स्वास्थ्य और पोषण

भारत के शहरों में डायबिटीज़, हाईपरटेंशन और बढ़ती स्वास्थ्य असमानताएं

बढ़ते गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के बीच सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच अब भी सीमित है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि शहरी अनौपचारिक बस्तियों में स्वास्थ्य समानता के लिए सामुदायिक स्तर पर कार्रवाई ज़रूरी है।
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एक कमरे में महिला और पुरुष स्वास्थ्यकर्मी_एनसीडी

साठ वर्षीय सकीना* मुंबई महानगरीय क्षेत्र (एमएमआर) की एक शहरी अनौपचारिक बस्ती में रहती हैं। उन्हें कोविड-19 के दौरान पता चला कि वह उच्च रक्तचाप और मधुमेह से ग्रसित हैं। उन्होंने इलाज के लिए कई डॉक्टरों से परामर्श लिया और दवाएं शुरू की, लेकिन कुछ महीनों बाद घर की आर्थिक कठिनाइयों के कारण उन्हें एलोपैथिक दवाएं लेना बंद करना पड़ा। जब चक्कर आना और सीने में दर्द जैसे लक्षण बढ़ने लगे, तो उन्होंने आराम के लिए बिना पर्ची के मिलने वाली पेन किलर और सेडटिव दवाओं का सहारा लिया। वह अपनी बीमारी को नियंत्रित करने के लिए किसी विशेष आहार का पालन भी नहीं कर पायी, क्योंकि उन्हें पता था कि संयुक्त परिवार में यह संभव नहीं था। उनके इलाके में स्वच्छता सुविधाओं की कमी ने उनकी परेशानी को और बढ़ा दिया। बार-बार पेशाब आना, जो उनकी बीमारी का एक लक्षण है, संभालना मुश्किल हो गया, जिसके कारण उन्होंने एक आयुर्वेदिक सिरप का सहारा लेना शुरू कर दिया।

सकीना जैसी कई महिलाएं चुपचाप इस पीड़ा को झेलती हैं। वे असुरक्षित शहरी अनौपचारिक बस्तियों (जिन्हें अक्सर झुग्गियां कहा जाता है) में रहने की कठिनाइयों के बीच अपनी दीर्घकालिक बीमारियों से जूझती रहती हैं। हाल के वर्षों में, निम्न और मध्यम आय वाले देशों की शहरी अनौपचारिक बस्तियों में गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) का स्तर बढ़ा है। ऐसी बस्तियों के निवासियों में कई कारणों से दीर्घकालिक बीमारियों का खतरा ज़्यादा रहता हैं। इन कारणों में भीड़भाड़ वाले घर, प्रतिकूल काम की स्थितियां, अस्वस्थ आहार, तनाव और पर्यावरण प्रदूषण शामिल हैं। इन क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच अक्सर सीमित होती है। आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक हाशिए पर रहने की स्थिति इन समुदायों के स्वास्थ्य को और अधिक प्रभावित करती है।

शहरी अनौपचारिक बस्तियों में ग़ैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के प्रबंधन की अनेक चुनौतियां

शहरी अनौपचारिक बस्तियों में ग़ैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के बढ़ते मामलों को ध्यान में रखते हुए, सोसायटी फॉर न्यूट्रिशन, एजुकेशन एंड हेल्थ एक्शन (स्नेहा)—जो मुंबई महानगरीय क्षेत्र की इन बस्तियों में स्वास्थ्य सुधार पर कार्य कर रही एक गैर-लाभकारी संस्था है—ने वर्ष 2022–23 में एक टियर-II नगर पालिका में गुणात्मक अध्ययन किया। इस अध्ययन का उद्देश्य उच्च रक्तचाप और मधुमेह से ग्रस्त लोगों के बीच उपचार प्राप्त करने के पैटर्न को समझना था।

