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सामाजिक संस्थाओं में कम्युनिकेशन को ‘जुगाड़’ नहीं, व्यवस्था की ज़रूरत है

गैर-लाभकारी संस्थाएं अक्सर कम्युनिकेशन से जुड़ी चुनौतियों का समाधान अधिक लोगों की नियुक्ति करने या एकबारगी कार्यशालाओं में निवेश करने में तलाशती हैं।
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भारत की कई प्रभावशाली सामाजिक संस्थाओं के कामकाज में एक विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ, ज़मीनी स्तर पर उनका काम लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रहा होता है। समुदाय अधिक सशक्त और चुनौतियों का सामना करने में ज़्यादा सक्षम बन रहे होते हैं, और उनके पास अपने प्रभाव को साबित करने वाले ठोस आंकड़े भी होते हैं। लेकिन दूसरी तरफ, अपने कार्यान्वयन के दायरे से बाहर निकलते ही संस्थाएं लगभग अदृश्य नज़र आती हैं। 

संस्थाओं के नेतृत्वकर्ता इस समस्या को समझते हैं। इसके समाधान के तौर पर वे अक्सर एक जैसे तरीके ही अपनाते हैं। जैसे, सोशल मीडिया संभालने के लिए किसी जूनियर कर्मचारी की नियुक्ति करना या फिर प्रोग्राम टीम को तीन दिन की स्टोरीटेलिंग कार्यशाला में भेज देना।

मगर कुछ महीनों बाद भी स्थिति में कुछ खास बदलाव नहीं आता। स्पष्ट योजना के अभाव में नया नियुक्त जूनियर कर्मचारी न्यूज़लेटर का फॉर्मेट तैयार करने, तस्वीरों का आकार बदलने और अचानक आने वाले रोज़मर्रा के छोटे-छोटे कामों में उलझकर रह जाता है। दूसरी ओर, फील्डवर्क के दबाव की वजह से प्रोग्राम टीम को कार्यशाला में सीखी गई बातों को व्यवहार में लागू करने का अवसर ही नहीं मिल पाता। नतीजतन, संस्था की पहचान और दृश्यता वहीं की वहीं बनी रहती है। कई मामलों में ऐसे प्रयास संस्था के भीतर पहले से मौजूद इस धारणा को और मज़बूत कर देते हैं कि कम्युनिकेशन में पैसा या समय लगाना उतना ज़रूरी नहीं है। 

यह समस्या स्टोरीटेलिंग की नहीं है, बल्कि संस्थागत व्यवस्था की है। कम्युनिकेशन की क्षमता किसी एक व्यक्ति या कौशल से नहीं बनती। यह एक ऐसी प्रणाली का परिणाम होती है जिसमें रणनीति, क्रियान्वयन से पहले तय की जाती है, कार्य एक समान मानकों के अनुसार किए जाते हैं, भूमिकाएं स्पष्ट रूप से परिभाषित होती हैं और संस्थागत ज्ञान किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। 

ऐसी व्यवस्था तैयार करना आसान नहीं है, खासकर छोटी संस्थाओं के लिए। इसलिए यह समझना ज़रूरी है कि यह चुनौती पैदा क्यों होती है और व्यवहार में इसका प्रभावी विकल्प कैसा दिखता है। 

मौजूदा तरीका क्यों कारगर साबित नहीं होता? 

छोटी सामाजिक संस्थाओं के लिए अच्छे कम्युनिकेशन पेशेवरों को आकर्षित करना और उन्हें लंबे समय तक अपने साथ बनाए रखना आसान नहीं होता। इसकी एक वजह यह है कि वेतन के मामले में वे कॉर्पोरेट क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पातीं। वहीं, इस क्षेत्र में करियर की प्रगति का रास्ता भी हमेशा स्पष्ट और सीधा नहीं होता। 

ऐसी स्थिति में अधिकांश संस्थाएं एक-दो कामचलाऊ तरीके अपनाती हैं। सबसे आम तरीका यह होता है कि किसी अन्य विभाग के कर्मचारी को उसके नियमित कामों के साथ-साथ कम्युनिकेशन की ज़िम्मेदारी भी दे दी जाती है। इससे उस समय के लिए संसाधनों की कमी तो कुछ हद तक पूरी हो जाती है, लेकिन इससे संस्था की कम्युनिकेशन की क्षमता विकसित नहीं हो पाती। 

समय के साथ इसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है। कम्युनिकेशन से जुड़े काम के नतीजे असंगत होने लगता है, ज़िम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण नहीं हो पाता और यह कार्यक्षेत्र लगातार संसाधनों की कमी से जूझता रहता है। 

