आज़ादी के आठ दशक बाद भी वन विभाग के नियंत्रण में क्यों हैं मध्य प्रदेश के वन ग्राम?
मध्य प्रदेश के बैतूल जिले की घोड़ाडोंगरी तहसील में एक गांव है, बांसबोड़ी। जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर, सतपुड़ा के जंगलों के बीच बसे इस गांव में करीब 100 परिवार रहते हैं। इनमें अधिकांश गोंड और कोरकू समुदायों के हैं। यह एक ‘वन ग्राम’ है। जब गांव के लोगों से पूछा गया कि इसे वन ग्राम क्यों कहा जाता है, तो उनका जवाब था, “क्योंकि यह गांव वन विभाग ने बसाया है और इसका प्रशासन आज भी वन विभाग ही देखता है। हाल तक जन्म-मृत्यु का रिकॉर्ड भी बीट गार्ड ही रखता था।”
यह जवाब चौंकाता है। देश को आज़ाद हुए लगभग आठ दशक हो चुके हैं, फिर भी बांसबोड़ी जैसे गांव सामान्य राजस्व ग्रामों की तरह क्यों नहीं हैं? इनका प्रशासन अब भी वन विभाग के नियंत्रण में क्यों है?
वन ग्राम वे बस्तियां हैं जिन्हें वन विभाग ने अपने नियंत्रण वाले वन क्षेत्रों में बसाया या अपने प्रशासनिक ढांचे में शामिल किया। इन गांवों में भूमि, रिकॉर्ड और प्रशासन लंबे समय तक राजस्व विभाग के बजाय वन विभाग के अधीन रहे।
वन ग्रामों में विकास और नागरिक सुविधाएं लगभग न के बराबर हैं। जो कुछ है, वह भी वन विभाग की अनुकंपा पर निर्भर है। यहां के लोग अपनी जमीन गिरवी नहीं रख सकते, बेच नहीं सकते, बैंक से ऋण नहीं ले सकते और खेती संबंधी सरकारी रियायतों का लाभ भी सीमित रूप में ही पा सकते हैं। यह गांव संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्र में आता है। यहां पेसा (PESA) कानून लागू है। साल 2022 में इसके नियम बनाए गए जिसके मुताबिक इस गांव में स्व-शासन के लिए ग्राम सभाएं निर्णय लेने के लिए स्वायत्त और शक्तिसंपन्न हैं लेकिन यह एक वन ग्राम है इसलिए इनके सारे निर्णय अंतत: वन विभाग के अधीन हैं। यह रवायत ब्रिटिश राज से चली आ रही है।
गांव के लोग बताते हैं कि उनके लिए जमीन केवल खेती का साधन नहीं, बल्कि पहचान और सुरक्षा का आधार है।
ऐसे गांव आज भी सामान्य राजस्व ग्रामों की तरह अधिकार और प्रशासनिक दर्जा हासिल नहीं कर पाए हैं। भारत की संसद ने 2006 में वन अधिकार कानून पारित करते हुए स्वीकार किया था कि आदिवासियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के साथ ‘ऐतिहासिक अन्याय’ हुआ है। वन ग्राम इसी अन्याय की सबसे स्पष्ट मिसाल हैं।
देश में ऐसे गांवों की संख्या लगभग 4500 से 5000 के बीच रही है। इनमें सबसे अधिक, 925 वन ग्राम मध्य प्रदेश में हैं।


वन ग्रामों के बसने-बसाने का इतिहास
वन ग्रामों का इतिहास ब्रिटिश शासन की वैज्ञानिक वानिकी और औद्योगिक जरूरतों से जुड़ा है। साल 1865 के भारतीय वन अधिनियम और बाद में 1878 तथा 1927 के वन कानूनों के ज़रिए अंग्रेजों ने जंगलों को राज्य नियंत्रण में लेना शुरू किया। उनका उद्देश्य स्पष्ट था, औद्योगिक जरूरतों के लिए वन संसाधनों का औद्योगिक दोहन और राजस्व में वृद्धि। इन कानूनों ने राज्य को किसी भी जंगल को आरक्षित घोषित करने का अधिकार दिया।
इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा प्रभाव आदिवासी समुदायों पर पड़ा। सदियों से वे झूम या बेवर खेती करते आए थे, जिसे अंग्रेजों ने ‘अ-वैज्ञानिक’ बताकर प्रतिबंधित कर दिया। पारंपरिक खेती का यह तरीका आदिवासियों की मान्यताओं पर आधारित था कि वो हल चलाकर धरती माता का गर्भ नहीं चीर सकते। जंगल आरक्षित घोषित हुए और आदिवासी समुदायों को उनसे बेदखल किया जाने लगा। दूसरी ओर, जंगलों के दोहन के लिए श्रमिकों की आवश्यकता थी। परिणामस्वरूप, जिन समुदायों को जंगलों से हटाया गया, उन्हीं को वन ग्रामों में बसाकर वन विभाग के लिए श्रम करने को बाध्य किया गया। जंगल के अभिभावक माने जाने वाले समुदाय, बेगार मज़दूर बना दिए गए।
कुछ पहले से बसे गांवों को वन ग्राम घोषित कर दिया गया और कुछ नए ग्राम बसाए गए। कई राजस्व ग्राम भी वन ग्रामों में बदल दिए गए। वन ग्रामों में बसाने की सामान्य शर्तें थीं, झूम खेती पर प्रतिबंध, सीमित भूमि पट्टे, प्रत्येक परिवार से वन विभाग के लिए श्रम तथा गांव के प्रशासन और रिकॉर्ड पर वन विभाग का नियंत्रण।
