आंगनवाड़ी में बच्चों की कम उपस्थिति के समाधान की मेरी यात्रा


जब मैंने मध्य प्रदेश के खरगोन ज़िले की तालाब चौक स्थित आंगनवाड़ी केंद्र संख्या 36 में काम शुरू किया, तो मेरे मन में बहुत उत्साह था। बच्चों के साथ सीखना, खेलना और उनके विकास में योगदान देना मेरे लिए सिर्फ काम नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी थी। लेकिन केंद्र में पहुंचते ही मुझे एक चुनौती का सामना करना पड़ा।
आंगनवाड़ी में बच्चों की उपस्थिति बेहद कम थी। कई दिनों तक वहां केवल तीन या चार बच्चे ही आते थे। इतने कम बच्चों के साथ किसी भी गतिविधि को नियमित रूप से करना मुश्किल था। शुरुआत में मुझे यह भी लगा कि शायद बच्चों की रुचि गतिविधियों में नहीं है, इसलिए मैंने अपने लेसन प्लान में बदलाव किए और उसमें रंग-बिरंगी शिक्षण सामग्रियों, चित्र-आधारित गतिविधियों और खेल-आधारित सीखने को शामिल किया। जो बच्चे आते थे, वे तो उत्साह से इन गतिविधियों में भाग लेते थे, हंसते थे, सीखते थे। लेकिन उनकी संख्या में कोई खास बढ़ोत्तरी नहीं हुई।
तब मुझे एहसास हुआ कि असल समस्या आंगनवाड़ी के भीतर नहीं, बल्कि उसके बाहर है। इस समस्या के समाधान के लिए मैंने बच्चों के घर जाना शुरू किया और उनके अभिभावकों से बातचीत करने की कोशिश की। लेकिन यह उतना आसान नहीं था, जितना मैंने सोचा था। कई बार जब मैं घर पहुंचती, तो बच्चों के माता-पिता काम पर जा चुके होते थे। उनमें से कुछ शुरुआत में मुझसे खुलकर बात करने में हिचकिचाते थे। उन्हें लगता था कि मैं केवल बच्चों की शिकायत करने आई हूं। कुछ अभिभावक यह भी कहते थे, “अभी तो बच्चा छोटा है, पढ़ाई की इतनी क्या जल्दी?” कई बार ऐसा भी हुआ कि मुझे एक ही परिवार से मिलने के लिए दो या तीन बार जाना पड़ा।
धीरे-धीरे, जब मैंने केवल उनकी बातें सुनने का प्रयास किया, तो वे खुलने लगे। उन्होंने बताया कि बच्चे देर रात तक जागते हैं। मोबाइल देखते हैं या परिवार के अन्य सदस्यों के साथ देर तक बैठे रहते हैं। पिता अक्सर देर से घर लौटते हैं, इसलिए परिवार की दिनचर्या भी देर रात तक चलती है। इन सब वजहों से सुबह बच्चे देर से उठते हैं। कई बार तो वे मुंह धोए बिना ही चाय पीकर दिन की शुरुआत करते हैं। ऐसे में आंगनवाड़ी आना पीछे छूट जाता है।
मुझे यह भी समझ में आया कि कई अभिभावक आंगनवाड़ी को केवल पोषण या देखभाल की जगह मानते थे। उन्हें यहाँ मिलने वाली शुरुआती शिक्षा के महत्व की पूरी जानकारी नहीं थी। साथ ही, कुछ माताएं घर के कामों में इतनी व्यस्त रहती थीं कि बच्चों को तैयार करके आंगनबाड़ी भेजना उन्हें अतिरिक्त ज़िम्मेदारी जैसा लगता था।
यहीं से मैंने अपनी रणनीति बदली। मैंने तय किया कि अगर बच्चों को नियमित रूप से आंगनवाड़ी लाना है, तो पहले अभिभावकों को आंगनबाड़ी से जोड़ना होगा। इसके लिए मैंने वहां ‘बाल चौपाल’ और ‘चिल्ड्रन्स डे’ जैसे छोटे-छोटे कार्यक्रम आयोजित किए। शुरुआत में इन कार्यक्रमों में भी बहुत कम अभिभावक आए। कई बार मुझे व्यक्तिगत रूप से घर-घर जाकर निमंत्रण देना पड़ा। कुछ ने आने का वादा भी किया, लेकिन पहुंचे नहीं। उस समय निराशा होती थी, लेकिन मैंने कोशिश जारी रखी।
जो अभिभावक आए, उनसे मैंने औपचारिक बातचीत करने के बजाय उनकी बातों को ध्यान से सुना। मैंने उन्हें सरल भाषा में बताया कि समय पर सोना, सुबह जल्दी उठना और नियमित रूप से आंगनवाड़ी आना बच्चों के विकास के लिए कितना ज़रूरी है। मैंने उनसे यह भी साझा किया कि यहां बच्चे केवल पढ़ना-लिखना नहीं सीखते, बल्कि बोलना, मिल-जुलकर रहना, खेलना और अपनी भावनाओं को व्यक्त करना भी सीखते हैं।
इसके अलावा, मैंने ऐसी वर्कशीट्स तैयार कीं, जिन्हें बच्चे अपने माता-पिता के साथ घर पर कर सकें। शुरुआत में कई अभिभावकों ने कहा कि उनके पास समय नहीं है। कुछ को यह समझने में भी कठिनाई हुई कि वर्कशीट करने में वे बच्चों की मदद कैसे करें। तब मैंने अगली बैठकों में उन्हें उदाहरण देकर यह सब समझाया। धीरे-धीरे वे इसमें रुचि लेने लगे।
लगातार संवाद, छोटे-छोटे प्रयासों और धैर्य का असर अभिभावकों पर दिखने लगा। वे बच्चों की दिनचर्या पर ध्यान देने लगे। उन्हें समय पर सुलाने और सुबह जल्दी तैयार करने की कोशिश करने लगे। कुछ माताएं खुद बच्चों को लेकर केंद्र आने लगीं।
इन प्रयासों की बदौलत बच्चों की उपस्थिति, जो पहले तीन या चार तक सीमित थी, बढ़कर सात हुई। फिर बारह और कुछ ही समय में लगभग बीस तक पहुंच गई। सबसे ज़्यादा खुशी की बात यह थी कि बच्चे नियमित रूप से आंगनबाड़ी आने लगे। वे केंद्र को अपने सीखने और खेलने की जगह मानने लगे।
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लेखक के बारे में
- नाजिया परवीन अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी भोपाल से एमए एजुकेशन (एमए एड) की पढ़ाई कर रही हैं। उनका कार्यक्षेत्र प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा, बाल विकास और आंगनवाड़ी केंद्रों के अध्ययन से जुड़ा है। उन्हें जमीनी अनुभवों के आधार पर शैक्षिक लेखन और विश्लेषण में विशेष रुचि है।

