शहरी भारत

क्या दिल्ली के गांवों का शहर पर हक़ नहीं है?

जून 2025 में दिल्ली के नारायणा गांव में एक जनसुनवाई हुई। इसने दशकों की सरकारी उपेक्षा के साथ-साथ स्थानीय समुदाय के उभरते प्रतिरोध को भी सामने रखा।​
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​​यह कहानी है दिल्ली के नारायणा गांव की एक जनसुनवाई की।​ 

​​जून 2025 की एक आम गर्म दोपहरी को उप-मंडल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) कार्यालय ने गांव में जनसुनवाई आयोजित करने का एक नोटिस जारी किया। यह ख़बर देखते ही देखते व्हाट्सऐप पर फैल गयी। अगले दिन दिल्ली रिज पर बने राम द्वारा मंदिर के पास बड़ी संख्या में भीड़ जुटने लगी। लोगों के पास कई सवाल थे: ‘अचानक यह जनसुनवाई क्यों?’ या ‘इससे क्या हासिल होगा?’ लेकिन इन सवालों के बीच यह स्पष्ट था कि लोग हर हाल में अपनी बात रखना चाहते थे।​ 

​​एसडीएम कार्यक्रम में तय समय से लगभग दो घंटे देर से पहुंचे। तब तक भीड़ कुछ कम हो चुकी थी, लेकिन करीब 50 लोग अब भी वहां डटे हुए थे। यह देखकर अधिकारी भी हैरान थे। 40 वर्षीय स्थानीय निवासी रमेश* का कहना था, “हमें अपनी पूरी ज़िंदगी में ऐसी जनसुनवाई का मौका नहीं मिला। जब तक हमारी बात नहीं सुनी जाएगी, हम यहां से नहीं जाएंगे।”​ 

​​यह स्पष्ट था कि प्रशासन के लिए भले ही यह एक सामान्य सरकारी प्रक्रिया रही हो, लेकिन गांव के लोगों के लिए यह एक दुर्लभ मौका था। ऐसा मौका, जब वे बता सकें कि देश की राजधानी में रहने के बावजूद वे वर्षों से विकास और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से कैसे बाहर रह गए हैं।​ 

​​उस दिन मैं भी सिटी सभा के काम के तहत नारायणा गांव के युवाओं के साथ चल रहे एक नियमित सामुदायिक मैपिंग अभ्यास के सिलसिले में वहां मौजूद थी। जब लोग राम द्वारा मंदिर के पास इकट्ठा होने लगे, तो मैंने भी जनसुनवाई का हिस्सा बनने का फैसला किया।​ 

​​ज़मीन कम, मंज़िलें ज़्यादा​ 

​​एक ओर दिल्ली रिज और दिल्ली कैंटोनमेंट, और दूसरी ओर नियोजित कॉलोनी नारायणा विहार तथा औद्योगिक क्षेत्र से घिरा नारायणा गांव एक बेहद सीमित भौगोलिक दायरे में बसा है।​ 

​​यह दिल्ली के उन अनेक गांवों में से एक है, जो आज भी शहर के ग्रामीण अतीत की झलक समेटे हुए हैं, लेकिन उसके तथाकथित विकसित या आधुनिक वर्तमान का हिस्सा नहीं बन पाए हैं। ये ऐसी जगहें हैं, जो न पूरी तरह ग्रामीण रह गयी हैं और न ही पूरी तरह शहरी बन पायी हैं। यहां न पहले की तरह खेती-बाड़ी संभव है, और न ही लोगों को शहरों जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं। वहीं, सामुदायिक संसाधनों (कॉमन्स) से भी उनका रिश्ता पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ है।​ 

​​आज़ादी से पहले दिल्ली का अधिकांश हिस्सा भौगोलिक और सामाजिक, दोनों ही रूपों में ग्रामीण था। लेकिन आज़ादी के बाद के दशकों में सरकार ने सार्वजनिक संस्थानों, औद्योगिक क्षेत्रों और नियोजित आवासीय कॉलोनियों के निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में खेती की ज़मीनों को अधिग्रहीत किया।

