February 19, 2024

किसान उत्पादक संगठनों की सफलता कैसे सुनिश्चित की जा सकती है?

किसानों की आय उल्लेखनीय रूप से बढ़ाने के लिए किसान उत्पादक संगठनों (एफ़पीओ) को मार्केट-रेडी उत्पाद का मॉडल विकसित करने और विकेंद्रीकृत उत्पादन पर ज़ोर देने की ज़रूरत है।
10 मिनट लंबा लेख

कंपनी (संशोधन) अधिनियम, 2002 लागू होने के बाद से, पिछले 22 वर्षों में, भारत में लगभग 7 हज़ार किसान उत्पादक संगठन (एफ़पीओ) – जिनमें जिनमें 4.3 मिलियन से अधिक छोटे उत्पादक शामिल हैं – का पंजीकरण हुआ है। इनमें से 92 फ़ीसद कृषि-आधारित हैं। अधिकांश एफ़पीओ कृषि मूल्य शृंखला (वैल्यू चेन) में मध्यस्थों की तरह काम करते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि ये ग्रेडिंग, छंटनी और इकट्ठा करने जैसी बुनियादी प्रक्रिया में शामिल होते हैं।

देश में लगभग 90 फ़ीसद एफ़पीओ मुख्य रूप से इनपुट प्रबंधन से जुड़े हुए हैं। यानी कि वे उर्वरक, बीज और कीटनाशक जैसे उत्पादों की ख़रीदकर इकनॉमीज ऑफ स्केल (कंपनियों को उनके आकार के कारण प्राप्त होने वाला लागत लाभ) प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। इनमें अधिकांश एफ़पीओ आउटपुट के प्रबंधन पर ध्यान नहीं देते हैं। यहां तक ​​कि ये प्राथमिक आउटपुट जैसी बुनियादी चीज पर भी ध्यान नहीं देते हैं, जो कि किसानों की उपज को मंडी में ले जाने के लिए एकत्र किया जाता है। अधिकांश उद्यमों के अव्यवहारिक होने के पीछे के प्रमुख कारणों में एफ़पीओ मॉडल का सीमित उपयोग भी एक है। एक अनुमान के अनुसार, 86 फ़ीसद एफ़पीओ की चुकता पूंजी (पेड-अप कैपिटल) 10 लाख रुपये से कम है और इससे निजी किसानों या एफपीओ को बढ़ी हुई आय या बाजार के दबदबे के मामले में बहुत कम फायदा मिलता है।

मूल्यवर्धन, जिसे कि ‘ऑफ-फार्म गतिविधि’ भी कहा जाता है, का अर्थ भोजन, फ़ैशन या जीवन शैली, किसी भी क्षेत्र में बाज़ार के लिए तैयार उत्पादों के निर्माण से है। मूल्य-वर्धक उत्पाद जैसे कि अनाज, जैम, टोकरियां और कपड़े आदि से उत्पादकों को अधिक लाभ मिलता है। इस प्रकार वे किसानों की आय बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण साधन हैं।

मूल्यवर्धन का सीधा अर्थ उत्पादन से है

खेती से उलट, विनिर्माण व्यक्तिगत स्तर पर की जाने वाली गतिविधि नहीं है। 1-5 एकड़ ज़मीन वाला कोई छोटा किसान अकेले ही खेती कर सकता है और अपनी उपज को बेच सकता है। लेकिन विनिर्माण व्यक्तिगत स्तर पर किया जाने वाला प्रयास नहीं है; उत्पादन और मार्केटिंग के लिए लोगों के एक समूह द्वारा किए जाने वाले ठोस प्रयास की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए, एक महिला अकेले ही टमाटर केचप का उत्पादन करके उसे फ़ास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड (एफएमसीजी) कंपनी को नहीं बेच सकती है।

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इसका मतलब यह है कि यदि ऑफ-फार्म उत्पादक कंपनियों (ओएफ़पीओ) को फलना-फूलना है तो उसके लिए हमें सिर्फ़ एक किसान के काम करने की मानसिकता से निकलकर उत्पादन-उन्मुख सोच को अपनाने की ज़रूरत होगी। भारत में अधिकांश एफ़पीओ का मूल्यवर्धन में योगदान लगभग शून्य के बराबर होता है और वे केवल कृषि उत्पादों की बिक्री से जुड़े होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि एफपीओ के मार्जिन को बढ़ाने के लिए उपज पर आवश्यक प्रसंस्करण की मात्रा काफी अधिक होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर कोई किसान दाल की खेती करता है और उसे बेचने से पहले पॉलिश मिल में ले जाकर उसकी पॉलिशिंग पर करवाता है तो इससे एफ़पीओ स्तर पर मार्जिन में किसी तरह का सुधार नहीं आता है।