इस नगर पालिका की 7 लाख की आबादी में से लगभग आधी जनसंख्या शहरी अनौपचारिक बस्तियों में रहती है। वहां की स्वास्थ्य सुविधाओं में एक सार्वजनिक सेकेंडरी स्तर का अस्पताल, 15 सार्वजनिक प्राथमिक स्तर की स्वास्थ्य इकाईयां और कई निजी चिकित्सक शामिल थे। उच्च रक्तचाप और मधुमेह से ग्रस्त मरीज़ों, स्थानीय सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य प्रदाताओं, तथा समुदाय के लोगों के साथ विस्तृत साक्षात्कार और चर्चाओं के आधार पर यह अध्ययन इन बस्तियों से जुड़े कई महत्वपूर्ण पैटर्न और चुनौतियों को सामने लाता है। यह अध्ययन कई क्षेत्रों में कमियों को उजागर करता है, जैसे निवारक देखभाल (प्रिवेंटिव केयर) को कैसे समझा जाता है, रोगों की पहचान (डायग्नोसिस) कैसे होती है, और मरीज़ अपनी बीमारी का प्रबंधन तथा चिकित्सकीय सलाह का पालन कैसे करते हैं। ये निष्कर्ष बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए नीतिगत हस्तक्षेप को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं:

निवारक देखभाल (प्रिवेंटिव केयर) को ज़रूरी नहीं माना जाता

अध्ययन में पाया गया कि शहरी अनौपचारिक बस्तियों के निवासी यह नहीं मानते कि उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी बीमारियों को रोका जा सकता है। इस कारण जीवनशैली में बदलाव जैसे रोकथाम के उपायों को न तो समझा जाता है, और न ही इन्हें अपनाया जाता है। एक निवासी ने कहा, “हम गरीब हैं। हमारे पास बिना किसी वजह के जांच (स्क्रीनिंग) कराने के पैसे नहीं हैं। अभी हमें कोई लक्षण नहीं है, तो हम जांच क्यों करवाएं?”

मेडिकल सैंपल की जांच करती एक महिला_एनसीडी
रोकथाम के उपाय और जांच की कमी के कारण अधिकांश लोग शुरुआती लक्षणों को नज़रअंदाज करते हैं, जिससे बीमारी की पहचान में देरी होती है। | चित्र साभार: निनारा / सीसी बीवाय

लक्षण न होने पर जांच (स्क्रीनिंग) कराने की अवधारणा लोगों को अव्यवहारिक लगती है। इसके अलावा, जांच कराने में समय और पैसे दोनों खर्च होते हैं। समुदाय-आधारित जांच बहुत कम होती है। हालांकि सरकारी अस्पतालों में जांच मुफ्त होती है, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए अक्सर लंबी दूरी तय कर इंतज़ार करना पड़ता है। स्थानीय क्लीनिक या पैथोलॉजी लैब में जांच की लागत लगभग 200 से 2000 रुपए तक होती है। इसके साथ ही, जांच के लिए समय निकालना लोगों को रोज़ की मजदूरी (दिहाड़ी) के नुकसान जैसा लगता है, इसलिए वे इसमें ज़्यादा रुचि नहीं दिखाते।

रोग की पहचान (डायग्नोसिस) अक्सर कई परामर्शों के बाद देर से होती है

रोकथाम के उपायों और नियमित जांच (स्क्रीनिंग) की कमी के कारण अधिकांश लोग शुरुआती लक्षणों को नज़रअंदाज करते हैं, जिससे बीमारी का पता देर से चलता है। कई मरीज़ों ने यह भी बताया कि वे अपनी बीमारी को मानने से पहले अलग-अलग डॉक्टरों से कई बार परामर्श लेते हैं। मधुमेह से पीड़ित एक मरीज़ ने बताया, “मेरे शरीर पर एक घाव था जो ठीक नहीं हो रहा था और उसमें दर्द होने लगा। मैं एक निजी त्वचा विशेषज्ञ के पास गया, तो उन्होंने बताया कि मुझे मधुमेह है। लेकिन परिवार थोड़ा चिंतित था, इसलिए उन्होंने कहा कि दोबारा जांच कराओ। मैं दूसरे डॉक्टर के पास गया, और वहां भी यही निकला। मैं कुल पांच डॉक्टरों के पास गया। जब सबने कहा कि मुझे ‘शुगर’ है, तब जाकर मैंने इसे माना।”