​​इस दौरान दिल्ली के गांवों को कागज़ों पर तो शहरी घोषित कर दिया गया, लेकिन उनकी प्रशासनिक स्थिति कभी स्पष्ट नहीं हुई। वे ​एक ऐसी गोलमोल परिस्थिति में फंस गए, जहां न तो उन्हें नगर निकायों लिए पर्याप्त शहरी माना गया और न ही ग्राम सभाओं के लिए पर्याप्त ग्रामीण।​ 

सैटेलाईट चित्र_जनसुनवाई
क्षेत्रवार प्रशासनिक व्यवस्था का मानचित्र। 

​​इस अनिश्चितता की एक बड़ी वजह वर्ष 1908 में लागू किया गया औपनिवेशिक लाल डोरा ढांचा भी था। इसके तहत गांव की आबादी वाले हिस्से और उसके आसपास की कृषि भूमि के बीच सीमा तय की गयी थी। समय के साथ इन क्षेत्रों को भवन निर्माण से जुड़े नियमों (बिल्डिंग बायलॉज़) से छूट मिल गयी। आज़ादी के बाद वर्ष 1957 और 1963 में जारी अधिसूचनाओं ने भी इस स्थिति को बरकरार​ रखा, जिससे इन इलाकों में नियामकीय (रेगुलेटरी) निगरानी लगभग नहीं के बराबर रह गयी।​ 

​​दिल्ली के कई शहरी गांवों में यह प्रशासनिक अस्पष्टता धीरे-धीरे सरकारी उपेक्षा में बदल गई। नारायणा गांव इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। एक समय यह गांव मुख्य रूप से पशुपालन और खेती पर निर्भर समुदायों का घर था। लेकिन 20वीं सदी के उत्तरार्ध में यहां तेज़ी से शहरीकरण हुआ। इसके बाद गांव के लोगों ने आसपास के इलाकों में सरकारी नौकरियों, असंगठित क्षेत्र और सर्विस क्षेत्र में काम करना शुरू किया।​ 

​​वहीं, गांव के भीतर ज़मीन के मालिक परिवारों ने अपनी ज़मीन और व्यावसायिक परिसरों को छोटे कारखानों और उद्योगों को किराये पर देना शुरू कर दिया। साथ ही, शहर में रोज़गार की तलाश में आने वाले लोगों के लिए किराये के मकान भी बनाए गए।​ 

उलझे तार और केबल_जनसुनवाई
बुनियादी सेवाओं पर बढ़ता दबाव। पानी और बिजली की लाइनें पुरानी, अव्यवस्थित और प्रशासनिक उपेक्षा की शिकार हैं।

​​1970 के दशक में 5000 लोगों के लिए बनायी गयी नारायणा बस्ती में आज 50000 से ज़्यादा लोग रहते हैं।​ 

​​एक समय के बाद गांव के चारों ओर विस्तार की गुंजाइश नहीं बची। ऐसे में आबादी बढ़ने के साथ उसका फैलाव ऊपर की ओर, यानी बहुमंज़िला इमारतों के रूप में हुआ। यह विस्तार भी ज़्यादातर बिना किसी नियोजन या औपचारिक ढांचे के हुआ। यही वजह है कि दिल्ली के अधिकांश शहरी गांवों की तरह नारायणा का यह विकास भी सरकारी योजनाओं और आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बन पाया।​ 

​​आसपास के इलाकों का विकास नियोजित तरीके से होता रहा, लेकिन नारायणा गांव नगर सेवाओं, विकास संबंधी नियमों और दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) जैसी एजेंसियों की दीर्घकालिक योजनाओं से काफी हद तक बाहर ही रहा। बाद में गांव को नगर प्रशासन के दायरे में तो शामिल कर लिया गया, लेकिन दशकों की यह उपेक्षा लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आज भी दिखायी देती है। इसका नतीजा यह है कि स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, पार्क और खेल के मैदान जैसी बुनियादी नागरिक सुविधाएं गांव के भीतर लगभग नहीं के बराबर हैं। इनमें से ज़्यादातर सुविधाएं गांव के बाहर स्थित हैं, जिससे स्थानीय लोगों के लिए उन तक पहुंचना आसान नहीं है।​ 

