शिक्षा

क्या छात्रों के अनुभव छात्रवृत्ति की नीतियां बदल सकते हैं?

देश का स्कॉलरशिप सिस्टम वंचित छात्रों की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पा रहा है। ऐसे में समुदाय-आधारित मॉडल उनके लिए सहयोग की एक नई राह दिखा सकते हैं।
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विशेष* सोशल वर्क में मास्टर ऑफ आर्ट्स की पढ़ाई कर रहे हैं। यह पहली बार है जब वह महाराष्ट्र के बुलढाणा ज़िले में स्थित अपने घर से दूर रह रहे हैं। उनके माता-पिता किसान हैं और परिवार की सालाना आय लगभग 2 लाख रुपये है। वह अपने पूरे परिवार में पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने वाले पहले व्यक्ति हैं।

विशेष हर हफ्ते में दो दिन सूरज उगने से पहले उठ जाते हैं। उन्हें मुंबई से लगभग 70 किलोमीटर पूर्व में स्थित कर्जत जाने के लिए लोकल ट्रेन पकड़नी होती है। वहां वह आजीविका और विकलांगता के क्षेत्र में काम करने वाले एक गैर-लाभकारी संगठन के लिए फील्डवर्क कर रहे हैं। इस यात्रा पर हर हफ्ते उनके लगभग 50 रुपये खर्च होते हैं। यात्रा और भोजन के लिए मिलने वाला फील्डवर्क भत्ता ज़्यादातर कम ही पड़ता है। ऐसे में अपना खर्च उठाने के लिए वह अक्सर कॉलेज के डाइनिंग हॉल में रात का खाना नहीं खाते। इससे वह हर हफ्ते लगभग 50 रुपये बचा पाते हैं।

अनुसूचित जनजाति समुदाय से आने वाले विशेष भारत सरकार की पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप के लिए पात्र थे। हालिया समय में इस स्कॉलरशिप व्यवस्था में कई बदलाव हुए हैं। अब अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के छात्र इसके पात्र नहीं हैं। साथ ही, स्कॉलरशिप के प्रबंधन और धनराशि बांटने की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार से हटाकर राज्य सरकारों को दे दी गई है। इसके बाद से हर राज्य की अपनी अलग नीतियां, पात्र शिक्षण संस्थानों की सूची और पढ़ाई के विषय हैं। 

इस बिखरी हुई व्यवस्था, एकमुश्त मिलने वाली स्कॉलरशिप, अलग-अलग राज्यों में अलग राशि, भुगतान में देरी और जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं ने वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का खर्च उठाना पहले से कहीं अधिक मुश्किल बना दिया है। इसके साथ ही, स्कॉलरशिप के लिए आवेदन करने और पूरी प्रक्रिया को समझने में भी उनके सामने पहले से अधिक मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। विशेष की तरह भारत के कॉलेजों में पढ़ने वाले बहुत से प्रथम पीढ़ी के छात्र रोज़मर्रा की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के संघर्ष से जूझते हैं।

भारत में स्कॉलरशिप व्यवस्था वंचित छात्रों की ज़रूरतों को पूरा क्यों नहीं कर पा रही?

भारत में ज़्यादातर स्कॉलरशिप, जिनमें केंद्र और राज्य सरकारों की पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप भी शामिल हैं, अल्पकालिक और एकमुश्त मदद के रूप में दी जाती हैं। आमतौर पर स्कॉलरशिप की राशि केवल एक शैक्षणिक वर्ष, या कई बार केवल एक सेमेस्टर के लिए ही दी जाती है। ऐसे में इस बात का आश्वासन नहीं होता कि आगे भी यह मदद जारी रहेगी। इससे बहुवर्षीय पाठ्यक्रमों (मल्टी-ईयर डिग्री) में पढ़ रहे विद्यार्थियों के लिए लगातार अनिश्चितता की स्थिति बनी रहती है। नतीजतन, वे अपनी पढ़ाई की दीर्घकालिक योजना बनाने के बजाय हर नए सेमेस्टर या वर्ष में अपनी आर्थिक स्थिति को लेकर परेशान रहते हैं।

