5 अगस्त 2019 को शक्ति शालिनी की काउंसलर कृतिका* नई दिल्ली के जंगपुरा स्थित हमारे कार्यालय के पास एक एटीएम से पैसे निकाल रही थी। तभी आठ लोगों के एक समूह ने उन पर हमला कर दिया और उनका अपहरण करने की कोशिश की। इस हमले का ज़िम्मेदार एक महिला का पूर्व साथी था, जो यौन और लैंगिक हिंसा के मामले में शक्ति शालिनी के आश्रय गृह में रह रही थी। कृतिका इस मामले को संभाल रही थी और उस महिला की सुरक्षा तथा पहचान को गोपनीय बनाए रखने की ज़िम्मेदारी भी उनके ऊपर थी। यह हमला एक सार्वजनिक स्थल पर हुआ, जहां आसपास कई लोग मौजूद थे। लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की। कृतिका किसी तरह वहां से बच निकलने में कामयाब हुई। लेकिन यह घटना कोई अपवाद नहीं है।
फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और गंभीर परिस्थितियों में काम करने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर बहुत कम आंकड़े उपलब्ध हैं। हालांकि, स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े प्रमाण बताते हैं कि ऐसे कर्मचारियों के खिलाफ हिंसा एक आम समस्या है। केवल कोविड-19 महामारी के दौरान ही स्वास्थ्यकर्मियों पर 133 हमले दर्ज किए गए, जबकि उनकी सुरक्षा के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद थे। इसके बावजूद, फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ता आज भी संकट की घड़ी में राहत पहुंचाने, सामाजिक न्याय, विकास और समुदायों को सशक्त बनाने जैसे अहम काम करते हैं। लेकिन फिर भी उन्हें न तो पहचान मिलती है और न ही पर्याप्त सुरक्षा। कानून, नीतियों, फंडिंग और संस्थागत प्राथमिकताओं में उनकी सुरक्षा, अधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य को अब भी बहुत कम महत्व दिया जाता है।
इस कमी को दूर करने के लिए शक्ति शालिनी ने ‘द सॉलिडैरिटी नेटवर्क’ की शुरुआत की। यह देशभर के 130 से अधिक फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार रक्षकों का एक साझा नेटवर्क है, जिसमें गैर-लाभकारी संस्थाओं, नागरिक समाज संस्थाओं, संगठनों से जुड़े लोग और स्वतंत्र सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। व्हाट्सऐप और गूगल ग्रुप्स के माध्यम से चलने वाला यह नेटवर्क एक ऐसा सुरक्षित मंच है, जहां सदस्य ज़रूरत पड़ने पर मदद मांग सकते हैं, अपने अनुभव साझा कर सकते हैं और सुरक्षा से जुड़े सवालों पर मिलकर समाधान खोज सकते हैं।
नेटवर्क से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुभवों और कृतिका से जुड़े मामले ने हमें वर्ष 2026 में एक अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। इस अध्ययन का उद्देश्य फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ताओं की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक सुरक्षा की स्थिति को समझना और उसमें सुधार के लिए ठोस सुझाव देना था।


आंकड़ों के पीछे के चेहरे
यह अध्ययन दो चरणों में किया गया था। पहले चरण में ‘द सॉलिडैरिटी नेटवर्क’ के 32 सदस्यों के साथ विस्तृत बातचीत की गई। यह नेटवर्क देशभर में फैला हुआ है। दिल्ली से बाहर रहने वाले सदस्यों को भी इसमें शामिल करने के लिए लिए यह चर्चा ज़ूम के माध्यम से ऑनलाइन आयोजित की गई।
इन चर्चाओं का उद्देश्य केवल यह समझना नहीं था कि फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ता किन असुरक्षाओं का सामना करते हैं। सदस्यों से हुई बातचीत के आधार पर अध्ययन के दूसरे चरण के लिए सर्वेक्षण प्रश्नावली भी तैयार की गई। यानी, सर्वेक्षण के सवाल सीधे उन लोगों के अनुभवों से निकले, जो रोज़ाना ज़मीनी स्तर पर काम करते हैं। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि अध्ययन उनकी वास्तविक चुनौतियों और काम की परिस्थितियों को सही ढंग से सामने ला सके।
दूसरे चरण में 63 फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक गुमनाम सर्वेक्षण किया गया। इनमें से 84 प्रतिशत प्रतिभागी गैर-लाभकारी संस्थाओं, नागरिक समाज संगठनों या सामुदायिक संगठनों से जुड़े थे, जबकि 16 प्रतिशत स्वतंत्र सामाजिक कार्यकर्ता थे। सर्वेक्षण में शामिल लगभग दो-तिहाई प्रतिभागी महिलाएं थी और करीब एक-तिहाई पुरुष। वहीं, 5 प्रतिशत से कम प्रतिभागियों ने अपनी पहचान नॉन-बाइनरी, ट्रांसजेंडर या जेंडरक्वीयर के रूप में बताई। सर्वेक्षण में शामिल आधे से अधिक प्रतिभागी वंचित जातीय या सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से थे। वे शहरी, ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में काम कर रहे थे, जबकि एक-तिहाई से अधिक प्रतिभागी ऐसे थे जो शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों में काम करते थे।
अध्ययन से क्या सामने आया?