वन ग्रामों में विकास और नागरिक सुविधाएं लगभग न के बराबर हैं। जो कुछ है, वह भी वन विभाग की अनुकंपा पर निर्भर है।
आज़ादी के बाद भी जारी व्यवस्था
संविधान लागू होने के साथ ही बेगार और जबरन श्रम को अवैध घोषित कर दिया गया था लेकिन वन ग्रामों में औपनिवेशिक नियंत्रण की संरचना बनी रही। वन विभाग का प्रशासनिक ढांचा लगभग जस का तस बना रहा। वन ग्रामों के निवासियों को न तो पूर्ण नागरिक अधिकार मिले और न ही उन्हें अपनी भूमि पर वैधानिक स्वामित्व प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप वे एक ऐसी प्रशासनिक स्थिति में फंसे रहे जहां वे न पूरी तरह वनवासी माने गए और न ही सामान्य ग्रामीण नागरिक।
साल 1952 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आदिवासी नीति के संदर्भ में ‘आदिवासी पंचशील’ का विचार रखा था। इसमें आदिवासी समुदायों के जीवन और संस्कृति का सम्मान करने, उन पर बाहरी मूल्यों को जबरन न थोपने तथा उनकी परंपरागत संस्थाओं को मजबूत करने की बात कही गई थी। लेकिन वन ग्रामों की वास्तविकता इससे उलट रही और यहां राज्य का नियंत्रण बना रहा।
साल 1961 के अनुसूचित क्षेत्र एवं अनुसूचित जनजाति आयोग (ढेबर कमीशन) ने वन ग्रामों के निवासियों को भूमि पर स्थायी अधिकार देने की सिफारिश की पर इसका विशेष असर नहीं पड़ा। 1975 में पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्रियों की बैठक और 1978 के राज्य वन मंत्रियों के सम्मेलन में यह अनुशंसा की गई कि वन ग्रामों को राजस्व ग्रामों में बदला जाए और वहां रहने वाले लोगों को भूमि पर स्थायी अधिकार दिए जाएं।
इस बीच सन 1976 में, मध्य प्रदेश वन ग्राम नियम अमल में आए। इनके प्रावधानों के अनुसार, वन ग्रामों में रहने वाले प्रत्येक परिवार को 2.5 हेक्टेयर भूमि आवंटित की गई। संयुक्त परिवारों को अतिरिक्त 2 1/2 (ढाई) हेक्टेयर भूमि भी दी गई लेकिन इन्हें राजस्व का दर्जा नहीं दिया गया। ठीक इसी समय महाराष्ट्र में वन ग्रामों को राजस्व ग्रामों में संपरिवर्तित किया गया।
बाद में 1984 में कृषि मंत्रालय ने अधिक अन्न उपजाओ अभियान के तहत राज्यों को, वन ग्रामों में बसे लोगों को दीर्घकालिक वंशानुगत अधिकार देने की सलाह दी।


भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने अपने पत्र संख्या 13-1-90-FP, दिनांक 18.9.1990 को (i) इन गांवों के निवासियों को भूमि पर वंशानुगत किन्तु अविच्छेद्य अधिकार देने तथा (ii) वन क्षेत्रों के भीतर स्थित इन तथा अन्य राजस्व गांवों के प्रशासन की ज़िम्मेदारी प्राथमिक रूप से राज्य के वन विभाग को सौंपे जाने की सिफ़ारिश की।
हालांकि, मध्य प्रदेश सरकार ने 2001 में वन ग्रामों के राजस्व में संपरिवर्तन के लिए केंद्र सरकार से अनुमति मांगी लेकिन 1980 के वन संरक्षण कानून के हवाले से उसे खारिज कर दिया गया।
वन अधिकार कानून और नया विवाद
वन अधिकार कानून, 2006 केवल भूमि अधिकारों का कानून नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र द्वारा ऐतिहासिक अन्याय की औपचारिक स्वीकृति भी है। इस कानून ने पहली बार यह माना कि आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासी समुदायों को औपनिवेशिक काल से लेकर स्वतंत्र भारत तक लगातार उनके पारंपरिक अधिकारों से वंचित किया गया। इसलिए इस कानून में व्यक्तिगत और सामुदायिक दोनों प्रकार के वन अधिकारों को मान्यता देने की व्यवस्था की गई।
कानून में स्पष्ट रूप से कहा गया कि वन ग्रामों, पुराने बसाहट क्षेत्रों और सर्वेक्षण से बाहर रह गए गांवों को राजस्व ग्रामों में परिवर्तित किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं था बल्कि इन समुदायों को वही संवैधानिक और नागरिक अधिकार उपलब्ध कराना था जो देश के अन्य ग्रामीण नागरिकों को प्राप्त हैं।
सवाल सीधा है कि जिन गांवों को स्वयं वन विभाग ने बसाया, उनके निवासियों को आज यह क्यों साबित करना पड़ रहा है कि वे वन आश्रित समुदाय हैं?
