हल्का-फुल्का

सपनापुर में आख़िरी आदमी की तलाश!

लोकतंत्र का हाल चाहे कितना बेहाल हो, आंकड़े उसे सुंदर बना ही देते हैं। ​

सपनापुर में इन दिनों बड़ी गिनती चल रही थी। गांव के लोग इसे अलग-अलग नाम दे रहे थे। शाम होते ही चाय की ठिया पर मजमा लगने लगता था। लोग इसे ‘देश की हाजिरी’ कह रहे थे और हुक्मरान इसे ‘ऐतिहासिक क्षण’ बता रहे थे। सुमन को दोनों नाम पसंद आए। लोकतंत्र की ख़ूबसूरती है कि आवाम और हुक्मरान एक ही चीज़ को अलग-अलग नाम से बुला सकते हैं।

सुमन इस गिनती अभियान में लगी हुई थी। वैसे तो वह एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता थी, लेकिन पिछले दस-पंद्रह सालों में उसकी नौकरी का दायरा इतना बढ़ चुका था कि उसे खुद याद नहीं रहता था कि उसकी मूल नियुक्ति किस काम के लिए हुई थी। उसे कभी-कभी लगता था कि अगर कल को चांद पर आबादी गिनने का फ़रमान जारी हुआ, तो सबसे पहले आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को ही रजिस्टर समेत वहां रवाना किया जाएगा।

हर सुबह वह फॉर्म लेकर निकलती और लोगों के घरों, कमरों, दीवारों, छतों, मोबाइल और इंटरनेट की जानकारी दर्ज करती। जब पहले ही दिन वह कच्ची बस्ती में पहुंची, तो सामने कस्तूरी चाची मिली। चाची के घर की पहचान थी कि वह हर साल बारिश में थोड़ा और लोकतांत्रिक हो जाता था। यानी उसकी दीवारें गिर जाती थी और फिर वह सबके लिए खुल जाता था। सुमन ने फॉर्म खोलकर पूछा, “छत किस चीज़ की बनी है?” चाची ने सपाट लहज़े से कहा, “अभी तो टिन की है। जुलाई के बाद भगवान भरोसे की।” चूंकि फॉर्म में भगवान का कॉलम नहीं था, सुमन ने बस टिन लिख दिया।

अगले दिन वह बस्ती के आखिरी छोर पर गयी। वहां उसे लोटा लेकर खेत जाते रघु बाबा मिले, जो बीते महीने शौचालय का सर्वे भर चुके थे। सुमन ने पूछा, “बाबा, घर में कितने लोग हैं?” बाबा ने पलटकर पूछा, “एक बात बताओ। तुम लोग हमें कितनी बार गिनोगे? जब छोटा था, तब भी गिन रहे थे। अब बुढ़ा गया हूं, तब भी गिन रहे हो। तब भी मैं गरीब था, अब भी मैं गरीब हूं।” सुमन को लगा कि आदमी का जीवन चाहे कितना बदहाल हो, आंकड़े उसे सुंदर बना ही देते हैं। कोई बेरोज़गार हो सकता है, गरीब हो सकता है, बीमार हो सकता है, लेकिन आंकड़ों का काम बस इतने से चल जाता है कि उसके घर में रेडियो और मोबाइल है या नहीं।

कागल पर लिखते हुए महिला का एक हाथ_सर्वे
बड़ी तस्वीरें हमेशा पूरी नहीं होती। उनमें सामान पहले आ जाता है, आदमी बाद में। | चित्र साभार: आईडीआर

इसी बीच एक शाम सुमन घर लौटी तो उसकी मां आंगन में बैठी दाल बीन रही थी। पता चला कि उसके छोटे भाई दीपू का फोन आया था। बीते चार सालों से दीपू और देश की जीडीपी लगातार चल रहे थे। कभी बरेली, कभी इंदौर। फिलहाल वह नागपुर के पास किसी गोदाम में था।

मां बोली, “वहां उसकी गिनती हो जाएगी न?” सुमन ने चिढ़कर बोला, “क्यों नहीं होगी? भूत थोड़े ही है!”