1. आर्थिक सुरक्षा
अध्ययन में शामिल अधिकांश फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आर्थिक असुरक्षा को अपनी सबसे बड़ी चिंताओं में से एक बताया। उनके अनुसार, इसकी कई वजहें हैं: समान काम के लिए असमान वेतन, वेतन मिलने में देरी, काम के बोझ के मुकाबले कम भुगतान, अतिरिक्त घंटों के काम का कोई पारिश्रमिक न मिलना और नौकरी का लगातार अधर में बने रहना।
कई प्रतिभागियों ने बताया कि उनकी नौकरी पूरी तरह प्रोजेक्ट की फंडिंग पर निर्भर करती है। जैसे ही किसी प्रोजेक्ट की फंडिंग समाप्त होती है, कई बार उन्हें नया प्रोजेक्ट मिलने तक महीनों घर बैठना पड़ता है। स्वास्थ्य या दुर्घटना बीमा जैसी सुविधाओं का अभाव, अस्थायी नियुक्तियां और भविष्य के लिए बचत न कर पाने की स्थिति इस आर्थिक असुरक्षा को और बढ़ा देती है। इसका असर केवल उनकी आर्थिक स्थिति पर नहीं, बल्कि उनके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।
हालांकि वेतन संहिता, 2019 समान काम के लिए समान वेतन का प्रावधान करती है, लेकिन अध्ययन से पता चला कि अधिकांश फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए आर्थिक सुरक्षा अब भी दूर की कौड़ी है।
सर्वेक्षण में शामिल केवल 36.5 प्रतिशत लोगों को ही ऐसी कर्मचारी सुविधाएं मिल रही थी, जो उन्हें लंबे समय की आर्थिक सुरक्षा दे सकें। वहीं, हर चार में से केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता के पास ही औपचारिक नियुक्ति या ऐसी नौकरी थी, जिसे अपेक्षाकृत सुरक्षित कहा जा सके।
फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ताओं की शारीरिक सुरक्षा का मतलब केवल उन्हें हिंसा या हमलों से बचाना नहीं है। इसमें यह सुनिश्चित करना भी शामिल है कि उनके पास सुरक्षित कार्यस्थल, ज़रूरी सुविधाएं और ऐसी परिस्थितियां हों, जिनमें वे अपना काम बिना डर के कर सकें। अध्ययन में शामिल कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि उन्हें अक्सर आरोपियों, गांव के दबंग लोगों और स्थानीय नेताओं से धमकियां मिलती हैं। एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा:
2. शारीरिक सुरक्षा
“मैं ग्रामीण इलाकों में काम करती हूं। बलात्कार और पंचायत से जुड़े मामलों में हमें अक्सर दबाव और धमकियों का सामना करना पड़ता है। एक सामूहिक बलात्कार पीड़िता के परिवार की मदद करते समय मुझ पर लगातार मामला रफ़ा-दफ़ा करने का दबाव बनाया गया। मुझे बार-बार धमकी भरे फोन आए और मेरा पता पूछा गया। कई बार जब हम कमज़ोर और वंचित लोगों का साथ देते हैं, तो गांव के ही कुछ दबंग हमें घेर लेते हैं और लूटने या जान से मारने की धमकी देते हैं। ऐसे वक़्त में हमारा मनोबल बुरी तरह टूट जाता है।”
अध्ययन से यह भी सामने आया कि शारीरिक सुरक्षा का अनुभव जेंडर के आधार पर काफी अलग है। सर्वेक्षण में शामिल करीब 95 प्रतिशत पुरुष सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि फील्ड वर्क के दौरान वे खुद को शारीरिक रूप से सुरक्षित महसूस करते हैं। वहीं, महिला प्रतिभागियों में केवल 61.9 प्रतिशत ने ही कहा कि वे इस दौरान खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं। सर्वेक्षण में एक-एक प्रतिभागी ने अपनी पहचान ट्रांसजेंडर, नॉन-बाइनरी और जेंडरक्वियर के रूप में बताई। इनमें ट्रांसजेंडर प्रतिभागी ने खुद को सुरक्षित बताया, नॉन-बाइनरी प्रतिभागी का जवाब तटस्थ था, जबकि जेंडरक्वियर प्रतिभागी ने कहा कि वे खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करते। गौरतलब है कि प्रतिभागियों की संख्या बहुत कम होने के कारण इन निष्कर्षों को व्यापक रूप से लागू नहीं किया जा सकता है।
