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तीस्ता: लोककथा से आंदोलन तक बहती एक नदी की कहानी

हाल ही में तीस्ता नदी को बचाने के लिए सिक्किम से पश्चिम बंगाल तक एक मार्च निकाला गया। इसके पीछे दो दशकों से चला आ रहा प्रतिरोध है, जो बांधों और हाइड्रोपावर परियोजनाओं के खिलाफ आवाज़ उठाता रहा है।
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‘आचुले!’—रोंग, यानी लेपचा भाषा का यह शब्द अपने भीतर जीवन की पूरी कहानी समेटे है: जन्म से लेकर इस लोक की यात्रा तक और फिर उस परलोक तक, जहां हमारे पूर्वज बसे हैं। यह खुशी में पुकारा जाता है, किसी की प्रशंसा में गूंजता है और कभी-कभी विरोध की आवाज़ भी बन जाता है। जन्म और शादी जैसे शुभ मौकों पर जब लोग इसे पुकारते हैं, तो यह मानो पीढ़ियों को जोड़ती हुई एक आवाज़ बनकर दूर तक फैल जाता है।

26 जुलाई, 2026 को जब मैं तारखोला के पास मार्च कर रहे दल से मिली, तो मेरा स्वागत गूंजती हुई ‘आचुले!’ की आवाज़ से हुआ। इस बार यह गूंज प्रतिरोध और असहमति की थी। कुल 19 लोग पैदल मार्च कर रहे थे। वे अफेक्टेड सिटिज़न्स ऑफ तीस्ता (एसीटी) से जुड़े थे। यह सिक्किम के उत्तर में घने जंगलों वाले पहाड़ी इलाके जोंगू से शुरू हुआ एक सामुदायिक आंदोलन है। वे उत्तर सिक्किम से पश्चिम बंगाल तक चार दिन के पैदल मार्च पर निकले थे। इस मार्च के ज़रिए वे सिक्किम की सबसे बड़ी नदी तीस्ता पर हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर परियोजनाओं (एचईपी) के प्रभाव को लेकर लोगों का ध्यान खींचना चाहते थे। 

एसीटी के साथ एकजुटता जताने, उनके मुद्दे का समर्थन करने और उनकी मांगों को मज़बूती से सामने रखने के लिए क्षेत्रीय राजनीतिक दल सिक्किम भूटिया लेपचा एपेक्स कम्युनिटीज़ (सिबलैक) के कुछ सदस्य और मेरे जैसे कुछ लोग भी इस मार्च में शामिल हुए थे। गूंजते नारों के बीच मैंने एसीटी दल के हाथों में कई पोस्टर भी देखे। उन पर बहुत से नारे लिखे हुए थे: ‘फ्लडेड फ्यूचर’, ‘हमारी नदियां, हमारी ज़िम्मेदारी’, ‘हर सुरंग एक घाव छोड़ती है’, ‘ज़िंदगी के लिए नदियां, आज़ाद बहती नदियां’, ‘आप नदियों के रखवाले हैं!’, ‘क्या इस सुरंग के अंत में रोशनी है?’, ‘हमारी तीस्ता को आज़ाद बहने दो’।

लोगों के हाथों में नारे लिखे कुछ पोस्टर_नदियां
‘तीस्ता मैटर्स टू मी’ मार्च में दिखे पोस्टर। | चित्र साभार: आकृति थातल

