एलपीजी संकट के बीच रोज़ी-रोटी के लिए जुगाड़ ही हमारा सहारा है


साल 2026 की शुरुआत में शुरू हुआ एलपीजी संकट आज भी लोगों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी और आजीविका को गहराई से प्रभावित कर रहा है। हाल ही में मुझे इसका एक उदाहरण राजस्थान के उदयपुर में देखने को मिला, जहां मेरी मुलाकात नाश्ते की दुकान चलाने वाले राजू* से हुई।
जब मैं उनकी दुकान पर समोसे ले रहा था, तो मैंने देखा कि वे समोसे, कचौड़ी वगैरह तलने के लिए एलपीजी गैस की बजाय एक भट्ठी का इस्तेमाल कर रहे थे। यह भट्ठी आम भट्ठियों से कुछ अलग तरह की दिख रही थी क्योंकि इसके साथ कोई गैस सिलेंडर नहीं था। जब मैंने उनसे इसके बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि कुछ महीने पहले तक वे नाश्ता बनाने के लिए एलपीजी का ही इस्तेमाल करते थे। लेकिन इस साल की शुरुआत से सिलेंडर मिलना मुश्किल हो गया। पहले जो कमर्शियल सिलेंडर 2,100-2,200 रुपए में मिलता था, उसकी कीमत अब 3,500 रुपए तक पहुंच गई है। उन्होंने आगे यह भी बताया कि उनकी दुकान पर समोसे, आलू वड़ा, कचौड़ी, वड़ा पाव और पोहा बनता है। ऐसे में एक सिलेंडर एक दिन में ही खत्म हो जाता है। कीमतों के बढ़ने के बावजूद पिछले कुछ समय से सिलेंडर समय पर नहीं मिल रहे हैं। इस वजह से दुकान चलाना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा था।
इसी परेशानी के कारण राजू ने दूसरी व्यवस्था तलाशनी शुरू की और इस भट्टी को काम में लेना शुरू किया। भट्टी के बारे में बताते हुए वे कहते हैं, “यह भट्ठी डीज़ल और इस्तेमाल किए हुए मशीन ऑयल, दोनों से चल सकती है। सामान्य दिनों में इसे चलाने के लिए 1,000 से 1,200 रुपए का डीज़ल लगता है। रविवार को ग्राहकों की संख्या बढ़ जाती है, तब इसका खर्च करीब 2,000 रुपए तक पहुंच जाता है। मुझे पता है कि यह एक अस्थायी समाधान है, क्योंकि भविष्य में डीज़ल भी आज की तरह आसानी से उपलब्ध रहेगा या नहीं यह कहना मुश्किल है।
अभी मशीन ऑयल 35–40 रुपए प्रति लीटर मिल रहा है और इस पर होने वाला खर्च सिलेंडर के मुकाबले लगभग 25 प्रतिशत कम है।”
हालांकि, उनके लिए इस व्यवस्था को तैयार करना आसान नहीं था। वे बताते हैं, “शुरुआत में जो मशीन लगवाई थी, वह छोटी पड़ गई और उसमें आग लग गई। इससे हमें 10–12 हज़ार रुपये का नुकसान हुआ। इसके बाद दूसरी मशीन बनवानी पड़ी। यह पूरा सेटअप बाजार में तैयार नहीं मिलता था। हमने भट्ठी और ब्लोअर अलग-अलग खरीदे और हाथीपोल बाज़ार (उदयपुर का एक बाज़ार) के वेल्डरों से उन्हें जुड़वाया। अब तक इस पूरी व्यवस्था पर 30–35 हज़ार रुपए खर्च हो चुके हैं।” राजू कहते हैं कि यह खर्च उठाना उनकी मजबूरी थी क्योंकि दुकान ही उनके परिवार की आमदनी का इकलौता ज़रिया है।
इस जुगाड़ के बारे में वे कहते हैं, “हमें परिस्थितियों के अनुसार कुछ न कुछ उपाय तो करना ही पड़ता है, वरना हमारी रोज़ी-रोटी पर संकट आ जाएगा।”
*पहचान गोपनीय रखने के लिए नाम बदल दिया गया है।
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लेखक के बारे में
- राकेश स्वामी आईडीआर में सह-संपादकीय भूमिका मे हैं। वह राजस्थान से जुड़े लेखन सामग्री पर जोर देते हैं। राकेश के पास राजस्थान सरकार के नेतृत्व मे समुदाय के साथ कार्य करने का एवं अकाउंटेबलिटी इनिशिएटिव, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च मे लेखन एवं क्षमता निर्माण का भी अनुभव है। राकेश ने आरटीयू यूनिवर्सिटी, कोटा से सिविल अभियांत्रिकी में स्नातक किया है।
