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डेटा से नहीं, लोगों से सीखना

भारत के ट्रकिंग समुदाय के साथ काम करते हुए हमने जाना कि फील्ड में समय बिताना, भरोसा बनाना और उन समुदायों को समझना कितना अहम है, जो अक्सर औपचारिक आंकड़ों से बाहर रह जाते हैं।
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भारत के असंगठित क्षेत्र की दुनिया आंकड़ों से लगभग गायब नज़र आती है। आर्थिक सर्वेक्षण 2021–22 के अनुसार, भारत के 53 करोड़ कामगारों में से लगभग 44 करोड़ असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इसके बावजूद, इस बारे में भरोसेमंद जानकारी मिलना आसान नहीं है कि ये कामगार कौन हैं, क्या काम करते हैं और उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी कैसी है। जहां कुछ आंकड़े उपलब्ध भी हैं, वे अक्सर पुराने, अधूरे या इतने सामान्यीकृत हैं कि उनसे कोई ठोस समझ नहीं बन सकती। ऐसे में, इन समुदायों के लिए किसी भी तरह की योजना तैयार करने वालों को अक्सर बुनियादी स्तर पर काम की शुरुआत करनी पड़ती है।

वर्ष 2023 में पर्पज़ ने ‘नई सोच की सवारी’ नाम से एक जागरूकता अभियान शुरू किया। इसका उद्देश्य भारत के ट्रकिंग समुदाय (ट्रक परिवहन से जुड़े लोगों) को इलेक्ट्रिक ट्रकों की ओर हो रहे बदलाव के लिए तैयार करना था। इसी दौरान हमें आंकड़ों की इस कमी का स्पष्ट एहसास हुआ।

भारतीय सड़कों पर कुल वाहनों में ट्रकों की हिस्सेदारी महज़ 3 प्रतिशत है, लेकिन वे पार्टिकुलेट मैटर (कणीय प्रदूषक) के लगभग 53 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार हैं। यही वजह है कि यह क्षेत्र शून्य-उत्सर्जन परिवहन (ज़ीरो एमिशन मोबिलिटी) की दिशा में प्राथमिकता का क्षेत्र बन जाता है। भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों पर आधारित परिवहन व्यवस्था को अपनाया जाना अभी शुरुआती दौर में ही है। वर्ष 2024 में देश में 3.5 टन से अधिक क्षमता वाले केवल 280 इलेक्ट्रिक ट्रकों की बिक्री हुई। वहीं, इलेक्ट्रिक ट्रकों को चार्ज करने की सुविधाओं और वित्तीय व्यवहार्यता जैसी चुनौतियों का व्यापक स्तर पर समाधान होना भी अभी बाकी है।

इसलिए, इस अभियान का उद्देश्य ट्रकिंग समुदाय को इलेक्ट्रिक ट्रक अपनाने के लिए राज़ी करना नहीं था। हमारा मकसद सिर्फ यह सुनिश्चित करना था कि जब यह बदलाव उनके सामने आए, तब उनके पास सही और ज़रूरी जानकारी हो, ताकि वे सोच-समझकर फैसला ले सकें।

डेटा के अभाव में काम करना

हालांकि, इस बदलाव को लेकर ट्रकिंग समुदाय के साथ काम करने के लिए सबसे पहले यह समझना ज़रूरी था कि वे हैं कौन। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह समझना बेहद मुश्किल था। इस समुदाय का एक बड़ा हिस्सा, जिसमें ट्रक ड्राइवर, मैकेनिक और छोटे फ्लीट ऑपरेटर शामिल हैं, औपचारिक रोज़गार व्यवस्था से बाहर काम करता है। यही वजह है कि जितना चुनौतीपूर्ण इन तक पहुंचना है, उतना ही मुश्किल इनकी विश्वसनीय गिनती करना भी है। जब हमने ‘नई सोच की सवारी’ पर काम शुरू किया, तब ट्रकिंग क्षेत्र से जुड़े लोगों पर उपलब्ध आंकड़े लगभग एक दशक पुराने थे। छोटे फ्लीट ऑपरेटरों की कुल संख्या या सक्रिय ट्रक ड्राइवरों की वास्तविक संख्या जैसी बुनियादी जानकारियां भी या तो पुरानी थी या उन पर भरोसा करना मुश्किल था।