अगर हम किसानों की आय में बढ़ोतरी देखना चाहते हैं तो हमें विनिर्माण की मानसिकता अपनानी होगी।

अगर हम किसानों की आय में बढ़ोतरी देखना चाहते हैं तो हमें सिद्धांत एवं व्यवहार दोनों में विनिर्माण की मानसिकता अपनानी होगी। इसके लिए आवश्यक है कि हम एक अत्याधुनिक विनिर्माण के सिद्धांतों पर चलने वाले वितरित एवं विकेंद्रीकृत उत्पादन वाले मॉडल का पालन करें।

वैश्विक स्तर पर, श्रमिकों की कमी के कारण अब सभी उत्पादन इकाइयां स्वचालित हो गई हैं। हालांकि, भारत के मामले में यह एक सही समाधान नहीं हो सकता है क्योंकि हम एक रोज़गार निर्माण करने की ज़रूरत वाला देश हैं। इसके अलावा, हमारे पास विभिन्न प्रकार के बाजार हैं – क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और वैश्विक- जिसके लिए प्रक्रियाओं का मानकीकरण, उच्च-गुणवत्ता वाले उत्पादों और अच्छी क़ीमत की ज़रूरत होती है। 100 फ़ीसद ऑटोमेशन के बिना इस लक्ष्य को कैसे पाया जा सकता है?

विनिर्माण का एक विकेंद्रीकृत, वितरित मॉडल

विनिर्माण का एक दृष्टिकोण हब-एंड-स्पोक मॉडल है। स्पोक के लिए हम अनौपचारिक गतिविधि कर सकते हैं लेकिन हब में औपचारिकता का एक उचित स्तर बना रहा है। समुदाय, स्पोक पर यानी कि हब के 5 -10 किलोमीटर के दायरे में रहते हैं।

किसी गांव की 30 महिलाओं के समूह का उदाहरण लेते हैं जो घर से काम करती हैं और केले के रेशे से बर्तन बनाती हैं। उनके पास एक कमरा है जहां वे अपने सामान को इकट्ठा करती हैं, जोड़ती हैं और उनका भंडारण करती हैं। हर, एफ़पीओ का एक प्रतिनिधि सप्ताह भर की टोकरियां लाने गांव में जाता है और उन्हें सार्वजनिक सेवा केंद्र में लेकर आता है जहां उनकी जांच की जाती है। उसके बाद महिलाएं प्रक्रिया के अनुसार अपने हाथों से छोटा-मोटा काम करती हैं। उदाहरण के लिए, केले से बनी प्रत्येक टोकरी को सौर हीटर में 60 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में रखा जाता है। मैन्यूफ़ैक्चरिंग इकाइयों की तरह ही, इस स्तर पर (केंद्र में), आवश्यक ढांचे को स्थापित किया जा सकता है, प्रक्रियाओं को स्थापित और मानकीकृत किया जा सकता है, और उत्पाद की गुणवत्ता की जांच की जा सकती है।

स्पोक फैक्ट्री अधिनियम के दायरे से बाहर मौजूद हो सकते हैं, जो कार्यस्थलों पर व्यक्तियों के लिए सुरक्षा और दक्षता मानक निर्धारित करता है, क्योंकि वे छोटे होते हैं और वितरित होते हैं और देश में विशाल अनौपचारिक कार्यबल का लाभ उठाते हैं। हालांकि, हब को औपचारिक होना चाहिए और इसमें वे सभी नीतियां शामिल होनी चाहिए जो इसे एक औपचारिक व्यवस्था का रूप देती हैं। उदाहरण के लिए, खाद्य उत्पादों के मामले में, इसमें एफएसएसएआई अनुपालन शामिल होगा। यह मॉडल समुदायों को अनौपचारिक से औपचारिक श्रम प्रणाली की ओर बढ़ने में भी मदद करता है।

जग से मक्के के डिब्बों में पानी डालना_किसान उत्पादक संगठन
खेती के विपरीत विनिर्माण एक व्यक्तिगत स्तर पर की जाने वाली गतिविधि नहीं है। | चित्र साभार: आईएफपीआरआई / सीसी बीवाय