दूसरा तरीका यह होता है कि संस्था किसी फ्रीलांस पेशेवर को परियोजना-आधारित कार्यों के लिए नियुक्त करे। इस भूमिका में एक सक्षम व्यक्ति अलग-अलग कामों को अच्छी तरह पूरा कर सकता है, लेकिन वह संस्था की मौजूदा व्यवस्था के भीतर काम कर रहा होता है, उसे बदल नहीं रहा होता। ऐसे में योजना बनाने में कमियां, जवाबदेही और संचालन से जुड़ी खामियां तथा संस्था की आगे बढ़ने की स्पष्ट रणनीति का अभाव जैसी समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं। 

जब संस्था के भीतर काम से जुड़ी आवश्यक जानकारियां देने, उसकी समीक्षा करने और दिशा तय करने की क्षमता कमज़ोर या असंगत होती है, तो संस्था का कामकाज योजनाबद्ध न होकर तत्काल परिस्थितियों के मुताबिक ही चलता रहता है, फिर चाहे उसे कोई भी कर रहा हो।

बांस के डंडे पर बंधे छोटे-बड़े लाउडस्पीकर_कम्युनिकेशन
कम्युनिकेशन ऐसा क्षेत्र है जिस पर संस्था के लगभग सभी लोग अपनी राय देना ज़रूरी समझते हैं। | चित्र सभार: पिक्सेल 

एक और कम दिखाई देने वाली चुनौती निर्णय लेने के अधिकार से जुड़ी होती है। कम्युनिकेशन ऐसा क्षेत्र है जिस पर संस्था के लगभग सभी लोग अपनी राय देना ज़रूरी समझते हैं। निर्णय लेने और ज़िम्मेदारियां तय करने की स्पष्ट व्यवस्था के अभाव में सभी अपनी-अपनी राय देने लगते हैं। ये राय चाहे कितनी ही अच्छी नीयत से दी गई हों। रणनीतिक सोच पर हावी हो जाती हैं। नतीजन, व्यक्तिगत पसंद-नापसंद को अधिक महत्व मिलने लगता है।

इन सभी चुनौतियों के पीछे एक और बुनियादी समस्या मौजूद है। कई बोर्ड सदस्य, संस्था के नेतृत्वकर्ता और फंडर कम्युनिकेशन को एक रणनीतिक कार्यक्षेत्र के बजाय प्रशासनिक या अतिरिक्त खर्च के रूप में देखते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि संस्था के काम की सुव्यवस्थित प्रस्तुति फंडरेज़िंग, दूसरी संस्थाओं या लोगों के साथ साझेदारियां बनाने और कार्यक्रमों की विश्वसनीयता को मज़बूत करने में कितनी अहम भूमिका निभाती है। 

बोर्ड सदस्यों और फंडर्स के सामने कम्युनिकेशन के महत्व को कैसे रखें 

कम्युनिकेशन में होने वाला यह कम निवेश फंडिंग की मौजूदा व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है। आमतौर पर कम्युनिकेशन को अप्रत्यक्ष खर्च (इंडायरेक्ट कॉस्ट) की श्रेणी में रखा जाता है, और भारत के एनजीओ सेक्टर में इस तरह के खर्चों के लिए व्यवस्था ही ऐसी बनी हुई है कि उन्हें पर्याप्त वित्तीय समर्थन नहीं मिलता। 

वर्ष 2021 में ब्रिजस्पैन की शोध रिपोर्ट में पाया गया कि भारत की 83 प्रतिशत सामाजिक संस्थाओं को अपने अप्रत्यक्ष खर्चों के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता जुटाने में कठिनाई होती है। इसी अध्ययन में शामिल 40 संस्थाओं के वित्तीय विश्लेषण से पता चला कि उनकी वास्तविक अप्रत्यक्ष लागत कुल खर्च का औसतन 19 प्रतिशत थी। इसके बावजूद, फंडर्स आमतौर पर अनुदान राशि का केवल 5 से 10 प्रतिशत हिस्सा ही ऐसे खर्चों के लिए देते हैं, जो सीधे कार्यक्रम से जुड़े नहीं होते। बड़े फंडर्स के मामले में यह औसत केवल 9 प्रतिशत था। 

शोध के अनुसार, कई फंडर्स की सोच अब भी यही है कि कार्यक्रमों पर होने वाले सीधे खर्चों के अलावा बाकी खर्च प्रभाव पैदा करने में योगदान नहीं देते। 

