भारत की डिजिटल वेलफेयर व्यवस्था बुनियादी अधिकारों को कमज़ोर कर रही है

17 वर्षीय गणेश* आंध्र प्रदेश के मन्यम जिले के एक दूरस्थ गडबा आदिवासी गांव के निवासी हैं। वह दसवीं कक्षा पास करने के बाद पार्वतीपुरम जिले के एक निजी जूनियर कॉलेज में दाखिले की तैयारी कर रहे थे। गणेश ने वह सब कुछ किया, जो उनसे अपेक्षित था। वह स्कूल गए, घर से दूर ट्राइबल वेलफेयर हॉस्टल में रहे और परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। लेकिन फिर भी उनके आधार कार्ड में हुई गलतियों ने उन्हें पढ़ाई से दूर कर दिया।
उनके आधार कार्ड में केवल उनकी फोटो सही थी। उनका नाम, पिता का नाम और जन्मतिथि किसी और व्यक्ति की थी। यह त्रुटियां नामांकन के समय हुई थी और इसके बारे में परिवार को भी जानकारी नहीं थी। जब गणेश ने कॉलेज में आवेदन किया, तो अधिकारियों ने आधार को अनिवार्य बताया। लेकिन कार्ड में गंभीर त्रुटियों के कारण उन्हें दाखिला नहीं दिया गया।
गणेश की कहानी कोई अपवाद नहीं है। यह दर्शाती है कि कैसे डिजिटल कल्याण प्रणालियों में मामूली प्रशासनिक त्रुटियां किसी व्यक्ति को महत्वपूर्ण अवसरों से वंचित कर सकती हैं। यह अक्सर सुधार का पूरा बोझ उन्हीं लोगों पर डाल देती हैं, जो इसे उठाने में सबसे कम सक्षम होते हैं। जब पहचान से जुड़ी व्यवस्थाएं सहायक साधन बनने के बजाय नियंत्रण का माध्यम बन जाती हैं, तब शिक्षा, भोजन, वेतन और गरिमा जैसे बुनियादी अधिकार भी शर्तों में बंध जाते हैं।
हमारे शोध और समुदायों के साथ जागरूकता और सामाजिक कल्याण की आदिवासी क्षेत्रों तक पहुंच पर काम के दौरान हमने प्रत्यक्ष रूप से देखा है कि डिजिटल प्रमाणीकरण और डेटाबेस-आधारित प्रक्रियाएं कैसे बुनियादी अधिकारों तक पहुंच को निर्धारित कर रही हैं।
हमारा मानना है कि भारत की तकनीक-आधारित कल्याण व्यवस्था, सुलभता और गरिमा के संवैधानिक अधिकारों से अधिक प्रशासनिक नियंत्रण को प्राथमिकता देती है, और इसी वजह से यह कई लोगों को व्यवस्था से बाहर कर देती है।
कल्याण प्रशासन में तकनीक-आधारित बदलाव
पिछले एक दशक में भारत की कल्याण प्रणाली में एक शांत, लेकिन गहरा परिवर्तन हुआ है। कल्याण योजनाओं में होने वाले रिसाव, दोहराव, अक्षमता और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं का समाधान अब प्रशासनिक सुधार या जवाबदेही के बजाय तकनीक-आधारित नियंत्रण के माध्यम से खोजा जा रहा है। डिजिटलीकरण को एक तटस्थ और दक्षता बढ़ाने वाले समाधान के रूप में प्रस्तुत किया गया है, मानो यह मानवीय विवेक को हटाकर स्वचालित सत्यापन और रियल-टाइम निगरानी के माध्यम से शासन की समस्याओं को हल कर सकता है।