ऐसे में, इस समुदाय तक पहुंचने के लिए हमें अपनी कई पूर्वधारणाओं पर नए सिरे से विचार करना पड़ा। हमें यह समझना पड़ा कि उपलब्ध आंकड़ों पर कितना भरोसा किया जा सकता है, लक्षित समुदाय को कैसे देखा जाए और ऐसा अभियान कैसे तैयार किया जाए, जिससे वे लोग जुड़ाव महसूस कर सकें, जिनके लिए उसे बनाया गया है।

एक साथ बैठकर लोग चर्चा करते हुए_ट्रक
इस बदलाव पर ट्रकिंग समुदाय के साथ काम करने के लिए सबसे पहले यह समझना ज़रूरी था कि वे हैं कौन? उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह समझ विकसित करना बेहद मुश्किल था। | चित्र साभार: नई सोच की सवारी

इस पूरी प्रक्रिया में हमने कुछ अहम बातें सीखीं।

1. उपलब्ध आंकड़ों को केवल शुरुआती आधार मानें

असंगठित क्षेत्र में इतनी अनिश्चितताएं होती हैं कि उस पर किए गए अध्ययन भी बहुत जल्दी पुराने पड़ जाते हैं। कामगारों की जगह बदलती रहती है, कामकाज के तौर-तरीके बदलते रहते हैं और आठ-दस साल पहले ट्रकिंग क्षेत्र की जो तस्वीर थी, वह आज से काफी अलग हो सकती है। जब हमने इस समुदाय को समझने की शुरुआत की, तो पाया कि कई बुनियादी सवालों के जवाब ही मौजूद नहीं थे। जैसे, एक से पांच ट्रकों वाले छोटे फ्लीट ऑपरेटरों की संख्या कितनी है? ट्रक ड्राइवर किन इलाकों में अधिक संख्या में काम करते हैं? असंगठित क्षेत्र के मैकेनिक अलग-अलग क्षेत्रों में किस तरह फैले हुए हैं?

इसीलिए, हमने उपलब्ध आंकड़ों को ज़मीनी हकीकत मानने के बजाय केवल शुरुआती बिंदु माना।

हमारी टीम ने अभियान के हर चरण में फीडबैक लिया और उससे मिली सीख को आगे की प्रक्रिया में शामिल किया। अभियान की रूपरेखा तैयार करने से पहले हमने कई जगहों पर जाकर ट्रक परिवहन से जुड़े लोगों के बीच समय बिताया और अपनी शुरुआती परिकल्पनाओं की पुष्टि की। हमने ज़रूरत पड़ने पर उनमें बदलाव भी किए। इस दौरान हमने अपने मुख्य लक्षित समूह, यानी ड्राइवरों, मैकेनिकों और फ्लीट ऑपरेटरों से विस्तार से बातचीत की। साथ ही, हम उन लोगों से भी मिले जो रोज़मर्रा के स्तर पर उनके फैसलों और कामकाज को प्रभावित करते हैं। जैसे, ट्रक चालकों के विश्राम स्थलों (रेस्ट स्टॉप) के मालिक, पेट्रोल पंप के संचालक और एग्रीगेटर। इन मुलाक़ातों से हमें यह समझने में मदद मिली कि इस समुदाय तक पहुंचने के प्रभावी माध्यम कौन-से हैं। साथ ही, हम ट्रकिंग क्षेत्र के भीतर मौजूद विविधताओं को बेहतर ढंग से समझ पाए।

