झारखंड में शिक्षा के लिए 40 वर्षों से चल रहा संघर्ष
Location Iconपश्चिम सिंहभूम ज़िला, झारखंड
झारखंड के सोनुआ ब्लॉक में कई पेड़ों के जलमग्न होने के कारण पीछे छूटे उजाड़ परिदृश्य को दर्शाती एक तस्वीर_शिक्षा झारखंड
साल, इमली, सागवान, जामुन, कटहल, कुसुमी, और केंदु के पेड़ों का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पानी में डूब चुका था और ये धीरे-धीरे मरने लगे। | चित्र साभार: स्मिता अग्रवाल

पनसुआ बांध 1982 में झारखंड के सोनुआ ब्लॉक में बनाया गया था। जिसके कारण आसपास के निचले-स्तर वाले जंगल अगले तीन से पांच वर्षों में 50-60 फीट पानी में डूब गए। आसपास के गांवों के बुजुर्गों का कहना है कि बड़े पैमाने पर साल, इमली, सागवान, जामुन, कटहल, कुसुमी और केंदु के पेड़ों का अब 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पानी में डूब गया था और ये धीरे-धीरे मरने लगे। 

पांच गांव – पंसुआ, मुजुनिया, मुंडूरी, बंसकाटा और कुटिपी – और बोइकेरा पंचायत के तीन गांव इस बांध के निर्माण से प्रभावित हुए थे। नतीजतन लोग ऊपरी हिस्से में जलाशय के किनारे जाकर बस गए थे।

मुंडारी, हो और कोडा जनजाति बहुल वाले मेरालगुट्टु के बुजुर्ग पनसुआ बांध के इतिहास का संबंध स्थापित करते हैं। साथ ही वे यह भी बताते हैं कि कैसे इसने पारिस्थितिकि और उनके जीवन दोनों को बदल कर रख दिया है। भूमि के जलमग्न होने के बाद सरकार ने इससे प्रभावित गांवों के लोगों से किए वादे पूरे नहीं किए। लगभग 35 साल बाद उन्हें मुआवजे का सिर्फ़ एक हिस्सा मिला है। कई परिवार अपने जलमग्न ज़मीन का कर अब तक चुका रहे हैं।

गांव के लोगों ने यह भी बताया कि कैसे उनकी भौगोलिक स्थिति के कारण उनके पास स्कूलों, स्वास्थ्य सुविधाओं, बिजली और यहां तक कि पीने के पानी की भी सुविधा उपलब्ध नहीं है। सबसे नज़दीकी प्राथमिक स्कूल गांव से 7 किलोमीटर की दूरी पर है और बाजार तक जाने के लिए उन्हें 12 किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता है। इस रास्ते का ज़्यादातर हिस्सा पथरीला और पहाड़ी है। एक दूसरा स्कूल बाईगुडा गांव से 5 किलोमीटर दूर है लेकिन यहां पहुंचने के लिए नाव की सवारी के अलावा पहाड़ भी पार करना पड़ता है। इसके अलावा मानसून के दौरान जलाशय का जल स्तर 10-15 फीट तक बढ़ जाता है और यह मार्ग कट जाता है। नतीजतन पैदल दूरी में 3-4 किलोमीटर का इज़ाफ़ा हो जाता है। ज़्यादातर बच्चे अपना स्कूल ज़ारी नहीं रख पाते हैं और बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं। पिछले तीन दशकों में मेरालगुट्टु के केवल एक व्यक्ति ने उच्च विद्यालय तक की अपनी पढ़ाई पूरी की है, और वह भी इसलिए क्योंकि वह अपने गांव से निकलकर कहीं और रहने लगा था।

इसके परिणामस्वरूप इलाके के ज़्यादातर परिवारों ने अब बेंगलुरु, मुंबई, पुणे और चेन्नई जैसे शहरों में प्रवासकरना शुरू कर दिया है। इन शहरों में जाकर ये लोग अपनी आजीविका चलाने के लिए ईंट के भट्टों और इमारत बनाने जैसे कामों में लग जाते हैं। मज़दूरों के एजेंट सस्ते मज़दूर के लिए इन इलाक़ों में आते रहते हैं।

मानसून की फसल कटाई के बाद यहां के लोग अगले छः महीनों के लिए प्रवासकर जाते हैं। जब परिवार जाता है तब बच्चे भी उनके साथ हो लेते हैं।

एस्पायर और टाटा स्टील फाउंडेशन ने मई 2022 में मेरालगुट्टू में एक केंद्र खोला। इस केंद्र का उद्देश्य जिले में माध्यमिक शिक्षा को सार्वभौमिक बनाने के अपने लक्ष्य के हिस्से के रूप में एक औपचारिक छात्रावास स्कूल में बच्चों का नामांकन करना है।

इस क्षेत्र में अब भी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है। लेकिन ऐसे बच्चों को स्कूल जाते देखना उत्साहजनक होता है जो पहले अपने माता-पिता के साथ प्रवास के लिए दूसरे शहरों में चले जाते थे।

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स्मिता अग्रवाल टाटा स्टील सीएसआर में शिक्षा प्रमुख हैं।

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