इससे कल्याण के क्षेत्र में एक नए तर्क का विकास हुआ है। पहचान सत्यापन, निरंतर निगरानी और डेटाबेस का एकीकरण अब केवल सहायक साधन नहीं रहे, बल्कि कल्याण वितरण के मूलभूत सिद्धांत बन गए हैं। आधार-आधारित प्रमाणीकरण, राशन के लिए ई-केवाईसी, ग्रामीण रोजगार योजनाओं में ऐप-आधारित उपस्थिति, और आधार से जुड़े भुगतान, तकनीकी सुधार के रूप में उचित हैं। लेकिन वास्तव में ये एक गहरे बदलाव को दर्शाते हैं, जहां अनुपालन, ट्रैकिंग और प्रशासनिक सुविधा, सुलभता और सुधार की क्षमता से अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।
इस लेख में जिन समस्याओं का वर्णन हुआ है, जैसे खाद्य अधिकारों से वंचित होना, मज़दूरी का नुकसान, या गलत तरीके से नाम हटाया जाना, ये कोई अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं। शोध और नागरिक समाज के दस्तावेजों से यह स्पष्ट है कि यह एक ऐसे तकनीक-केंद्रित दृष्टिकोण के अनुमानित परिणाम हैं, जिसमें तकनीक को प्रशासन का विकल्प मान लिया गया है, न कि उसका सहयोगी। जब प्रणालियां लाभार्थियों को नियंत्रित करने के लिए डिज़ाइन की जाती हैं, लेकिन उनमें सुधार के मजबूत तंत्र, वैकल्पिक व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की गुंजाइश नहीं होती, तब अपवर्जन संयोग नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक समस्या बन जाता है।

संवैधानिक दृष्टि: कल्याण, गरिमा और जीवन का अधिकार
भारत में कल्याणकारी सेवाओं का वितरण एक संवैधानिक दायित्व है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम और मनरेगा (जिसे अब विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन या वीबी-जीआरएएम-जी के रूप में प्रतिस्थापित किया गया है) जैसे अधिकार-आधारित कानून स्पष्ट रूप से अधिकारों की गारंटी देते हैं। लेकिन जिन योजनाओं को औपचारिक कानूनी दर्जा नहीं मिला है, वे भी अनुच्छेद 21 के दायरे में आती हैं, जो गरिमा के साथ जीवन के अधिकार की रक्षा करता है। पिछले दशकों में सर्वोच्च न्यायालय ने इस अधिकार की व्याख्या करते हुए इसमें भोजन, आश्रय, स्वास्थ्य और आजीविका तक की पहुंच को शामिल किया है।
हाल के नीतिगत बदलाव इन संवैधानिक अधिकारों के महत्व को और स्पष्ट करते हैं। उदाहरण के लिए, मनरेगा के स्थान पर वीबी-जीआरएएम-जी का आना इस चिंता को जन्म देता है कि कहीं काम के अधिकार की कानूनी गारंटी कमज़ोर तो नहीं हो रही है, और क्या कल्याण प्रणाली धीरे-धीरे प्रशासनिक-नियंत्रित ढांचे में बदल रही है? ऐसे में डिजिटल कल्याण प्रणालियों की भूमिका और भी अहम हो जाती है, क्योंकि अब तकनीक ही लोगों की आजीविका और अधिकारों तक पहुंच का माध्यम बनती जा रही है।
इसलिए डिजिटल कल्याण को एक स्पष्ट संवैधानिक कसौटी पर परखा जाना चाहिए: क्या यह सुलभता और गरिमा को बढ़ाता है, या उन्हें बाधित करता है?
