ज़मीनी संस्थाएं अपनी हायरिंग प्रक्रिया को कैसे बेहतर बना सकती हैं?

“शुरुआत में हमने कई राज्यों से अच्छी डिग्री और अनुभव वाली सबसे योग्य नर्सों का चयन किया। लेकिन वे व्यवहारिक कारणों के चलते तीन-चार महीने से ज्यादा टिक नहीं पायी। फिर हमने आदिवासी समुदाय की नर्सों को लेना शुरू किया। उनके पास स्किल कम थी, लेकिन उन्होंने काम नहीं छोड़ा। हां, हमें उनमें निवेश जरूर करना पड़ा।”– कमलेश, बेसिक हेल्थ सर्विस, सलूम्बर (दूरस्थ आदिवासी क्षेत्र में स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाली एक संस्था।)
“हमने एक उच्च शिक्षित उम्मीदवार (एलएलएम) को रखा, लेकिन उनकी विचारधारा हमसे मेल नहीं खाती थी। वह जेल प्रशासन के साथ काम करने के हमारे समावेशी तरीके से असहमत थी और जल्द ही काम छोड़कर चली गयी।” – प्रवीण, लॉ फाउंडेशन, बिहार (एक कानूनी सहायता संस्था)
हाल के वर्षों में कई संस्थाओं के अनुभव यह दिखाते हैं कि गलत भर्ती का असर सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह पूरी संस्था की दिशा, विश्वसनीयता और स्थायित्व को प्रभावित कर सकता है। जब कोई संस्था एक व्यक्ति से शुरू होकर कुछ ही वर्षों में 20–30 लोगों की टीम बन जाती है, तो उसे याद रखना चाहिए कि “टीम बढ़ाना” और “टीम बनाना” दो अलग प्रक्रियाएं हैं। उदाहरण के लिए, अगर अचानक फंडिंग आ जाए, परियोजना का विस्तार हो जाए, और भर्ती हड़बड़ी में की जाए, तो अक्सर अस्थिरता से जुड़े परिणाम सामने आते हैं।
हम हायरिंग क्यों और किस लिए कर रहे हैं?
आमतौर पर हम एक वाक्य सुनते हैं: ‘प्रोजेक्ट मिल गया है, जल्दी से किसी को रखना है।’ यहीं से गलती की शुरुआत होती है। इसलिए इससे पहले कि आप अपनी संस्था में किसी नए पद के लिए विज्ञापन निकालें, अपनी टीम के साथ बैठकर कुछ सवालों पर मंथन जरूरी है।
1. हमें इस पद की जरूरत क्यों है?
यह सबसे बुनियादी सवाल है, लेकिन अक्सर इसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। तुरंत भर्ती की प्रक्रिया शुरू करने के बजाय, यह समझना जरूरी है कि आखिर यह पद क्यों बनाया जा रहा है? अगर यह नई भूमिका है, तो इसकी क्या जरूरत है? क्या यह किसी नए प्रोजेक्ट के लिए है? या मौजूदा काम के विस्तार के लिए? क्या मौजूदा टीम में किसी तरह की कमी है, जिसे यह नया व्यक्ति पूरा करेगा?
दूसरा, क्या यह पद किसी के जाने से खाली हुआ है? अगर कोई पुराना कर्मचारी संस्था छोड़कर गया है, तो यह सोचने का सही मौका है कि क्या हमें उसी तरह के व्यक्ति की जरूरत है, या भूमिका में बदलाव की गुंजाइश है। हो सकता है कि पिछले अनुभवों से सीखते हुए आप इस भूमिका को थोड़ा बदलना चाहें।
पहला कदम यही है कि आप तय करें कि इस पद का उद्देश्य क्या है और यह संस्था के दीर्घकालिक लक्ष्यों से कैसे जुड़ा हुआ है।
2. प्रोजेक्ट की अवधि क्या है?
लॉ फाउंडेशन के संस्थापक प्रवीण कहते हैं, “फर्ज कीजिए अगर प्रोजेक्ट पांच साल का है, तो हमें ऐसा व्यक्ति चाहिए जो कम से कम शुरुआती तीन साल हमारे साथ बना रहे। इस पैमाने के आधार पर ही प्रतिभागी की विलिंगनेस (इच्छा) देखने का नजरिया तलाशना होगा।” इसका अर्थ यह नहीं है कि आप किसी से लिखित प्रतिबद्धता लें। इसका मतलब है चयन के दौरान यह समझना कि आवेदक का करियर-रुझान क्या है? क्या वह संबंधित क्षेत्र में लंबी अवधि तक काम करना चाहता है या इसे एक ट्रांजिशन स्टेप की तरह देख रहा है?
