असम में फ़्रिस्बी का खेल जातीय संघर्ष को रोक रहा है

Location Iconचिरांग जिला, असम
अपने हाथ में फ़्रिस्बी को पकड़े हुए लोगों का एक समूह_फ़्रिस्बी का खेल 
अल्टीमेट फ़्रिस्बी उन विचारों को लेकर आया जिनकी संघर्ष-ग्रस्त समुदायों को तत्काल आवश्यकता थी। | चित्र साभार: द एंट

असम में बोडो और आदिवासी समुदाय कई दशकों से एक-दूसरे के पड़ोसी हैं। बोडो गांव भूटान की सीमा से लगे हैं। आदिवासियों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा दिहाड़ी मज़दूर है और उन्हें काम के लिए बोडो गांवों में जाना होता है जिसके लिए सीमा पार करनी पड़ती है। वहीं, बोडो जनजाति के लोग अपने खेतों में उगने वाली फसलों को बेचकर अपना गुजर-बसर करते हैं इसलिए उन्हें बाजार की ज़रूरत होती है। वहां पहुंचने के लिए उन्हें आदिवासी गांवों से गुजरना पड़ता है।

जब भी इन दोनों समुदायों के बीच हिंसा की कोई घटना होती है तब इनकी जीविका कमाने से जुड़ी सभी गतिविधियां ठप्प पड़ जाती हैं। 2014 में भी ऐसा ही कुछ हुआ था जब चिरांग जिले जैसे कई इलाकों में समुदायों के बीच जातीय संघर्ष हुए थे। इस संघर्ष में कई लोगों की जान चली गई थी। तत्काल प्रभाव से शांति स्थापित करने की जरूरत थी जिसके लिए समुदाय के लोगों को आमने-सामने बैठकर बात करनी थी। यही वह समय था जब खेल-कूद जुड़ाव के सूत्र के रूप में उभर कर आया।

इलाके के कई समुदायों में हर तरह के खेल की खासी लोकप्रियता थी। इसलिए यहां काम करने वाले कई स्थानीय और समाजसेवी संगठनों ने सोचा कि इसका फायदा उठाना चाहिए। बोडो और आदिवासियों को एक ही छत के नीचे लाने के लिए इन्होंने कुश्ती जैसे स्वदेशी खेलों का इस्तेमाल किया क्योंकि दोनों ही समुदायों के लोग पहले से ही इसे खेलना जानते थे। लेकिन एक खेल अल्टीमेट फ्रिस्बी भी था – एक ऐसा खेल जिसे स्थानीय लोगों ने कभी नहीं खेला था – जो बहुत जल्दी बहुत अधिक लोकप्रिय हो गया।

यह विदेश से आया एक खेल है। 2015 में मैंने अपने एक दोस्त से सुना कि अनीष मुखर्जी जो एक गांधी फ़ेलो हैं, इस खेल में पारंगत हैं। साथ ही, यह भी पता चला कि वे असम में समुदायों के साथ काम करना चाहते हैं। हमने उनसे सम्पर्क किया और इस पर चर्चा की कि क्या और कैसे यह खेल समुदायों के बीच के तनाव को ख़त्म करने में मददगार साबित हो सकता है?

चिरांग के लोगों के लिए अल्टीमेट फ़्रिस्बी एक एकदम नया खेल था। यह अपने साथ ऐसे मौके लेकर आया था जिनकी संघर्ष-ग्रस्त समुदायों को तत्काल आवश्यकता थी।उदाहरण के लिए, इसे लड़के एवं लड़कियों को एक साथ मिलकर खेलना था और उम्र की सीमा भी नहीं थी। जल्दी ही मां और बेटे, भाई और बहन एक साथ फ़्रिस्बी खेल रहे थे। इस खेल में कोई रेफ़री नहीं होता है इसलिए टीम के सदस्यों को सामूहिक रूप से मध्यस्थता करनी पड़ती थी और खेल के दौरान उभरे मुद्दों को हल करना होता था।

जातीय शत्रुता वाले क्षेत्र में यह एक महत्वपूर्ण अभ्यास था। इस खेल में एक ‘स्पिरिट सर्कल’ की अवधारणा भी है – हर बार खेल शुरू करने से पहले, खिलाड़ी रणनीति बनाने के लिए एक साथ मिलते हैं जिससे उनके बीच संवाद को बढ़ावा मिलता है। यह फुटबॉल जैसे किसी खेल के साथ सम्भव नहीं था जिनके बारे में समुदाय की अपनी अवधारणा है। फ़्रिस्बी लिंग, धर्म और भाषाई पहचान के मानदंडों से अछूता था और फैसिलिटेटर खेल के नियमों में सुधार कर सकते थे।

उदाहरण के लिए हमने एक नियम बनाया है जिसके अनुसार प्रत्येक टीम को तीन मातृभाषाओं और तीन धर्मों का प्रतिनिधित्व करना होता है। इससे खेलने वालों को जो कभी अपने गांव से बाहर नहीं गए थे, उन्हें अपनी टीम में लोगों को शामिल करने के लिए उनके पास जाने और उन्हें समझाने पर मजबूर होना पड़ा।

जेनिफर लियांग असम में ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काम करने वाली एक समाजसेवी संस्था द एंट की सह-संस्थापक हैं।

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अधिक जानें: जानें किस तरह कुश्ती ने असम में युवा बोडो लोगों के बीच शराब की लत से लड़ने में मदद की।

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