जब किसी राशन कार्ड धारक को इसलिए भोजन नहीं मिलता क्योंकि उसकी उंगली का निशान मशीन से मेल नहीं खाता, तो यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि उसके भोजन के अधिकार का उल्लंघन है। जब किसी मज़दूर की उपस्थिति ऐप में दर्ज नहीं होती और उसे मज़दूरी नहीं मिलती, तो यह उसके आजीविका के अधिकार पर सीधा प्रहार है। तकनीक संवैधानिक जांच से बाहर नहीं है। इसलिए जब वह बुनियादी अधिकारों तक पहुंच का माध्यम बनती है, तो उसका मूल्यांकन प्रशासनिक सुविधा के आधार पर नहीं, बल्कि संवैधानिक मानकों के आधार पर होना चाहिए।
दक्षता से बहिष्कार तक: कैसे डिजिटल कल्याण व्यवस्था अपनी कमियों को नागरिकों की गलती के रूप में पेश करती है
तकनीक कल्याण वितरण का एक तटस्थ साधन नहीं है। सिस्टम और डैशबोर्ड का डिज़ाइन यह तय करता है कि उसमें कौन दिखाई देगा, कौन बाहर रह जाएगा, और तंत्र की विफलता की कीमत कौन चुकाएगा। कई विश्लेषकों ने यह बताया है कि जब तकनीक-आधारित कल्याण प्रणाली विफल होती है, तो इसका दोष अक्सर सिस्टम डिज़ाइन या अवसंरचना की कमियों को नहीं दिया जाता। इसके बजाय, इसे नागरिक की अनुपालन न करने या अधूरी पहचान की समस्या के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
1. प्रशासनिक तर्क बनाम नागरिक तर्क
अधिकांश डिजिटल कल्याण प्रणालियां प्रशासनिक प्राथमिकताओं—जैसे निगरानी, मानकीकरण और रिसाव नियंत्रण के आधार पर बनाई जाती हैं। उनकी सफलता को प्रमाणीकरण दर, अपलोड की गई प्रविष्टियों और अपडेटेड डैशबोर्ड से मापा जाता है। लेकिन नागरिकों के लिए अन्य बातें अधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्हें नियमित और सुनिश्चित पहुंच, सरल प्रक्रियाएं, त्रुटियों को सुधारने की सुविधा और सम्मानजनक व्यवहार चाहिए।
यह अंतर ही बहिष्करण की जड़ बनता है। आज की डिजिटल कल्याण प्रणाली संदेह-आधारित डिज़ाइन पर आधारित है, जहां नागरिकों को बार-बार यह साबित करना पड़ता है कि वे कौन हैं, कहां हैं और उनके दस्तावेज वैध हैं। इसका सबसे अधिक भार गरीबों पर पड़ता है।
2. जब लोग विविध हैं, तो तकनीक भी अलग-अलग क्यों न हो?
अमूमन डिजिटल प्रणालियां इस धारणा पर बनाई जाती हैं कि पूरे भारत में लोगों की तकनीक तक पहुंच एक समान है। यही कारण है कि एक ही प्रकार की प्रक्रियाएं, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, ई-केवाईसी और मोबाइल आधारित उपस्थिति—शहरी क्षेत्रों, दूरस्थ आदिवासी बस्तियों, बाढ़-प्रभावित गांवों और प्रवासी श्रमिक स्थलों—सभी जगह समान रूप से लागू की जाती हैं।
यह दृष्टिकोण भौगोलिक भिन्नता, कनेक्टिविटी, साक्षरता स्तर, विकलांगता, महिलाओं की मोबाइल तक पहुंच और प्रवासन पैटर्न को नजरअंदाज़ करता है। इसका नतीजा यह होता है कि डिजिटल सिस्टम वहीं सबसे बेहतर काम करते हैं जहां लोग पहले से ही अपेक्षाकृत सक्षम हैं, और वहीं सबसे ज्यादा विफल होते हैं जहां लोग सबसे अधिक वंचित होते हैं।