जब आर्थिक मदद नियमित और लगातार मिलने के बजाय कभी-कभार या एकमुश्त मिलती है, तो छात्रों को कई मुश्किल फैसले लेने पड़ते हैं। उन्हें पढ़ाई पर ध्यान देने के बजाय पार्ट-टाइम काम करना पड़ सकता है, असाइनमेंट या दूसरे शैक्षणिक काम टालने पड़ सकते हैं या फिर ऊंची ब्याज दर पर कर्ज़ लेना पड़ सकता है। लेकिन इन तरीकों से भी समस्या का सिर्फ़ कुछ समय के लिए ही समाधान होता है, क्योंकि स्कॉलरशिप की तरह ये भी स्थायी नहीं होते। इसका सबसे ज़्यादा असर प्रथम पीढ़ी के छात्रों पर पड़ता है। उन पर आर्थिक दबाव बढ़ता है, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है और कई मामलों में उन्हें बीच में ही पढ़ाई छोड़नी भी पड़ती है।

वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले प्रथम पीढ़ी के छात्रों को अपने सहपाठियों की तरह ही पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करने और समान अकादमिक अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश करनी होती है। लेकिन उनके सामने कई ऐसी चुनौतियां भी होती हैं, जो अक्सर दिखाई नहीं देती। उन्हें नई भाषा में सहज होना पड़ता है, कॉलेज या यूनिवर्सिटी के तौर-तरीकों और अपेक्षाओं को समझना पड़ता है, शिक्षकों और सहपाठियों के साथ अकादमिक रिश्ता बनाना पड़ता है और पढ़ाई से जुड़े अवसरों तक पहुंचने के रास्ते खुद तलाशने पड़ते हैं। यह सब वे ऐसे माहौल में करते हैं, जो उनके लिए सांस्कृतिक रूप से नया और आर्थिक रूप से मुश्किल हो सकता है। जिन छात्रों के परिवार या आसपास के लोगों में पहले किसी ने शिक्षा हासिल नहीं की है, उनके लिए यह अतिरिक्त मेहनत एक तरह का ‘प्रथम पीढ़ी कर (टैक्स)’ बन जाती है, जिसे चुकाना उनकी मजबूरी है। यानी, उन्हें कई ऐसे सामाजिक, सांस्कृतिक और संस्थागत तौर-तरीके खुद सीखने पड़ते हैं, जिन्हें दूसरे छात्र अक्सर अपने परिवार और आसपास के माहौल से पहले ही सीख चुके होते हैं।

ऐसी परिस्थितियों में सिर्फ़ आर्थिक मदद काफी नहीं होती। अगर छात्रों को लगातार और व्यक्तिगत सहयोग न मिले, तो स्कॉलरशिप का असर भी सीमित रह जाता है। एक बार मिलने वाली स्कॉलरशिप किसी विद्यार्थी की शंकाएं सुनने, उसे यह समझाने कि किन रिसर्च पत्रिकाओं को पढ़ना चाहिए, रिसर्च ग्रांट के लिए आवेदन कैसे करना है या अपने ही समुदाय में संवेदनशील तरीके से फील्डवर्क कैसे करना है—इन सबमें उसकी मदद नहीं कर सकती। सरकारी और प्राइवेट, दोनों ही स्कॉलरशिप योजनाओं में मेंटरशिप, साथियों से सीखने और एल्यूमनी नेटवर्क (पूर्व छात्रों का नेटवर्क) जैसे मददगार विकल्प शामिल नहीं होते। जबकि कई बार छात्रों को आगे बढ़ने के लिए जिस मार्गदर्शन और सहयोग की ज़रूरत होती है, वह केवल पैसे से नहीं, बल्कि ऐसे ही मेंटर्स और साथियों के नेटवर्क से मिल सकता है।