प्रतिभागियों ने यह भी बताया कि उन्हें अक्सर पर्याप्त सुरक्षा उपकरण नहीं मिलते, असुरक्षित परिस्थितियों में काम करना पड़ता है और स्वास्थ्य व स्वच्छता से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव रहता है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि उन्हें पीड़ितों और आरोपियों, दोनों के परिवारों की ओर से गाली-गलौज, उत्पीड़न और शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ा है। कुछ को गांव में दोबारा न आने की धमकियां भी मिली हैं। कुछ प्रतिभागियों ने बताया कि उन्हें रेलवे लाइनों के आसपास या औद्योगिक बस्तियों जैसे असुरक्षित इलाकों में अकेले काम पर भेजा गया। वहीं, कई महिलाओं ने देर रात या तड़के ड्यूटी पर आने-जाने के दौरान उत्पीड़न का सामना करने की बात सामने रखी। अध्ययन में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि असुरक्षित जगहों पर अकेले काम करना (खासकर महिलाओं और जेंडर-विविधता वाले फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए), एक नियमित रूप से गंभीर चुनौती है।
3. मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा
मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा का अर्थ है कि कर्मचारी अपने कार्यस्थल पर खुद को भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस करें और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें उचित सहयोग मिल सके। अध्ययन में शामिल कई फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि हिंसा, उत्पीड़न, संकट और आघात (ट्रॉमा) से जुड़े मामलों के साथ लगातार काम करना उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालता है। लेकिन इन अनुभवों से उबरने के लिए उन्हें अपनी संस्थाओं से पर्याप्त सहयोग नहीं मिल पाता। एक हेल्पलाइन पर काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया, “मैं हेल्पलाइन पर संकट में फंसे लोगों की कॉल उठाती हूं। हमारा काम ही ऐसा है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां बहुत आम हैं। रोज़ाना हिंसा और उत्पीड़न की कहानियां सुनना हमें भीतर तक झकझोर देता है और भावनात्मक रूप से थका देता है। लेकिन हर कॉल पर शांत और धैर्यपूर्ण बने रहना भी ज़रूरी होता है। ऐसे में लगातार आने वाली कॉल के बीच आराम का बहुत कम समय बच पाता है।”
सर्वेक्षण में शामिल हर पांच में से एक से अधिक (22.2 प्रतिशत) प्रतिभागियों ने बताया कि वे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। कई प्रतिभागियों ने कहा कि वे अमूमन वर्तमान और भविष्य, दोनों को लेकर चिंता में रहते हैं। अपनी सुरक्षा, परिवार की भलाई और किसी संकट की स्थिति में क्या होगा – इन सवालों की चिंता तब और बढ़ जाती है, जब उन्हें लगता है कि ऐसी परिस्थिति में उनकी संस्था, फंडर या लीडरशिप की ओर से उन्हें पर्याप्त सहयोग नहीं मिलेगा।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि 65 से 70 प्रतिशत प्रतिभागियों को ऐसे कार्यस्थल मिले, जहां भेदभाव अपेक्षाकृत कम था, ज़रूरत पड़ने पर छुट्टी लेने की सुविधा थी और लीडरशिप तक अपनी बात पहुंचाने का कोई माध्यम मौजूद था। लेकिन आधे से भी कम प्रतिभागियों के पास गोपनीय और बिना किसी पूर्वाग्रह के मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध थी। इसी तरह, नियमित रूप से उनके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के बारे में बातचीत या वेल-बींग चेक-इन की व्यवस्था भी बहुत कम संस्थाओं में थी। नतीजतन, अध्ययन में शामिल बहुत से सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि शारीरिक-भावनात्मक थकान (बर्नआउट) और गहरे मानसिक तनाव का अनुभव उनके जीवन का सामान्य हिस्सा बन चुका है।
बदलाव की शुरुआत कहां से हो?