इस मार्च की जड़ें

लीनोर 17 साल की हैं और मार्च में शामिल सबसे कम उम्र के लोगों में से एक हैं। वह मार्च में शामिल होने के लिए स्कूल से छुट्टी लेकर आई थी। मार्च शुरू ही हुआ था कि मेरी नज़र एक झंडे पर पड़ी। झंडे पर एक पक्षी बना था और उसके ऊपर-नीचे दो पंक्तियां लिखी थी। मैंने झंडा थामे खड़ी लीनोर से पूछा कि आखिर इस झंडे की कहानी क्या है? उसने बताया कि झंडे की तीन आड़ी पट्टियां जीवन की एक कहानी कहती हैं। ऊपर और नीचे की रक्त-लाल पट्टियां जीवन और उसे जीने के लिए ज़रूरी ताकत का प्रतीक हैं। बीच की सफेद पट्टी शांति की निशानी है। और ठीक बीच में बना पक्षी ‘कोहोम-फो’ है—पहाड़ी तीतर, जिसे लेपचा मान्यताओं में एक देवी का रूप माना जाता है। पक्षी के पीछे कंचनजंघा पर्वत अपनी पूरी भव्यता के साथ खड़ा है। इन सबको घेरे एक गोले के दोनों ओर धान की दो बालियां बनी हैं। ऊपर लिखे ‘मूतुंच्यी’ का मोटे तौर पर अर्थ है ‘मां के प्यारे लोग’। और उसके ठीक नीचे एक पुकार लिखी है—‘आचुले!’

झंडे पर बने इन प्रतीकों की कहानी को याद करते हुए उसने मुझे एक विनाशकारी बाढ़ की कथा सुनाई। एक ऐसी बाढ़, जिसने मायेल ल्यांग (लेपचा लोगों की पैतृक धरती, जिसे उनका आदिम घर माना जाता है) का बड़ा हिस्सा बहा दिया था। बाढ़ से बचने के लिए समुदाय के लोग तेंदोंग पर्वत की चोटी पर जा चढ़े। वहीं उनकी मुलाकात कोहोम-फो से हुई। उसने धरती पर मिलेट बीयर (मोटे अनाज से बना मादक पेय) का छिड़काव किया, जिससे बाढ़ का पानी उतरने लगा और धरती फिर से जीवन से खिल उठी। बाद में जब मैंने इस झंडे के बारे में और पढ़ा, तो इसके प्रतीकों के कई और अर्थ भी स्पष्ट हुए।

लाल और सफ़ेद रंग का लेपचा समुदाय का झंडा_नदियां
लेपचा समुदाय का झंडा। | चित्र साभार: आकृति थातल

मान्यताओं के अनुसार, लीनोर जिस बाढ़ की बात कर रही थी, वह तीस्ता (रोंगन्यू) और उसकी सबसे बड़ी सहायक नदी रंगीत के बीच हुई एक दौड़ का नतीजा थी। यह सिक्किम की एक मशहूर लोककथा है, जिसे यहां ज़्यादातर लोग जानते हैं। लेपचा लोकविश्वास में इन दोनों नदियों की मौजूदगी इतनी गहरी है कि उनके प्रति समुदाय की श्रद्धा को सिर्फ ‘सम्मान’ कह देना उनके महत्व को कम करके देखना होगा।

इस कहानी के मुताबिक, रोंगन्यू और रंगीत दो प्रेमी थे, जो अलग-अलग पर्वतों से निकलकर चोरी-छिपे कंचनजंघा के पास मिला करते थे। जब दोनों ने एक होने की ठानी, तो उन्होंने वर्तमान दार्जिलिंग में स्थित पेशोक के पास मिलने का फ़ैसला किया। आसपास का यह इलाका आज त्रिवेणी के नाम से जाना जाता है।

दोनों पहाड़ की तलहटी से नदियों के रूप में अपनी यात्रा पर निकले। रोंगन्यू ने मैदानों तक पहुंचने के लिए परिलबू नाम के एक सांप को अपना मार्गदर्शक चुना, जबकि रंगीत ने तुत्फो नाम के एक पक्षी की मदद ली। परिलबू के बताए रास्ते पर चलती हुई रोंगन्यू तय जगह पर रंगीत से पहले पहुंच गई। रंगीत का मार्गदर्शक तुत्फो बार-बार इधर-उधर भटक जाता था और रंगीत को उसे रास्ते पर बने रहने की याद दिलानी पड़ती थी। आखिरकार जब रंगीत वहां पहुंचा और उसने रोंगन्यू को पहले से इंतज़ार करते पाया, तो उसके मुंह से निकला—‘थी-सुथा!’ यानी, ‘तुम कब पहुंचीं?’ माना जाता है कि इसी घटना से तीस्ता नदी को अपना नाम मिला। रोंगन्यू के पहले पहुंच जाने से रंगीत आवेश में आ गया और गुस्से में वापस लौट पड़ा। उसके लौटने से इलाके में भयानक बाढ़ आ गई। मेरी अपनी समझ में, इस गुस्से में हमें आहत पुरुष-अहम की झलक भी दिखाई देती है। यही वह लोककथा है, जिसकी गहरी जड़ें पूरे समुदाय की सामूहिक स्मृति में हैं। इसलिए यह एसीटी के मार्च के प्रतीकों और उसकी कहानी से इतनी गहराई से जुड़ती है।