गणेश के कॉलेज में प्रवेश न मिलने के बाद उसकी दादी, जो एक दिहाड़ी मज़दूर हैं, ने कई महीनों तक आसपास के कस्बों में आधार केंद्रों, बैंकों और मंडल कार्यालयों के चक्कर लगाए। उन्हें जिला मुख्यालय में आदिवासी कल्याण विभाग (लगभग 60 किलोमीटर दूर) और यहां तक कि विशाखापट्टनम (लगभग 120 किलोमीटर दूर) भी जाना पड़ा। समस्या यह थी कि एक बार में केवल एक ही विवरण सुधारा जा सकता था, जिससे उन्हें कई बार चक्कर काटने पड़े। इस आवाजाही में उनकी मेहनत से कमाई हुई मज़दूरी और उधार लिए हुए पैसे भी बर्बाद होते थे। अंततः नाम और जन्मतिथि बदलने के लिए अधिकारियों ने गजेट अधिसूचना मांगी। चूंकि इन सुधारों को कानूनी पहचान में बदलाव माना जाता है, इसलिए इनके लिए प्रायः गजेट नोटिफिकेशन जरूरी होता है, जो इस परिवार की पहुंच से पूरी तरह बाहर था।
लेख लिखे जाने तक गणेश का आधार अब भी सही नहीं हुआ है, और उसकी पढ़ाई रुकी हुई है।
यह कहानी डिजिटल गवर्नेंस की एक और बड़ी समस्या की ओर इशारा करती है: केंद्रीकरण।

केंद्रीकृत प्रणाली कोई चमत्कारी समाधान नहीं है
अधिकांश डिजिटल कल्याण प्रणालियां बड़े मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (एमआईएस) के माध्यम से काम करती हैं, जो एक क्रमिक प्रक्रिया में चलती हैं। उदाहरण के लिए, मनरेगा में यदि उपस्थिति सही तरीके से अपलोड नहीं होती, तो मस्टर रोल बंद नहीं होते। मस्टर रोल बंद नहीं होते, तो मज़दूरी की गणना नहीं होती। और जब तक मज़दूरी फाइल नहीं बनती, भुगतान शुरू नहीं होता। यानी, किसी एक चरण में विफलता पूरी श्रृंखला को रोक देती है।
जमीनी स्तर पर इससे निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है:
1. बहिष्कार स्वचालित और तुरंत होता है; सुधार की प्रक्रिया केंद्रीकृत और पहुंच से बाहर रहती है
फील्ड में काम करने वाले अधिकारी, जो स्थानीय परिस्थितियों को समझते हैं, अक्सर स्पष्ट गलतियों को भी ठीक नहीं कर पाते। पंचायत सचिव बायोमेट्रिक विफलता को ओवरराइड नहीं कर सकते। ब्लॉक अधिकारी हटाए गए मज़दूरों को बहाल नहीं कर सकते। बैंक अधिकारी आधार-आधारित भुगतान अस्वीकृति को स्वीकार नहीं सकते।
इस डिज़ाइन के परिणाम रोजमर्रा की कल्याण सेवाओं में दिखाई देते हैं। विशाखापट्टनम के पाडेरू क्षेत्र के बंडावेढ़ी गांव में हमारे फील्डवर्क के दौरान लगभग 400 लोग पीडीएस के राशन से वंचित रह गए, क्योंकि राशन दुकान में मशीन खराब होने के कारण बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण नहीं हो पाया। स्थानीय अधिकारियों के पास सिस्टम को ओवरराइड करने का अधिकार नहीं था। राज्य स्तर के आईटी सिस्टम तक यह मामला पहुंचने में महीनों लग गए। एक मशीन पूरे समुदाय के लिए विफलता का कारण बन गई। ऐसे मामलों में आधार का विकल्प न होना स्थिति को और गंभीर बना देता है।
2. डेटा को हटाना जितना आसान, सुधार करना उतना ही मुश्किल
यदि किसी व्यक्ति को आधार संबंधी त्रुटि के कारण मनरेगा से बाहर कर दिया जाता है, तो वही त्रुटि उसे अन्य योजनाओं, जैसे पीएम-किसान, से भी वंचित कर सकती है। लेकिन आधार रिकॉर्ड या एक योजना में सुधार करने से अन्य डेटाबेस स्वतः अपडेट नहीं होते। इसका मतलब है कि व्यक्ति को अलग-अलग प्रणालियों में अलग-अलग सुधार करवाना पड़ता है।
