हल्का-फुल्का

इस 15 अगस्त सोशल सेक्टर मांगे… आज़ादी

आज़ादी सिर्फ सत्ता से नहीं, कभी-कभी अपनी बनाई व्यवस्थाओं से भी चाहिए होती है। सोशल सेक्टर में भी कुछ ऐसे तौर-तरीके हैं, जो धीरे-धीरे टूल से तख्त बन बैठे हैं।
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कहते हैं कि जमीन पर बदलाव कभी सीधा नहीं होता। इसलिए सोशल सेक्टर ने उसे संभालने के लिए कुछ औज़ार बनाए। लेकिन जो औज़ार काम आसान करने के लिए बनाए थे, अब वे खुद ही काम बन गए हैं। बरसों-बरस में ये इतने मज़बूत हो गए हैं कि जमीनी बदलाव भी इनके सामने प्रमाण-पत्र लेकर आता है।

तो आइए मिलते हैं इस 15 अगस्त सोशल सेक्टर के कुछ ऐसे औज़ारों से जिनसे अब सेक्टर खुद आज़ादी चाहता है।

1. पायलट फेज़, सेक्टर छोड़ो!

डाक टिकट और कुछ लिखे हुए एक पुराने पोस्टकार्ड की फ़ोटो_आज़ादी

2. जार्गन राज, सेक्टर छोड़ो!

डाक टिकट और कुछ लिखे हुए एक पुराने पोस्टकार्ड की फ़ोटो_आज़ादी

3.फोटो राज, सेक्टर छोड़ो!

डाक टिकट और कुछ लिखे हुए एक पुराने पोस्टकार्ड की फ़ोटो_आज़ादी

4. बजट राज, सेक्टर छोड़ो!

डाक टिकट और कुछ लिखे हुए एक पुराने पोस्टकार्ड की फ़ोटो_आज़ादी

5. डबल स्टैंडर्ड, सेक्टर छोड़ो!

डाक टिकट और कुछ लिखे हुए एक पुराने पोस्टकार्ड की फ़ोटो_आज़ादी

6. आउटकम राज, सेक्टर छोड़ो!

डाक टिकट और कुछ लिखे हुए एक पुराने पोस्टकार्ड की फ़ोटो_आज़ादी

7. लॉगफ्रेम सत्याग्रह

डाक टिकट और कुछ लिखे हुए एक पुराने पोस्टकार्ड की फ़ोटो_आज़ादी

8. प्रोग्राम-प्रशंसा, सेक्टर छोड़ो!

डाक टिकट और कुछ लिखे हुए एक पुराने पोस्टकार्ड की फ़ोटो_आज़ादी

लेखक के बारे में

  • पूजा राठी आईडीआर हिंदी में संपादकीय विश्लेषक (एडिटोरियल एनालिस्ट) हैं। इससे पहले, उन्होंने फेमिनिज़्म इन इंडिया में सह-संपादक के रूप में काम किया है, जहां उन्होंने जेंडर, पर्यावरण और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को कवर किया। पूजा को यूएन लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित किया गया है और वह 2024 की लाडली मीडिया फैलो भी रह चुकी हैं। इसके अलावा, वह खबर लहरिया की रूरल मीडिया फेलोशिप और एटलस फॉर बिहेवियर चेंज इन डेवलपमेंट की बिहेवियरल जर्नलिज़्म फेलोशिप की पूर्व फेलो रह चुकी हैं। पूजा ने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है।
  • शोभा शमी आईडीआर में सीनियर एसोसिएट- डिजिटल हैं। पिछले 14 वर्षों से वे हिंदी डिजिटल मीडिया की दुनिया में ऐसी कहानियों को आवाज़ देने की कोशिश कर रही हैं, जो अक्सर किनारे पर ही छूट जाती हैं। आईडीआर में आने से पहले शोभा दैनिक भास्कर, अमर उजाला, नेटवर्क-18, डॉयचे वेले (डीडब्ल्यू), स्कूपव्हूप और एशियाविले न्यूज़ जैसे मीडिया संस्थानों में भी काम कर चुकी हैं। उन्होंने पीपुल्स आर्काइव ऑफ़ रूरल इंडिया (पारी) के लिए अनुवाद का काम भी किया। हाशिए पर खड़े लोगों की कहानियां शोभा के दिल के सबसे करीब हैं। वे उन सवालों की तरफ़ बार-बार लौटती हैं, जो जाति, जेंडर, सेक्सुअलिटी और समाज की परतों में छिपे होते हैं।
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