जून 2026 की एक सुबह, मध्य प्रदेश के भौरा गांव में चिरायु महिला क्रॉप प्रोड्यूसर कंपनी के बाहर का खुला मैदान ट्रैक्टरों और पिकअप गाड़ियों से भरा हुआ था। किसान 100 किलोमीटर से भी ज़्यादा दूर हरदा और पांढुरना से बैतूल ज़िले के इस गांव तक पहुंचे थे।
लेकिन क्यों? क्योंकि इन ज़िलों के आसपास चिरायु उन गिनी-चुनी जगहों में से एक थी, जहां यूरिया और डाय-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) का स्टॉक अब भी बचा हुआ था। ये दोनों चीज़ें आने वाले फसल सीज़न के लिए ज़रूरी थी।
अप्रैल 2026 में राज्य सरकार ने सब्सिडी वाले कृषि इनपुट के वितरण को डिजिटल बनाने के लिए ई-विकास पोर्टल शुरू किया। इसका मकसद खाद की हेराफेरी और कालाबाज़ारी पर रोक लगाना था। इस पोर्टल पर किसान की पात्रता की पुष्टि उसके ज़मीन के रिकॉर्ड और आधार कार्ड की बिनाह पर की जानी थी। इसके बाद किसान के मोबाइल नंबर पर एक ओटीपी भेजा जाता, जिसके ज़रिए ई-टोकन बनाया जाता। इस टोकन से होने वाले अंतिम लेन-देन की पुष्टि बायोमेट्रिक पॉइंट ऑफ सेल (पीओएस) सत्यापन के ज़रिए की जाती।
इस पूरी व्यवस्था की बुनियाद एक अनुमान पर टिकी थी: ज़मीन के रिकॉर्ड सही हों और जिस किसान के नाम पर ज़मीन दर्ज है, वही उस पर खेती भी करता हो।
किसानों को इस पोर्टल के बारे में पहले से बहुत कम जानकारी दी गई थी। दूसरी ओर, चिरायु ने अपनी 1000 महिला शेयरधारकों के लिए यूरिया और डीएपी का सिर्फ़ 120 टन स्टॉक रखा था। लेकिन उसे अचानक पूरे क्षेत्र के किसानों को जारी किए गए ई-टोकन के ज़रिए खाद उपलब्ध कराने का केंद्र बना दिया गया।

रायु के सीईओ कमलेश कोटेचा ने बताया, “हमारी पहली प्राथमिकता वे सदस्य और शेयरधारक हैं, जो सालों से हमसे जुड़े हुए हैं। लेकिन पंजीकरण पोर्टल पर हमें सदस्यों को खाद उपलब्ध कराने वाली एफपीसी के बजाय खुदरा विक्रेता के रूप में दर्ज किया गया। ये दोनों अलग-अलग सरकारी श्रेणियां हैं।”
जून की उस सुबह कमलेश के पास सुबह सात बजे से परेशान और नाराज़ किसानों के करीब 50 फोन आए। इन किसानों ने न तो कभी चिरायु का नाम सुना था, न ही भौरा गांव के बारे में जानते थे। आखिरकार, चिरायु के कुल स्टॉक का 45 प्रतिशत उन किसानों को बेचना पड़ा, जो खाद की कुछ बोरियों के लिए घंटों का सफ़र तय करके सैकड़ों किलोमीटर दूर से आए थे।
जून के आखिर तक, जब खरीफ की बुवाई का समय शुरू हो चुका था, बैतूल के किसान खाद और अन्य ज़रूरी सामान जुटाने के लिए भागदौड़ में ही लगे हुए थे। इससे बुवाई कई हफ्तों तक टल गई। जुलाई में भी जब यह अव्यवस्था जारी रही, तो किसानों ने भोपाल में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए। आखिरकार, सरकार को ई-टोकन व्यवस्था पूरी तरह वापस लेनी पड़ी।
लेकिन इस व्यवस्था से पैदा हुई मुश्किलें पोर्टल बंद होने के बाद भी बनी रही।
देशभर में सरकारी योजनाओं और कल्याणकारी सेवाओं का लाभ पहुंचाने के लिए डिजिटल प्रक्रियाएं लागू की जा रही हैं। ऐसे में बैतूल के किसानों का अनुभव दिखाता है कि इन व्यवस्थाओं में तकनीकी खामियां सामाजिक और आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती हैं। इसका खामियाज़ा उन्हीं लोगों को भुगतना पड़ता है, जिनकी मदद के लिए ये व्यवस्थाएं बनाई जाती हैं। 2026 में जून और जुलाई के दौरान, मैंने भौरा में महिला किसानों से मुलाकात की और देखा कि किस तरह वे खाद खरीदने के लिए बार-बार चिरायु के ऑफिस के चक्कर लगा रही थी।