मसलन, पंजाब में ट्रकिंग का कामकाज जिस तरह संचालित होता है, वह दिल्ली से काफ़ी अलग है। वहीं, गुजरात की परिस्थितियां इन दोनों राज्यों से अलग हैं। भौगोलिक संदर्भ इस क्षेत्र के लगभग हर पहलू को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, फ्लीट ऑपरेटर अपना कारोबार कैसे चलाते हैं या ड्राइवर अपने काम को किस नज़र से देखते हैं यह सब भौगोलिक संदर्भ से ही तय होता है। इसके अलावा, इस क्षेत्र की बहुत-सी बातें ऐसी हैं जो किसी औपचारिक आंकड़े में दर्ज ही नहीं होतीं।

ट्रकों में क्षमता से अधिक माल लादना, फ्लीट ऑपरेटरों और ड्राइवरों के बीच रोज़गार के अनौपचारिक ढांचे, या फिर बिना औपचारिक रिकॉर्ड के होने वाले वित्तीय लेन-देन आदि की जानकारी हमें तब मिली जब हम ख़ुद ज़मीन पर मौजूद रहे। कोई भी डेटासेट हमें ये बातें नहीं बता सकता था।

तभी हमें एहसास हुआ कि फील्ड में जाना हमारे शोध की कमियों को भरने का एक ज़रिया नहीं था। दरअसल, वही हमारा असल शोध था। साथ ही, इस क्षेत्र की प्रकृति को देखते हुए इस बात की संभावना बहुत कम थी कि हम दोबारा उन्हीं लोगों से दो-चार हों। इसलिए हमने पूरी परियोजना ख़त्म होने का इंतज़ार नहीं किया और अभियान के दौरान ही लगातार फीडबैक लेते रहे। हमने अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में लोगों से जुड़ने के अपने तरीके का परीक्षण किया और हर दस कार्यक्रमों के बाद प्रतिभागियों के सवालों और फीडबैक का विश्लेषण किया।

2. अपने लक्षित समुदाय की पूरी विविधता को समझें

असंगठित क्षेत्र कोई एक समान समूह नहीं है और ट्रकिंग क्षेत्र इसका एक अच्छा उदाहरण है। सतही तौर पर देखें तो इसमें तीन प्रमुख समूह नज़र आते हैं: ड्राइवर, मैकेनिक और फ्लीट ऑपरेटर। लेकिन इनमें से हर समूह भी कई अलग-अलग वर्गों में बंटा हुआ है।

फ्लीट ऑपरेटरों में खुद का ट्रक चलाने वाले ड्राइवर, कुछ ट्रकों का संचालन करने वाले छोटे ऑपरेटर, जिनके रूट तय नहीं होते, और बड़ी कंपनियां जिनका संचालन व्यवस्थित होता है और जिनके पास दीर्घकालिक अनुबंध औपचारिक बिलिंग की व्यवस्था होती है, सभी शामिल हैं। इसी तरह, लंबी दूरी और छोटी दूरी के ट्रक ड्राइवरों की समस्याएं, उनके लिए ज़रूरी जानकारी और उनके संवाद के तरीके भी अलग-अलग होते हैं। मैकेनिकों में भी कुछ ऐसे हैं जिन्होंने अधिकृत वर्कशॉप में प्रशिक्षण लिया है, जबकि कई ऐसे हैं जिन्होंने काम करते-करते यह हुनर सीखा है और वे ट्रांसपोर्ट नगरों में सामान्य मरम्मत का काम करते हैं। यही फर्क नई तकनीक को लेकर उनकी सोच और समझ को भी प्रभावित करता है।