लीनोर कहती हैं, “मेरे माता-पिता एसीटी से जुड़े हैं। इसलिए मैं बचपन से तीस्ता नदी की कहानियां और उसे बचाए रखने की अहमियत सुनती आई हूं। मैं यह अपने भविष्य के लिए कर रही हूं। मेरे लिए यहां होना बहुत ज़रूरी है। मेरे कुछ दोस्तों को पता है कि मैं मार्च में हूं, लेकिन उन्हें समझ नहीं आता कि मैं यहां क्यों आई हूं।”

पहाड़ों के बीच बहती नदी_नदियां
(बाएं) कालिम्पोंग जिले में पेशोक रोड स्थित लवर्स मीट व्यू पॉइंट से त्रिवेणी (2024); पश्चिम बंगाल के कालिम्पोंग जिले के किरनी से तीस्ता नदी। | चित्र साभार: आकृति थातल

एसीटी की स्थापना वर्ष 2007 में अथुप लेपचा ने की थी। करीब दो दशकों में इस आंदोलन ने सिक्किम की अलग-अलग पीढ़ियों के लोगों के बीच अपनी जगह बनाई है। यह मार्च अथुप को श्रद्धांजलि का प्रतीक था, जिनका वर्ष 2025 में निधन हो गया था। लेकिन साथ ही यह सिक्किम में हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर परियोजनाओं (एचईपी) को रद्द करने और उनकी दोबारा समीक्षा करने की मांग भी उठाता है। इसने यह भी स्पष्ट किया कि तीस्ता का सवाल सिर्फ लेपचा या जोंगू समुदाय का मुद्दा नहीं है।

तीस्ता एक सीमा-पार बहने वाली नदी है, जो सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश पहुंचती है और फिर बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इसका मतलब है कि जो भी किसी न किसी रूप में इस नदी से जुड़ा है—चाहे वह लोकविश्वास, लोककथा, भूगोल, पारिस्थितिकी या अर्थव्यवस्था के ज़रिए हो—उसकी इस नदी की सलामती में बराबर हिस्सेदारी और ज़िम्मेदारी है। मार्च का मुख्य नारा, ‘तीस्ता मैटर्स टू मी’ यानी ‘तीस्ता मेरे लिए मायने रखती है’, इसी बात को बेहद सटीक ढंग से सामने रखता है।

मार्च की राह पर: फिदांग से त्रिवेणी तक

मार्च की शुरुआत उत्तर सिक्किम में जोंगू से निकलने के पहले पड़ाव फिदांग से हुई। यहां एक बोंगथिंग (लेपचा शमन) की मौजूदगी में प्रकृति की प्रार्थना की गई, जो लेपचा समुदायों की जीववादी मान्यताओं का हिस्सा है। कुछ बौद्ध लामाओं ने भी इसमें शामिल होकर प्रार्थना की। फिदांग से निकलकर मार्च करने वाला दल मंगन से होते हुए पूर्वी सिक्किम में दाखिल हुआ और अपने पहले पड़ाव माखा पहुंचा।

तीस्ता के किनारे बस छोटे से गांव माखा तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं है। यहां गंगटोक जिले के दिक्चू और राले जैसे गांवों पर वर्ष 2023 में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियल झील फटने से आई बाढ़ का गहरा असर पड़ा था। इस आपदा में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई थी। मृतकों की संख्या के अनुमान 40-100 से ज़्यादा हैं, हालांकि ऐसी आपदाओं के बाद सामने आने वाले आंकड़े अक्सर भरोसेमंद नहीं होते। इसकी एक वजह यह है कि मजदूरों और दूसरे अस्थायी कामगारों का रिकॉर्ड कई बार कहीं दर्ज ही नहीं होता। यहीं नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (एनएचपीसी) का स्टेज V बांध है। 510 मेगावॉट की इस हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर परियोजना का बांध दिक्चू में है और पावरहाउस सिरवानी में।