डिजिटल व्यवस्था की सीमाएं और गांवों की हकीकत
इस क्षेत्र में काम करने वाले कृषि विशेषज्ञ दीनदयाल डांगी कहते हैं, “जहां ज़मीन के कागज़ात पक्के हैं और किसान पहले से सशक्त हैं, वहां ई-टोकन व्यवस्था बिना किसी परेशानी के काम करती है। लेकिन बैतूल पहुंचते ही हकीकत बिल्कुल उलट हो जाती है। यहां किसान पुश्तैनी ज़मीन पर खेती करते हैं। कई पीढ़ियों से ज़मीन का बंटवारा नहीं हुआ है। अगर ज़मीन के रिकॉर्ड में आपका नाम नहीं है, तो आप सिर्फ़ ई-टोकन ही नहीं, बल्कि कम ब्याज वाले किसान क्रेडिट कार्ड लोन और दूसरी सरकारी योजनाओं के लाभ से भी वंचित रह जाते हैं। जब ज़मीन के रिकॉर्ड की बुनियाद ही मौजूद नहीं है, तो डिजिटल सर्वर की गड़बड़ी ठीक करके क्या हासिल होगा?”
खाद खरीदने का समय आने से कुछ हफ्ते पहले ही चिरायु ने अपने सदस्यों को ई-टोकन व्यवस्था के बारे में बता दिया था। लेकिन किसानों के पास इतना समय नहीं था कि वे अपने ज़मीन के रिकॉर्ड में सुधार करवा सकें या उनकी पुष्टि कर सकें, ताकि पोर्टल का इस्तेमाल बिना किसी परेशानी के कर पाएं।
चिरायु के ऑफिस में रुपेश नाम के एक कर्मचारी किसानों को ई-विकास पोर्टल इस्तेमाल करने में मदद करते थे। किसान उन्हें कागज़ की एक पर्ची थमाते, जिस पर उनके आधार कार्ड से जुड़ा मोबाइल नंबर लिखा होता था। इसी नंबर पर वन-टाइम पासवर्ड (ओटीपी) आता था। बुज़ुर्ग किसानों के मामले में यह नंबर अक्सर परिवार के किसी ऐसे सदस्य का होता था, जो कहीं और रहता था। रुपेश ओटीपी आने का इंतज़ार करते और कई बार खुद फोन करके उसे मंगवाते। इस बीच, पोर्टल पर कभी-कभी सर्वर की गड़बड़ी भी सामने आ जाती।
सत्यापन पूरा होने के बाद, सिस्टम ज़मीन के रिकॉर्ड निकालता और किसान के पास कितनी ज़मीन है, उसके अनुपात में खाद की मात्रा तय करता। इसके बाद एक ई-टोकन जारी होता, जो एक या एक से अधिक विक्रेताओं से जुड़ा होता था और करीब 72 घंटे तक वैध रहता था। टोकन की अवधि खत्म होने तक उसे किसी दूसरे विक्रेता के यहां इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था। ऐसा तब भी होता, जब किसान के पहुंचने से पहले ही तय किए गए विक्रेता के पास खाद का स्टॉक खत्म हो जाता।
पोर्टल पर सभी विक्रेताओं के पास उपलब्ध खाद का स्टॉक रियल टाइम में दिखता था। इसलिए जैसे ही किसी विक्रेता के यहां खाद उपलब्ध होने का संकेत मिलता, उसे पाने के लिए किसानों में होड़ मच जाती। कई मामलों में, जब किसी किसान को एक ही विक्रेता से उसके हिस्से की पूरी खाद नहीं मिल पाती, तो पोर्टल बाकी खाद लेने के लिए उसे दूसरी जगह भेज देता। यानी एक और चक्कर और 3000 रुपये तक का अतिरिक्त खर्च।