अधिकांश मरीज़, जो दिहाड़ी मज़दूरी या घरेलू काम करते हैं, ऐसी स्थिति में झटपट आराम चाहते हैं। इस कारण वे दर्द या तकलीफ को जल्दी से कम करने वाली दवाइयों को प्राथमिकता देते हैं और इसके लिए वे आसपास के स्थानीय स्वास्थ्य प्रदाताओं के पास जाते हैं। ये स्थानीय प्रदाता अक्सर यूनानी और होम्योपैथी चिकित्सा में डिग्री या डिप्लोमा रखते हैं, जिन्हें सामान्य रूप से आयुष (आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, और होम्योपैथी) चिकित्सक कहा जाता है।

एक चिकित्सक ने बताया की मरीज़ आगे और जांच कराने या फ़ॉलो-अप करने में हिचकते हैं। इसकी जगह वे तत्काल आराम को प्राथमिकता देते हैं। मरीज़ कहते हैं, “अभी के लिए कुछ दे दीजिए, बाकी बाद में देखेंगे।”

हालांकि ऐसे चिकित्सक प्रारंभिक जांच, परामर्श, रेफरल, लक्षणों के आधार पर उपचार, और उपचार का पालन करने संबंधी मार्गदर्शन के माध्यम से गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) की देखभाल करने की कोशिश करते हैं, लेकिन इनमें से कई लोग इन रोगों के इलाज में गंभीरता से शामिल होने से बचते हैं। इसका कारण एनसीडी की एलोपैथिक दवाओं पर निर्भरता, सीमित प्रशिक्षण, प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने का डर, और मरीज़ों की औपचारिक जांच करवाने के प्रति हिचकिचाहट है। स्थानीय सरकारी अस्पतालों के साथ उनका संबंध कमज़ोर था या लगभग नहीं के बराबर होता है, और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली से प्रशिक्षण और सहयोग के बिना दीर्घकालिक बीमारियों का प्रबंधन करने की उनकी क्षमता भी सीमित होती है।

इसके बावजूद, मरीज़ों के लिए वही पहला संपर्क बिंदु होते हैं, और जब लक्षण गंभीर या असहनीय हो जाते हैं, या कुछ मामलों में आपात स्थिति तक पैदा हो जाती है, तब ही मरीज़ एलोपैथिक निजी डॉक्टरों या अस्पतालों के पास जाते हैं। इसके बाद ही उन्हें अपनी बीमारी की पुष्टि हो पाती है।

दीर्घकालिक बीमारियों का प्रबंधन अलग-थलग और महंगा है

बीमारी का पता चलने के बाद मरीज़ अपनी बीमारी को नियंत्रित करने के लिए चिकित्सकीय सलाह का पालन करने के कई तरीके अपनाते हैं। वे इलाज का खर्च और लक्षणों की गंभीरता, इन दोनों के बीच संतुलन बनाते हुए निर्णय लेते हैं।