3. भूमिका से जुड़ी जिम्मेदारियों की स्पष्टता
यह स्पष्ट रूप से रेखांकित करना जरूरी है कि भूमिका से जुड़ी वास्तविक जिम्मेदारियां क्या हैं। उदाहरण के लिए, अगर यह दफ्तर-आधारित भूमिका है, तो इसमें आवेदक की तकनीकी दक्षता, भाषा ज्ञान, विषय विशेषज्ञता आदि के बारे में पहले अच्छे से समझ लेना चाहिए। इसके उलट अगर यह फील्ड-आधारित भूमिका है, तो क्या इसमें लगातार अलग-अलग जगहों पर जाना होगा? क्या यह यात्राएं अकेले करनी होंगी? क्या व्यक्ति को रिमोट एरिया में रहना होगा? बेसिक हेल्थ सर्विस संस्था ने अपना अनुभव साझा किया कि बाहर से आयी नर्सों के लिए आदिवासी इलाके में रहना और चौबीस घंटे उपलब्ध रहना मुश्किल होता था। उन्हें इस बात का अंदाजा ही नहीं था कि गांव में बिजली कटौती होगी, इंटरनेट सीमित होगा, और उन्हें समुदाय के साथ मिलकर काम रहना होगा। इसलिए, संस्था को पद से जुड़ी जिम्मेदारियों के संबंध में आवेदक को हमेशा स्पष्ट और विस्तृत जानकारी देनी चाहिए।
4. वेतन सिर्फ एक संख्या नहीं है
वेतन केवल बजट की गणना नहीं, आपकी हायरिंग रणनीति का केंद्रीय तत्व हो सकता है। यह तय करता है कि आपके रिक्त पद की ओर किस प्रकार के पेशेवर आकर्षित होंगे। सरल शब्दों में समझें, तो एक पद से जुड़ा वेतन आवेदकों की विविधता का आधार होता है। उदाहरण के तौर पर:
- यदि आप अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी वेतन दे सकते हैं, तो संभावना है कि आपके पास ऐसे उम्मीदवार आयेंगे जिनके पास पर्याप्त अनुभव, संस्थागत एक्सपोजर और स्पष्ट पेशेवर अपेक्षाएं होंगी।
- यदि वेतन मध्यम स्तर का है, तो अधिकतर उम्मीदवार ऐसे होंगे जो अपने करियर के माध्यमिक चरण में हैं और उनका करियर अभी आगे बढ़ रहा है।
- यदि बजट सीमित है, तो स्थानीय पृष्ठभूमि से आने वाले या करियर की शुरुआत कर रहे उम्मीदवारों की संख्या अधिक हो सकती है।
उदयपुर की सामाजिक संस्था सेवा मंदिर में एचआर से जुड़े अमित और रत्ना इस बात को कुछ इस तरह समझाते हैं कि “जब आपके पास बजट सीमित होता है, तो स्वाभाविक है कि बहुत अधिक वेतन की अपेक्षा रखने वाले प्रतिभागियों को आप शुरुआत में ही अलग कर देते हैं।”
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कम वेतन पर योग्य लोग नहीं मिलते। बल्कि बात इतनी-सी है कि हर वेतन-सीमा आमतौर पर एक खास तरह की प्रतिभा और उम्मीदों वाले लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
यदि आपकी संस्था सीमित संसाधनों के साथ काम कर रही है, तो आपको यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि उस बजट में किस प्रकार की प्रोफाइल वास्तविक रूप से संभव है। क्या आप तत्काल विशेषज्ञता चाहते हैं? या आप ऐसे लोगों के साथ काम करने के लिए तैयार हैं, जिनमें क्षमता है और उन्हें प्रशिक्षित किया जा सकता है?
5. संस्था की विचारधारा क्या है?