इन अंतरों को समझना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि कोई एक तरीका पूरे समुदाय पर समान रूप से असर नहीं डाल सकता। उदाहरण के लिए, जब हमने ट्रकिंग समुदाय के साथ बातचीत शुरू की, तो पाया कि ड्राइवरों की सबसे बड़ी चिंता उनकी आजीविका थी। उनकी आय का एक हिस्सा इस बात पर निर्भर करता है कि वे डीज़ल की कितनी बचत कर पाते हैं। ऐसे में, इलेक्ट्रिक ट्रकों की बात सामने आते ही उनके मन में सबसे पहला सवाल यही आया कि इसका उनकी कमाई पर क्या असर पड़ेगा। दूसरी ओर, मैकेनिकों के मन में यह आशंका थी कि जब इलेक्ट्रिक ट्रकों में पारंपरिक इंजन ही नहीं होगा, तो उनकी भूमिका क्या रह जाएगी? वहीं, फ्लीट ऑपरेटरों की प्राथमिकता इलेक्ट्रिक ट्रकों की वित्तीय व्यवहार्यता और तकनीकी विश्वसनीयता थी। उनके सवाल बैटरी की रेंज (एक बार चार्ज होने पर ट्रक द्वारा तय की जा सकने वाली दूरी), चार्जिंग में लगने वाले समय और उन परिस्थितियों से जुड़े हुए थे, जिनमें इलेक्ट्रिक ट्रक आर्थिक रूप से लाभकारी साबित हो सकते हैं।

इलेक्ट्रिक ट्रकों को अपनाने का अंतिम निर्णय भले ही फ्लीट ऑपरेटर लेते हों, लेकिन वे काफी हद तक अपने ड्राइवरों और मैकेनिकों की राय पर निर्भर रहते हैं।

इसके अलावा, इस पूरी तस्वीर का एक और महत्वपूर्ण पहलू भी था। इलेक्ट्रिक ट्रकों को अपनाने का अंतिम निर्णय भले ही फ्लीट ऑपरेटर लेते हों, लेकिन वे काफी हद तक अपने ड्राइवरों और मैकेनिकों की राय पर निर्भर रहते हैं। यह एक ऐसा समुदाय है जहां बड़े फैसले साथियों के अनुभवों और आपसी भरोसे पर टिके होते हैं। एक फ्लीट ऑपरेटर दूसरे ऑपरेटर से यह पूछता है कि किसी ट्रक का प्रदर्शन कैसा रहा? साथ ही, वह अपने मैकेनिक से पूछता है कि ट्रक कितनी बार ठप्प हुआ? ऐसे में अगर हम सिर्फ अंतिम फैसला लेने वालों पर ध्यान देते, तो उन लोगों की भूमिका को नज़रअंदाज़ कर बैठते, जो असल में इन फैसलों को प्रभावित करते हैं।

यही कारण था कि हमें हर समूह के साथ बातचीत की सामग्री भी अलग-अलग तैयार करनी पड़ी। ड्राइवर यह जानना चाहते थे कि इलेक्ट्रिक ट्रकों से उनके काम करने की सुविधा और उनकी आय पर क्या असर पड़ेगा? मैकेनिक यह समझना चाहते थे कि इलेक्ट्रिक ट्रक डीज़ल ट्रकों से कितने मिलते-जुलते हैं और कितने अलग हैं और क्या उनके मौजूदा कौशल आगे भी उपयोगी रहेंगे? वहीं, फ्लीट ऑपरेटर वित्तीय व्यवहार्यता और तकनीकी विश्वसनीयता से जुड़े ठोस आंकड़े और तथ्य चाहते थे। यदि एक ही जानकारी तीनों समूहों के सामने एक ही तरीके से रखी जाती, तो वह किसी के लिए भी प्रभावी साबित नहीं होती।

3. पूर्वधारणाओं के साथ काम न करें

किसी भी अभियान की रूपरेखा तैयार करते समय सबसे आम गलतियों में से एक यह है कि हम पहले से तय कर लेते हैं कि लक्षित समुदाय किस तरह की बातों से जुड़ाव महसूस करेगा। मसलन, जलवायु परिवर्तन या तकनीकी बदलाव जैसे विषयों पर काम करने वाले हममें से कई लोग यह मान लेते हैं कि राष्ट्रीय हित, पर्यावरणीय प्रभाव या दीर्घकालिक बदलाव जैसे मुद्दे लोगों को आकर्षित नहीं करेंगे। खासकर उन समुदायों को, जिनकी प्राथमिकताएं रोज़मर्रा की आजीविका और तत्काल ज़रूरतें होती हैं। लेकिन इस अभियान पर काम करने के दौरान हमारा अनुभव इस धारणा से बिल्कुल अलग रहा।