वे अपनी आर्थिक स्थिति और पहुंच के अनुसार अलग-अलग निजी स्वास्थ्य प्रदाताओं के पास आते-जाते रहते थे। शहरी अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले अधिकांश लोगों को पास के एकमात्र सरकारी अस्पताल पर इलाज के लिए भरोसा नहीं था। प्राथमिक स्तर के स्वास्थ्य केंद्रों में गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) से जुड़ी सीमित सेवाएं उपलब्ध थी, जिनके बारे में अधिकांश लोग जानते भी नहीं थे। सेवाओं की खराब गुणवत्ता, दूरी, देखभाल में सहयोग की कमी, और दवाइयों की अनुपलब्धता ऐसे प्रमुख कारण थे जिनकी वजह से मरीज़ नगर पालिका क्षेत्र में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग नहीं करते थे। जो लोग निजी इलाज का खर्च नहीं उठा सकते थे, उन्हें बेहतर सरकारी अस्पतालों तक पहुंचने के लिए महानगरीय क्षेत्र के भीतर लंबी दूरी तय कर दूसरे नगरों में जाना पड़ता था। कई मरीज़ अपनी पहली जांच के दौरान दी गयी एलोपैथिक दवाइयों पर ही निर्भर रहते थे, जिन्हें वे सीधे मेडिकल दुकानों से खरीद लेते थे और इलाज के फॉलो-अप के लिए दोबारा डॉक्टरों के पास नहीं जाते थे। उनके घरों के नजदीक मौजूद यूनानी और होम्योपैथी चिकित्सकों, जिनकी सेवाएं निजी एलोपैथिक डॉक्टरों की तुलना में सस्ती थी, से वे लक्षणों के आधार पर उपचार लेने तथा रक्तचाप और ब्लड शुगर की जांच करवाने के लिए संपर्क करते थे।

शहरी अनौपचारिक बस्तियों में गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) का स्तर बढ़ा है। ऐसी बस्तियों के निवासियों में कई कारणों से दीर्घकालिक बीमारियों का खतरा ज़्यादा रहता हैं।

नतीजतन, इलाज के दौरान मरीज़ अपनी आर्थिक स्थिति और बीमारी की गंभीरता के हिसाब से एलोपैथिक और वैकल्पिक उपचारों के बीच बार-बार बदलाव करते थे। वे अक्सर दवाइयों का सेवन बीच में रोक देते थे या पूरी तरह बंद कर देते थे। इस कारण उपचार का पालन अनियमित बना रहता था और सस्ती तथा असरदार दवाओं की तलाश में वे लगातार अलग-अलग निजी डॉक्टरों के पास जाते रहते थे।

उच्च रक्तचाप से पीड़ित एक व्यक्ति ने बताया, “मुझे काम के दौरान हार्ट अटैक आया था। यहां एक सरकारी अस्पताल है, लेकिन वहां अच्छा इलाज नहीं मिलता। इसलिए मैं पहले एक निजी अस्पताल गया और फिर दूसरी नगर पालिका के एक सरकारी अस्पताल गया, जहां मुझे उच्च रक्तचाप बताया गया। मैं वहां से दी गई दवाइयां ले रहा था और यहां स्थानीय डॉक्टरों से अपना रक्तचाप चेक करवाता था। जब मैं चार महीने के लिए बाहर गया, तो मैंने यह सोचकर दवा बंद कर दी कि अब मैं ठीक हूं। फिर मुझे दूसरा अटैक आ गया।”

अधिकांश मरीज़ अपनी बीमारी के लक्षण कम करने के लिए बेहतर खान-पान और व्यायाम जैसे जीवनशैली संबंधी बदलावों का भी नियमित रूप से पालन नहीं करते । कुछ लोगों ने बताया कि ऐसे बदलाव उनके जीवन की परिस्थितियों में संभव नहीं थे या डॉक्टरों ने उन्हें इस तरह की सलाह ही नहीं दी थी।

इस प्रकार, जागरूकता की कमी, जटिल और अलग-थलग उपचार-प्राप्ति की प्रक्रियाएं, दवाइयों के पालन में अनियमितता, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं तक कमज़ोर पहुंच, और इलाज की कम वहन क्षमता—ये सभी बातें मिलकर यह तय करती हैं कि शहरी अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लोग उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी दीर्घकालिक बीमारियों का प्रबंधन कैसे करते हैं।

संवेदनशील शहरी बस्तियों में एनसीडी की देखभाल को बेहतर बनाने के लिए क्या किया जा सकता है?