गुरगुंडा गांव की निवासी और चिरायु बोर्ड की सदस्य निर्मला बताती हैं, “जब हम अपने पिता के नाम पर टोकन लेने गए (ज़मीन उन्हीं के नाम पर है) तो खाद लेने का केंद्र बैतूल के पास तय किया गया, जो हमारे गांव से करीब 50 किलोमीटर दूर है। वहां से डीएपी और यूरिया लाना हमारे लिए बहुत महंगा पड़ता, इसलिए हम खाद नहीं ले सके। बार-बार टोकन बुक करने के बाद, चौथी कोशिश में हमें 10-12 किलोमीटर दूर पहावाड़ी से यूरिया मिल पाया। बुवाई का सही समय निकल जाने के बाद हमें डीएपी डालना पड़ा। हमारे पूरे गांव में मक्का और धान, दोनों की बुवाई 10-15 दिन देर से हुई।”
इन मुश्किलों के अलावा, भारत के ग्रामीण और दूरदराज़ इलाकों में डिजिटलीकरण से जुड़ी आम समस्याएं यहां भी मौजूद थी। सालों तक खेतों में कड़ी मेहनत करने के चलते किसानों की उंगलियों की लकीरें घिस गई थी। इस वजह से कई किसान खाद बिक्री केंद्रों पर लगी पॉइंट ऑफ सेल (पीओएस) मशीनों पर बायोमेट्रिक सत्यापन पूरा नहीं कर पा रहे थे।
दूरदराज़ के इलाकों में मोबाइल नेटवर्क कमज़ोर होने के कारण ओटीपी की पुष्टि भी भरोसेमंद तरीके से नहीं हो पाती थी। कई बार संदेश पहुंचने से पहले ही 72 घंटे की समय-सीमा वाला टोकन बेकार हो जाता था। कुछ मामलों में बैंक खाते, आधार कार्ड और ज़मीन के रिकॉर्ड में नाम की वर्तनी में मामूली अंतर होने पर भी पोर्टल ने किसानों को अपने आप अयोग्य घोषित कर दिया।
ज़मीन के रिकॉर्ड की कमी, जिसका सबसे ज़्यादा खामियाज़ा महिलाओं ने भुगता
यह मान लेना कि जो व्यक्ति ज़मीन पर खेती करता है, उसी के नाम पर उसका मालिकाना हक़ भी दर्ज होगा, अपने आप में एक बड़ी समस्या है। यह मान्यता लैंगिक भेदभाव से भी जुड़ी है और खेती करने वाले कई लोगों की हकीकत से मेल नहीं खाती। इनमें आदिवासी समुदायों की महिलाएं भी शामिल हैं। कई महिलाएं बिना किसी लिखित दस्तावेज़ के, परिवार की ज़मीन पर अनौपचारिक रूप से खेती करती हैं। लेकिन जब सरकारी व्यवस्था खाद लेने के लिए काउंटर पर ज़मीन के दस्तावेज़ मांगती है, तो परिवार के अंदर आपसी भरोसे और सहमति के आधार पर चलने वाली व्यवस्था काम नहीं आती।
ऐसे में जिन महिलाओं के नाम पर ज़मीन नहीं थी, वे ई-टोकन तभी हासिल कर सकती थी, जब परिवार का कोई सदस्य (अक्सर कोई पुरुष रिश्तेदार) आवेदन के लिए अपने ज़मीन के दस्तावेज़ देता। परिवार में विवाद होने या किसी सदस्य के दस्तावेज़ देने से इनकार करने पर महिलाओं के लिए ई-टोकन हासिल करना मुमकिन नहीं था।

मालवार गांव की किसान संगीता बाई का मामला कुछ ऐसा ही था। उनके यहां परिवार की ज़मीन पति के नाम करवाने की प्रक्रिया तब रुक गई, जब उनके ससुर का देहांत हो गया। विरासत में मिली ज़मीन अपने नाम करवाना और मालिकाना हक़ के दस्तावेज़ों में बदलाव कराना बेहद मुश्किल और महंगा होता है। अक्सर यह प्रक्रिया महिलाओं के लिए और भी कठिन हो जाती है, क्योंकि उन्हें जटिल कानूनी कार्रवाई से जूझना पड़ता है या अधिकारियों को रिश्वत देनी पड़ती है। जिन मामलों में ज़मीन के दस्तावेज़ किसी मृत व्यक्ति के नाम पर दर्ज होते हैं, वहां परिवार सरकारी कामकाज के लिए ये दस्तावेज़ देने से भी कतराते हैं। ज़मीन का बंटवारा करने के बाद रिकॉर्ड में बदलाव करवाना, उसे आधार से जोड़ना, दस्तावेज़ों पर नोटरी से हस्ताक्षर करवाना, पोर्टल पर कागज़ात अपलोड करना और तहसीलदार या उप-जिला मजिस्ट्रेट (एसडीएम) से मंज़ूरी लेने की पूरी प्रक्रिया में कई हफ्ते लग सकते हैं।