जब हमने ट्रकिंग समुदाय के साथ इलेक्ट्रिक वाहनों पर आधारित परिवहन व्यवस्था पर बातचीत शुरू की, तो हमें लगा था कि प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी बातें उन्हें दूर की लगेंगी। लेकिन हुआ इसका उलट। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए ट्रक ड्राइवरों, जिनमें से कई छोटे शहरों और गांवों से थे, ने पर्यावरण में आए कई बदलावों का ज़िक्र किया। वे साफ़ तौर पर महसूस कर पा रहे थे कि आज उनके बच्चे जिस हवा में सांस ले रहे हैं, वह उनके अपने बचपन की हवा से अलग है। उनके लिए प्रदूषण कोई नीतिगत बहस का विषय नहीं था, बल्कि उनके बच्चों के भविष्य से जुड़ी एक निजी चिंता थी। ड्राइवरों, मैकेनिकों और फ्लीट ऑपरेटरों, सभी की सोच इस मामले में एक जैसी थी।

फ्लीट ऑपरेटरों के साथ हुई बातचीत से भी कुछ अप्रत्याशित और महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। उनमें से कुछ ने अपनी तरफ से भारत की ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा उठाया। उन्होंने विदेशों से आयात किए जाने वाले तेल पर देश की निर्भरता और विशेष रूप से सौर ऊर्जा के माध्यम से स्थानीय स्तर पर बिजली उत्पादन की संभावनाओं का उल्लेख किया। यह दृष्टिकोण हमारी ओर से नहीं, बल्कि बातचीत के दौरान उनकी ओर से स्वाभाविक रूप से उभरकर सामने आया। बाद में इसी समझ ने हमारी संचार रणनीति को और प्रभावी बनाया।

हमें यह भी महसूस हुआ कि फील्डवर्क को लेकर हमारी कई धारणाएं भी सही नहीं थी (खासकर जेंडर से जुड़ी भूमिकाओं को लेकर)। हमारी टीम की महिला सदस्यों ने समुदाय के साथ पूरी सहजता और बराबरी से संवाद किया, यहां तक कि तकनीकी विषयों पर भी। यह हमारे शुरुआती अनुमान से अलग था। इसी तरह, जब हमने ट्रक चालकों से पूछा कि क्या वे महिलाओं को ड्राइवर के रूप में इस क्षेत्र में आते देखना चाहेंगे, तो उनकी झिझक का कारण जेंडर से जुड़ा पूर्वाग्रह नहीं था। उनकी चिंता इस पेशे की प्रकृति को लेकर थी। मसलन, अनिश्चित रास्ते, सुरक्षा से जुड़े जोखिम और काम की कठिन परिस्थितियां। उनका कहना था कि वे अपने किसी भी प्रिय व्यक्ति को इन हालातों में काम करते हुए नहीं देखना चाहेंगे।

4. भरोसा शुरुआत से ही कायम करें

इस अभियान की एक अहम सीख यह भी थी कि भरोसा इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप समुदाय के बीच किन लोगों के साथ पहुंचते हैं। असंगठित क्षेत्र के कई ट्रक चालक बाहर से आने वाली संस्थाओं को संदेह की नज़र से देखते हैं। उन्हें अक्सर लगता है कि ऐसी संस्थाएं अपने किसी तय एजेंडे के साथ आती हैं।

इसीलिए, हमने चाइल्ड सर्वाइवल इंडिया जैसे ज़मीनी संगठनों के साथ साझेदारी की, जो वर्षों से ट्रक चालकों के कल्याण के लिए काम कर रहे थे और जिन पर समुदाय पहले से भरोसा करता था। इससे यह स्पष्ट संदेश गया कि हमारा उद्देश्य किसी उत्पाद या विचार को उन पर थोपना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसी जानकारी उपलब्ध कराना है जिसका इस्तेमाल वे अपनी ज़रूरत और समझ के अनुसार कर सकें। हमने यह भी सुनिश्चित किया कि भाषा किसी तरह की रुकावट न बने। अभियान की सामग्री और पोस्टर कई भाषाओं में तैयार किए गए। समय के साथ हमारे डिजिटल संसाधनों का दायरा भी बढ़ाया गया, ताकि वे हिंदी भाषी क्षेत्रों से बाहर के समुदायों तक भी पहुंच सकें।