पेड़ों के बीच बहती नदी_नदियां
2023 में ग्लेशियल झील फटने से आई बाढ़ के दो महीने बाद माखा में तीस्ता नदी का नज़ारा, जहां किनारे बह चुके हैं। | चित्र साभार: आकृति थातल

एसीटी की को-जनरल सेक्रेटरी मायालमित लेपचा ने मुझे बताया कि दिक्चू बांध से जुड़ी सुरंगों का नेटवर्क सड़क के ठीक नीचे से गुज़रता है। इसकी वजह से कई जगह सड़कें टूट चुकी हैं और इस हिस्से में मार्च करना काफी मुश्किल था। आखिरकार स्थानीय लोगों के सहयोग से ही यह सफर पूरा हो सका। वह कहती हैं, “माखा किसी भी मायने में कोई सैलानी जगह नहीं है। लेकिन जब हम वहां पहुंचे, तो स्थानीय लोगों ने हमारे लिए भोजन-पानी का इंतज़ाम किया और रहने की जगह भी दी। हमारे एक परिचित ने अपने रिश्तेदार के नए बने घर में हमारे ठहरने का बंदोबस्त कर दिया। घर की एक मंज़िल बनकर तैयार थी, लेकिन वहां न बिजली थी, न फर्नीचर। उनके इस अपनेपन ने हमारा मन छू लिया। जिस तरह उन्होंने हमारा ध्यान रखा, उसने हमें भावुक कर दिया था।”

वह आगे कहती हैं, “वे जानते और समझते हैं कि हम क्या करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि उन्होंने खुद भी यह सब झेला और महसूस किया है…एनएचपीसी स्टेज V से वे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।” पहले दिन मार्च में शामिल लोगों ने करीब 26 किलोमीटर पैदल सफर तय किया। अगली सुबह वे माखा से रंगपो की ओर निकल पड़े। रंगपो सिक्किम–पश्चिम बंगाल सीमा के पास बसा एक कस्बा है। सिंगतम के पास 20 माइल पर हाल ही में हुए भूस्खलन की वजह से उन्हें रास्ता बदलकर जाना पड़ा। सिंगतम तीस्ता और उसकी एक सहायक नदी के किनारे बसा शहर है। रास्ता बदलने से उस दिन का मार्च और लंबा हो गया। रात उन्होंने रंगपो में आराम किया और अगली सुबह जल्द ही सीमा के छोटे से कस्बे मेली के लिए निकल पड़े।

यहां यह समझना ज़रूरी है कि फिदांग से त्रिवेणी तक का रास्ता जानबूझकर चुना गया था, ताकि पूरा दल तीस्ता के बहाव के साथ आगे बढ़े और रास्ते में एचईपी और उनके लिए बनाई गई सुरंगों से हुए नुकसान को अपनी आंखों से देख सके। मायालमित बताती हैं, “हमने मार्च के लिए जानकर मानसून का मौसम चुना, ताकि हम सभी भूस्खलनों और सुरंगों व बांधों से हुए नुकसान का असर देख सकें।” मार्च कर रहे दल को सिक्किम–पश्चिम बंगाल सीमा के मेली, तीस्ता बाज़ार और गेल खोला जैसे कस्बों में रहने वाले परिवारों से भी काफी सहयोग मिला। वर्ष 2023 की बाढ़ के बाद इन जगहों का बड़ा हिस्सा लगभग पूरी तरह पानी में डूब गया था और बाढ़ के साथ आई गाद के नीचे दब गया था।

सड़क किनारे विरोध प्रदर्शन में बैठे लोग_नदियां
तीसरे दिन मार्च के बीच रास्ते में तारखोला के पास आराम करता एसीटी का दल। | चित्र साभार: आकृति थातल

