झारखंड की जल सहिया 15 साल से आंदोलन क्यों कर रही हैं?


मैं झारखंड के दुमका जिले में रहती हूं, जहां लोग मुझे जल सहिया कार्यकर्ता के रूप में जानते हैं। राज्य में जल सहिया के तौर पर काम करने वाली ग्रामीण महिलाएं पेयजल और स्वच्छता से जुड़ी योजनाओं को ज़मीनी स्तर पर लागू करने की ज़िम्मेदारी निभाती हैं।
मैं अक्सर कहती हूं कि हम यहां के जल की जलपरियां हैं। हम गांव-गांव और दूर-दराज़ के इलाकों में मीलों पैदल चलकर पानी और स्वच्छता से जुड़ी अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी करते हैं। हमें कई बार जंगलों और कठिन रास्तों से होकर भी गुज़रना पड़ता है, जहां जंगली जानवरों का डर बना रहता है। हम सीधे समुदाय के बीच काम करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि हर घर तक साफ पानी पहुंचे।
मैंने वर्ष 2010 में जल सहिया के रूप में काम करना शुरू किया था। प्रशासन ने शुरुआत में ही यह साफ कर दिया गया था कि यह कोई नियमित नौकरी नहीं होगी। हमें वेतन नहीं मिलेगा, बल्कि काम के अनुसार प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। उस समय यह व्यवस्था अधिकांश जल सहियाओं को स्वीकार्य लगी। हमारा मानना था कि भले ही आमदनी कम हो, लेकिन इस काम से हमें एक पहचान और सम्मान मिलेगा।
लेकिन बीते 15 वर्षों में हमारा यह भरोसा लगातार कमज़ोर हुआ है। पूरी लगन से अपना काम करने के बावजूद हमें कभी भी समय से प्रोत्साहन राशि नहीं मिली। वर्ष 2014-15 तक आते-आते हमें यह समझ आ गया कि बिना आवाज़ उठाए कुछ नहीं बदलेगा। उसी साल हमने अपना पहला आंदोलन किया और यहीं से हमें संगठित होकर लड़ने की शुरुआत की।
हमने अपना संगठन बनाया और अपने हक की मांग उठाई। नौ सालों के लंबे संघर्ष के बाद वर्ष 2019 में राज्य सरकार ने जल सहियाओं के लिए हर महीने 1000 रुपए की प्रोत्साहन राशि तय की, लेकिन यह पर्याप्त नहीं था। हर बार सरकार बदलने के साथ ही हमारी स्थिति फिर से अनिश्चित हो जाती है। नीतियां बदलती हैं, भुगतान लंबित होता है, और हमारे पास आंदोलन करने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। पिछले 15 वर्षों में हमने अनगिनत आंदोलन किए हैं।
वर्ष 2025 में हमें फिर से लामबंद होना पड़ा। दिन-रात धरना देने के बाद हमारी प्रोत्साहन राशि में वृद्धि हुई और सरकार द्वारा हमारे मानदेय के तौर पर 2000 रुपए की मासिक राशि घोषित की गई। यह भी संघर्ष के बिना संभव नहीं था। अपने हक को पाने के लिए लगातार सड़कों पर रहना हमारी मजबूरी बन चुकी है।
समस्या सिर्फ भुगतान की नहीं है। जिन विभागों के साथ मिलकर हमें काम करना होता है, वहां भी अक्सर हमें असहयोग और अपमान का सामना करना पड़ता है। कई बार अधिकारियों की भाषा ऐसी होती है, जो हमारे काम और सम्मान दोनों को ठेस पहुंचाती है। हमें लगातार ऐसे इलाकों में काम करना होता है, जहां पानी के स्रोत सुरक्षित नहीं होते हैं। इसके बावजूद हमें कोई उपकरण, सुरक्षा या स्वास्थ्य सुविधा नहीं दी जाती। फिर जब दूषित पानी से लोग बीमार पड़ते हैं, तो इसका ठीकरा हमारे सिर पर फोड़ दिया जाता है।
मेरा सवाल यह है कि क्या जल सहियाएं बिना संसाधनों के लोगों को कोई समाधान दे सकती हैं?
जब मेरे जैसी अनगिनत ग्रामीण महिलाओं को इस काम में जोड़ा गया था, तब हमारा केवल पांचवीं पास होना पर्याप्त माना गया था। लेकिन आज जब हम अपने अधिकारों की बात करते हैं और आंदोलन में जुटते हैं, तो हमें अशिक्षित कहकर ख़ारिज कर दिया जाता है।
राज्य में चुनावी दौर आते ही जल सहियाओं के लिए एकमुश्त राशि और मुआवज़े जैसी कई ख़बरें अख़बारों की सुर्ख़ियां बनती हैं, लेकिन सच यह है कि आज भी कई कर्मियों को उनका बकाया नहीं मिला है। ऐसी कई जल सहिया तो अब इस दुनिया में भी नहीं हैं, लेकिन उनका भुगतान अब तक लंबित है। इसलिए हमारी यह लड़ाई अब सिर्फ अपने लिए नहीं, उनके लिए भी है।
समय के साथ मैंने संगठन में ज़िम्मेदारियां भी संभाली हैं। मैं वर्तमान में झारखंड प्रदेश जल सहिया यूनियन (दुमका) के जिला अध्यक्ष के पद पर कार्यरत हूं। दुमका जिले के 10 प्रखंडों के 2700 गांवों में तकरीबन 2000 जल सहिया काम कर रही हैं। गांवों में पानी की व्यवस्था को संभालने का पूरा दारोमदार इन्हीं के कंधों पर है।
हमारी मांगें साफ़ हैं। राज्य में जल सहियाओं को न्यूनतम 18000 रुपए मासिक मानदेय मिलना चाहिए। साथ ही, हमारे काम की अनिश्चितता को देखते हुए हमें बीमा भी दिया जाना चाहिए।
यह मुद्दा केवल वेतनमान या धनराशि का नहीं है, बल्कि यह हमारे सम्मान और अधिकार का सवाल है।
रजनी मिर्धा एक जल सहिया कर्मी और झारखंड प्रदेश जल सहिया यूनियन (दुमका) की जिला अध्यक्ष हैं।
*इस लेख के लिए प्रिंस मुखर्जी ने आंशिक योगदान दिया है।
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लेखक के बारे में
- रजनी मिर्धा झारखंड के दुमका जिले, गोपीकांदर में जल सहिया पद पर कार्यरत हैं। वह झारखंड प्रदेश जलसहिया यूनियन (दुमका) की जिला अध्यक्ष भी हैं।