इसे करने के लिए आधार रिकॉर्ड ठीक करना, बैंक खाता या एनपीसीआई मैपिंग (आधार को बैंक खाते से जोड़ने की प्रक्रिया) ठीक करना और फिर स्थानीय मनरेगा कार्यालय जाकर जॉब कार्ड बहाल करवाना पड़ता है। अगर आपका रिकॉर्ड हटा दिया गया है, तो आपको अन्य स्तरों पर भी शिकायत करनी पड़ सकती है।
डेटाबेस के बीच असंगति के कारण कई बार ऐसा भी हुआ है कि लोगों को कुछ सुविधाएं मिलनी बंद हो गयी है, लेकिन अन्य सुविधायें मिलती रही।
उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश के पार्वतीपुरम मन्यम जिले में एक आदिवासी मज़दूर रामाराव* को मनरेगा डेटाबेस में ‘मृत’ दर्ज कर दिया गया, क्योंकि उनका जॉब कार्ड, आधार-आधारित भुगतान नियमों के पालन न करने पर हटा दिया गया था। लेकिन वही व्यक्ति हर महीने राशन दुकान से अपना राशन ले रहा था। यानी, एक सरकारी डेटाबेस में वह मृत था, जबकि दूसरे में जीवित।
3. केंद्रीकरण संवैधानिक सुरक्षा को दरकिनार करता है
अनुसूचित क्षेत्रों में यह केंद्रीकरण पेसा अधिनियम (पंचायत विस्तार अधिनियम) की उस भावना को भी कमजोर करता है, जिसमें स्थानीय शासन और ग्राम सभा की भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया है। डिजिटल प्रणालियां आदिवासी क्षेत्रों में बिना पर्याप्त परामर्श के लागू की गई हैं, जिससे संवैधानिक संरक्षण की मूल भावना प्रभावित होती है।
ये परिणाम संयोग नहीं हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और योजनाओं में बार-बार सामने आने वाले ये अनुभव दिखाते हैं कि समस्या कोई एक तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि संरचनात्मक डिज़ाइन की कमी है। ये डिजिटल प्रणालियां न तो लचीली हैं, न ही इनमें तकनीक विफल होने पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था है, और जब इसमें स्पष्ट रूप से अपवर्जन दिखता है, तब भी स्थानीय अधिकारियों के पास समाधान करने का अधिकार नहीं होता।
इसके साथ ही, यह राज्य और नागरिकों के बीच पारदर्शिता और जवाबदेही की असमानता को भी उजागर करता है।
निगरानी, इंटर-ऑपरेबिलिटी और एकतरफा पारदर्शिता
डिजिटल कल्याण प्रणालियों ने सरकार को नागरिकों के जीवन पर उपस्थिति रिकॉर्ड, प्रमाणीकरण डेटा और संबंधित डेटाबेस के माध्यम से अभूतपूर्व निगरानी की क्षमता दी है। लेकिन जब नागरिक जानकारी या सुधार की मांग करते हैं, तो यही प्रणालियां अपारदर्शी और अलग-थलग हो जाती हैं।
इंटरऑपरेबिलिटी (डेटाबेस के बीच समन्वय) केवल एक दिशा में काम करती है। यह हटाने और अपवर्जन के लिए सुविधाजनक है, पर सुधार या शिकायत निवारण के लिए नहीं। इसका परिणाम है एकतरफा पारदर्शिता, जहां नागरिकों को लगातार खुद को साबित करना पड़ता है, और सरकार उन्हें देख सकती है। यह ढांचा नियंत्रण को प्राथमिकता देता है, न कि जवाबदेही को। यह निगरानी को बढ़ावा देता है, न कि सशक्तिकरण को।