ऊपर दिए गए निष्कर्ष इस बात को दोहराते हैं कि मरीज़ों के बीच बीमारी के बेहतर प्रबंधन और शहरी अनौपचारिक बस्तियों में सस्ती तथा सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। इसके लिए सामुदायिक स्तर की पहल और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में नीतिगत बदलावों को साथ लेकर चलने वाला एक समग्र दृष्टिकोण आवश्यक होगा।

1. सामुदायिक स्तर पर काम

सामुदायिक स्तर पर रोकथाम के प्रति जागरूकता बढ़ाने, रोगों की पहचान और उपचार के बारे में समझ विकसित करने, तथा दीर्घकालिक बीमारियों के बेहतर प्रबंधन को सक्षम बनाने के लिए सामुदायिक स्तर पर हस्तक्षेप ज़रूरी हैं।

सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता और पीयर एजुकेटर्स इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप स्वास्थ्य संदेश देकर रोकथाम के उपायों और समय पर जांच के महत्व को समझा सकते हैं, जिससे बीमारी का बोझ कम करने और शुरुआती स्तर पर रोगों को पहचानने में मदद मिल सकती है। उदाहरण के तौर पर, हमारे संदर्भ में नियमित व्यायाम करना और घर पर विशेष आहार का पालन करना हमेशा संभव नहीं था। इसलिए स्वास्थ्य संदेशों को उसी अनुसार ढालने की ज़रूरत है—जैसे तली हुई चीज़ों की जगह भुना हुआ चना और भुट्टा जैसे सस्ते और स्वास्थ्यवर्धक आहार के सेवन की सलाह देना।

उच्च रक्तचाप और मधुमेह से पीड़ित मरीज़ों के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर जाकर संपर्क करना और सामुदायिक स्तर पर सहायक समूहों का निर्माण करना ज़रूरी है, ताकि लोगों में नियमित उपचार पालन का महत्व विकसित हो, उन्हें सस्ते और आसानी से उपलब्ध उपचार विकल्प मिल सकें, और सामुदायिक रसोई जैसे माध्यमों से स्वस्थ खान-पान जैसी जीवनशैली संबंधी आदतों को अपनाने में मदद मिल सके। चूंकि मरीज़ चिकित्सकीय सलाह का पालन अलग-अलग तरीकों से करने की कोशिश करते हैं, इसलिए व्यवहार परिवर्तन से जुड़े हस्तक्षेप स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार होने चाहिए और दवाइयों तथा उपचार के पालन के विविध पैटर्न को पहचानना चाहिए, ताकि वे प्रभावी हो सकें।

2. स्थानीय स्वास्थ्य प्रदाताओं की भूमिका को मज़बूत करना

स्थानीय चिकित्सकों ने स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि दीर्घकालिक बीमारियों के लिए सामुदायिक स्तर की स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने में उनकी भूमिका को औपचारिक रूप से मान्यता देकर मज़बूत करने की ज़रूरत है। इसके लिए लक्षित क्षमता-विकास कार्यक्रमों की आवश्यकता है, जिनके माध्यम से स्थानीय आयुष चिकित्सकों को इस तरह प्रशिक्षित किया जा सके कि वे मरीज़ों के लिए सामुदायिक संपर्क बिंदु की भूमिका निभा सकें—जैसे लक्षणों की पहचान करना, प्राथमिक जांच और निगरानी करना, समय पर रेफरल देना, दवाइयों की उपलब्धता बनाए रखना, और मरीज़ों के साथ लगातार संपर्क में रहकर यह सुनिश्चित करना कि वे निर्धारित दवाइयों का नियमित सेवन करें।

स्थानीय स्वास्थ्य प्रदाताओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के बीच रेफरल की व्यवस्था तथा स्थानीय स्वास्थ्य नेटवर्क में उनकी भागीदारी जैसे औपचारिक संबंध स्थापित करने से समन्वय और मरीज़ों के स्वास्थ्य परिणामों में सुधार हो सकता है। चिकित्सकों द्वारा बताए गए टीबी और कोविड-19 कार्यक्रमों के सफल मॉडल यह दर्शाते हैं कि निगरानी और सहयोग के लिए स्थानीय प्रदाताओं की भागीदारी न केवल संभव है, बल्कि प्रभावी भी है, और इन अनुभवों को गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के प्रबंधन में भी अपनाया जाना चाहिए।

3. सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार

संवेदनशील समुदायों के लिए सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान ही है। हालांकि भारत में गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम मौजूद हैं, लेकिन उन्हें लागू करने में हमेशा कमियां रही हैं। जिस नगर पालिका का अध्ययन किया गया, वहां मुफ़्त सेवाएं उपलब्ध होने के बावजूद दीर्घकालिक बीमारियों के इलाज के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा था। मरीज़ स्थानीय निजी चिकित्सकों के पास जा रहे थे, लेकिन विशेष इलाज, दवाइयों और इन बीमारियों से जुड़ी आपात स्थितियों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मज़बूत करना अत्यंत आवश्यक है।

शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों या स्वास्थ्य पोस्टों को प्रशिक्षित कर्मचारियों, उपयुक्त जांच सुविधाओं, दवाइयों की उपलब्धता, और दीर्घकालिक रोग प्रबंधन पर केंद्रित मानकीकृत उपचार प्रोटोकॉल से लैस करने की ज़रूरत है, ताकि वे केवल संक्रामक रोगों और मातृ स्वास्थ्य तक सीमित न रहें। इसी प्रकार, सरकारी अस्पतालों को बेहतर स्टाफ़िंग और बुनियादी ढांचे के माध्यम से मज़बूत करना जरूरी है, ताकि वे दीर्घकालिक बीमारियों के लिए सस्ती बाह्य रोगी सेवाएं और आपातकालीन उपचार उपलब्ध करा सकें। एनसीडी के रोकथाम और नियंत्रण कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए मरीज़-केंद्रित और दीर्घकालिक एनसीडी देखभाल व्यवस्थाओं को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के सभी स्तरों पर बेहतर तरीके से एकीकृत करना आवश्यक है।

अंत में, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने पर नीतिगत ध्यान और समुदाय के साथ सबसे नज़दीक से काम करने वाले स्थानीय स्वास्थ्य प्रदाताओं के साथ महत्वपूर्ण साझेदारियां, संवेदनशील शहरी बस्तियों में दीर्घकालिक बीमारियों के लिए एक समग्र स्वास्थ्य प्रणाली विकसित कर सकती हैं। सामुदायिक स्तर की पहल मरीज़ों द्वारा संचालित प्रयासों को मज़बूत कर सकती है, जिससे दीर्घकालिक बीमारियों का बेहतर प्रबंधन संभव होगा। शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी असमानताओं को कम करने के लिए दीर्घकालिक बीमारियों के बेहतर प्रबंधन की दिशा में तुरंत कार्रवाई की आवश्यकता को पहचानना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।

*गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदला गया है।

*इस अनुवाद में मूल लेख के सभी हाइपरलिंक बिना किसी परिवर्तन के शामिल किए गए हैं।

इस लेख का अनुवाद शब्द एआई द्वारा किया गया है।

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लेखक के बारे में

  • जेनिफर स्पेंसर मुंबई स्थित सोसायटी फॉर न्यूट्रिशन, एजुकेशन एंड हेल्थ ऐक्शन (स्नेहा) में एक कंसल्टेंट क्वालिटेटिव शोधकर्ता हैं। पब्लिक पॉलिसी में स्नातकोत्तर, जेनिफर के पास शहरी शासन से जुड़े बहु-क्षेत्रीय मुद्दों पर आठ वर्षों के शोध और काम का अनुभव है। वर्तमान में वह टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई से अर्बन पॉलिसी और गवर्नेंस में पीएचडी भी कर रही हैं। स्वास्थ्य, स्वच्छता और शासन के क्षेत्र में उनके कई लेख प्रकाशित हो चुके हैं।