किचन गार्डन से कक्षा तक: नवागढ़ विद्यालय की सीख


मेरा नाम नीलम लकड़ा है और मैंने अक्टूबर 2025 में बीएड की पढ़ाई पूरी की है। पढ़ाई के दौरान हमें टीचिंग प्रैक्टिस के तहत साल के अंत में 4 महीनों के लिए सरकारी विद्यालय में पढ़ाना होता है। बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ हम विद्यालय की विभिन्न गतिविधियों, जैसे खेल-कूद और सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि में भी शामिल होते हैं।
मैं वर्ष 2025 में टीचिंग प्रैक्टिस के लिए जुलाई से अक्टूबर तक रांची जिले के अनगढ़ा ब्लॉक के नवागढ़ गवर्नमेंट सेकेंडरी विद्यालय में पढ़ाने जाती थी। नवागढ़ एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है जहां मुंडा समुदाय प्रमुख है। यह अनुभव मेरे पिछले विद्यालय के अनुभव से बिल्कुल अलग था। यहां शिक्षा केवल कक्षा तक सीमित नहीं थी, बल्कि पूरे समुदाय की साझा जिम्मेदारी थी। जंगलों और पहाड़ों से घिरे इस शांत परिसर में केजी से दसवीं तक की कक्षाओं में लगभग 550 बच्चे पढ़ते हैं, जहां प्रकृति भी सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा बन जाती है।
नवागढ़ के एक स्थानीय व्यक्ति ने ही विद्यालय के लिए भूमि दान की थी। वह आज भी विद्यालय से जुड़े हुए हैं और इसकी प्रगति में गहरी रुचि लेते हैं। गांव के लोग और ग्राम सभा भी विद्यालय संचालन में शामिल रहते हैं। यहां की पंचायत शिक्षा समिति भी काफी सक्रिय है। 6 शिक्षकों वाले इस विद्यालय में गांव के शिक्षित युवा स्वेच्छा से पढ़ाने भी आते हैं। यह शिक्षकों की कमी पूरा करने की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण कदम है। छात्रों की शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में समुदाय का सहयोग इस विद्यालय को खास बनाता है।
विद्यालय के प्रधानाचार्य (हरेकृष्ण चौधरी) महतो समुदाय से हैं और अनगढ़ा के ही रहने वाले भी हैं। उनके प्रयासों और सामुदायिक सहयोग से विद्यालय की सभी गतिविधियों में स्थानीय योगदान स्पष्ट तौर पर झलकता है। इसका असर बच्चों के आत्मविश्वास में साफ दिखाई देता है। वे मंच पर निडर होकर बोलते हैं, खेलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और अपनी बात खुलकर रख पाते हैं।
विद्यालय की एक विशेष पहल ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया। विद्यालय के परिसर में ही एक बाड़ी, यानी किचन गार्डन बनाया गया है। इसमें उगायी जाने वाली तमाम तरह की मौसमी सब्जियां छात्रों को मध्यान्ह भोजन या मिड डे मील में खाने को दी जाती हैं। यहां केवल आठवीं तक नहीं, बल्कि दसवीं तक के छात्रों को मध्यान्ह भोजन दिया जाता है।
यहां नियम है कि बाड़ी में उगायी जाने वाली सब्जियां सिर्फ छात्रों के लिए ही इस्तेमाल की जाती हैं। उन्हें कोई भी स्टाफ या अन्य व्यक्ति घर नहीं ले जा सकता है। इन विभिन्न सब्जियों से छात्रों की पोषण की जरूरतें तो पूरी होती ही हैं, साथ ही प्रधानाचार्य स्वयं छात्रों को पारंपरिक तरीकों से सब्जियां उगाना सिखाते हैं। इससे सीखने की प्रक्रिया व्यवहारिक और रोचक बनती है।
खेल-कूद हो, योग सत्र हो या फिर करमा जैसे पारंपरिक त्योहार, प्रधानाचार्य पढ़ाई के साथ इन तमाम गतिविधियों के संचालन और बच्चों की सहभागिता तय करने में सबसे आगे रहते हैं। इसका प्रभाव अन्य शिक्षकों पर भी दिखाई देता है।
यह विद्यालय इस इलाके में सामुदायिक सहयोग और शिक्षकों की निष्ठा का एक मजबूत उदाहरण है। मैंने अपने चार महीनों के दौरान यहां कई सामाजिक संस्थाओं के लोगों को भी जुड़ते देखा, जो विद्यालय से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाए हैं।
एक शिक्षक के रूप में मेरे लिए नवागढ़ विद्यालय का अनुभव एक बड़ी सीख है, जो मुझे भी ऐसा ही बनने की प्रेरणा देती है।
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लेखक के बारे में
- नीलम लकड़ा झारखंड के गुमला जिले की रहने वाली हैं। नीलम ने वर्ष 2025 में रांची के जनक दुलारी नेशनल बीएड कॉलेज से बीएड की शिक्षा प्राप्त की है। उन्हें खेती-बाड़ी, जंगल घूमना, मछली पकड़ना अच्छा लगता है। नीलम को पशुओं से विशेष लगाव है।