तकनीक कल्याण वितरण का एक तटस्थ साधन नहीं है। सिस्टम और डैशबोर्ड का डिज़ाइन यह तय करता है कि उसमें कौन दिखाई देगा, कौन बाहर रह जाएगा, और तंत्र की विफलता की कीमत कौन चुकाएगा।
अब आवश्यकता है एक ऐसे डिजिटल मॉडल की जो अधिकारों के अनुकूल हो और जो यह निर्णय ले सके कि क्या केंद्रीकृत होना चाहिए और किन बातों को स्थानीय स्तर पर नियंत्रित किया जाना चाहिए। भुगतान और अधिकारों की गारंटी केंद्रीय स्तर पर हो सकती है, लेकिन प्रमाणीकरण के विकल्प, सुधार की प्रक्रिया और शिकायत निवारण स्थानीय स्तर पर विकेंद्रीकृत होने चाहिए।
हालांकि वर्तमान प्रणालियां इस तर्क को उलट देती हैं। कुछ ऐसे उदाहरण भी मौजूद हैं, जहां डिजिटल प्रणालियां नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती हैं और पारदर्शिता को जवाबदेही के टूल में बदलती हैं।
अधिकार-आधारित उदाहरण: जनमनरेगा से संभावनाएं
अधिकांश मनरेगा मज़दूरों के लिए यह जानना कि उन्होंने साल में कितने दिन काम किया, उन्हें कितनी मज़दूरी मिली, कितनी राशि लंबित है या भुगतान हुआ है या नहीं—इन सबके लिए पंचायत, ब्लॉक कार्यालय या भुगतान एजेंसियों के कई चक्कर लगाने पड़ते हैं। इस तरह की मध्यस्थों पर निर्भरता, जवाबदेही को कमजोर करती है।
जनमनरेगा ऐप, जिसे 2017 में सरकार ने लॉन्च किया था, इस कमी को दूर करता है। यह ऐप मज़दूरों को उनके मस्टर रोल, काम के दिनों, लंबित मज़दूरी, भुगतान की स्थिति और जॉब कार्ड की जानकारी रियल-टाइम में देखने की सुविधा देता है। इसमें मनरेगा के तहत सभी संपत्तियों की सूची भी उपलब्ध है, जिससे नागरिक, मज़दूर और सामाजिक ऑडिट टीमें जमीनी स्तर पर सत्यापन कर सकती हैं। “नियर मी” फीचर के माध्यम से कोई भी व्यक्ति—चाहे वह किसी अन्य राज्य में ही क्यों न हो—अपने आसपास के कार्यस्थलों की जानकारी देख सकता है। प्रवासी मज़दूरों के लिए यह ऐप विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि वे कहीं से भी अपनी मज़दूरी की स्थिति देख सकते हैं और पास के कामों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
हम भी इस ऐप के डिज़ाइन के कुछ पहलुओं पर सलाह और दस्तावेजीकरण में शामिल रहे हैं, जो मनरेगा मज़दूरों के साथ लंबे समय के फील्ड अनुभव पर आधारित था। जनमनरेगा एक अलग डिजिटल दर्शन प्रस्तुत करता है: यह स्वैच्छिक है, मज़दूरों को उनके रिकॉर्ड तक सीधी पहुंच देता है और उनके और उनकी मज़दूरी के बीच कोई बाधा नहीं बनता। महत्वपूर्ण बात यह है, कि यह मौजूदा प्रक्रिया में किसी भी नई समस्या को नहीं जोड़ता। यह केवल जानकारी को व्यापक बनाता है, जो अधिकारों को मजबूत करती हैं।
अच्छा डिजिटल कल्याण कैसा होना चाहिए
इस लेख में बताए गए संरचनात्मक अंतर और विफलताएं तकनीक के खिलाफ नहीं, बल्कि उन डिज़ाइनों के खिलाफ हैं जो सुलभता के बजाय नियंत्रण को प्राथमिकता देते हैं। डिज़ाइन से लेकर डिलीवरी तक, डिजिटल कल्याण प्रणाली को तीन मूल स्तंभों पर आधारित होना चाहिए:
1. अधिकार-सम्मत डिज़ाइन
