झारखंड में मज़दूरी के लिए पलायन करने वालों में 89.6 प्रतिशत पुरुष हैं। खेती का काम साल में केवल छह महीने ही चलता है। इसके बाद रोज़गार के अवसर कम हो जाते हैं, इसलिए बेहतर कमाई की उम्मीद में पुरुष दूसरे शहरों की ओर पलायन करते हैं। वहीं, महिलाएं घर और परिवार की पूरी ज़िम्मेदारी संभालने के लिए गांव में रह जाती हैं।
उनके हिस्से घर की मरम्मत से लेकर बच्चों की पढ़ाई, बुज़ुर्गों की तीमारदारी और ऐसे कई फैसलों की ज़िम्मेदारी आ जाती है, जिन्हें उन्होंने पहले कभी अकेले नहीं निभाया। इसके साथ उन्हें हर समय किसी न किसी चिंता का सामना करना पड़ता है। घर से बाहर निकलने पर उन्हें समाज के तानों और सवालों से भी जूझना पड़ता है। लेकिन इन सबके बावजूद, उनके लिए कोई ऐसी सरकारी योजना नहीं है जो उनकी इस स्थिति को समझते हुए उन्हें सहारा दे सके।
शोध बताते हैं कि भारत में पलायन करने वाले पुरुषों की पत्नियां (उन महिलाओं की तुलना में जिनके पति पलायन नहीं करते) अपने स्वास्थ्य को कमतर मानती हैं। इसकी वजह अनियमित रूप से मिलने वाला पैसा, बातचीत का कम होना और लंबे समय तक पति-पत्नी का अलग-अलग रहना है।
इस वीडियो में झारखंड के सरायकेला-खरसावां ज़िले की कुजू ग्राम पंचायत की मुखिया पिंकी बारदा बता रही हैं कि पलायन का यह बोझ महिलाओं के जीवन को किस तरह प्रभावित करता है और ऐसे समय में गांव की महिलाएं किस तरह एक-दूसरे का सहारा बनती हैं।
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लेखक के बारे में
- पिंकी बारदा झारखंड के सरायकेला-खरसावां ज़िले के राजनगर प्रखंड स्थित कुजू ग्राम पंचायत की मुखिया हैं। एक मुखिया के रूप में वह स्थानीय बुनियादी सुविधाओं के विकास, जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और गांव के समग्र विकास से जुड़े कामों की ज़िम्मेदारी संभालती हैं।


