरत को पैदा करता है।

सभी तक पहुँचने वाली शिकायत निवारण प्रणाली का निर्माण कैसे करें

शिकायत निवारण को लेकर किए गए हमारे सर्वेक्षणों के परिणाम और अनुभव यह बताते हैं कि उपयोगकर्ताओं की पहुँच इस प्रणाली से जुड़ी सूचनाओं तक आसानी से होनी चाहिए। चूंकि लोगों को इस बात का डर होता है कि शिकायत करने से उन्हें बैंक के अधिकारियों द्वारा परेशान किया जा सकता है, इसलिए उन्हें एक ऐसे मंच की जरूरत होती है जहां वे अपनी पहचान छुपाकर बिना किसी आशंका के शिकायत दर्ज कर सकते हैं। 

शिकायतों को दर्ज करने के लिए लिखित संचार माध्यम के अलावा आवाज़-आधारित (वॉइस-बेस्ड) इंटरफेस भी मुहैया करना चाहिए ताकि अधिक से अधिक उपयोगकर्ताओं को शामिल किया जा सके। जीआरएम का मूल्यांकन लिंग के आधार पर भी किया जाना चाहिए ताकि इस बात को समझा जा सके कि औरतों और अन्य लिंग के लोगों के लिए इसे कैसे अधिक से अधिक पहुंचाया जा सकता है। 

कल्याण वितरण के लिए ई-आरयूपीआई जैसी सुविधाओं की शुरुआत के साथ ही, ये बदलाव वित्तीय क्षेत्र में शिकायत निवारण को प्रासंगिक और सब तक पहुँचने लायक बनाने के लिए एक शुरुआती बिन्दु की तरह काम कर सकता है। साथ ही उपयोगकर्ताओं के विश्वास को बढ़ा सकता है और वित्तीय सेवाओ को ऊंचाई पर ले जाने में मददगार हो सकता है। 

शोएब रहमान और मतिउर रहमान के योगदान के साथ।

इस लेख को अँग्रेजी में पढ़ें

अधिक जानें

  • पढ़ें कि डिजिटल वित्तीय सेवाओं के नियामकों को अपने उपभोक्ताओं की बात क्यों सुननी चाहिए।
  • जानें कि आप किस तरह सुनिश्चित कर सकते है कि बैंकिंग लोकपाल आपके द्वारा दर्ज शिकायतों को ख़ारिज न करे।
  • जानें कि महिलाओं के वित्तीय समावेशन का अर्थ बैंक में उनके नाम से खाता खुलवाने से आगे की बात क्यों है।

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लेखक के बारे में
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रोहन एस कटेपल्लेवर

रोहन एस कटेपल्लेवर एक विकास क्षेत्र के पेशेवर हैं, जिन्हें सरकार, कॉर्पोरेट और जनहित एजेंसी क्षेत्रों में नौ वर्षों से अधिक का अनुभव है। उनका मानना ​​​​है कि उपयुक्त तकनीक, जो नीचे से ऊपर और प्रासंगिक है, समाज में एक समान शक्ति पैदा कर सकती है। ग्राम वाणी में, वह साझेदारी से संबंधित प्रयासों का नेतृत्व करते हैं और हाशिए पर और कम आय वाले समुदायों के लिए आजीविका सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और लैंगिक न्याय के लिए अभिनव कार्यक्रमों और अनुसंधान का प्रबंधन करते हैं।

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वाणी विश्वनाथन

वाणी विश्वनाथन एक विकास संचार पेशेवर हैं, जिनके पास स्वयंसेवी संस्थाओं और कॉर्पोरेट्स के लिए कहानी कहने और अभियान प्रबंधन में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वह विशेष रूप से लिंग और कामुकता के क्षेत्रों और विकास में उनकी भूमिका और मानव अधिकारों तक पहुंच में रुचि रखती है। ग्राम वाणी में उन्होनें लंबे समय तक लेखन और सोशल मीडिया के माध्यम से भारत के केंद्रीय इलाकों और शहरी निम्न-आय वाले समुदायों के लोगों की कहानियों पर प्रकाश डालने का काम किया।

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