संगीता बताती हैं, “मैंने देखा कि जिन गांववालों के पास अपनी ज़मीन नहीं थी, वे भी अपने हिस्से की खाद पाने के लिए ज़्यादा ज़मीन वाले किसानों के दस्तावेज़ उधार ले रहे थे। मेरी एक रिश्तेदार ने मुझे अपने दस्तावेज़ दे दिए। इससे मैं खाद हासिल कर पाई और फिर उसे अपने और एक दूसरी महिला के बीच बांट लिया, जो बिल्कुल इसी परेशानी से जूझ रही थी।”
पट्टे पर या सिखमी बटाई पर ज़मीन लेकर खेती करने वाले किसान भी सैद्धांतिक रूप से इस व्यवस्था के लिए योग्य थे। ऐसी खेती अक्सर लिखित या मौखिक समझौते पर आधारित होती है। लेकिन इन किसानों की खाद पाने की राह अब भी ज़मीन के मालिक की मर्ज़ी पर निर्भर थी।
वन गांवों के किसानों की मुश्किलें और भी विकट
बैतूल में खेती करने वाली आबादी का एक बड़ा हिस्सा वन गांवों में रहता है। ई-टोकन व्यवस्था का लाभ उठाने के लिए किसानों के पास पहले पट्टा होना ज़रूरी था। वन भूमि के लिए अलग प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था है। इसके तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक भूमि अधिकार दिए जाते हैं, लेकिन इसकी प्रक्रिया राजस्व भूमि के रिकॉर्ड वाली व्यवस्था से बिल्कुल अलग है। कई दावे अब भी लंबित हैं। कहीं वन विभाग की आपत्तियां हैं, कहीं ज़मीन की नाप-जोख को लेकर विवाद हैं, तो कहीं प्रशासनिक कामकाज का बोझ मंज़ूरी में अड़ंगा लगा देता है।
पटवारी को हर किसान का खसरा (यानी ज़मीन के रिकॉर्ड का विवरण) और रकबा (यानी ज़मीन का क्षेत्रफल) पोर्टल पर अपलोड करना था। अगर काम का बोझ, तकनीकी दिक्कतें या डिजिटल साधनों तक सीमित पहुंच इसमें बाधा बनती, तो किसान का रिकॉर्ड पोर्टल पर दिखाई ही नहीं देता। पटवारी की ओर से सिस्टम में दर्ज की गई एक छोटी-सी गलती भी किसान के लिए खाद की तय मात्रा ख़राब कर सकती थी।
वहीं, कुछ मामलों में पोर्टल ने अपने आप ज़मीन का बंटवारा कर दिया। इससे एक ही ज़मीन सभी भाई-बहनों के बीच बराबर बांट दी गई, बिना यह देखे कि वास्तव में उस पर खेती कौन कर रहा था। नतीजतन, किसानों को मिलने वाली खाद की मात्रा ऐसे ज़मीन के टुकड़ों के आधार पर तय होने लगी, जिनका धरातल पर कोई अस्तित्व ही नहीं था। किसान जगदीश ने बताया:
खाद का ठप बाज़ार, अधर में आजीविका
जुलाई के आखिर में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद, कृषि सचिव निशांत वरवड़े ने खुदरा विक्रेताओं को हाइब्रिड व्यवस्था अपनाने का निर्देश दिया। इसके तहत खाद की बिक्री ई-विकास टोकन और सीधे पीओएस मशीन पर बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, दोनों तरीकों से की जा सकती थी। इसके बाद 30 जुलाई को सरकार ने औपचारिक रूप से ई-टोकन व्यवस्था वापस ले ली। तब से हाइब्रिड व्यवस्था लागू है।
लेकिन अचानक लिए गए इस फैसले से किसानों को राहत मिलने के बजाय एक नई मुश्किल खड़ी हो गई। इसका दबाव सीधे किसान उत्पादक कंपनियों (एफपीसी) और स्थानीय विक्रेताओं पर आ गया। सबसे पहले, सरकार ने एक सख्त नोटिस जारी किया, जिसमें कहा गया कि अगर कोई उत्पादक कंपनी अपने स्टॉक से गैर-सदस्य किसानों को कृषि इनपुट खरीदने से रोकती है, तो उसका लाइसेंस तत्काल रद्द किया जा सकता है। वहीं, हाइब्रिड व्यवस्था लागू करने के दौरान स्पष्ट दिशानिर्देशों की कमी के कारण विक्रेताओं के सामने कामकाज से जुड़ी कई परेशानियां खड़ी हो गई।