हमारे अध्ययन में शामिल फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सिर्फ़ अपनी चुनौतियां ही नहीं बताई, बल्कि यह भी साझा किया कि उनकी सुरक्षा और काम की परिस्थितियों को बेहतर बनाने के लिए क्या बदलाव ज़रूरी हैं। उनके सुझाव संस्थाओं की प्राथमिकताओं, कार्य-संस्कृति, नीतियों, काम करने के तरीकों और सहयोग व्यवस्था – सभी से जुड़े हुए हैं।
1. सुरक्षा को संस्था की योजना और बजट का हिस्सा बनाया जाए
फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ताओं की सुरक्षा कोई अतिरिक्त व्यवस्था नहीं, बल्कि हर परियोजना की शुरुआत से ही उसका हिस्सा होनी चाहिए। इसमें सुरक्षा संबंधी प्रशिक्षण, सुरक्षित यात्रा की व्यवस्था और ज़रूरी संसाधनों के लिए बजट पहले से तय किया जाना चाहिए।
इसके लिए गैर-लाभकारी संस्थाओं के नेतृत्व को ऐसे फंडरों के साथ काम करना होगा, जो सामाजिक कार्यकर्ताओं के उचित वेतन, सामाजिक सुरक्षा और दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए भी संसाधन उपलब्ध कराएं। वहीं, फंडरों को भी परियोजनाओं का मूल्यांकन करते समय यह देखना चाहिए कि संस्थाओं ने कर्मचारियों की सुरक्षा और कल्याण के लिए अलग से क्या प्रावधान किए हैं।
फील्ड में काम के दौरान सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देश और आपातकालीन स्थिति में अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएं भी फ्रंटलाइन कर्मचारियों की भागीदारी से तैयार की जानी चाहिए और समय-समय पर उनकी समीक्षा होनी चाहिए। इनमें चिकित्सा, कानूनी और अन्य आवश्यक मदद के लिए 24×7 संपर्क व्यवस्था, ज़िम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा और तय समयसीमा के भीतर कार्रवाई की प्रक्रिया शामिल होनी चाहिए।
उदाहरण के लिए, शक्ति शालिनी की 24 घंटे चलने वाली सर्वाइवर हेल्पलाइन पर कर्मचारियों को दिन-रात की शिफ्टों में काम करना होता है। इसलिए संस्था ने उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए देर रात की ड्यूटी के दौरान सुरक्षित यातायात व्यवस्था को प्रोजेक्ट के शुरुआती बजट और योजना में ही शामिल किया।
2. फील्ड और कार्यस्थल, दोनों की सुरक्षा मज़बूत की जाए
जहां जोखिम अधिक हो, वहां कर्मचारियों को अकेले भेजने के बजाय टीम या ‘बडी-सिस्टम’ के तहत काम कराया जाना चाहिए। खासकर देर रात या तड़के की ड्यूटी के लिए सुरक्षित यातायात की व्यवस्था ज़रूरी है। कर्मचारियों को उनके काम के अनुरूप सुरक्षा उपकरण, जैसे मास्क, दस्ताने, सिर की सुरक्षा के लिए हेलमेट या अन्य आवश्यक सामान और उपयुक्त जूते, उपलब्ध कराए जाने चाहिए। साथ ही, फील्ड विज़िट के लिए उन्हें आधिकारिक पहचान पत्र और प्राधिकरण पत्र भी दिए जाने चाहिए।
कार्यस्थल के भीतर भी सुरक्षा का ध्यान रखना उतना ही ज़रूरी है। इसके लिए सुरक्षित पेयजल, साफ़ और कार्यशील जेंडर-संवेदनशील शौचालय, तथा मासिक धर्म से जुड़ी ज़रूरतों को ध्यान में रखने वाली सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए। प्रवेश-नियंत्रण की व्यवस्था, जैसे की-कार्ड और किसी विज़िटर की जांच जैसी प्रक्रियाएं भी कार्यस्थल को अधिक सुरक्षित बना सकती हैं।
इसके अलावा, संस्थाओं को कर्मचारियों के लिए नियमित प्रशिक्षण आयोजित करना चाहिए, ताकि वे जोखिम भरी परिस्थितियों को पहचानना, तनावपूर्ण हालात को संभालना, आपात स्थिति में सही प्रतिक्रिया देना और ज़रूरत पड़ने पर आत्मरक्षा के बुनियादी उपाय सीख सकें। साथ ही, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 का प्रभावी पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। शिकायतों के निपटारे के लिए ऐसी व्यवस्था हो, जिसमें समय-सीमा स्पष्ट हो और जवाबदेही भी तय हो।
3. संस्थाओं में देखभाल (केयर) की संस्कृति विकसित की जाए
संस्थाओं को यह स्वीकार करना होगा कि फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ताओं का श्रम उनके काम की बुनियाद है। इसलिए ज़रूरी है कि वे नियमित रूप से उनसे बातचीत करें, ज़मीनी वास्तविकताओं को समझें और उनकी चिंताओं को महज़ ‘काम का हिस्सा’ कहकर न टालें।