संस्था के भीतर और बाहर, इस सोच को बदलने के लिए एक स्पष्ट और सुनियोजित तर्क प्रस्तुत करना आवश्यक है। इसके लिए कुछ कदम लगातार प्रभावी साबित हुए हैं: 

मांग को नए तरीके से प्रस्तुत करें: फंडर्स से ‘कम्युनिकेशन पर होने वाले अतिरिक्त खर्च’ के लिए सहायता मांगने के बजाय एक साझा उद्देश्य पर बात करें। जैसे, किसी मुद्दे को अधिक लोगों तक पहुंचाना, संस्था के काम को लेकर लोगों में भरोसा बनाना और फंडर के निवेश को उचित पहचान दिलाना। फंडर्स उस काम के लिए संसाधन उपलब्ध कराने के प्रति अधिक तैयार रहते हैं जिसके साथ उनका नाम और योगदान भी जुड़ा होता है।

सिर्फ बताइए नहीं, दिखाइए: बोर्ड सदस्यों और फंडर्स को काम के एक-दो ठोस नतीजों से परिचित कराइए। जैसे, किसी समुदाय पर आधारित प्रभावशाली कहानी, मीडिया में प्रकाशित सामग्री, या ऐसी डोनर रिपोर्ट जो वास्तव में पढ़ने योग्य और प्रभावशाली हो। कई बार एक अच्छा उदाहरण वह बात साबित कर देता है जो प्रस्तुति की कई स्लाइडें भी नहीं कर पातीं। 

इसे भी कार्यक्रम की तरह मापें और रिपोर्ट करें: कम्युनिकेशन से जुड़े नतीजों को भी व्यवस्थित रूप से दर्ज और साझा करें। उदाहरण के लिए, कितने लोगों तक पहुंच बनी, कवरेज की गुणवत्ता कैसी रही, कितने नए लोगों ने संपर्क किया और कितनी नई साझेदारियां शुरू हुईं। जब कम्युनिकेशन के परिणाम कार्यक्रमों के परिणामों के साथ समान रूप से प्रस्तुत किए जाते हैं, तब यह स्पष्ट दिखाई देता है कि संस्था की योजनाओं और रणनीतियों के संदर्भ में कम्युनिकेशन की कितनी अहमियत है। 

अन्य संस्थाओं के उदाहरण सामने रखें: ऐसे संगठनों की ओर ध्यान दिलाएं जिन्होंने अपने क्षेत्र में बेहतर दृश्यता और पहचान के माध्यम से अधिक फंडिंग, बेहतर प्रतिभाओं को आकर्षित करने और नीतिगत स्तर पर प्रभाव डालने में सफलता हासिल की है। सामाजिक क्षेत्र अक्सर अपने ही अनुभवों और उदाहरणों से सबसे तेज़ी से सीखता है। 

यही बदलाव कम्युनिकेशन को केवल एक खर्च मानने और उसे कम से कम रखने की सोच से आगे ले जाता है और उसे ऐसी संस्थागत क्षमता के रूप में देखा जाने लगता है, जिसे समय के साथ विकसित और मज़बूत बनाया जाना चाहिए। 

दो हाथ संवाद के चिह्न को पकड़े हुए_कम्युनिकेशन
समस्या स्टोरीटेलिंग की नहीं है, बल्कि संस्थागत व्यवस्था की है। कम्युनिकेशन की क्षमता किसी एक व्यक्ति या कौशल से नहीं बनती।| चित्र सभार: पिक्सेल 

व्यवहार में यह कैसा दिखता है? 

यदि कम्युनिकेशन को संस्था के एक प्रमुख कार्य के रूप में स्थापित करना है, तो यह बात संस्था की संरचना, प्रबंधन और उसे मिलने वाले में भी दिखाई देनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, कम्युनिकेशन केवल कुछ गतिविधियों तक सीमित न रहे, बल्कि संस्था के कामकाज का एक अभिन्न हिस्सा बने। 

व्यवहार में यह कैसा दिख सकता है, इसे समझने के लिए कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया जा सकता है: 

1. कम्युनिकेशन को संस्थागत महत्व दें 

कम्युनिकेशन को सबसे आखिर में किया जाने वाला काम नहीं माना जा सकता। यदि नेतृत्व इसे ‘वास्तविक काम’ के बाद जोड़े जाने वाले हिस्से के रूप में देखता है, तो टीम अपना समय काम करने के बजाय अपनी अहमियत को साबित करने में खर्च कर देगी। कार्यकारी नेतृत्व और बोर्ड की ओर से यह स्पष्ट निर्देश होना चाहिए कि कम्युनिकेशन संस्था का एक प्रमुख कार्यक्षेत्र है। 

