शिक्षा

हिंदी हमारे लिए जितनी जरूरी, राजी भाषा भी उतनी ही जरूरी है

पिथौरागढ़ जिला, उत्तराखंड

मैं उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के धारचूला ब्लॉक के किमखोला गांव में रहता हूं। मैं विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) राजी समुदाय से आता हूं। हमारे समुदाय में आज भी पढ़ाई को बहुत महत्व नहीं दिया जाता है। नई पीढ़ी के बच्चे स्कूल तो जाने लगे हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर आठवीं या दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। इसके बाद वे ‘चिरान’ यानी जंगल से लकड़ी काटने और उसे बेचने का काम करने लगते हैं। मेरी खुद की पढ़ाई भी ऐसे ही हालात में हुई। मैं दिन में स्कूल जाता था और रात में लकड़ी ढोने का काम करता था।

अभी मैं कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल में बीएससी (चौथा सेमेस्टर) का छात्र हूं। मेरे लिए यहां तक पहुंचना आसान नहीं था। पहले वर्ष हॉस्टल न मिलने की वजह से मुझे किसी के घर पर रहना पड़ा। वहां मुझे रहने की जगह और खाना तो मिलता था, लेकिन इसके बदले मुझसे पूरे घर का काम करवाया जाता था। फिर दूसरे वर्ष मुझे हॉस्टल मिल गया। आज भी कुछ लोग समय-समय पर मेरा आर्थिक सहयोग करते हैं, जिससे मैं मेस का 2000 रुपए का खर्च चुका पाता हूं। 

मैंने तय कर लिया था कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, पढ़ाई नहीं छोड़ूंगा। मां हमेशा शिक्षा की अहमियत समझाती थी। वह चाहती थी कि मेरी पढ़ाई पूरी हो। माता-पिता के देहांत के बाद अब मैं परिवार में अकेला रह गया हूं। मेरी पांचवीं तक की पढ़ाई राजी समुदाय के लिए चलने वाले विशेष स्कूल से हुई। इसके बाद मैंने आगे की पढ़ाई बलुवाकोट के स्कूल से की। वहां अलग-अलग समुदायों के बच्चे पढ़ते थे।

स्कूल में अन्य बच्चों के व्यवहार की वजह से मुझे काफी परेशानी का सामना करना पड़ता था। मेरे दिखने-बोलने के तरीके, सामुदायिक पहचान और आर्थिक स्थिति की वजह से अक्सर मेरा मजाक उड़ाया जाता था। ऐसे व्यवहार से तंग आकर मैंने अपने पहले स्कूल को छोड़कर दूसरे स्कूल में दाखिला लिया, जो घर से लगभग चार किलोमीटर दूर था।

मां के देहांत बाद मैं अपनी नानी के घर रहने लगा। वहां से मैं जौलजीबी स्थित स्कूल में पढ़ने जाता था। शुरुआत में वहां भी कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। फिर मैंने टीचर से शिकायत की और धीरे-धीरे स्थिति में कुछ सुधार हुआ।

इस दौरान मेरा परिचय प्रो. कविता रस्तोगी से हुआ, जो भाषाओं के संरक्षण के लिए काम कर रही हैं। उन्होंने मेरे स्कूल का दौरा किया और नई पीढ़ी के बच्चों को राजी भाषा से जोड़ने के लिए कुछ विद्यार्थियों का चयन किया। इनमें से एक मैं भी था। इस काम के लिए मुझे कुछ आर्थिक सहयोग भी मिलता था, जिससे मैं अपनी पढ़ाई और अन्य जरूरतें पूरी कर पाता था।

उनसे जुड़ने के बाद मैं हर रविवार को अपने समुदाय के छोटे बच्चों को राजी भाषा सिखाने लगा। हम लोगों ने मिलकर राजी में किताबें तैयार की। साथ ही हमने कविताओं और गीतों जैसी रोचक सामग्री के जरिए भी बच्चों को राजी लिखना-पढ़ना सिखाया। 

दरअसल आज स्थिति कुछ ऐसी है कि गांव में लोगों के बीच राजी भाषा और अपनी संस्कृति को लेकर बहुत जागरूकता नहीं है। बच्चे हिंदी मे बात करते हैं तो माता-पिता इसे गर्व की बात मानते हैं। लेकिन हिंदी हमारे लिए जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी राजी भाषा भी है। लोग अपनी जड़ों को बचाने के लिए बहुत उत्सुक नहीं नजर आते हैं। फिर काम की तलाश में पलायन की वजह से भी नई पीढ़ी अपनी भाषा और संस्कृति से दूर होती जा रही है। 

मुझे जब भी मौका मिलता है, तो मैं अपनी भाषा में बात करता हूं। फोन पर नानी और दीदी से राजी में ही बात करता हूं। हालांकि मेरे साथ में पढ़ने वाले अन्य छात्र बहुत कौतूहल से पूछते हैं कि तुम ये कौन सी भाषा बोलते हो? तुम पहाड़ के हो तो पहाड़ी क्यों नहीं बोलते हो? तब मैं उन्हें अपने समुदाय और अपनी भाषा-संस्कृति के बारे में बताता हूं।

कॉलेज की पढ़ाई के लिए अब मैं नैनीताल आ गया हूं, लेकिन राजी भाषा के साथ मेरा काम निरंतर जारी है। नए गीत-कविताएं लिख रहा हूं। मैंने और मेरे एक दोस्त ने मिलकर ‘सारे जहां से अच्छा’ गीत का राजी भाषा में अनुवाद भी किया है।

मुझे डर है कि अगर हमने आज कोशिश नहीं की, तो हम अपने समुदाय की संस्कृति को केवल किस्से-कहानियों में ही सुन पाएंगे, असल जीवन में नहीं। राजी भाषा के बारे में बात तो करेंगे, लेकिन भाषा बोलने वाला कोई नहीं बचेगा। अपने समुदाय की संस्कृति और भाषा को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए हमें कई स्तर पर काम करने होंगे। राजी समुदाय के लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना और आर्थिक रूप से सहयोग देना बहुत जरूरी है।

अधिक जानें: पढ़ें, ​क्या है दिन में वन रक्षक और रात में ब्रू संस्कृति के संरक्षक की कहानी?         

अधिक करें: लेखक से जुड़ने और उनके काम को सहयोग देने के लिए उनसे [email protected] पर संपर्क करें।​

लेखक के बारे में

  • मुकेश सिंह रजवार कुमाऊं विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर के छात्र हैं, जहां वह वर्तमान में विज्ञान का अध्ययन कर रहे हैं। मुकेश पढ़ाई के साथ-साथ भाषाई संरक्षण के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। वह अपने स्कूली दिनों से ही राजी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रयासरत हैं।