हमने देखा कि लॉ फाउंडेशन के प्रवीण ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके चयनित उम्मीदवार और संस्था के बीच तालमेल नहीं बना और 3 महीने बाद ही उन्हें इस पद के लिए दुबारा उम्मीदवार की तलाश शुरू करनी पड़ी। इसलिए सिर्फ डिग्री और योग्यता देखना काफी नहीं है। आपको यह भी देखना होगा कि उम्मीदवार की सोच, मूल्य और विचारधारा आपकी संस्था से मेल खाते हैं या नहीं। खासकर अगर आपका काम संवेदनशील मुद्दों (जैसे कारावास, दलित अधिकार, आदिवासी विषय आदि) से जुड़ा है, तो यह और भी जरूरी हो जाता है। आस्था के पुराने साथी आर डी व्यास कहते है, “हम अक्सर प्रतिभागियों से पूछते हैं ‘गरीब आखिर गरीब क्यों है?’ ऐसे सवालों के जवाब आपको उम्मीदवार के बारे में बहुत कुछ समझा देते हैं।
सही संदेश का खास महत्व
पद का कार्य-विवरण (जॉब डिस्क्रिप्शन, जिसे बोलचाल की भाषा में ‘जेडी’ भी कहा जाता है) एक ऐसा दस्तावेज होता है, जिसमें किसी पद की भूमिका, जिम्मेदारियां, आवश्यक कौशल और अपेक्षाएं स्पष्ट रूप से लिखी होती हैं। ये ही उम्मीदवार के लिए आपकी संस्था का पहला परिचय है। यानी एक अच्छा जेडी आपको सैकड़ों अनावश्यक आवेदनों से बचा सकता है।
1. स्पष्टता: जेडी में वेतनमान को साफ शब्दों में लिखें। यह सुनिश्चित करेगा कि जिनकी अपेक्षा आपके बजट से बाहर है, वे आवेदन न करें, जिससे आपका और उनका समय बचेगा। प्रवीण कहते हैं कि आजकल अमूमन जेडी में वेतनमान की जगह लिख दिया जाता है कि वेतन ‘सेक्टर स्टैंडर्ड’ अथवा ‘मार्केट स्टैंडर्ड’ पर दिया जाएगा। ऐसे शब्दों के इस्तेमाल से प्रतिभागियों में भ्रम पैदा हो सकता है।
2. वास्तविकता: रत्ना और अमित कहते हैं कि अगर आपकी संस्था रिमोट इलाके में काम करती है, तो जेडी में यह स्पष्ट करना सही होगा कि यह नौकरी रिमोट एरिया में है, सुविधाएं सीमित हैं, और समुदाय के साथ रहना होगा। हालांकि, आप आवश्यकतानुसार इसमें कुछ रियायतो के बारे में भी लिख सकते हैं।
3. मूल्य: प्रवीण बताते हैं कि हमारी संस्था ने अपने जेडी में यह लिखना शुरू किया कि हम प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थियों, वंचित समुदायों और एलजीबीटीक्यूआईए+ व्यक्तियों के आवेदन को प्रोत्साहित करते हैं। यह केवल एक नैतिक बयान नहीं है, बल्कि उचित उम्मीदवारों को आकर्षित करने का एक सशक्त माध्यम भी है।
4. भाषा: जेडी लिखते समय घुमावदार शब्दों, लंबे वाक्यों और जटिल भाषा से बचें। एक आदर्श जेडी को दो पन्नों के भीतर अपनी बात कह देनी चाहिए। साथ ही, चयन प्रक्रिया (जैसे, टेस्ट, इंटरव्यू आदि) के सभी स्तरों के विषय में भी साफ-साफ लिखें।
जेडी को कहां और कैसे साझा करें?