इसके साथ ही, हमने शुरुआत से ही ट्रकिंग समुदाय के साथ पूरी पारदर्शिता बरती। इलेक्ट्रिक ट्रकों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के बजाय हमने साफ़ तौर पर बताया कि मौजूदा परिस्थितियों में वे आर्थिक रूप से लाभकारी साबित हो सकते हैं या नहीं और उनकी मौजूदा सीमाएं (मसलन, बैटरी की रेंज और चार्जिंग में लगने वाला समय) क्या हैं। ड्राइवरों और फ्लीट ऑपरेटरों ने ऐसे संदेशों पर कहीं अधिक भरोसा किया, जो उन्हें स्पष्ट जानकारी देते थे। यह उन संदेशों से अलग थे, जहां उन्हें लगता कि उन्हें कुछ बेचने की कोशिश की जा रही है।

हमने यह भी सुनिश्चित किया कि समुदाय को सवालों के जवाब तुरंत मिलें। इसके लिए हमने आईआईटी मद्रास के तकनीकी विशेषज्ञों के साथ-साथ उन ड्राइवरों, फ्लीट ऑपरेटरों और मैकेनिकों को भी बातचीत का हिस्सा बनाया, जिन्हें पहले से इलेक्ट्रिक ट्रकों के साथ काम करने का अनुभव था। जिस समुदाय में साथियों का अनुभव मायने रखता है, वहां इन अनुभवी लोगों की बात तकनीकी विशेषज्ञों जितनी ही भरोसेमंद मानी गई।

सांप-सीढी का खेल खेलते लोग_ट्रक
किसी भी कैंपेन की रूपरेखा तैयार करते समय सबसे आम गलतियों में से एक यह है कि हम पहले से तय करके चलते हैं कि लक्षित समुदाय किस तरह की बातों से जुड़ाव महसूस करेगा। | चित्र साभार: नई सोच की सवारी

5. समुदाय से जुड़ने का तरीका समझें

अपने लक्षित समुदाय को समझना काम का केवल एक हिस्सा होता है। उतना ही ज़रूरी यह भी होता है कि आप उनके साथ किस तरह जुड़ते हैं। बातचीत के तरीके, बातचीत कहां की जा रही है और आपका लहज़ा कैसा है इसी से यह तय होता है कि लोग उसमें शामिल होंगे भी या नहीं।

ट्रक चालकों के साथ काम करने का मतलब था उनकी रोज़मर्रा की परिस्थितियों के अनुरूप अपनी रणनीति बनाना। सड़क पर लंबे समय तक रहने के कारण उनके पास समय बहुत सीमित होता है। उन्हें जो थोड़ा बहुत आराम का समय मिलता भी है, वह अक्सर सड़क किनारे ढाबों या माल की लोडिंग-अनलोडिंग में चला जाता है। इसलिए हमने उनसे यह उम्मीद नहीं की कि वे हमारे पास आएं। इसके बजाय, हम वहीं गए जहां वे पहले से मौजूद थे। यानी हाईवे के विश्राम स्थल या रेस्ट स्टॉप, लोडिंग और अनलोडिंग पॉइंट (माल लादने और उतारने की जगहें), चाय की टपरियां और कंपनी की कैंटीनें। हमने उनसे उसी माहौल में बातचीत की, जहां वे सहज थे। फिर चाहे वे कुर्सी पर बैठे हों, सोफे पर या ज़मीन पर। इससे संवाद औपचारिक होने के बजाय स्वाभाविक और आत्मीय बना रहा। तकनीकी जानकारी देने वाले सत्रों को भी हमने ‘चाय पे चर्चा’ का रूप दिया, ताकि बातचीत सहज ढंग से आगे बढ़े और लोग खुलकर अपनी बात रख सकें। कई बार ऐसा भी हुआ कि हमारे वहां से चले जाने के बाद भी प्रतिभागियों के बीच चर्चा लंबे समय तक जारी रही।