कुछ दिन बाद ब्लॉक कार्यालय में एक प्रशिक्षण सत्र के दौरान उसे प्रवासी आबादी से जुड़े नियम समझाए गए। नियम ऐसे थे कि सुमन को लगा कि भूतों को गिनना ज़्यादा आसान होता होगा। उसी शाम उसने दीपू को फोन किया। पता चला कि जिस समय वहां गिनती करने वाले लोग आए थे, वह दूसरे ज़िले में माल उतारने गया हुआ था। उसका नाम गिना गया या नहीं, उसे ख़बर नहीं थी।

सुमन को याद आया कि वह रोज़ ऐसे लोगों से मिलती है, जो घर में कम और रास्तों में ज्यादा रहते हैं। कोई दस महीने दिल्ली में तो कोई चार महीने केरल में। कोई भट्ठे से फैक्ट्री तक घूम रहा है, कोई फैक्ट्री से गोदाम तक। घर कहीं, काम कहीं, राशन कहीं, वोट कहीं और पता कहीं।

पहले चरण की गिनती ख़त्म होने को थी। ब्लॉक कार्यालय में जोश हाई था। आंकड़ों के सटीक होने और देश की तस्वीर बदलने के पुल बांधे जा रहे थे। सुमन यह सब देख रही थी और मन ही मन सोच रही थी कि उस तस्वीर में दीपू कहां है?

घर में उसका बिस्तर था। अलमारी में उसके कपड़े थे। मां की बातों में उसके लिए डर था। हर महीने उसके खाते से आने-जाने वाले पैसों के स्क्रीनशॉट थे। लेकिन गिनती में वह कहां था, यह किसी को ठीक-ठीक मालूम नहीं था।

उस रात सुमन जब लेटी, तो उसे याद आया कि बचपन में उसे और दीपू को बिस्तर कितना बड़ा लगता था। उसे स्कूल की एक फोटो की याद भी आयी। फोटो मिलने पर पता चला था कि सबसे पीछे खड़ी लंबी लड़की फ्रेम से कट गयी थी।

हेडमास्टर ने तब कहा था, “अरे, सब आ तो गए!” लेकिन लड़की को तस्वीर में सब का होना नहीं, बस अपना न होना दिख रहा था।

सुमन को लगा कि शायद बड़ी तस्वीरें हमेशा पूरी नहीं होती। उनमें सामान पहले आ जाता है, आदमी बाद में। और कई बार जब तक आदमी की बारी आती है, फ्रेम भर चुका होता है।

अगले दिन सुमन ने सारे फॉर्म जमा कर दिए। आंकड़ों का काम पूरा हो चुका था।

देश की तस्वीर बन रही थी। बस उसमें सपनापुर का एक आदमी कहीं खो गया था।

और जैसा अक्सर होता है, किसी ने उसे ढूंढने की कोशिश भी नहीं की।

लेखक के बारे में

  • ​​कुमार उन्नयन ​​आईडीआर​​ में सीनियर एडिटोरियल एसोसिएट के रूप में कार्यरत हैं। वे नियमित रूप से भाषा और समुदाय से जुड़े विषयों पर काम करते रहे हैं। इस दौरान उन्होंने मौखिक इतिहास शोध, फील्ड पत्रकारिता, लेखन और अनुवाद जैसे क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई है। ​​आईडीआर​​ से पहले वह सेंटर फॉर कम्युनिटी नॉलेज, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एशियन स्टडीज़, नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी, कथा और द कारवां जैसे संस्थानों से जुड़े रहे हैं। उन्होंने साहित्य में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है और मौखिक इतिहास में प्रशिक्षित हैं।​
  • पूजा राठी आईडीआर हिंदी में संपादकीय विश्लेषक (एडिटोरियल एनालिस्ट) हैं। इससे पहले, उन्होंने फेमिनिज़्म इन इंडिया में सह-संपादक के रूप में काम किया है, जहां उन्होंने जेंडर, पर्यावरण और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को कवर किया। पूजा को यूएन लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित किया गया है और वह 2024 की लाडली मीडिया फैलो भी रह चुकी हैं। इसके अलावा, वह खबर लहरिया की रूरल मीडिया फेलोशिप और एटलस फॉर बिहेवियर चेंज इन डेवलपमेंट की बिहेवियरल जर्नलिज़्म फेलोशिप की पूर्व फेलो रह चुकी हैं। पूजा ने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है।