सामाजिक विज्ञान की चुनौती

समस्या केवल स्कॉलरशिप योजनाओं की बनावट तक सीमित नहीं है। यह इस बात से भी जुड़ी है कि सरकारी और प्राइवेट स्कॉलरशिप के बीच अलग-अलग विषयों के छात्रों को कितनी आर्थिक मदद मिलती है। अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (एआईएसएचई) 2021–22 के अनुसार, कला और सामाजिक विज्ञान पढ़ने वाले छात्रों की संख्या इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों की संख्या से दो गुना से भी अधिक है। इसके बावजूद, प्राइवेट स्कॉलरशिप में इन विषयों के छात्रों को उनकी संख्या के अनुपात में पर्याप्त आर्थिक सहायता नहीं मिलती। इसका सीधा असर यह होता है कि कला, मानविकी और सामाजिक विज्ञान के छात्रों के लिए स्कॉलरशिप के अवसर बहुत कम रह जाते हैं, जबकि उच्च शिक्षा में पढ़ने वाले छात्रों का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं विषयों से आता है।

इसका महत्व सिर्फ़ इस बात तक सीमित नहीं है कि किसी छात्र को उच्च शिक्षा मिल पाती है या नहीं। ऐसे समय में, जब मानवाधिकार, पर्यावरणीय न्याय और समानता जैसे मुद्दों पर स्वतंत्र सोच और बहस की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है, सामाजिक विज्ञान के छात्रों और शोधकर्ताओं की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। जब आर्थिक मजबूरियों के चलते वंचित समुदायों से आने वाले छात्र इन विषयों की पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं, तो इसका असर सिर्फ़ उनकी शिक्षा पर नहीं पड़ता। इन विषयों का दायरा भी धीरे-धीरे उन समुदायों की ज़मीनी हकीकत से दूर होने लगता है, जिनके जीवन और अनुभवों को समझना और बदलना उसका उद्देश्य है।

इसलिए, सामाजिक विज्ञान पढ़ रहे प्रथम पीढ़ी के छात्रों के लिए आर्थिक सहायता को मजबूत करना सिर्फ़ उच्च शिक्षा तक उनकी पहुंच का सवाल नहीं है। यह प्रतिनिधित्व का भी सवाल है। यानी कौन रिसर्च करता है, किसके अनुभवों को विचार-विमर्श में जगह मिलती है और कौन सार्वजनिक बहस और नीतियों तक अपनी आवाज़ पहुंचा पाता है। इसका असर आगे चलकर सार्वजनिक विमर्श और नीतिगत फैसलों की गुणवत्ता और प्रासंगिकता, दोनों पर पड़ता है।

हाथ में मोमबत्ती लिए मिट्टी की दीवारों पर अक्षर लिखते कुछ बच्चे_स्कॉलरशिप
जब आर्थिक सहायता अनियमित होती है, तो छात्रों को कई मुश्किल समझौते करने पड़ते हैं। | चित्र साभार: पेक्सेल्स

एक अलग मॉडल कैसा हो सकता है

वंचित समुदायों से आने वाले सामाजिक विज्ञान के छात्रों के लिए लंबे समय तक मिलने वाले सहयोग के बहुत कम अवसर हैं। ऐसे में, छात्रों की भागीदारी और उनके नेतृत्व में चलने वाले सामुदायिक मॉडल उनके लिए एक अहम सहारा बन सकते हैं। ये मॉडल उन्हें लगातार मदद और मार्गदर्शन देने के साथ-साथ अपनी आवाज़ उठाने और अपने मुद्दों के लिए काम करने का मंच भी दे सकते हैं। इसके लिए कुछ बातों पर खास ध्यान देने की ज़रूरत है:

1. समुदाय-आधारित स्कॉलरशिप मॉडल को बढ़ावा देना

ब्रिज स्कॉलरशिप, जिसकी स्थापना लेखक ने की है, और कर्ता इनिशिएटिव की कर्ता स्कॉलरशिप जैसे समुदाय-आधारित मॉडल स्कॉलरशिप को केवल आर्थिक मदद के रूप में नहीं देखते। इनका उद्देश्य छात्रों को लंबे समय तक आर्थिक मदद के साथ-साथ मार्गदर्शन और सहयोग देना है। इन मॉडल की शुरुआत इस सोच से होती है कि शिक्षा एक अधिकार है और छात्रों को अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए लगातार सहयोग मिलना चाहिए। इनमें डोनर को केवल पैसे देने वाले और छात्रों को केवल मदद पाने वाले लोगों के रूप में नहीं देखा जाता। इसके बजाय, समान रुचियों, विषयों और जीवन-अनुभवों वाले विद्यार्थियों का एक ऐसा नेटवर्क बनाने पर ज़ोर दिया जाता है, जहां वे एक-दूसरे से सीख सकें और सहयोग कर सकें।

इसका एक तरीका यह है कि स्कॉलरशिप को किसी खास विषय या सामाजिक पृष्ठभूमि वाले छात्रों की ज़रूरतों के अनुसार तैयार किया जाए। जैसे, प्रथम पीढ़ी के छात्रों या जन स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और सामाजिक कार्य जैसे कम फंडिंग पाने वाले, लेकिन महत्वपूर्ण विषयों की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए अलग स्कॉलरशिप बनाई जा सकती हैं।

ऐसी सहभागिता वाली व्यवस्था से छात्रों में साझा जिम्मेदारी और अपनी भूमिका का एहसास बढ़ता है। यह मॉडल इस बात को भी समझता है कि किसी छात्र की पढ़ाई और करियर से जुड़े फैसले केवल कॉलेज या यूनिवर्सिटी से तय नहीं होते। उसके जीवन के अनुभव, परिवार और सामाजिक पृष्ठभूमि भी इन फैसलों को गहराई से प्रभावित करते हैं।

इन मॉडल में छात्रों के निजी जीवन को भी महत्व दिया जाता है। वंचित समुदायों से आने वाले छात्रों को अपनी पसंद के किसी भी विषय, जिसमें स्टेम (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमेटिक्स) भी शामिल है, पढ़ने के समान अवसर मिलने चाहिए। लेकिन सामाजिक विज्ञान में उनकी भागीदारी भी उतनी ही ज़रूरी है, क्योंकि इन विषयों में असमानता, रोज़गार, शिक्षा और शासन जैसे मुद्दों पर रिसर्च होती है और नीतियां बनाने में मदद मिलती है।

विडंबना यह है कि इन मुद्दों से सबसे अधिक प्रभावित समुदायों के लोग ही अक्सर रिसर्च और विचार-विमर्श में सबसे कम प्रतिनिधित्व रखते हैं। इसका मतलब है कि नीतियां बनाते समय जिन शोध और आंकड़ों पर भरोसा किया जाता है, उनमें अक्सर उन लोगों के अनुभव और नज़रिए शामिल नहीं होते, जिनके जीवन पर इन नीतियों का सबसे ज़्यादा असर पड़ता है।

2. अन्य साथियों और डोनर के साथ रिश्ता बनाना

यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि ये मॉडल डोनर और छात्रों के बीच संबंधों को किस तरह एक नए रूप में देखते हैं। यहां सहयोग केवल एक बार मिलने वाली आर्थिक मदद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक लंबे और लगातार चलने वाले रिश्ते में बदल जाता है।

ब्रिज में हमने इसका अनुभव किया है। एक डोनर ने एक छात्र की एलएलएम की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप दी। लेकिन उनका सहयोग केवल स्कॉलरशिप देने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने पूरे साल उस छात्र का मार्गदर्शन किया और भारत के सर्वोच्च न्यायालय की लॉ क्लर्क-कम-रिसर्च एसोसिएट परीक्षा की तैयारी में भी उसकी मदद की। छात्र ने भी यह परीक्षा सफलतापूर्वक पास की।

ऐसे मॉडल में डोनर केवल यह नहीं देखते कि छात्र कैसा प्रदर्शन कर रहा है। वे उसकी शैक्षणिक यात्रा में एक सहयोगी और मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं। वहीं, छात्रों को भी सिर्फ मदद पाने वाले लाभार्थी के रूप में नहीं देखा जाता। उन्हें ऐसे सक्रिय समुदाय का हिस्सा माना जाता है, जहां वे अपनी सोच, फैसलों और आवाज़ के साथ योगदान दे सकते हैं।