​​विलुप्त होते साझा संसाधन और सामाजिक परंपराएं​ 

​​जनसुनवाई के दौरान कई मुद्दे सामने आए। इस बैठक में दिल्ली जल बोर्ड, उद्यान विभाग (हॉर्टिकल्चर), ट्रैफिक पुलिस, वन स्टॉप सेंटर (ओएससी) के प्रतिनिधि और उप-मंडल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) समेत कई विभागों के अधिकारी मौजूद थे।​ 

​​स्थानीय निवासियों ने बुनियादी ढांचे और सामाजिक सुविधाओं की कमी, रिज के भौगोलिक स्वरूप के कारण पानी की असमान उपलब्धता और तीन मीटर से भी कम चौड़ी गलियों की समस्या सामने रखी। उनका कहना था कि आपदा की स्थिति में इतनी संकरी गलियों में राहत और बचाव कार्य करना बेहद मुश्किल है।​ 

​​बैठक में ज़मीन के मालिकाना हक़ का मुद्दा भी उठा। स्थानीय निवासी समीर* ने पूछा, “उस ज़मीन का मालिकाना हक़ कैसे तय होगा, जिस पर कई लोगों का दावा है?” उनका इशारा उन संपत्तियों की ओर था, जो समय के साथ परिवार के अलग-अलग सदस्यों के बीच मंज़िलों के हिसाब से बंट गयी हैं या जिनके हिस्से प्रवासी परिवारों को बेच दिए गए हैं। यह सवाल स्थानीय स्तर पर कई लोगों को परेशान करता है।​ 

​​इसके साथ ही निवासियों ने तेज़ी से ख़त्म होते गांव के प्राकृतिक और साझा संसाधनों (कॉमन्स) पर भी चिंता जतायी। उनका कहना था कि कभी यह साधन गांव के सामाजिक जीवन का केंद्र हुआ करते थे।​ 

​​67 वर्षीय नरेश* ने बताया, “हम अपने जलाशय खो चुके हैं।” उनका इशारा उन पुराने तालाबों और जल स्रोतों की ओर था, जिन्हें पुनर्जीवित और संरक्षित करने की मांग गांव वाले लंबे समय से करते आ रहे हैं। लेकिन आज इन जलाशयों पर अतिक्रमण कर आसपास की कॉलोनियों के लिए पार्क बना दिए गए हैं।​

पुराने और नए निर्माण में अंतर_जनसुनवाई
पहले और अब। ऊपर: एक मंज़िला बस्तियों से घनी शहरी आबादी तक का सफ़र। नीचे: समय के साथ रिज क्षेत्र के साझा संसाधनों (कॉमन्स) का बदलता स्वरूप।

​​जनसुनवाई में उठे मुद्दों ने यह भी दिखाया कि गांव के भीतर पार्क, खेल के मैदान और दूसरे सार्वजनिक मनोरंजन स्थलों की कितनी कमी है। रोज़मर्रा की बुनियादी सुविधाओं के लिए भी लोगों को आसपास की कॉलोनियों पर निर्भर रहना पड़ता है।​ 

​​ज़रा कल्पना कीजिए कि आपका अपना मोहल्ला तंग घरों और बमुश्किल सांस लेने लायक गलियों से भरा हो। आपको हरियाली देखने या शाम को क्रिकेट खेलने के लिए भी पास की किसी दूसरी कॉलोनी में जाना पड़े, जबकि वह ज़मीन कभी आपके ही गांव का हिस्सा रही हो। ऐसे में कॉलोनियों की आपसी राजनीति और सामाजिक असमानताओं पर शायद ही कभी बात की जाती है।​ 