हालांकि, इस प्रक्रिया में हमें एक और ज़रूरी बात समझ में आई। जहां ड्राइवर अनौपचारिक माहौल में ज़मीन पर साथ बैठकर बातचीत करने में सहज थे, वहीं उसी माहौल में फ्लीट ऑपरेटर सहज महसूस नहीं करते थे। यदि दोनों समूहों को एक ही तरह के सत्र में शामिल किया जाता, तो संवाद प्रभावी नहीं हो पाता। इसलिए, हमने दोनों से अलग-अलग ढंग से बातचीत करने की योजना बनाई। मसलन, फ्लीट ऑपरेटरों के साथ उनके कार्यालयों में अपेक्षाकृत औपचारिक चर्चा की गई, जबकि ड्राइवरों के लिए अनौपचारिक बैठकों का आयोजन किया गया। इनमें से किसी भी चर्चा में दूसरे समूह के लोगों के आने पर कोई रोक नहीं थी। संवाद का स्वरूप और स्थान इस तरह चुना गया कि वह स्वाभाविक रूप से उसी समूह को आकर्षित करे, जिसके लिए वह तैयार किया गया था।

बातचीत की शुरुआत करने के लिए हमने एक और दिलचस्प तरीका अपनाया। हम सामुदायिक बैठकों के दौरान सांप-सीढ़ी का खेल खेलते थे। इस खेल के ज़रिए हम यह समझना चाहते थे कि लोग इलेक्ट्रिक ट्रकों के बारे में क्या सोचते हैं। इसका नियम सरल था। जब कोई प्रतिभागी सीढ़ी पर पहुंचता, तो उसे इलेक्ट्रिक ट्रकों का एक फ़ायदा बताना होता था। और जब वह सांप पर आता, तो उसे अपनी किसी चिंता या आशंका के बारे में बताना होता था। इस तरीके से ऐसी धारणाएं सामने आईं, जो शायद किसी सामान्य सर्वेक्षण से कभी सामने नहीं आतीं। उदाहरण के लिए, जब इलेक्ट्रिक ट्रक को चार्ज होने में लगने वाले दो घंटे के समय की बात आई, तो हमने पहले से यह मान लिया था कि लोग इसे एक खामी के तौर पर देखेंगे। लेकिन ड्राइवरों ने इसे बिल्कुल अलग नज़रिए से देखा। उनके लिए इसका मतलब था लंबी दूरी के सफ़र के दौरान आराम करने का एक तय समय। यानी एक ऐसी सुविधा, जो उन्हें डीज़ल ट्रकों के साथ शायद ही कभी मिल पाती है।

6. सोचें कि आपके बाद आपकी पहल का क्या भविष्य होगा?

हमारे लिए बातचीत केवल सामुदायिक बैठकों तक सीमित नहीं थी। सत्र समाप्त होने के बाद भी लोगों के मन में कई सवाल बने रहते थे। मसलन, लोगों ने चार्जिंग, लागत और बैटरी की उम्र को लेकर सवाल उठाए और यह भी कि इलेक्ट्रिक ट्रक चलाने का अनुभव वास्तव में कैसा होता है। इसलिए हमने ऐसा एक माध्यम तैयार करने की कोशिश की, जहां लोग अपनी सुविधा के अनुसार कभी भी लौटकर जानकारी हासिल कर सकें। इसी सोच से ईवी ओके प्लीज़ नाम का एक यूट्यूब चैनल शुरू किया गया, जिसकी सामग्री ज़मीन पर लोगों की जिज्ञासाओं और सवालों के आधार पर तैयार की गई।