पीओएस काउंटर पर सिर्फ़ आधार कार्ड दिखाकर खाद खरीदने वाले किसानों के मामले में यह जांचने की कोई व्यवस्था नहीं थी कि ज़मीन उनके अपने नाम पर दर्ज है या नहीं। इसके अलावा, सरकारी आदेश में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया था कि पीओएस मशीनों के ज़रिए हर किसान को कितनी मात्रा में और किस तरह की खाद दी जानी चाहिए।

खाद के आवंटन को लेकर स्पष्ट नियम न होने के कारण किसान जितनी मिल सकती थी, उतनी खाद लेने की कोशिश करने लगे। दूसरी ओर, दुकानदारों को पीओएस मशीन से होने वाले हर लेन-देन का ब्योरा ई-विकास पोर्टल पर अपलोड करना पड़ता था। पोर्टल का बैकएंड सॉफ्टवेयर अब भी बिक्री का मिलान ज़मीन के रिकॉर्ड से करता था। स्टॉक में गड़बड़ी पाए जाने और लाइसेंस रद्द होने के डर से दुकानदारों ने खाद बेचना ही बंद कर दिया। कई दिनों तक खाद गोदामों में बंद रही और किसान इंतज़ार करते रह गए। उज्जैन और बैतूल जैसे ज़िलों के व्हाट्सऐप व्यापारिक ग्रुपों में स्थानीय कृषि अधिकारी वरिष्ठ अधिकारियों के फोन नंबर डालकर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते थे।
इन तमाम बातों के मद्देनज़र, ई-विकास पोर्टल का सफर डिजिटल शासन की एक विडंबना उजागर करता है। राज्य सरकार ने इसे जमाखोरी, मनमाने दाम वसूलने और खाद की हेराफेरी रोकने के लिए एक आधुनिक तकनीकी उपाय के तौर पर शुरू किया था। लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसके लागू होने का नतीजा यह हुआ कि किसानों को खुले बाज़ार में खाद की कालाबाज़ारी के ऊंचे दाम चुकाने पड़े। यूरिया की एक बोरी, जिसकी सब्सिडी वाली कीमत 266 रुपये थी, किसानों को 1000-1200 रुपये में खरीदनी पड़ी। वहीं, 50 किलो डीएपी की सब्सिडी वाली कीमत 1350 रुपये थी, लेकिन किसानों ने इसके लिए 2400-2500 रुपये तक चुकाए।
इस बीच, कुछ किसानों को अचानक खेती करने का तरीका भी बदलना पड़ा। टेकरिपुरा में चिरायु के लिए बीज और खाद जुटाने वाली अनीता मक्के की बुवाई के लिए ई-विकास पोर्टल पर अपना पंजीकरण नहीं करा पाई, इसलिए उन्हें खाद नहीं मिल पाई। ज़मीन खाली छोड़ने के बजाय उन्होंने धान की खेती शुरू कर दी और सब्सिडी व्यवस्था से पूरी तरह बचने के लिए धान गहनता प्रणाली (एसआरआई) अपनाई। इस इलाके के कुछ अन्य किसानों ने भी बिना खाद के हाइब्रिड फसलों की बुवाई की। उन्होंने कम पैदावार स्वीकार करना बेहतर समझा, ताकि कम से कम अपने परिवार के खाने भर का अनाज उगा सकें।

सिर्फ टेक्नोलॉजी से शासन की खामियां दूर नहीं हो सकती
ये अनुभव दिखाते हैं कि टेक्नोलॉजिकल समाधान ज़मीनी हकीकत से कटकर काम नहीं कर सकते। इस पूरे किस्से में जिस सीमांत किसान के पास न स्मार्टफोन था, न यह जानकारी कि कौन-सा पोर्टल किस समय खुलता है, उसे अचानक सुबह चार बजे उठकर ई-टोकन हासिल करने के लिए जूझना पड़ा।