एक अच्छा जॉब डिस्क्रिप्शन (जेडी) तैयार करने के बाद अगला प्रमुख कदम है उसे सही जगहों पर साझा करना। अक्सर संस्थाएं सीमित माध्यमों का उपयोग करती हैं, जिसके कारण एक ही तरह की प्रोफाइल वाले आवेदन आते हैं और विविधता की कमी रह जाती है। ऐसे में आप कुछ प्रचलित माध्यमों का रूख कर सकते हैं:
1. पेशेवर प्लेटफॉर्म
यदि आप माध्यमिक या विशेषज्ञ स्तर की भूमिका के लिए भर्ती कर रहे हैं, तो उन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स का सहारा लिया जा सकता है जहां सामाजिक क्षेत्र की वैकेंसी प्रकाशित होती हैं। अमित, रत्ना और प्रवीण जैसे कई सेक्टर पेशेवर भी अपनी संस्थाओं में नियुक्ति के लिए नीचे दिए गए कुछ ऐसे प्लेटफॉर्म्स का उपयोग करते हैं-
इन प्लेटफॉर्म्स पर आमतौर पर वैसे उम्मीदवार मिलते हैं जिनके पास पहले से एनजीओ या सीएसआर क्षेत्र का अनुभव होता है, या जो राष्ट्रीय स्तर पर अवसर तलाश रहे होते हैं।
2. सोशल मीडिया और व्हाट्सएप ग्रुप
आजकल सोशल मीडिया और व्हाट्सएप नेटवर्क से भी अच्छी संख्या में आवेदन मिलते हैं। खासकर जब आपको जल्दी आवेदन जुटाने हैं और आपका बजट विज्ञापन देने के लिए सीमित है।
- फेसबुक और लिंक्डइन पर व्यक्तिगत प्रोफाइल और पेज से पोस्ट करें। आप कई सहयोगी संस्थाओं को अपने ग्रुप्स और प्लेटफॉर्म्स पर शेयर करने के लिए भी निवेदन कर सकते है।
- व्हाट्सएप ग्रुप: आजकल कई सारे व्हाट्सप्प ग्रुप्स बने हुए हैं, जहां ग्रुप मेंबरहायरिंग से जुड़ी पोस्ट शेयर कर सकते हैं और किसी भी संस्था के साथी उनसे जुड़ सकते हैं। जैसे –तमुकु अलर्ट्स, ग्राउन्ड जीरो जॉब्स, ऑप एवेन्यू आदि
- शैक्षिक संस्थानों के पूर्व छात्र ग्रुप: जैसे टीआईएसएस, दिल्ली यूनिवर्सिटी या राज्य विश्वविद्यालयों के एलुमनाई (पूर्व छात्र) ग्रुप।
- अपनी संस्था के सभी सोशल मीडिया चैनल्स का इस्तेमाल भी जरूर करें।
3. सामुदायिक स्तर पर घोषणा
अगर भूमिका फील्ड-आधारित है और उसके लिए समुदाय के साथ लगातार काम करना है, तो सिर्फ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भर रहना सही नहीं है। उदाहरण के लिए- पैरालीगल वालंटियर, कम्युनिटी मोबिलाइजर, आशा कार्यकर्ता या स्वास्थ्य सहायक से जुड़ी भूमिका आदि।
इसके लिए आप समुदाय के साथ बैठक कर सकते है। स्थानीय संगठनों (जैसे महिला समूह, युवा मंडल) को भी सूचना प्रसारित करें। इसे अधिक कारगर बनाने के लिए आप समुदाय में ही लिखित या मौखिक आवेदन लेने की प्रक्रिया भी रख सकते हैं। यह तरीका वंचित समुदायों का प्रतिनिधित्व बढ़ाता है और सुनिश्चित करता है कि चयनित व्यक्ति स्थानीय संदर्भ के अनुरूप हो।
स्क्रीनिंग और इंटरव्यू पर खास ध्यान दें
असली चुनौती की शुरुआत होती है आवेदन आने के बाद। सेवा मंदिर से रत्ना बताती हैं कि महज 15-20 मिनट के इंटरव्यू में किसी को पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता। इसलिए एक बहु-स्तरीय प्रक्रिया अपनाना जरूरी है।
प्रारंभिक छंटनी: अब कई संस्थाएं प्रतिभागियों के आवेदन लेने के लिए गूगल फॉर्म जैसे टूल्स का इस्तेमाल करती हैं, ताकि सारे आवेदन एक ही जगह पर आ जाएं। पहले सारे सीवी ईमेल पर आते थे और उन्हें एकत्रित करना मुश्किल होता था। वहीं गूगल फॉर्म के माध्यम से आप उम्मीदवारों से कई अन्य सवाल भी पूछ सकते हैं, जैसे कि सामाजिक पृष्ठभूमि, वेतन अपेक्षा आदि। उनके जवाबों के आधार पर प्रारंभिक छंटनी की जा सकती है।