व्यवहार में इसका मतलब है कि कम्युनिकेशन के लिए अलग बजट हो, नेतृत्व करने वाली टीम का एक सदस्य इसकी निगरानी करे, प्रबंधन समीक्षाओं में कम्युनिकेशन के परिणाम नियमित एजेंडा का हिस्सा हों, और कम्युनिकेशन प्रमुख को निर्णय लिए जाने के बाद जानकारी देने के बजाय रणनीतिक योजना बनाने की चर्चाओं में शामिल किया जाए। ये बहुत बडे संगठनात्मक बदलाव नहीं हैं, लेकिन ये संकेत देते हैं कि इस कार्यक्षेत्र के पीछे संस्थागत समर्थन मौजूद है। 

2. केवल काम करने वाले व्यक्ति को नहीं, एक आधार स्तंभ को नियुक्त करें

सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती निवेश ऐसे व्यक्ति में होता है जो कम्युनिकेशन के कार्यक्षेत्र की नींव रख सके। यानी मध्यम या वरिष्ठ स्तर का एक ऐसा पेशेवर, जो इस कार्यक्षेत्र की रूपरेखा तैयार कर सके, संस्था के बाकी लोगों को इसकी रणनीति समझा सके और समय के साथ एक टीम विकसित कर सके। इसके लिए शुरुआत से पूर्णकालिक नियुक्ति आवश्यक नहीं है; सही व्यक्ति के साथ अंशकालिक जुड़ाव भी, स्पष्ट दिशा के बिना की गई पूर्णकालिक नियुक्ति से अधिक प्रभावी हो सकता है। 

प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों और गरिमा पर काम करने वाली शोध एवं नीति बनाने और उसे लागू करने वाली संस्था वर्क फेयर एंड फ्री (डब्लूएफएफ) के साथ वर्डमैटर का काम इसका एक उदाहरण है। पिछले 18 महीनों में वर्डमैटर ने डब्लूएफएफ की डिजिटल मौजूदगी को संभाला है और कम्युनिकेशन की बुनियाद तैयार करने की दिशा में काम किया है, जबकि इस काम को संभालने वाले आंतरिक टीम के सदस्यों में बदलते रहे हैं। 

जिन संस्थाओं में कम्युनिकेशन की आंतरिक ज़िम्मेदारी बार-बार बदलती रहती है, वहां ऐसा आधार स्तंभ व्यक्ति संस्था के पुराने अनुभवों और समझ को बनाए रखता है और संगठन के भीतर आंतरिक क्षमता विकसित होने तक काम में निरंतरता सुनिश्चित करता है। इस बाहरी आधार स्तंभ की निरंतर मौजूदगी का परिणाम यह रहा कि छोटे गैर-लाभकारी संगठनों में आम तौर पर देखने को मिलने वाला कर्मचारियों का बार-बार बदलना भी डिजिटल माध्यमों पर लोगों के जुड़ाव को बाधित नहीं कर सका और न ही उसकी प्रगति को फिर से शून्य पर ले गया। 

डब्लूएफएफ का यह अनुभव एक ऐसी संस्था को दर्शाता है जिसने अपने कम्युनिकेशन के सफर के शुरुआती चरण में ही बाहरी आधार स्तंभ में निवेश करने की दूरदर्शिता दिखाई। हालांकि, हर छोटी गैर-लाभकारी संस्था के लिए ऐसा कर पाना संभव नहीं होगा। 

जिन छोटी गैर-लाभकारी संस्थाओं के पास इतने संसाधन भी नहीं हैं कि वे कुछ समय के लिए किसी व्यक्ति को कम्युनिकेशन के लिए नियुक्त कर सकें, उनके लिए कुछ व्यावहारिक विकल्प मौजूद हैं। दो या तीन समान सोच वाली संस्थाएं अपनी साझा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए किसी वरिष्ठ सलाहकार की सेवाएं साझा कर सकती हैं। सेक्टर से जुड़े संगठन, पूर्व छात्रों के नेटवर्क और बिना शुल्क काम करने के लिए तैयार कम्युनिकेशन पेशेवर एक निश्चित अवधि के लिए संरचित मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं। सेवानिवृत्त या दो नौकरियों के बीच के दौर से गुज़र रहा कोई वरिष्ठ पेशेवर भी मामूली मानदेय पर इस कार्यक्षेत्र की ज़िम्मेदारी संभालने के लिए तैयार हो सकता है। 