यह रिश्ता स्कॉलरशिप की अवधि खत्म होने के बाद भी बना रहता है। पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्र एल्यूमनी के रूप में एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं और ऐसा नेटवर्क बनाते हैं, जो अलग-अलग संस्थानों, शहरों और यहां तक कि देशों की सीमाओं से भी आगे जाता है। समय के साथ ये नेटवर्क एक तरह की सामाजिक पूंजी बन जाते हैं। इनके ज़रिए पूर्व छात्र ऐसे साथियों से मार्गदर्शन, नए अवसर और सहयोग पा सकते हैं, जो उनके जैसे शैक्षणिक अनुभवों और चुनौतियों से गुज़र चुके हैं।

इनमें से कई छात्र आगे चलकर खुद भी मेंटर बन जाते हैं। इस तरह सहयोग का एक ऐसा सिलसिला बनता है, जिसमें एक मास्टर्स का छात्र किसी पीएचडी कैंडिडेट से मार्गदर्शन पाता है, और वही पीएचडी कैंडेडेट ख़ुद किसी युवा पेशेवर से सहयोग पा सकता है।

शिक्षा एक अधिकार है और छात्रों को अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए लगातार सहयोग मिलना चाहिए।

ये नेटवर्क जीवन के उन महत्वपूर्ण पड़ावों पर भी साथ देते हैं, जब कोई छात्र किसी नए शहर में जाता है, पहली नौकरी शुरू करता है या आगे की पढ़ाई के लिए कोई नया रास्ता चुनता है। ऐसे समय में संस्थागत मदद अक्सर उपलब्ध नहीं होती। इसलिए, स्कॉलरशिप का असर पढ़ाई पूरी होने के साथ खत्म नहीं हो जाता। समय के साथ यह आपसी सहयोग के एक ऐसे लंबे रिश्ते में बदल सकता है, जिसे वही समुदाय आगे बढ़ाता है, जिसके निर्माण में स्कॉलरशिप ने शुरुआत में मदद की थी।

ऐसे मॉडल में आर्थिक मदद के साथ-साथ मानवीय रिश्तों को भी उतना ही महत्व दिया जाता है। इससे ऐसे रिश्ते बनते हैं, जो स्कॉलरशिप की अवधि खत्म होने के बाद भी बने रहते हैं। स्कॉलरशिप पाने वाले छात्रों को केवल मदद के लाभार्थी के रूप में नहीं देखा जाता। उन्हें एक भावी सहयोगी के रूप में देखा जाता है, जो आगे चलकर उसी नेटवर्क को मज़बूत करने में योगदान दे सकते हैं, जिसने उनकी शिक्षा में मदद की थी।

इससे ऐसे मॉडल की पहुंच और लंबे समय तक बने रहने की क्षमता, दोनों बढ़ती हैं। साथ ही, स्कॉलरशिप को केवल आर्थिक सहायता के बजाय ज्ञान, नेतृत्व और सामाजिक बदलाव में सामूहिक निवेश के रूप में देखने का एक नया नज़रिया सामने आता है।

3. बहु-वर्षीय सहयोग उपलब्ध कराना

किसी स्कॉलरशिप की सबसे बड़ी ताकत अक्सर उसकी राशि नहीं, बल्कि उसका लगातार उपलब्ध होना होता है। कई वर्षों तक मिलने वाली आर्थिक सहायता से छात्रों को पूरे पाठ्यक्रम के दौरान यह भरोसा रहता है कि उनकी पढ़ाई के लिए सहयोग बना रहेगा। उन्हें हर साल या हर सेमेस्टर यह सोचकर परेशान नहीं होना पड़ता कि अगली बार स्कॉलरशिप मिलेगी या नहीं। इसके बजाय, वे अपनी पढ़ाई और आगे की योजनाओं पर लंबे समय के लिए ध्यान दे सकते हैं।