इसके बावजूद कई राज्यों में इस कानून की भावना के अनुरूप कार्यान्वयन नहीं हुआ। विशेषकर मध्य प्रदेश में वन विभाग और राजस्व प्रशासन के बीच अधिकारों की खींचतान ने प्रक्रिया को और जटिल बना दिया। ग्राम सभाओं को कानून में केंद्रीय भूमिका दी गई लेकिन व्यवहार में निर्णय लेने की शक्ति अक्सर प्रशासनिक तंत्र के हाथों में ही बनी रही। यानी कागज पर ग्राम सभा को स्थानीय निर्णयों में अहम भूमिका मिली है, लेकिन वन ग्राम का दर्जा होने से भूमि और प्रशासन से जुड़े कई फैसलों में वन विभाग की भूमिका निर्णायक बनी रहती है।
साल 2006 में वन अधिकार कानून लागू होने के बाद छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने वन ग्रामों को राजस्व ग्रामों में संपरिवर्तित किया। इस कानून में वन ग्रामों के संपरिवर्तन का स्पष्ट प्रावधान हैं।
लेकिन मध्य प्रदेश में स्थिति उलटी दिशा में बढ़ी। स्थानीय संगठनों और अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि 2008 में वन विभाग ने कई परिवारों से पुराने पांच हेक्टेयर वाले पट्टे वापस लेकर कम भूमि के नए पट्टे जारी किए, जिससे वन अधिकार कानून के तहत मान्यता मिलने वाली ज़मीन कम हो गई।
पिछले साल अप्रैल और सितंबर में वन ग्रामों को राजस्व ग्रामों में बदलने के लिए नई मानक प्रक्रिया (SoP) जारी की गई है। लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह प्रक्रिया ऐतिहासिक वास्तविकताओं को नज़रअंदाज़ करती है और नए प्रकार के अन्याय पैदा करती है।
सवाल सीधा है कि जिन गांवों को स्वयं वन विभाग ने बसाया, उनके निवासियों को आज यह क्यों साबित करना पड़ रहा है कि वे वन आश्रित समुदाय हैं? जब सारे रिकॉर्ड वन विभाग के पास हैं और समुदाय उसकी अनुमति से पीढ़ियों से वहां रह रहे हैं तो उनसे अतिरिक्त प्रमाण क्यों मांगे जा रहे हैं?
वन ग्रामों का सवाल केवल ज़मीन का नहीं है। यह इस बात की परीक्षा भी है कि वन अधिकार कानून और पेसा जैसे कानून जमीन पर कितने प्रभावी हैं। जिन समुदायों को वन विभाग ने बसाया और जिनके रिकॉर्ड उसी विभाग के पास हैं, उनसे आज भी अपने अधिकार साबित करने को कहना ऐतिहासिक अन्याय को और लंबा खींचता है।
यह लेख मूल रूप से मोंगाबे हिंदी पर प्रकाशित हुआ है।
लेखक के बारे में
- सत्यम श्रीवास्तव हिंदी लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और वन अधिकार विषय के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से एमफिल की शिक्षा प्राप्त की है। पिछले दो दशकों से वे जन आंदोलनों, आदिवासी समुदायों और मानवाधिकार के मुद्दों के साथ सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं।सत्यम श्रुति संस्था के निदेशक रह चुके हैं और अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के साथ भी काम कर चुके हैं। वर्तमान में वे स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं। वनाधिकार के मुद्दों पर एट्री संस्था के साथ जुड़े हैं। वन अधिकार, आदिवासी प्रश्न, आजीविका और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर उनका गहरा अनुभव और समझ है। उनके लेख और स्तंभ द वायर, न्यूज़लॉन्ड्री, डाउन टू अर्थ, न्यूज़क्लिक, कारवां और जनपथ सहित अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशनों में प्रकाशित हो चुके हैं। कोरोना महामारी पर उनकी एक पुस्तक ‘स्मृतियाँ जब हिसाब मांगेंगी’ प्रकाशित हो चुकी है। लेखन, प्रशिक्षण और जनसरोकारों के मुद्दों पर संवाद के माध्यम से उन्होंने नागरिक समाज में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है।