सिद्धांत एक ही है: शुरुआत में ही किसी अनुभवी व्यक्ति द्वारा लिया गया निर्णय बाद में जूनियर लोगों द्वारा इस काम को संभालने से ज़्यादा असरदार होता है।

3. ज़मीनी स्तर से लोगों का जुड़ाव सुनिश्चित करें 

जो कम्युनिकेशन टीमें नियमित रूप से फील्ड की वास्तविकताओं से जुड़ी नहीं रहतीं, वे समय के साथ किसी प्रोजेक्ट या कार्य की संक्षिप्त जानकारी देने वाले दस्तावेज़ों और दूसरों से मिली जानकारी के आधार पर काम करने लगती हैं। इससे तैयार की गई सामग्री काम चलाने लायक तो हो सकती है, लेकिन उसमें वह विशिष्टता नहीं होगी जो काम को स्वयं देखकर प्राप्त होती है।

फील्ड से जुड़ाव दोहरा उद्देश्य पूरा करता है। इससे तैयार होने वाली सामग्री की गुणवत्ता तो बेहतर होती ही है। साथ ही, फील्ड पर नियमित उपस्थिति कम्युनिकेशन टीम को संस्था की ज़मीनी वास्तविकताओं से जोड़े रखने के कुछ विश्वसनीय तरीकों में से एक है। इसलिए फील्ड विजिट को कम्युनिकेशन टीम के कैलेंडर में एक प्रमुख पेशेवर ज़िम्मेदारी के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। 

जब टीम फील्ड में समय बिताती है, तो कार्यक्रम को चलाने वाले कर्मचारियों के साथ बने संबंध, संस्था जिन समुदायों के साथ काम करती है उनके बारे में विकसित समझ, और वहां से प्राप्त संदर्भगत जानकारी, सभी उस नैरेटिव की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं, जिसे टीम तैयार करती है। 

इस आदत को विकसित करने के लिए, कम से कम शुरुआत में, एक संरचना की ज़रूरत होती है। 2019 में पानी, आजीविका और शासन से जुड़ी चुनौतियों पर ग्रामीण समुदायों के साथ काम करने वाली संस्था ग्राम विकास ने अपनी कम्युनिकेशन टीम के लिए त्रैमासिक फील्ड विजिट ट्रैकर शुरू किया। यह एक सरल व्यवस्था थी, जिसमें तहत प्रत्येक तिमाही की शुरुआत में नियोजित फील्ड विजिट को दर्ज करना होता था और फिर तीन महीने बाद उनकी रिपोर्ट देनी होती थी। 

इस ट्रैकर ने अपना उद्देश्य पूरा किया। एक बार जब फील्ड विज़िट टीम के कामकाज का नियमित हिस्सा बन गईं, तो इस व्यवस्था की आवश्यकता नहीं रही। यह अनुशासन टीम के काम करने के तरीके का हिस्सा बन चुका था। 

4. कम्युनिकेशन की ज़िम्मेदारी केवल कम्युनिकेशन टीम तक सीमित न रखें 

अधिकांश गैर-लाभकारी संस्थाओं में कम्युनिकेशन टीम के पास कार्यक्रमों से जुड़ा गहरा तकनीकी ज्ञान नहीं होता, जबकि प्रोग्राम टीम के पास स्टोरीटेलिंग के लिए आवश्यक कौशल या समय की कमी हो सकती है। अगर दोनों टीमें एक दूसरे से सीखें तो इस फर्क को फासले को कम किया जा सकता है। ऐसे नियोजित सत्र, जिनमें दोनों टीमें एक-दूसरे को कोई व्यावहारिक कौशल सिखाएं, संस्था के काम को बताने के तरीके पर सभी की साझी समझ और ज़िम्मेदारी विकसित कर सकते हैं। 

ग्राम विकास ने इस सिद्धांत को बड़े स्तर पर अपनाया। लगभग 3,000 गांवों में काम करने वाली इस संस्था के सामने यह व्यावहारिक चुनौती थी कि उसकी मुख्य टीम में केवल तीन सदस्य थे। इस चुनौती से निपटने के लिए संस्था ने दो वर्षों में 128 फील्ड कर्मचारियों को स्टोरीटेलिंग और दस्तावेज़ीकरण का प्रशिक्षण दिया। दूसरे वर्ष तक कुल सामग्री का 45 प्रतिशत, फील्ड के कर्मचारियों ने बनाया। जब महामारी के दौरान केंद्रीय टीम की आवाजाही रुक गई, तब उस वर्ष तैयार की गई सामग्री का आधे से अधिक हिस्सा फील्ड कर्मचारियों ने तैयार किया। ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि क्षमता का विकेंद्रीकरण किया गया था और उसे संस्था की कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाया गया था। 