​​रिज में स्थित नारायणा जैसे गांवों में कभी कुश्ती और पहलवानी गांव के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा हुआ करती थी। अखाड़े सिर्फ अभ्यास की जगह नहीं, बल्कि ऐसे साझा सार्वजनिक स्थल थे, जहां खिलाड़ी और दर्शक एक साथ जुटते थे। लेकिन आज गांव के लगभग सभी अखाड़ों पर या तो व्यावसायिक गतिविधियों का कब्ज़ा हो चुका है या फिर सरकार ने उनका अधिग्रहण कर लिया है। अब गांव के भीतर केवल राम द्वारा मंदिर परिसर में एक अखाड़ा बचा है, जिसकी देखभाल और संचालन समुदाय खुद करता है।​ 

​​वहीं, नारायणा फ्लाईओवर के नीचे प्रस्तावित ​इनडोर खेल परिसर​ का निर्माण भी लंबे समय से अधूरा पड़ा है। इसी तरह चौपाल जैसी पारंपरिक जगहें, जहां कभी रागनियां गायी जाती थी और त्योहारों में नगाड़े बजते थे, भूमि अधिग्रहण और विकास परियोजनाओं की भेंट चढ़ चुकी हैं। अब उत्सव और सामुदायिक आयोजन रिंग रोड फ्लाईओवर के नीचे आयोजित किए जाते हैं, जहां सरकारी व्यवस्था लगभग नदारद होती है।​ 

​​जनसुनवाई के दौरान जब लोग अपने अनुभव साझा कर रहे थे, तो उनकी बातों में एक गहरी नाराज़गी साफ झलक रही थी। उनका मानना है कि आसपास के इलाकों, खासकर नियोजित कॉलोनी नारायणा विहार, के विकास पर लगातार ध्यान दिया गया। वहीं प्रशासन ने सब कुछ जानते-समझते हुए भी नारायणा गांव की तरफ आंखें मूंदकर रखी हैं।

​​जवाब का इंतज़ार​ 

​​जनसुनवाई के दौरान लोगों से कहा गया कि वे केवल “सार्वजनिक शिकायतें” ही सामने रखें। पूरी कार्यवाही लगभग एक औपचारिक प्रशासनिक प्रक्रिया की तरह चलती रही। एसडीएम हर शिकायत पर लोगों से पूछते कि वह किस विभाग के अधिकार क्षेत्र में आती है। ऐसा लग रहा था मानो शिकायतों का समाधान करने से ज़्यादा महत्वपूर्ण उन्हें अलग-अलग विभागों में बांटना हो। लोगों से यह भी कहा गया कि वे अपनी शिकायतें लिखित रूप में जमा करें, ताकि संबंधित विभाग उन पर कार्रवाई कर सके।​ 

एक रजिस्टर और मीटिंग का दृश्य_जनसुनवाई
राम द्वारा मंदिर में आयोजित जनसुनवाई की कार्यवाही। 

​​लेकिन इसके बाद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।​ 

​​कुछ दिनों बाद एसडीएम कार्यालय में एक और बैठक बुलायी गयी। इस बार कुछ चुनिंदा स्थानीय निवासियों को बुलाया गया, ताकि यह तय किया जा सके कि गांव की किन समस्याओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके बाद मामला ज़िला मजिस्ट्रेट (डीएम) के पास पहुंचा, जिन्होंने एक हफ्ते बाद इस समूह से मुलाकात की।​ 

​​लेकिन वहां भी वही सिलसिला दोहराया गया। अलग-अलग विभागों के अधिकारियों को बुलाया गया, समस्याओं पर चर्चा हुई और आश्वासन दिए गए।​ 

​​इस बैठक का एक अहम नतीजा यह रहा कि अधिकारियों ने समुदाय की शिकायतों की जांच के लिए मौके पर जाकर निरीक्षण करने का वादा किया। लेकिन यह लेख लिखे जाने तक ऐसे निरीक्षण शुरू नहीं हुए थे।​ 

​​नारायणा के युवा और अधिकार का दावा​ 

​​जहां सरकारी संस्थाओं की प्रतिक्रिया अब भी धीमी बनी हुई है, वहीं दिल्ली के शहरी गांवों, जिनमें नारायणा भी शामिल है, के निवासी (खासकर युवा) लंबे समय से चली आ रही सरकारी उपेक्षा का अपने-अपने तरीकों से जवाब दे रहे हैं।​ 