प्रवीण कहते हैं, “हम कई बार फोन कॉल से छंटनी करते हैं। प्रतिभागियों के बात करने के तरीके से बहुत सी चीजें पता चल जाती हैं। दूसरी तरफ एक संस्था की प्रतिनिधि कहती हैं, “मैंने सभी आवेदनों के जवाब में आवेदकों को सीधे एक असेसमेंट भेज दिया। बहुत सारे आवेदकों ने तय समय-सीमा तक असेसमेंट वापस नहीं भेजे, जिससे मेरा पहले छंटनी करने का बहुत सारा समय बच गया। बाकी जिन आवेदकों ने असाइनमेंट भेजे, उनके लेखन कौशल की जानकारी भी मिल गयी।”
कुल मिलाकर आपको सचेत होकर ये फैसला लेना होगा कि आपके प्रतिभागी से आप किस तरह की पेशेवरता चाहते हैं और उन्हें जांचने के लिए कौन सा तरीका सही होगा।
इंटरव्यू: अमित और रत्ना इस बात पर जोर देते हैं कि चुनाव करते समय पैनल में महिला, फील्ड स्टाफ, विषय विशेषज्ञ, वंचित वर्ग से कोई अनुभवी व्यक्ति और वरिष्ठ प्रबंधन को शामिल होना चाहिए। वह आगे जोड़ते हैं कि इंटरव्यू पैनल में अगर संस्थाओं के पास ऐसे लोग न हो, तो दूसरी संस्थाओं से सहयोग लिया जा सकता है। खासतौर से जब आप जमीनी और संवेदनशील मुद्दों पर काम कर रहे हों। ऐसा करने से आपको विविध अनुभवों के मानकों पर खरा उतरने वाला उम्मीदवार मिलेगा।
हालांकि एक दूरस्थ आदिवासी संस्था कोटड़ा आदिवासी संस्थान के निदेशक सरफराज इसके उलट अपने कॉर्डिनेटर से प्रथम स्तर के इंटरव्यू कराते हैं। इसके बाद वह चयनित उम्मीदवारों से स्वयं इंटरव्यू करते हैं। दोनों ही तरीकों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं। लेकिन आप तय कर सकते हैं कि आपके लिए, और उस भूमिका के लिए क्या बेहतर काम करेगा।
रेफरेंस जांचे: बहुत सी संस्थाएं प्रतिभागियों के पूर्व अनुभवों के परिचित लोगों से उनके काम के बारे में जानकारी लेती हैं। यह तरीका प्रतिभागी के दृष्टिकोण और उनकी क्षमताओं को जानने का अच्छा माध्यम हो सकता है। आप भी इस तरीके से यह जांच सकते हैं कि उम्मीदवार आपकी संस्था के लिए उपयुक्त हैं या नहीं।
उम्मीदवारों को ढूंढने में विविधता अपनायें
इंटर्नशिप और फेलोशिप से जुड़े लोगों को हायर करना: कई बड़ी संस्थाएं अक्सर अपने फेलोशिप और इंटर्नशिप प्रोग्राम चलाती हैं, जिनके नेटवर्क अथवा प्लेटफॉर्म से जुड़कर ऐसे फेलोज या इंटर्न को अपने यहां बुलाया जा सकता है। रत्ना और अमित का मानना है कि जो लोग फेलोशिप या इंटर्नशिप के जरिए पहले से संस्था से जुड़े होते हैं, वे अच्छे उम्मीदवार होते हैं। उनकी क्षमता, समर्पण और संस्था के प्रति समझ पहले से परखी हुई होती है। वहीं बीएचएस से कमलेश भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि उन्होंने डॉक्टरों की तात्कालिक कमी को दूर करने के लिए एक अलग मॉडल अपनाया। वह एक ट्रैवल फेलोशिप से जुड़े, जिसमें युवा डॉक्टर अलग-अलग संस्थाओं में तीन-तीन महीने काम करते हैं। इससे उन्हें विशेषज्ञता मिलती रही और कुछ डॉक्टर लंबे समय के लिए उनके साथ जुड़ पाए। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि उनका समुदाय से जुड़ाव हो जाता है।
सामुदायिक भर्ती: अगर आपकी जरूरत जमीनी काम करने वाले व्यक्तियों की है, तो समुदाय स्तर पर भर्ती करना एक अच्छा विचार हो सकता है। प्रवीण कहते हैं, “हम मुसहर बस्ती में जाकर, समुदाय की लड़कियों से बात करके उन्हें पैरालीगल वालंटियर बनाते हैं। भले ही उन्हें प्रक्षिशित करना पड़े, लेकिन समुदाय में प्रतिनिधित्व और जुड़ाव के लिहाज से यह बेहतर विकल्प होता है।