कम्युनिकेशन टीम के कार्य की प्रभावशीलता काफी हद तक प्रोग्राम टीम के साथ उसके संबंधों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। प्रोग्राम टीमें अक्सर उन समुदायों और वास्तविकताओं के सबसे करीब होती हैं जिनमें संस्था बदलाव लाने का प्रयास कर रही होती है। उनके पास वह ज्ञान, अनुभव और संदर्भगत जानकारी होती है जो कम्युनिकेशन को विशिष्टता और विश्वसनीयता प्रदान करती है। 

दोनों के बीच मज़बूत संबंध लगातार नई जानकारियों और समझ के प्रवाह को संभव बनाते हैं। इसके विपरीत, कमज़ोर या केवल औपचारिक संबंधों की स्थिति में कम्युनिकेशन अक्सर सामान्य और सतही रह जाता है। इसलिए कम्युनिकेशन टीम का कार्यक्रमों के साथ नज़दीकी जुड़ाव होना ज़रूरी है, ताकि वे व्यावहारिक अनुभवों से उभरने वाली बातों को समझ सकें और प्रभावी ढंग से सामने ला सकें।

5. अस्पष्टता से होने वाली थकान से प्रतिभाशाली लोगों को बचाएं

छोटी संस्थाओं में कम्युनिकेशन से जुड़े प्रतिभाशाली व्यक्तियों के कमज़ोर पड़ने या संस्था छोड़ने के पीछे दो कारण लगातार दिखाई देते हैं: अस्पष्ट अपेक्षाएं और सीमित संसाधनों का बिखराव। कम्युनिकेशन कार्यक्षेत्र का आधार स्तंभ जो भी व्यक्ति हो, कम्युनिकेशन संबंधी सभी अनुरोधों के लिए एकमात्र संपर्क व्यक्ति वही होना चाहिए। उसका काम यह सुनिश्चित करना हो कि किन अनुरोधों को छांटा जाए और किन्हे प्राथमिकता दी जाए, ताकि टीम की क्षमता का रणनीतिक उद्देश्यों की दिशा में उपयोग हो सके। 

इसके अलावा दो और चीज़ों में निवेश महत्वपूर्ण है। पहला है संस्थागत स्मृति का निर्माण। इसके लिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि सामग्री कैसे एकत्र की जाएगी, उसकी समीक्षा कैसे होगी, उसे मंज़ूरी कैसे मिलेगी और उसे सुरक्षित कैसे रखा जाएगा। यह व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो किसी एक व्यक्ति के कार्यकाल पर निर्भर न रहे। 

कई बोर्ड सदस्य, संस्था के नेतृत्वकर्ता और फंडर कम्युनिकेशन को एक रणनीतिक कार्यक्षेत्र के बजाय प्रशासनिक या अतिरिक्त खर्च के रूप में देखते हैं।

दूसरा महत्वपूर्ण निवेश है फ्रीलांसरों और सेवा प्रदाताओं का एक भरोसेमंद नेटवर्क तैयार करना, जिसे विभिन्न प्रकार के कार्यों और अलग-अलग बजट के मुताबिक उपयोग किया जा सके। एक विश्वसनीय बाहरी नेटवर्क छोटी टीम को उस पहुंच और क्षमता से लैस कर सकता है, जो सामान्यतः बड़ी टीम के पास होती है। 

6. एक बार के प्रशिक्षण के बजाय निरंतर सहयोग को प्राथमिकता दें 

कम्युनिकेशन क्षमता निर्माण के लिए अल्पकालिक कार्यशालाओं पर सोशल सेक्टर की निर्भरता की समीक्षा की जानी चाहिए। निरंतर सहयोग के अभाव में उनका प्रभाव कुछ ही सप्ताहों में समाप्त हो जाता है। स्थायी क्षमता, काम करते हुए नियमित अभ्यास से विकसित होती है। यह तब बनती है जब कोई वरिष्ठ पेशेवर समय के साथ टीम के साथ मिलकर वास्तविक कार्यों पर काम करता है, जैसे डोनर रिपोर्ट तैयार करना, मीडिया के साथ हुए संवादों संभालना या संस्था की कार्यसंस्कृति को समझते हुए काम करना। महत्वपूर्ण अवसरों पर मौजूद रहकर दी गई मदद ही गहन सहयोग और समय-समय पर मिलने वाले मार्गदर्शन के बीच अंतर पैदा करती है। 