मार्च के आखिरी दिन समूह मेली से रवाना हुआ और त्रिवेणी पहुंचकर नदियों के नाम अपनी आखिरी प्रार्थना के साथ मार्च का समापन किया। इस दिन कालिम्पोंग और दार्जिलिंग से भी कई लोग, जिनमें बोंगथिंग और लामा भी शामिल थे, उनके साथ शामिल हुए। एसीटी के जनरल सेक्रेटरी ग्यात्सो लेपचा कहते हैं, “यह एकजुटता बेहद ज़रूरी है। उत्तर बंगाल के लोगों का इसमें शामिल होना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, ताकि वे भी नदी की देखभाल की ज़िम्मेदारी साझा कर सकें।” हालांकि, इस साझा मकसद पर लोगों को एकजुट करना आसान नहीं है। आंदोलन की शुरुआत से ही एसीटी के सदस्यों ने इसे जारी रखने के लिए कई तरह की कुर्बानियां दी हैं—मायालमित को अपनी कॉलेज की पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी, तो वर्ष 2007 की भूख हड़ताल के दौरान एसीटी के कुछ सदस्यों को जेल भी जाना पड़ा। यहां तक कि अपने ही समुदाय के भीतर उन्हें असहमति का सामना करना पड़ा है। 

मायालमित कहती हैं, “कुछ लोग मुझे इसलिए पसंद नहीं करते क्योंकि मैं इन बांधों के निर्माण के खिलाफ हूं। खासकर पानन में, जो उत्तर सिक्किम के ऊपरी जोंगू में एक गांव है और जहां 280 मेगावॉट की एचईपी बनाने का प्रस्ताव है। मैं समझ सकती हूं कि ज़मीन बेचने से गांववालों को जो पैसे मिलेंगे, वे उनके काम आ सकते हैं। लेकिन मैं यह भी जानती हूं कि इससे होने वाले नुकसान के सामने यह रकम कुछ नहीं है।” एसीटी ने विकास के कुछ दूसरे विकल्प भी सुझाए हैं, जो प्रकृति से अदावत नहीं करते। वह आगे कहती हैं, “अगर बात आमदनी की है, तो हमने इस इलाके में होम-स्टे चलाने का प्रस्ताव दिया है, जो लोगों के लिए कमाई का ज़रिया बन सकें। इससे पर्यावरण को बहुत कम नुकसान होगा और ज़मीन पर कब्ज़ा किए बिना हम अपनी संस्कृति को भी बढ़ावा दे सकेंगे।” यह मार्च हर किसी से अपील करता है कि वे इस पूरे क्षेत्र की नदियों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को निभायें।

साझा नुकसान के बीच समुदाय का साथ

सड़क किनारे के टूटे फूटे फुटपाथ_नदियां
मेली के रास्ते में सड़क पर पड़ी दरारें। | चित्र साभार: आकृति थातल

जोंगू में होम-स्टे चलाने वाली एसीटी की सदस्य विनोना लेपचा ने बताया, “मैं पहली बार इस तरह के किसी मार्च में शामिल हुई हूं। इतने लोगों को साथ आते देखना वाकई प्रेरणादायक है। मुझे इस मार्च का हिस्सा बनकर भी खुशी हुई, क्योंकि यह सिर्फ मेरे दादाजी (अथुप लेपचा) के योगदान का सम्मान नहीं करता, बल्कि उस काम को भी आगे बढ़ाता है, जो हम सालों से करते आ रहे हैं।”

बहती नदी और उसके किनारे खड़ी कुछ मशीनें_नदियां
मेली में तीस्ता नदी के किनारे चल रहा निर्माण कार्य। | चित्र साभार: आकृति थातल