6सी रूपरेखा

इंडस्ट्री ने पिछले कुछ वर्षों में सफल ओएफ़पीओ का निर्माण किया है और हमारे अनुभव और अंतर्दृष्टि को 6सी फ्रेमवर्क में कैद किया जा सकता है। इस रूपरेखा को ओएफपीओ स्थापित करने के इच्छुक अन्य संगठनों द्वारा अपनाया जा सकता है।

1. निर्माण

बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं के निर्माण के लिए एकत्रीकरण बहुत महत्वपूर्ण है। एक बार उस लक्ष्य को हासिल कर लेने के बाद आपको सेवाओं और बुनियादी ढांचों तक पहुंचने की ज़रूरत होती है। सेवा वाले हिस्से में एफ़पीओ में काम करने के लिए लोगों की नियुक्ति और परिसर और इमारत जैसी चीजें आती हैं। मूल्यवर्धन के लिए ऐसी जगहों का होना अनिवार्य है।

जहां, एक सामान्य एफपीओ में, शेयरधारक अकेले किसान होते हैं, वहीं हमने उत्पादक संस्थानों को शेयरधारकों के रूप में शामिल करने का विकल्प चुना है। उत्पादक संस्थानों में स्वयं सहायता समूह (एसएचजी), फेडरेशन, या पारस्परिक लाभ ट्रस्ट (एमबीटी) शामिल हैं। हमने एमबीटी वाले विकल्प का चयन किया। वर्तमान में हमारे पास 35 एमबीटी हैं, और उनमें से प्रत्येक के सदस्यों की संख्या लगभग 2 सौ से 4 सौ के बीच है। हमारा अनुभव कहता है कि मूल्य वर्धन के लिए यह मॉडल अधिक कारगर है। एमबीटी में, सभी प्रक्रियाओं का हस्ताक्षरकर्ता उत्पादक को ही बनाया जाता है, इसलिए स्वामित्व का भाव उच्च होता है। इससे उत्पादकों को अपनी पहचान स्थापित करने में मदद मिलती है और भविष्य के लिए निश्चित स्थिरता मिलती है।

2. प्रणाली

मूल्यवर्धित उत्पादों पर काम करने वाले ओएफपीओ द्वारा उठाये जाने वाले कदमों में सबसे महत्वपूर्ण है कि वे संभावित बाजारों और ग्राहकों की पहचान के बारे में सोचें। इसके समानांतर, उन्हें क्षेत्र में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों (मक्का, बांस, मोटे अनाज, घास आदि) का मूल्यांकन करने के साथ ही उन उत्पादों को बाज़ार तक पहुंचाने के लिए प्रणालियों का निर्माण करना चाहिए।

हालांकि, हमेशा ही अंतिम उत्पाद का उत्पादन करना आवश्यक नहीं होता है। ओएफपीओ, बड़ी कंपनियों के लिए आपूर्तिकर्ता के रूप में भी काम कर सकते हैं। उदाहरण के लिए वृत्ति, छत्तीसगढ़ में एक एफ़पीओ के साथ काम करता है जो शरीफे के गूदे के उत्पादन के काम से जुड़ा हुआ है। इसके बाद इस गूदे को आइसक्रीम कंपनियों को बीच दिया जाता है। हालांकि, भारतीय एफ़पीओ, किसी बड़े ब्रांड के उप-आपूर्तिकर्ता बनने के इस सेमी-प्रोसेसिंग वाले रास्ते के बारे में विस्तार से जानते भी नहीं हैं और ना ही इससे संबंधित किसी तरह की खोजबीन ही की है।

3. क्षमता

मूल्य शृंखला में लोगों को प्रशिक्षित करना महत्वपूर्ण होता है। ऐसे उद्यमों को संचालित करने के लिए किसानों को आवश्यक पेशेवर कौशल की ज़रूरत होती है। हब-एंड-स्पोक मॉडल में, नियमित रूप से चलने वाला प्रशिक्षण होना चाहिए, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो दूर वाले (स्पोक) के स्तर पर होते हैं। वे अलग-थलग रह कर काम नहीं कर सकते हैं और उन्हें नियमित रूप से अपने काम पर कौशल और प्रतिक्रिया की ज़रूरत होती है ताकि वे अपेक्षित मानकों को पूरा कर सकें।