यह स्थिरता खासतौर पर सामाजिक विज्ञान के छात्रों के लिए ज़रूरी है। इन विषयों में अक्सर फील्डवर्क, इंटर्नशिप और लंबे समय तक चलने वाली रिसर्च की ज़रूरत होती है। पढ़ाई के साथ नियमित नौकरी करते हुए इन ज़िम्मेदारियों को निभाना कई बार मुश्किल होता है। इसलिए किसी छात्र के लिए सवाल सिर्फ़ यह नहीं होता कि उसे आज आर्थिक मदद मिल रही है या नहीं। वह यह भी सोचता है कि क्या यह मदद उसकी पढ़ाई के दूसरे साल में भी जारी रहेगी?

जब स्कॉलरशिप हर साल दोबारा आवेदन करने या थोड़े समय के रिज़ल्ट पर निर्भर नहीं होती, तो छात्र अधिक आत्मविश्वास के साथ ऐसे शैक्षणिक अवसर चुन पाते हैं, जिनसे उन्हें तुरंत आर्थिक फायदा भले न हो, लेकिन जो उनके लंबे समय के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।

उच्च शिक्षा तक पहुंच, खासकर सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में, लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। ऐसे में यह सोचना ज़रूरी है कि छात्रों को प्रभावी सहयोग देने का तरीका क्या हो सकता है। उच्च शिक्षा में सरकारी निवेश बढ़ाने के लिए लगातार एडवोकेसी की ज़रूरत तो है ही, लेकिन समुदाय-आधारित स्कॉलरशिप मॉडल सहयोग को देखने का एक अलग तरीका भी सामने रखते हैं। ये मॉडल मानवीय रिश्तों, साझा ज़िम्मेदारी और आपसी भरोसे पर आधारित होते हैं।

जब स्कॉलरशिप योजनाओं में छात्रों की भागीदारी और लंबे समय तक मिलने वाले सहयोग को जगह दी जाती है, तो सामाजिक और आर्थिक नीतियों से सबसे अधिक प्रभावित लोग सिर्फ़ शोध और नीतियों का विषय बनकर नहीं रह जाते। वे इन नीतियों को समझने, उन पर सवाल उठाने और उन्हें बेहतर बनाने की प्रक्रिया में भी अपनी भूमिका निभा सकते हैं। इस तरह के मॉडल एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाने में मदद करते हैं, जो छात्रों को सिर्फ़ कॉलेज या विश्वविद्यालय में दाखिला लेने तक मदद नहीं करती, बल्कि उनकी पूरी पढ़ाई के दौरान उनका साथ देती है।

इसके ज़रिए शोध और नीतिगत समझ में भी समाज के अलग-अलग वर्गों के अनुभव और आवाज़ें शामिल हो पाती हैं। इससे शोध ज़मीनी हकीकत के करीब आता है और उन समस्याओं को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है, जिनके समाधान की कोशिश की जा रही है।

*गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदले गए हैं।

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लेखक के बारे में

  • मंज़र व्हाट वर्क्स हब फॉर ग्लोबल एजुकेशन में सीनियर मैनेजर हैं, जहां वह शोध-साक्ष्यों को नीतियों और व्यवहार में प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने पर काम करते हैं। इससे पहले वह ऑक्सफर्ड इंटरनेट इंस्टीट्यूट, जे-पैल साउथ एशिया और नाबार्ड कंसल्टेंसी सर्विसेज़ के साथ काम कर चुके हैं। वह ब्रिज स्कॉलरशिप्स के संस्थापक भी हैं, जो भारत के वंचित समुदायों से आने वाले विद्यार्थियों को आवश्यकता-आधारित छात्रवृत्ति के साथ दीर्घकालिक मार्गदर्शन और सहयोग प्रदान करती है। मंज़र चीवनिंग स्कॉलर रहे हैं और उन्होंने ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय तथा टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई से मास्टर्स की डिग्री हासिल की है।
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