दलितों के स्वाभिमान का साहित्य है लोकगाथा सलहेस
यह वीडियो इंटरव्यू, वरिष्ठ दलित साहित्यकार और चिंतक राम श्रेष्ठ दीवाना के शब्दों में राजा सलहेस की लोकगाथा की एक गहरी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। वे राजा सलहेस को सिर्फ बिहार या किसी एक जाति विशेष की लोकगाथा का नायक नहीं, बल्कि बहुजन समाज के साझा नायक के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार सलहेस की लोकगाथा प्रेम, संवेदना, विद्रोह और सामाजिक न्याय की ऐसी अनूठी अभिव्यक्ति है, जिसकी गहराई विश्व की अन्य लोकगाथाओं में भी दुर्लभ है। वे खास तौर पर इस बात पर जोर देते हैं कि सलहेस और मलिनिया की प्रेमकथा जाति, धर्म और पितृसत्तात्मक बंधनों को तोड़ती है और एक अधिक समानतापूर्ण समाज की कल्पना पेश करती है। वे बताते हैं कि सलहेस की गाथा सामंती अत्याचारों, डोली प्रथा और सामाजिक अन्याय के खिलाफ संघर्ष की कहानी भी है, जो आज के समय में सामाजिक बदलाव की प्रेरणा बन सकती है।
वीडियो में दीवाना, गैर-दलित लेखकों द्वारा सलहेस साहित्य की व्याख्या पर गंभीर सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि सवर्ण लेखकों ने इस लोकगाथा को उसके वास्तविक सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ से काटकर उसमें ब्राह्मणवादी और पाखंडवादी तत्व जोड़ दिए, जिससे इसकी क्रांतिकारी चेतना कमजोर हुई। वे तर्क देते हैं कि लोकसाहित्य को समझने के लिए जमीनी शोध, कलाकारों के अनुभव और बहुजन दृष्टिकोण जरूरी है। बातचीत में वे लोकसाहित्य, दलित सौंदर्यशास्त्र और सांस्कृतिक स्वाधीनता के सवाल को जोड़ते हुए कहते हैं कि सलहेस की गाथा को अवतारवाद और चमत्कारवाद से मुक्त करके ही उसके असली वैज्ञानिक, मानवीय और परिवर्तनकारी स्वरूप को समझा जा सकता है। उनके मुताबिक यह लोकगाथा बहुजन समाज के स्वाभिमान, प्रतिरोध और सांस्कृतिक मुक्ति की एक महत्वपूर्ण धरोहर है।
यह लेख मूल रूप से साहसपीडिया पर प्रकाशित हुआ है।
लेखक के बारे में
- सुनील कुमार गाज़ियाबाद स्थित एक स्वतंत्र सांस्कृतिक पत्रकार, कला शोधकर्ता और कला फिल्म निर्माता हैं। मुख्यधारा की मीडिया व्यवस्था का हिस्सा रहते हुए उन्होंने यह अनुभव किया कि कला लेखन और कला कार्यक्रमों के निर्माण के लिए उपलब्ध स्थान लगातार सिमटता जा रहा है। इसके बावजूद उन्होंने कला और उससे जुड़े मुद्दों को सामने लाने के लिए नए विकल्प तलाशने के अपने प्रयास कभी नहीं छोड़े। करीब 14 वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ वह बिहार की विभिन्न मूर्त और अमूर्त लोककलाओं के ऑडियो-विज़ुअल और फोटो डॉक्यूमेंटेशन से जुड़े हुए हैं। उनके कार्यक्षेत्र में जीवित लोककला दिग्गजों के अभिलेखीय साक्षात्कार और कला परंपराओं से जुड़ी मौखिक इतिहास सामग्री का दस्तावेजीकरण भी शामिल है। दृश्य कला पर अपने लेखन के लिए उन्हें वर्ष 2017 में दिनकर पुरस्कार (बिहार कला सम्मान) से सम्मानित किया जा चुका है।