केंद्र (हब) के स्तर पर, इस मॉडल को विनिर्माण की दुनिया में काम करने वाले पेशेवरों की ज़रूरत होती है – ऐसे लोग जो न्यूनतम वेतन, मानव संसाधन प्रबंधन, गुणवत्ता, प्रक्रियाएं और प्रणालियों के अलावा सभी प्रासंगिक कानून और अनुपालन जैसे मामलों की समझ रखते हैं।

एफ़पीओ उद्यम हैं और उनका प्रत्येक सदस्य एक माइक्रो-आंत्रप्रेन्योर होता है।

वर्तमान में, यह सब एफ़पीओ की दुनिया से ग़ायब है, और यहीं पर आकर कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय द्वारा एक ठोस प्रयास आवश्यक हो जाता है। मंत्रालय को अपने कार्यक्रमों में उद्यमशीलता, विनिर्माण और प्रबंधन के इन पहलुओं पर विस्तार से काम करने की ज़रूरत है। ऐसा इसलिए है क्योंकि, एफ़पीओ उद्यम हैं और प्रत्येक सदस्य सूक्ष्म-उद्यमी (माइक्रो-आंत्रप्रेन्योर) होता है।

सरकार को उद्यमशीलता के संबंध में सिद्धांत और अभ्यास, दोनों विकसित करना चाहिए। उन्हें एफपीओ उद्योग के लिए पारा-प्रोफेशनल को प्रशिक्षित करने के बारे में सोचना चाहिए जो मानव संसाधन, वित्त, गुणवत्ता, विनिर्माण, अनुपालन आदि जैसे विषयों को सम्भाल सकें। इन कार्यक्रमों का संचालन सामूहिक रूप से किया जाना ताकि पर्याप्त संख्या में पेशेवर उपलब्ध रहें।

4. क्रिएट (निर्माण)

एक दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है उत्पाद के डिज़ाइन और विकास के बारे में सूचना। बाज़ार की समझ विकसित होने और ग्राहक की मांग को समझ लेने के बाद आप क्या बनायेंगे? यह चरण किसानों की उपज के साथ उपभोक्ताओं की आकांक्षाओं को जोड़ता है। आमतौर पर, अंतिम उपभोक्ता के साथ किसानों का किसी तरह का सीधा संबंध नहीं होता है। इसलिए उत्पादों को डिज़ाइन करने वालों को इस अंतर को कम करने वाले कदम उठाने चाहिए। वे कुछ प्रश्नों को पूछ कर इस काम को कर सकते हैं: उत्पाद का डिज़ाइन कैसे किया जाना चाहिए? विधि क्या है? उदाहरण के लिए, अगर किसी क्षेत्र विशेष के स्थानीय किसान मोटे अनाज की खेती करते हैं तो उस स्थिति में उस कृषि उपज के प्रयोग से बनने वाले बाजरा बार या बाजरा अनाज जैसे उत्पाद विकसित किए जा सकते हैं जिनके वितरण में भी आसानी होगी।

क्रिएट उन उत्पादों के विकास में मदद करता है जो बाज़ार की प्राथमिकता के अनुरूप हों और जिन्हें बनाना आसान हो। इस चरण में अनुसंधान एवं विकास, डिज़ाइन और उत्पाद विकास शामिल होता है। उदाहरण के लिए, हमने बुनाई में उपयोग किए जाने वाले केले की छाल का रेशम और फाइबर बनाने के लिए केले की छाल मूल्य श्रृंखला के भीतर नई प्रक्रियाएं विकसित करने के लिए अनुसंधान प्रयोगशालाओं के साथ काम किया।

5. पूंजी

ओएफपीओ को एक विनिर्माण उद्यम की तरह चलाने के लिए उच्च स्तर के अग्रिम निवेश के साथ-साथ सस्ती कार्यशील पूंजी की भी ज़रूरत होती है। ये महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ओएफपीओ को अपने ग्राहकों के लिए 60 से 90 दिन की क्रेडिट अवधि बढ़ानी होगी। ऐसा करने और नकदी प्रवाह का प्रबंधन करने में सक्षम होने के लिए, उन्हें कार्यशील पूंजी के फ़ंडिंग की ज़रूरत होती है।

16 फ़ीसद ब्याज दर पर ऋण देने वाली ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) से कार्यकारी पूंजी लेना एक महंगा सौदा होता है। इसके कारण एफ़पीओ को वित्तीय रूप से सुदृढ़ होने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। कृषि विपणन अवसंरचना, उद्यम पूंजी सहायता और बागवानी के एकीकृत विकास मिशन जैसी सरकारी योजनाएं एफपीओ की स्थापना के लिए आवश्यक पूंजी का केवल 40-60 फ़ीसद हिस्सा ही देती हैं। शेष राशि दानदाताओं और सीएसआर से मिलने वाले अनुदानों से जुटानी पड़ती है।