छोटी संस्थाओं के लिए यह ज़रूरी नहीं कि इसमें बहुत पैसा खर्च किया जाए। किसी बाहरी मार्गदर्शक के साथ मासिक समीक्षा बैठक, समान चरण में काम कर रही दो या तीन अन्य गैर-लाभकारी संस्थाओं के साथ मिलकर सीखने का समूह, या प्रत्येक तिमाही में कुछ चुनिंदा कार्यों पर संरचित प्रतिक्रिया ये सभी वह काम कर सकते हैं जो एक बार आयोजित की गई कार्यशाला नहीं कर पाती। 

कार्यशाला की तुलना में मार्गदर्शन का असर कम दिखाई देने वाला होता है और इसके लिए संसाधन जुटाना भी अधिक कठिन हो सकता है, लेकिन उसका प्रभाव समय के साथ बढ़ता जाता है। कई महीनों में यह केवल लोगों के काम करने के तरीके को नहीं, बल्कि कम्युनिकेशन के बारे में उनकी सोच को भी बदल देता है। 

फंडर्स क्या कर सकते हैं 

इस चर्चा का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष फंडर्स से जुड़ा है। जिन गैर-लाभकारी संस्थाओं ने मज़बूत और विश्वसनीय कम्युनिकेशन कार्यक्षेत्र विकसित किए हैं, उनमें लगभग हमेशा कोई एक फंडर या फंडर्स का छोटा समूह शामिल रहा है, जिसने अलग तरीके से सोचने और सहयोग करने का निर्णय लिया। 

व्यवहार में इसका अर्थ यह रहा है कि अप्रत्यक्ष खर्चों के लिए प्रचलित 5–10 प्रतिशत के बजाय वास्तविक ज़रूरतों के अनुरूप वित्तीय सहायता दी जाए; कम्युनिकेशन को छिपे हुए खर्च की तरह बाकी खर्चों में शामिल करने के बजाय उसे बजट में एक अलग मद के रूप में शामिल किया जाए; और अनुदान प्राप्त संस्थाओं के समूह के लिए वरिष्ठ कम्युनिकेशन मार्गदर्शकों जैसे साझा संसाधनों को सहयोग दिया जाए। 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह समझा जाए कि कम्युनिकेशन की क्षमता समय के साथ विकसित होती है। इसे बनाने में कई महीने या कभी-कभी कुछ वर्ष भी लग सकते हैं, यह किसी एक अनुदान चक्र में तैयार नहीं हो जाती। एक बार आयोजित की गई कार्यशाला कौशलों में सुधार ला सकती है, लेकिन निरंतर मार्गदर्शन संस्थागत व्यवस्थाओं और दीर्घकालिक क्षमता के निर्माण में मदद करता है। 

रोहिणी नीलेकणी फिलैंथ्रॉपीज (आएनपी) इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण प्रस्तुत करती है। आएनपी के अधिकांश अनुदान अप्रतिबंधित होते हैं, जिससे साझेदार संस्थाओं को कम्युनिकेशन और संस्थागत विकास में निवेश करने की स्वतंत्रता मिलती है तथा उन्हें इन मदों को शेष बचे खर्चों के रूप में नहीं देखना पड़ता। 

व्यक्तिगत अनुदानों से आगे बढ़कर, आएनपी ने अपने साझेदार संस्थानों के समूह के लिए साझा व्यवस्थाओं में भी निवेश किया है। इनमें 17 सत्रों वाला एक इम्पैक्ट कम्युनिकेशन कार्यक्रम शामिल है, जिसमें लक्षित समूह की पहचान करना (ऑडियंस मैपिंग), डिज़ाइन और जनसंपर्क जैसे विषय शामिल हैं। इसके साथ ही, लक्षित स्टोरीटेलिंग अनुदानों ने संस्थाओं को अपनी दस्तावेज़ीकरण प्रणालियों को मज़बूत करने, कम्युनिकेशन कर्मचारियों की नियुक्ति करने और ज़मीनी स्तर की कहानियों को अधिक नियमित रूप से सामने लाने में मदद की है। 