​​नारायणा में समुदाय के साथ काम करते हुए मैंने युवाओं की भाषा और सोच में एक अहम बदलाव देखा है। उदाहरण के लिए, जाट समुदाय की पुरानी पीढ़ियां राजनीति में प्रतिनिधित्व और भागीदारी की बात मुख्य रूप से जाति और रिश्तेदारी के दायरे में करती थी। लेकिन आज इस समुदाय के युवा कानून, सुशासन, बेहतर जीवन और शहर के नागरिक के रूप में अपनी पहचान और अधिकारों की बात कहीं ज़्यादा मजबूती से कर रहे हैं।​ 

​​इस बदलाव के साथ प्रतिरोध के नए तरीके भी सामने आए हैं, जो ज़मीन के साथ-साथ विमर्श की भाषा में भी साफ झलकते हैं। नारायणा में ज़मीन के मालिकाना हक़ को लेकर लंबे समय से चल रहे संघर्षों की पृष्ठभूमि में, इन्हीं समुदायों के युवा अब साइकिल, द दिल्ली देहात प्रोजेक्ट, दिल्ली 360 अर्बन देहात और भाषाकोश​ जैसे सामूहिक प्रयासों से जुड़ रहे हैं। इन पहलों के ज़रिए वे अपने गांवों के इतिहास को डिजिटल रूप से संजो रहे हैं, ताकि सार्वजनिक विमर्श में उनकी मौजूदगी और पहचान दर्ज हो सके।​ 

​​ये तमाम पहलें उस भविष्य की कल्पना को भी सामने लाती हैं, जिसमें दिल्ली को एक ‘विश्वस्तरीय’, ‘टिकाऊ’, ‘पैदल चलने योग्य’ और ‘मिश्रित उपयोग’ वाला शहर माना जाता है। गौरतलब है कि ये सभी बातें कभी दिल्ली के इन गांवों के जीवन का हिस्सा थी। साथ ही, इन प्रयासों के ज़रिए यह समझ भी मज़बूत हो रही है कि गांव के सभी समुदायों को साथ लेकर चलना और उनकी आवाज़ को सुनना ज़रूरी है।​ 

​​नारायणा में युवा अपने गांव के इतिहास को नक्शों और मौखिक इतिहास (ओरल हिस्ट्री) के ज़रिए दर्ज करने में जुटे हैं। वे अवैध भूमि अधिग्रहण और प्रशासनिक लापरवाही के ख़िलाफ़ याचिकाएं दायर कर रहे हैं और स्थानीय अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करने की कोशिश कर रहे हैं।​ 

​​सिटी सभा के साथ काम करते हुए उन्होंने समुदाय के लिए ‘ओपनस्ट्रीटमैप’ का प्रशिक्षण भी आयोजित कराया, ताकि गांव के लोग अपने इलाक़े से जुड़ा स्थानिक डेटा (स्पेशियल डेटा) खुद तैयार कर सकें और ज़रूरत पड़ने पर उसे तथ्यात्मक साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल कर सकें। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज तक नारायणा में ज़मीन के मालिकाना हक़ से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज़ जारी नहीं हुए हैं। इसकी एक वजह यह है कि जियोस्पेशियल दिल्ली लिमिटेड (जीएसडीएल) के पोर्टल पर राजस्व मानचित्र (रेवेन्यू मैप) अब तक अपडेट नहीं किया गया है।​ 

लैपटॉप चलाती कुछ महिलायें_जनसुनवाई
स्थानीय लोगों के लिए आयोजित ओपनस्ट्रीटमैप प्रशिक्षण सत्र।

​​​​नारायणा का स्थानीय समुदाय पहले भी कई ज़मीनी मुद्दों पर संगठित होकर अपनी आवाज़ बुलंद कर चुका है। उदाहरण के लिए, गांव के बाहर फुटपाथ पर बनाए जा रहे एक कूड़ाघर के विरोध में लोगों ने प्रदर्शन किया था। इस निर्माण के कारण पैदल चलने वालों के लिए रास्ता लगभग बंद हो गया था।​ 