स्थानीय/राज्य विश्वविद्यालय: नामी सोशल कॉलेज या बड़े संस्थानों से इतर राज्य या स्थानीय विश्वविद्यालयों से भी युवाओं को मौका दिया जा सकता है। ऐसे उम्मीदवार स्थानीय संदर्भ को समझते हैं और संस्था के साथ लंबे समय तक काम कर पाते हैं हैं। अमित कहते हैं, ‘अगर आपका बजट कम है, लेकिन आप थोड़ी मेहनत करने के लिए तैयार हैं, तो आपको स्थानीय स्तर पर संस्थानों से जुड़ना चाहिए। कभी-कभी ये युवा साथी सबसे बेहतर साबित हो सकते हैं।
रेफरल माध्यम: आर डी व्यास कहते हैं कि हमारे पास अधिकतर साथी रेफरल के माध्यम से आते थे। इस से आने वाले लोग काफी विश्वसनीय हो सकते है, क्यूंकि आपकी साथी संस्थाओं ने इन्हें परख लिया होता है। हालांकि, अमित इसके विपरीत दृष्टिकोण को उजागर करते हैं। वह मानते हैं कि इससे रिश्ते भी खराब हो सकते हैं। वह कहते हैं, “जब आप किसी की सिफारिश पर किसी को रखते हैं और वह सही उम्मीदवार नहीं होता, तो पेशेवर और व्यक्तिगत, दोनों रिश्तों में खटास आती है।
इन सभी बातों की सावधानीपूर्वक जांच के बाद भी यह नहीं कहा जा सकता कि हर बार सब कुछ पूरी तरह सही ही होगा। हायरिंग कोई स्थिर प्रक्रिया नहीं है। समय के साथ न केवल संस्थाओं की जरूरतें बदलती हैं, बल्कि पेशेवरों की अपेक्षाएं और काम करने के तरीके भी बदलते रहते हैं। समय, संदर्भ और संस्था के विकास के साथ रणनीतियां भी बदलती हैं। इसलिए यह भी जरूरी है कि संस्थों के प्रतिनिधि भी निरंतर सीखते रहें। कई संस्थाएं इसके लिए लीडरशिप प्रोग्राम चलाती हैं, जिनका हिस्सा बना जा सकता है।
कुल मिलाकर, हायरिंग को प्रशासनिक काम से ऊपर उठाकर संस्थागत क्षमता के रूप में देखना जरूरी है। यह नजरिया एक टीम को सशक्त संस्था में बदल सकता है।
यह लेख प्रवीण (लॉ फाउंडेशन), अमित और रत्ना (सेवा मंदिर), सरफराज (कोटड़ा आदिवासी संस्था), आर डी व्यास (पूर्व साथी आस्था संस्थान) आदि के साथ चर्चाओं पर आधारित है।
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लेखक के बारे में
- राकेश स्वामी आईडीआर में सह-संपादकीय भूमिका मे हैं। वह राजस्थान से जुड़े लेखन सामग्री पर जोर देते हैं। राकेश के पास राजस्थान सरकार के नेतृत्व मे समुदाय के साथ कार्य करने का एवं अकाउंटेबलिटी इनिशिएटिव, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च मे लेखन एवं क्षमता निर्माण का भी अनुभव है। राकेश ने आरटीयू यूनिवर्सिटी, कोटा से सिविल अभियांत्रिकी में स्नातक किया है।
- रजिका सेठ आईडीआर हिंदी की प्रमुख हैं, जहां वह रणनीति, संपादकीय निर्देशन और विकास का नेतृत्व सम्भालती हैं। राजिका के पास शासन, युवा विकास, शिक्षा, नागरिक-राज्य जुड़ाव और लिंग जैसे क्षेत्रों में काम करने का 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने रणनीति प्रशिक्षण और सुविधा, कार्यक्रम डिजाइन और अनुसंधान के क्षेत्रों में टीमों का प्रबंधन और नेतृत्व किया। इससे पहले, रजिका, अकाउंटेबिलिटी इनिशिएटिव, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में क्षमता निर्माण कार्य का निर्माण और नेतृत्व कर चुकी हैं। रजिका ने टीच फॉर इंडिया, नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी और सीआरईए के साथ भी काम किया है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में बीए और आईडीएस, ससेक्स यूनिवर्सिटी से डेवलपमेंट स्टडीज़ में एमए किया है।
