रायश्याबाड़ी: हर बार उजड़कर भी उम्मीद बोते किसान


वर्ष 2024 में त्रिपुरा में आई बाढ़ से पहले धलाई जिले में रायश्याबाड़ी की पहाड़ियों को झूम खेती के लिए जाना जाता था। लेकिन इस आपदा ने न केवल लोगों के जीवन और आजीविका को बुरी तरह प्रभावित किया, बल्कि इस इलाके के उस इतिहास को भी फिर से सामने ला खड़ा किया, जिसके घाव अब तक पूरी तरह भरे नहीं थे। इस बाढ़ में रायश्याबाड़ी के किसानों को भारी फसल नुकसान, घरों के टूटने-बिखरने और मिट्टी के बहाव जैसी कई समस्याओं का सामना करना पड़ा।
आजीविका के क्षेत्र में काम करने वाली गैर-लाभकारी संस्था सेस्टा में इंटीग्रेटर प्रसांत देबबर्मा बताते हैं, “मैंने एक किसान को कमर तक पानी में डूबे हुए धान की कटाई करते देखा। उसे उम्मीद थी कि बाढ़ का पानी जल्द उतर जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पानी तब तक नहीं थमा, जब तक बहकर आई मिट्टी और मलबे ने खेतों और पहाड़ियों को पूरी तरह तबाह नहीं कर दिया।”
रायश्याबाड़ी के लिए बाढ़ कोई असामान्य घटना नहीं है। वर्ष 1974 में गुमटी जलविद्युत परियोजना के तहत गोमती नदी पर एक बांध बनाया गया, जिससे कृत्रिम डंबूर झील का निर्माण हुआ। इस झील ने हरे-भरे राइमा–साइमा घाटी क्षेत्र को जलमग्न कर दिया और इसके साथ ही रायश्याबाड़ी के निचले इलाके भी डूब गए। इस घटना ने यहां के लोगों के जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया।
जल संबंधी मुद्दों पर काम करने वाले समाजशास्त्री थॉमस मालसोम कहते हैं, “हमने एक ही झटके में पीढ़ियों से संचित ज्ञान को लगभग मिटा दिया। हजारों आदिवासी समुदाय विस्थापित हो गए। जो लोग वहीं रह गए, उन्हें बदलते भू-दृश्य के अनुरूप खुद को ढालना पड़ा। उन्होंने मछली पकड़ने या धान की खेती जैसे नए आजीविका विकल्प अपनाए। अब जलवायु परिवर्तन के कारण वे एक बार फिर विस्थापन के खतरे का सामना कर रहे हैं। इससे बचने के लिए उन्हें फिर से खुद को परिस्थितियों के अनुसार ढालना होगा।”
लोगों ने अपनी परिस्थितियां बदलने के लिए कई प्रयास किए हैं। दरअसल, झूम खेती भी इसी विस्थापन का परिणाम थी, जिसने लोगों को पहाड़ियों में बसने के लिए मजबूर किया था। हाल के वर्षों में सेस्टा जैसी गैर-लाभकारी संस्थाओं की मदद से उन्होंने आजीविका के वैकल्पिक साधन के रूप में आम की खेती की ओर रुख किया है। लेकिन बाढ़ के चलते इस कोशिश के परिणाम मिले-जुले रहे हैं।
प्रसांत बताते हैं, “स्थानीय भू-दृश्य, पर्यावरण और बाज़ार का अध्ययन करने के बाद हमने आम को प्रमुख फसल के रूप में चुनने का फैसला किया। इसके तहत किसानों को आम्रपाली आम के पौधे वितरित किए गए, क्योंकि यह किस्म यहां की जलवायु के अनुकूल है और बाज़ार में इसकी अच्छी कीमत मिलती है।” शुरुआती सफलता से उत्साहित होकर सेस्टा ने एक विस्तृत योजना तैयार की। इसके तहत 180 भूमिधारक किसानों को आधे एकड़ और एक एकड़ के आम के बाग़ लगाने में सहयोग दिया जाना था। वहीं 20 भूमिहीन किसानों की आय के स्रोतों में विविधता लाने के लिए उन्हें सूअर पालन कार्यक्रम से जोड़ा जाना था। लेकिन तभी बाढ़ आ गई।
प्रसांत आगे कहते हैं, “डंबूर झील के पानी से सिंचाई करने के लिए कुछ किसानों ने अपने पौधे जलाशय के किनारे लगा दिए थे। जलस्तर बढ़ने पर उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा। वहीं कुछ किसानों ने पौधे पहाड़ियों की ऊंची ढलानों पर लगाए थे। लेकिन वे भी बहाव और मिट्टी कटने की वजह से नुकसान से नहीं बच सके।” पानी उतरने के साथ ही किसानों का नए बाग़ लगाने का उत्साह भी ठंडा पड़ गया।
मौजूदा समय में काफी समझाने-बुझाने के बाद किसान एक बार फिर अपनी किस्मत आज़माने को तैयार हो रहे हैं। इस बार उन्होंने ढलानों पर कंटूर ट्रेंच और अर्धचंद्राकार मेड़ें बनाई हैं, ताकि पानी के बहाव की गति कम हो सके। इससे पानी को मिट्टी में समाने के लिए अधिक समय मिलता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है। किसानों की आय बढ़ाने के लिए सेस्टा आम के साथ अंतरफसली खेती के तहत अदरक और अन्य मसालों की खेती में भी उनकी मदद कर रहा है।
प्रसांत को उम्मीद है कि 2026 की गर्मियां अपने साथ अच्छी फसल लेकर आयेंगी। इलाके के किसान भी चाहेंगे कि उनकी ये उम्मीद सफल हो।
हंसातनु रॉय वर्ष 2025–26 के आईडीआर नॉर्थईस्ट फेलो हैं।
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लेखक के बारे में
- हंसातनु रॉय वर्ष 2025–26 के आईडीआर नॉर्थईस्ट मीडिया फेलो हैं। वह ग्रीन हब नॉर्थईस्ट फेलो भी रह चुके हैं। हंसातनु को फिल्म-निर्माण और संरक्षण संबंधी शोध में रुचि है, और वह पूर्व में अरुणाचल प्रदेश और असम में पब्लिक हेल्थ संस्थान के साथ काम कर चुके हैं। उन्होंने डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है।