कई चुनौतियों के बावजूद नारायणा में प्रतिरोध और सामूहिक संगठन की परंपरा आज भी ज़िंदा है। यहां के लोग इस उम्मीद के साथ अपनी लड़ाई जारी रखे हुए हैं कि एक दिन उन्हें न्याय मिलेगा और प्रशासन की जवाबदेही तय होगी। राज्य के साथ उनके संवाद का सिलसिला कई पीढ़ियों से चलता आ रहा है।​ 

तख्तियों के साथ विरोध प्रदर्शन करते कुछ लोग_जनसुनवाई
रिंग रोड के फुटपाथ पर गांव के प्रवेश द्वार के सामने बनाए जा रहे कूड़ाघर के विरोध में आयोजित प्रदर्शन। 

​​अक्सर कहा जाता है कि लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है, जब उसके नागरिक सक्रिय हों। यह माना जाता है कि नागरिकों की मांगों और अधिकारों को लेकर राज्य के साथ संवाद हो और उनकी प्राथमिकताओं के आधार पर फैसले लिए जाएं। लेकिन व्यवहार में केवल भागीदारी ही काफ़ी नहीं होती। खासकर जो लोग औपचारिक शासन व्यवस्था के हाशिये पर हैं, उनके लिए यह प्रक्रिया एकतरफा बोझ बन जाती है।​ 

​​नारायणा गांव का अनुभव इसी गहरे असंतुलन की ओर इशारा करता है। यहां नागरिकों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी की अपेक्षा की जाती है, लेकिन राज्य की प्रतिक्रिया अस्पष्ट और अनिश्चित नज़र आती है।​ 

​​यह साफ है कि केवल नागरिकों की भागीदारी से प्रशासनिक स्पष्टता, जवाबदेही और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी पूरी नहीं की जा सकती। अगर लोकतंत्र को वास्तव में सार्थक बनाना है, तो उसे केवल नागरिकों को सक्रिय करने या औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसके बजाय ऐसी जवाबदेही विकसित करनी होगी, जो राज्य और नागरिकों के बीच भरोसे और रिश्तों पर आधारित हो। यानी ऐसी शासन व्यवस्था, जो सिर्फ़ शिकायतों पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित न रहे, बल्कि जिन लोगों के लिए वह काम करती है, उनके जीवन की वास्तविकताओं के अनुरूप भी हो।​ 

​​अगर शहरी गांवों का भविष्य और उनकी शासन व्यवस्था आपके लिए भी चिंता का विषय है, तो अब समय है कि इस चिंता को सामूहिक नागरिक पहल में बदला जाए। आइए, हर दिन एक कहानी से इस सफर की शुरुआत करते हैं।​ 

तस्वीरें, नक्शे और ऑडियो रिकॉर्डिंग साभार: सिटी सभा

​​*गोपनीयता बनाए रखने के लिए सभी नाम बदले गए हैं।

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लेखक के बारे में

    • सलेहा सप्रा शहरी विकास के क्षेत्र में सक्रिय एक डेवलपमेंट पेशेवर हैं। वह सिटी सभा की सह-संस्थापक हैं, जो एक गैर-लाभकारी संस्था है। सिटी सभा की शुरुआत शहरों में मौजूद असमानताओं को ध्यान में रखते हुए की गयी थी। यह संस्था शोध, ज़मीनी पहल, एडवोकेसी और शिक्षा के ज़रिए हाशिये पर रह रहे समुदायों और शहरी स्थानीय निकायों के साथ काम करती है, ताकि नागरिकों की सक्रिय भागीदारी बढ़े और स्थानीय शासन अधिक जवाबदेह बन सके। सलेहा के पास शहरी नियोजन और विकास से जुड़े कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करने, उन्हें लागू करने और उनकी निगरानी करने का 10 वर्षों का अनुभव है। उनका काम जेंडर, स्थानीय शासन, गतिशीलता (मोबिलिटी), जलवायु और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर केंद्रित है। उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से शहरीकरण और विकास (अर्बनाइज़ेशन एंड डेवलपमेंट) में मास्टर डिग्री हासिल की है। 
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