यह मॉडल इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि इसमें तीन ऐसे निवेशों को एक साथ जोड़ा गया है, जो आमतौर पर एक साथ कम ही दिखाई देते हैं: अप्रतिबंधित वित्तीय सहायता, अनुदान प्राप्त संस्थाओं के बीच साझा क्षमता निर्माण, और विशिष्ट क्षमता संबंधी कमियों को दूर करने के लिए लक्षित सहयोग। 

जब फंडर्स इस तरह कम्युनिकेशन में निवेश करते हैं, तो इसका लाभ केवल किसी एक संस्था तक सीमित नहीं रहता। इससे पूरे क्षेत्र को यह संकेत मिलता है कि कम्युनिकेशन निवेश का एक वैध और महत्वपूर्ण क्षेत्र है, और इससे अगली संस्था के लिए ऐसे निवेश का समर्थन हासिल करना भी आसान हो जाता है। 

मौजूदा सीमाओं के बावजूद, गैर-लाभकारी संस्थाएं स्वयं भी इसकी बुनियाद रखना शुरू कर सकती हैं। किसी छोटी संस्था के लिए, जो यह सोच रही हो कि शुरुआत कहां से की जाए, यह प्रक्रिया उतनी कठिन नहीं है जितनी पहली नज़र में दिखाई देती है। सबसे पहले, बोर्ड स्तर पर यह स्पष्ट सहमति बनाएं कि कम्युनिकेशन एक रणनीतिक कार्यक्षेत्र है, कोई सहायक सेवा नहीं। इसके बाद कनिष्ठ स्तर की नियुक्तियां करने से पहले आधार स्तंभ के तौर पर किसी व्यक्ति की पहचान करें, चाहे वह अंशकालिक हो, साझा व्यवस्था के तहत हो या किसी मार्गदर्शक के सहयोग से। फिर उसके आसपास यथासंभव सरल व्यवस्था विकसित करें। 

कार्यशालाओं की तुलना में मार्गदर्शन को प्राथमिकता दें, फील्ड से जुड़ाव के नियमित अवसर बनाएं और फंडर्स के सामने अपनी बात साझा परिणामों की भाषा में रखें। 

कहानियां पहले से मौजूद हैं। कमी केवल उस व्यवस्था की है जो उन्हें सामने ला सके। 

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लेखक के बारे में

  • रॉबिन जैकब अब्राहम वर्डमैटर कम्युनिकेशंस के सह-संस्थापक और साझेदार हैं। उन्होंने लगभग दो दशकों तक लाभकारी और गैर-लाभकारी संस्थाओं के साथ कम्युनिकेशन, प्रौद्योगिकी और संस्थागत विकास के क्षेत्र में काम किया है। वेबचटनी/ड्रिजलिन, ग्रेट प्लेस टू वर्क, अंबुजा फाउंडेशन और डब्लूओआरटी में काम करने के अनुभव ने उन्हें यह गहरी समझ दी है कि कम्युनिकेशन को टिकाऊ बनाने के लिए उसे संस्थागत संस्कृति का हिस्सा बनाना आवश्यक है। रॉबिन का काम ऐसी प्रणालियां, डिजिटल ढांचे और कार्य-संचालन की आधारभूत व्यवस्थाओं निर्माण पर केंद्रित है, जो संस्थाओं को कम्युनिकेशन के मामले में आत्मनिर्भर बनने में सक्षम बनाती हैं।
  • प्रिया पिल्लई वर्डमैटर कम्युनिकेशंस की संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) हैं। उन्होंने भारत में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक परिवर्तन के लिए काम करने वाली संस्थाओं के कार्यक्रमों, शोध और कम्युनिकेशन का नेतृत्व करते हुए 20 वर्षों का अनुभव प्राप्त किया है। उन्होंने ग्राम विकास, कर्नाटक हेल्थ प्रमोशन ट्रस्ट और स्ट्राइव कंसोर्टियम जैसी संस्थाओं के साथ काम किया है। आईआरएमए की पूर्व छात्रा प्रिया ने डोनर के सहयोग से चलने वाली ऐसी संस्थाओं में कम्युनिकेशन की बेहतर व्यवस्था निर्मित कीहै, जहां कार्यक्रमों की जटिलताएं, सीमित संसाधन और संस्थागत प्राथमिकताओं के बीच लगातार संतुलन बनाते हुए काम करना होता है। प्रिया का ध्यान संस्थागत पहचान को मज़बूत करने, संस्था के काम को लोगों तक पहुंचाने की रणनीति विकसित करने और कम्युनिकेशन की ऐसी व्यवस्थाएं खड़ी करने पर केंद्रित है, जिन्हें संस्थाएं लंबे समय तक बनाए रख सकें।