इसे प्रभावी बनाने के लिए हमने कुछ बातों का विशेष ध्यान रखा। सबसे पहली बात यह कि चैनल की सामग्री का सीधा संबंध उन्हीं सवालों से था, जो हमें समुदाय के बीच लगातार सुनने को मिल रहे थे। फील्ड में बातचीत के दौरान सामने आने वाले प्रश्नों, शंकाओं और भ्रांतियों को वीडियो का रूप दिया गया। इस तरह यह चैनल पहले से तय सामग्री का संग्रह बनने के बजाय, समय के साथ विकसित होते जवाबों का एक जीवंत भंडार बनता गया।

दूसरी अहम बात भाषा थी। लंबी दूरी तय करने वाले कई ट्रक चालक हिंदी या उत्तर भारत की अन्य भाषाएं बोलते थे, जबकि छोटी दूरी के चालक अक्सर अपनी स्थानीय भाषा में संवाद करने में अक्सर अधिक सहज थे। इसलिए, सामग्री कई भाषाओं में तैयार की गई, ताकि अलग-अलग क्षेत्रों और पृष्ठभूमियों के चालक उसे आसानी से समझ सकें।

आख़िर में, हम चाहते थे कि यह चैनल ट्रकिंग क्षेत्र की विविध पहलुओं को भी सामने लाए। इसलिए इसमें आईआईटी मद्रास के विशेषज्ञों, अशोक लेलैंड, बिलियन-ई, चार्ज-ज़ोन और भारी उद्योग मंत्रालय के प्रतिनिधियों के साथ-साथ स्वयं ट्रकिंग समुदाय के ड्राइवरों, मैकेनिकों और फ्लीट ऑपरेटरों को भी शामिल किया गया। इन वीडियो को व्हाट्सऐप समूहों के माध्यम से भी साझा किया गया, जिससे बातचीत सामुदायिक बैठकों तक सीमित न रहकर आगे भी जारी रह पाई।

असंगठित क्षेत्र के समुदायों के लिए कुछ तैयार करना केवल संचार की चुनौती नहीं है। यह शोध, डिज़ाइन और भरोसा कायम करने की चुनौती भी है। ऐसे समुदायों के साथ काम करते समय अक्सर पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध नहीं होते। साथ ही, लक्षित समुदाय हमारी शुरुआती कल्पना से कहीं अधिक विविध होता है और जिन मुद्दों को हम सबसे अहम मानते हैं, ज़रूरी नहीं कि लोगों के लिए भी वे उतने ही ज़रूरी हों।

‘नई सोच की सवारी’ पर काम करने के हमारे अनुभव ने हमें यह सिखाया कि इनमें से कोई भी चुनौती ऐसी नहीं है, जिसे पार न किया जा सके। इसके लिए सबसे पहले यह स्वीकार करना ज़रूरी है कि शुरुआत में हमारे पास हर सवाल का जवाब नहीं होगा। साथ ही, हमें अपनी बनी-बनाई धारणाओं को समुदाय की वास्तविकताओं के आधार पर बदलने के लिए तैयार रहना होगा। और सबसे ज़रूरी बात, हमें लोगों के साथ ऐसा संवाद और रिश्ता बनाना होगा जो फील्ड से हमारे लौट आने के बाद भी बना रहे।

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लेखक के बारे में

  • कृतिका महाजन पर्पज़ में रणनीतिक संचार (स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशंस) और जनसहभागिता (पब्लिक एंगेजमेंट) से जुड़ी पेशेवर हैं। उन्हें सामाजिक प्रभाव से जुड़े अभियानों और विभिन्न क्षेत्रों के साझेदारों के साथ पहलों का नेतृत्व करने का एक दशक से अधिक का अनुभव है। उनका काम मुख्य रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य, भ्रामक सूचनाओं, जलवायु कार्रवाई, स्वच्छ मोबिलिटी और वृद्धावस्था जैसे विषयों पर केंद्रित है। वह जटिल मुद्दों को स्पष्ट रणनीतियों और प्रभावी अभियानों में बदलने का काम करती हैं। उनके काम की विशेषता यह है कि वह नागरिक समाज, समुदायों, मीडिया और विभिन्न संस्थानों को साथ लाकर जनधारणाओं में बदलाव और व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा देती हैं।
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