तकनीक को संविधान के प्रावधानों, जिसमें अनुच्छेद 21 और 14 शामिल है, का सम्मान करना चाहिए। साथ ही अनुसूचित क्षेत्रों के लिए पांचवीं अनुसूची और पेसा के तहत मिलने वाले विशेष संरक्षणों का भी सम्मान होना चाहिए।
2. कम भार और संदर्भ-संवेदी प्रणाली
डिजिटल टूल नागरिकों पर बोझ बढ़ाने के बजाय उसे कम करें, और ऐसे वातावरण में भी काम करें जहां कनेक्टिविटी कम हो और सामाजिक विविधता अधिक हो।
3. सुधार की सुविधा और स्थानीय अधिकार
बहिष्करण कभी भी सुधार से आसान नहीं होना चाहिए। स्थानीय अधिकारियों को निर्णय लेने का अधिकार दिया जाना चाहिए। डिजिटल प्रणाली को ऑफलाइन प्रक्रियाओं का पूरक होना चाहिए, उनका विकल्प नहीं। विशेषकर वहां, जहां कनेक्टिविटी, साक्षरता या दस्तावेजों की कमी डिजिटल पहुंच को सीमित करती है।
भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां डिजिटल कल्याण प्रणाली या तो अधिकारों को मजबूत कर सकती है, या उन्हें कमज़ोर बना सकती है। सफलता को डैशबोर्ड, डेटा या प्रमाणीकरण की संख्या से नहीं, बल्कि एक सरल प्रश्न से मापा जाना चाहिए: क्या यह प्रणाली सबसे कमज़ोर और हाशिए पर खड़े व्यक्ति का जीवन आसान बनाती है?
यदि यह उसके जीवन को कठिन बनाती है, तो चाहे वह कितनी भी दक्ष क्यों न लगे, वह असफल है। एक डिजिटल सरकार का उद्देश्य लोगों की सेवा करना होना चाहिए, न कि संवैधानिक अधिकारों की जगह स्वचालित नियंत्रण प्रणाली स्थापित करना।
*गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदले गए हैं।
लिबटेक इंडिया के बीडीएस किशोर ने इस लेख में योगदान दिया है।
इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें।
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अधिक जानें
लेखक के बारे में
- वेंकटेश्वरलु कुरुवा बीते आठ वर्षों से लिबटेक इंडिया के साथ काम कर रहे हैं। उनका काम मनरेगा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) जैसी योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन के दस्तावेजीकरण पर आधारित है। वह मुख्य रूप से कर्नाटक के रायचूर जिले में कार्यरत हैं। वह अध्ययन कर रहे हैं कि आधार जैसे डिजिटल सिस्टम सामाजिक सुरक्षा लाभों तक पहुंच को कैसे प्रभावित करते हैं। वह गैर-लाभकारी संगठनों, ग्रामीण युवाओं और जमीनी कार्यकर्ताओं को कल्याण अधिकारों और डिजिटल गवर्नेंस पर प्रशिक्षण भी देते हैं।
- चक्रधर बुद्धा लिबटेक इंडिया के सह-संस्थापक और वरिष्ठ शोधकर्ता हैं। उनका काम डिजिटल कल्याण प्रणालियों में पारदर्शिता और जवाबदेही को सशक्त बनाना है। वह मनरेगा, सूचना का अधिकार (आरटीआई) और आदिवासी समुदायों के लिए सामाजिक सुरक्षा को सुलभ बनाने पर काम करते हैं। वह फील्ड रिसर्च, डेटा विश्लेषण और नीति संवाद के माध्यम से यह समझते हैं कि डिजिटल गवर्नेंस नागरिकों के सरकार से रोजमर्रा के संवाद और कल्याण से जुड़े अधिकारों को कैसे प्रभावित करती है। लिबटेक की स्थापना के पहले वह भूमि अधिकार संघर्ष जैसे सामाजिक न्याय के आंदोलनों से जुड़े हुए थे, और ग्रामीण तथा आदिवासी समुदायों के साथ काम करते थे।