इसी तरह, प्रतिरोध को लेकर हुई बातचीत के दौरान मायालमित सहज ही समुदाय की भागीदारी और उसके समर्थन से जुड़े किस्से सुनाती हैं। एक हालिया घटना का ज़िक्र करते हुए (जहां निर्माणाधीन 500 मेगावॉट के एनएचपीसी तीस्ता स्टेज VI एचईपी की सुरंग ढह गई थी) वह कहती हैं, “बीते कुछ समय में जो घोर लापरवाही हुई है, उसके बावजूद हमें उम्मीद है कि लोग अब जाग रहे हैं… हमारे पैदल मार्च में इससे कहीं ज़्यादा लोग शामिल हो सकते थे, लेकिन यह देखकर भी दिल को सुकून मिला कि लोगों ने दूसरे तरीकों से हमारा साथ दिया। कुछ बुज़ुर्गों ने रास्ते में खाना और पानी खरीदने के लिए हमें पैसे दिए। कुछ लोगों ने 100 से लेकर 2000 रुपये तक का सहयोग किया…कुछ ने हमें अपनी दुकानों में बुलाया, शौचालय इस्तेमाल करने दिए, दवाइयां और खाना दिया और ठहरने की जगह भी दी। यहां तक कि पानी पिलाना और हमसे बात करना जैसी छोटी दिखने वाली चीज़ें भी हमारे लिए समर्थन का ही एक रूप थी। इसके लिए मैं हमेशा लोगों की आभारी रहूंगी।”

मार्च खत्म होने के बाद अब एसीटी की योजना 520 मेगावॉट की तीस्ता स्टेज IV और 280 मेगावॉट की पानन एचईपी को स्थायी रूप से रद्द करने की मांग को लेकर एक ज्ञापन तैयार करने की है। एक और मांग है कि फिदांग से साक्योंग-पेंटोंग तक तीस्ता और रोंगयुंग नदियों के किनारे का इलाका—जहां दुर्लभ तितलियां पाई जाती हैं—रिवराइन सैंक्चुअरी यानी नदी-आधारित अभयारण्य घोषित किया जाए। साक्योंग-पेंटोंग उत्तर सिक्किम के मंगन जिले का एक गांव है।

विरोध प्रदर्शन में खाना-पानी बांटते लोग_नदियां
रास्ते में समर्थकों द्वारा लाया गया खाना साझा करते हुए। | चित्र साभार: आकृति थातल

एक नदी के प्रति इतने लोगों की आस्था और चिंता को अपनी आंखों से देखना और उनके बीच अपनापन महसूस करना एक अनूठा एहसास था। पूरे रास्ते चलते हुए नदी लगातार हमारी नज़र के सामने बनी रही। ग्यात्सो लेपचा ने इस मार्च में शामिल लोगों की तुलना परिलबू से की—वह सांप, जिसने लोककथा में तीस्ता को उत्तर सिक्किम से त्रिवेणी तक का रास्ता दिखाया था। 

यह बेहद ख़ूबसूरत उपमा हमें याद दिलाती है कि लोग आज भी ख़ुद को उन कहानियों से अलग नहीं देखते हैं, जिन्हें सुनते-कहते वे बड़े हुए हैं। और न ही उस कुदरत से, जिसका हम सब हिस्सा हैं।

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लेखक के बारे में

  • आकृति थातल आईडीआर की नॉर्थईस्ट मीडिया फेलो (2026–27) हैं। वह सिक्किम की मल्टीडिसिप्लिनरी कलाकार और रिसर्चर हैं। उन्होंने मीडिया, कल्चरल स्टडीज़ और एंथ्रोपोलॉजी की पढ़ाई की है। उनके काम में ‘घर’ और उससे जुड़े अनुभव खास तौर पर जगह रखते हैं। वह यह समझने की कोशिश करती हैं कि शहर की सार्वजनिक जगहों में लोगों की भागीदारी से शहर का जीवन, माहौल और लोगों की उम्मीदें कैसे बदलती हैं। उनका काम जाति और सेक्शुयलिटी की वजह से समाज में लोगों को मिलने वाली जगह और बहिष्करण को समझने की कोशिश करता है। वर्तमान में आकृति तस्वीरों और वीडियो के ज़रिए यादों को दर्ज करने और उनके बनने की प्रक्रिया पर शोध कर रही हैं। उनका ध्यान गंगटोक में तेजी से हो रहे शहरीकरण और उससे बदलती यादों पर है। वह समझना चाहती हैं कि कला लोगों को किसी मुद्दे पर गंभीरता से सोचने के लिए कैसे प्रेरित कर सकती है।
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