संस्थाओं को केवल सेल्फ-केयर (स्वयं अपनी देखभाल करना) ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे की देखभाल की संस्कृति को भी बढ़ावा देना चाहिए। इसके लिए कर्मचारियों को सजगता, तनाव से उबरने के तरीकों और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। साथ ही, ऐसे मौके भी बनाए जाने चाहिए जहां कर्मचारी एक-दूसरे का सहारा बन सकें और अपने अनुभव साझा कर सकें।
इसके अलावा, काम करने का तरीका भी ऐसा होना चाहिए जो आघात (ट्रॉमा) के प्रभाव को समझे और उसका ध्यान रखे। इसका मतलब है कि कर्मचारियों पर ज़रूरत से ज़्यादा काम का बोझ न डाला जाए, उनके काम के घंटे उचित हों, समय-समय पर उनकी मानसिक और भावनात्मक स्थिति के बारे में व्यक्तिगत बातचीत की जाए और भावनात्मक रूप से कठिन मामलों पर काम करने के बाद उन्हें आराम और उबरने का पर्याप्त समय मिले।
उदाहरण के लिए, शक्ति शालिनी में कर्मचारियों के साथ नियमित व्यक्तिगत और टीम स्तर पर वेल-बींग चेक-इन किए जाते हैं, जिन्हें कर्मचारियों ने उपयोगी बताया है। खासकर हिंसा और आघात (ट्रॉमा) से जुड़े मामलों पर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए गोपनीय, संवेदनशील और बिना किसी पूर्वाग्रह के मानसिक स्वास्थ्य सहयोग को संस्थाओं की प्राथमिकता बनाया जाना चाहिए।
4. रोज़गार की सुरक्षा, उचित वेतन और कर्मचारी सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं
हर फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ता को लिखित नियुक्ति पत्र मिलना चाहिए, जिसमें उसकी भूमिका, ज़िम्मेदारियां, वेतन और सुविधाओं का स्पष्ट उल्लेख हो। संस्थाओं को समान काम के लिए समान वेतन सुनिश्चित करना चाहिए, श्रम कानूनों का पालन करना चाहिए और वेतन, यात्रा या अन्य खर्चों की प्रतिपूर्ति तथा अन्य भुगतान समय पर करने चाहिए।
कर्मचारियों की दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा, टर्म इंश्योरेंस, भविष्य निधि (पीएफ), वृद्धावस्था पेंशन और आपातकालीन सहायता कोष जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि किसी संकट की स्थिति में उन्हें आर्थिक सहारा मिल सके।
ये सभी सुझाव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण बनाना है, तो गैर-लाभकारी संस्थाओं, फंडरों और प्रशासन, तीनों को मिलकर काम करना होगा। जैसा कि एक फ्रंटलाइन सामाजिक कार्यकर्ता ने हमें बताया, “जो व्यवस्था अपने कर्मचारियों की रक्षा करती है, वह अपने लक्ष्य की भी रक्षा करती है।” यही सोच फंडरों, संस्थाओं और प्रशासन के लिए आगे बढ़ने की शुरुआत होनी चाहिए।
*पहचान गोपनीय रखने के लिए नाम बदले गए हैं।
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लेखक के बारे में
- ऐश्वर्या भूटा शक्ति शालिनी में कंसल्टेंट रिसर्च कोऑर्डिनेटर हैं। उनका काम भारत में लैंगिक समानता और विकास से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित है। उन्हें शोध के क्षेत्र में पांच वर्षों से अधिक का अनुभव है और इससे पहले वह नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाउंटेबिलिटी में काम कर चुकी हैं। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ शेफ़ील्ड (यूनाइटेड किंगडम) से सोशल रिसर्च और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (नई दिल्ली) से डेवलपमेंट एंड लेबर स्टडीज़ में स्नातकोत्तर किया है।
- तमन्ना बसु शक्ति शालिनी में कोर लीड हैं और वर्ष 2014 से संस्था के साथ जुड़ी हुई हैं। वह एशिया फॉर बेटर फंडिंग में रीजनल लीड के रूप में भी कार्यरत हैं। इससे पहले वे सिविस में फंडरेज़र और एचएक्यू: सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स में रिसर्च एवं कम्युनिकेशंस कंसल्टेंट रह चुकी हैं। उन्होंने अशोका विश्वविद्यालय (हरियाणा) और निर्मा विश्वविद्यालय (गुजरात) में अंग्रेज़ी साहित्य का अध्यापन भी किया है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एमफिल की डिग्री प्राप्त की है।