अनिवार्य रूप से हमें, मिश्रित वित्त – सरकार, बाजार और परोपकारी पूंजी का मिश्रण – पर ध्यान देने की जरूरत होती है क्योंकि पहले तीन वर्षों के दौरान, अकेले सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाले पैसे से गुजारा करना मुश्किल होता है।

इस अवधि के बाद, कंपनी को आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में बढ़ना चाहिए, ताकि एफ़पीओ को अपने बूते चलाये रखने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हो।

पूंजी की व्यवस्था करने की प्रक्रिया में अच्छी तरह से डिज़ाइन किए गए और संरचित बोर्ड भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आमतौर पर एफ़पीओ अपनी शुरुआत उप-आपूर्तिकर्ताओं के रूप में करते हैं। इसलिए, समुदाय के कुछ लोगों के अलावा, उनके बोर्ड में कम से कम उनके दो ग्राहक होने चाहिए। सरकार, निजी क्षेत्र और समुदाय के सदस्यों का मिश्रण ओएफपीओ को विकास और लाभप्रदता बढ़ाने में मदद कर सकता है।

6. कनेक्ट/संपर्क

6सी ढांचे के अंतिम तत्व में उत्पादकों को एक बड़े पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ने और ट्रेसबिलिटी और पारदर्शिता के साथ अवसरों को बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करना शामिल है, जो विनिर्माण के मामले में महत्वपूर्ण हैं। ओएफपीओ के लिए ट्रैसेबिलिटी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ग्राहकों के बीच एक प्रमुख विक्रय बिंदु है।

इंडस्ट्री एक सहयोगी डिजिटल सोशल प्लेटफॉर्म का निर्माण कर रही है जिसे प्लेटफॉर्म फॉर इनक्लूसिव एंटरप्रेन्योरशिप (पीआईई) कहा जाता है। इसका उद्देश्य नॉलेज असेट्स (सामग्री, प्रक्रियाएं, उपकरण, समाधान) और डेटा एनालिटिक्स को नवाचार और प्रतिक्रिया देने के लिए एक सामूहिक स्थान प्रदान करना है), जिससे प्रत्येक हितधारक को सक्षम बनाया जा सके ताकि वे एकीकृत रूप से अपनी शक्ति का उपयोग कर सकें।

इंडस्ट्री में, ग्रीनक्राफ़्ट 6सी का एक ऐसा उदाहरण है जिसे व्यवहार में लाया जा रहा है। 10 हज़ार सदस्यों वाले एक एफ़पीओ, जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं, कंपनी रीसायकल हुए केले के छाल, साल के पत्तों से बनने वाले प्लेट और बांस के उत्पादों से टोकरियां बनाती है। ये सभी उत्पाद हाथ से बनाए जाते हैं। 2012 में अपनी स्थापना के बाद से, कंपनी ने बिक्री के क्षेत्र में 50 लाख अमेरिकी डॉलर की कमाई की है और इसके ग्राहकों में एच&एम, टीजे मैक्स और आइकिया जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

भारत में ओएफ़पीओ का परिदृश्य, संभावनाओं और चुनौतियों दोनों को दिखाता है। बड़े पैमाने पर ओएफ़पीओ को प्रभावी ढंग से बनाने के लिए, हमें एक विनिर्माण मानसिकता अपनाने की जरूरत है जो विभिन्न संदर्भों में एक समग्र ढांचे को शामिल करती है।

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लेखक के बारे में
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नीलम छिबर

नीलम छिबर इंडस्ट्री फाउंडेशन की सह-संस्थापक और मैनेजिंग ट्रस्टी हैं। उनका काम एक होलिस्टिक इकोसिस्टम पर केंद्रित है जो ग्रामीण समुदायों को तेजी से बदलती राष्ट्रीय और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को आगे बढ़ने में सक्षम बनाता है। नीलम को नीति आयोग द्वारा वीमेन ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया पुरस्कार भी मिला है। इसके अलावा उन्हें 2020 में इकोनॉमिक टाइम्स सोशल एंटरप्रेन्योर ऑफ द ईयर अवॉर्ड और 2011 में श्वाब सोशल एंटरप्रेन्योर ऑफ द ईयर अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया है।

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