जब टेक्नोलॉजी ज़मीन पर मौजूद बुनियादी समस्याओं को दूर नहीं कर पाई, तो राज्य सरकार ने भी उन्हें सुलझाने की कोशिश नहीं की। इसके बजाय, उसने चुपचाप इस व्यवस्था को वापस ले लिया। ऐसा ही कुछ आंध्र प्रदेश में भी हुआ था, जहां 2016 में आधार से जुड़ी लगभग ऐसी ही पीओएस व्यवस्था को प्रायोगिक तौर पर लागू किया गया था। इस व्यवस्था के तीन प्रमुख आधारों में से दो—ज़मीन के रिकॉर्ड और मृदा स्वास्थ्य कार्ड—ज़मीनी स्तर पर कारगर साबित नहीं हुए। बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण में 10 से 20 प्रतिशत तक मामले खारिज हो रहे थे। बुवाई के व्यस्त मौसम में खुदरा विक्रेता इस व्यवस्था को दरकिनार करने लगे और खाद देने के लिए किसी भी उपलब्ध आधार नंबर को स्वीकार करने लगे।
एक दशक बाद मध्य प्रदेश के किसानों को भी उसी नाकामी का सामना करना पड़ा। इस बीच, राज्य सरकार ने ज़िम्मेदारी स्थानीय विक्रेताओं पर डाल दी। उन्हें लाइसेंस रद्द होने के खतरे के बीच ऐसी हाइब्रिड व्यवस्था के तहत काम करना पड़ा, जिसके नियम स्पष्ट नहीं थे। चिरायु में इस फैसले का असर अब भी दिखता है। वहां अगली बार यूरिया का नया स्टॉक उतना ही मंगाया गया, जितना महिला सदस्यों को फसल में पहली बार खाद डालने तक की ज़रूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त था।
यह घटना यह भी दिखाती है कि स्थानीय शासन संस्थाओं की ताकत को धीरे-धीरे कमज़ोर करके पोर्टलों पर निर्भरता बढ़ाई गई है। जगदीश के मुताबिक, पहले पटवारी सीधे ग्राम सभा में आता था और वहीं ज़मीन की सीमाएं तय करने और बंटवारे का काम करता था। अब पटवारी लोगों से लोक सेवा केंद्र जाने, आवेदन जमा करने, वकील करने और तहसीलदार के आवेदन की समीक्षा करने तक इंतज़ार करने को कहता है। ये प्रक्रियाएं लंबी और महंगी हैं, और इनके चलते किसान अपने अधिकारों और सरकारी योजनाओं के लाभ हासिल करने से वंचित रह जाते हैं।
अगर राजस्व विभाग ने ब्लॉक और ज़िला स्तर के अधिकारियों तथा ग्राम सभाओं के साथ मिलकर परिवारों के बीच ज़मीन के हस्तांतरण से जुड़े लंबित मामलों को निपटाया होता, या गांवों में जागरूकता अभियान चलाए होते, तो किसानों को इस हद तक बेबस नहीं होना पड़ता। जब तक सरकारी व्यवस्थाएं ज़मीन तक पहुंच और उस पर अधिकार से जुड़ी मौजूदा समस्याओं को हल नहीं करती, तब तक टेक्नोलॉजी की हर नई परत हाशिये पर रहने वाले किसानों की मुश्किलें और बढ़ाती रहेगी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इससे उनकी आजीविका पर भी लगातार दबाव बढ़ता जाएगा।
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लेखक के बारे में
- संता निबेदिता एक विज़ुअल प्रैक्टिशनर, फ़िल्म प्रोग्रामर और फ़िल्म निर्माता हैं। उनके पास खेती-किसानी से जुड़ी आजीविका और जेंडर के मुद्दों पर ज़मीनी स्तर पर काम करने का कई वर्षों का अनुभव है। उन्होंने मध्य भारत में रहते हुए महिला किसान संघों और किसान उत्पादक कंपनियों को मज़बूत बनाने के लिए समुदायों के साथ काम किया है। खेती-किसानी में स्थानीय स्तर पर हो रहे बदलावों को समझना उनकी खास दिलचस्पी का विषय है। वह नर्मदा महिला संघ से भी जुड़ी हुई हैं, जो मध्य प्रदेश की 17,000 आदिवासी और दलित महिला किसानों का संघ है।
