कहते हैं कि एनजीओ की सबसे बड़ी चिंता फंडिंग होती है। लेकिन जिन लोगों ने कभी ऑफिस ढूंढ़ा है, वे जानते हैं कि असली संघर्ष तो किराए का ऑफिस ढूंढ़ने का है। सस्ता ऑफिस मिले तो मकान मालिक की टेंशन। अच्छा ऑफिस मिले तो किराए की टेंशन। और दोनों मिल जाएं, तो सिक्योरिटी डिपॉजिट देखकर लगता है कि शायद इसी के लिए अलग से फंडिंग प्रपोज़ल लिखना पड़ेगा। ऐसे में जो लोग नया ऑफिस ढूंढ़ रहे हैं, उनका दिन शायद कुछ ऐसा बीतता होगा –
1. सुबह 10 बजे – सेक्टर में नेटवर्किंग


2. दोपहर 12 बजे – अब ब्रोकर ही सहारा है


3. शाम 5 बजे – को-वर्किंग भी देख लेते हैं


4. शाम 7 बजे – आख़िरी उम्मीद


लेखक के बारे में
- राकेश स्वामी आईडीआर में सह-संपादकीय भूमिका मे हैं। वह राजस्थान से जुड़े लेखन सामग्री पर जोर देते हैं। राकेश के पास राजस्थान सरकार के नेतृत्व मे समुदाय के साथ कार्य करने का एवं अकाउंटेबलिटी इनिशिएटिव, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च मे लेखन एवं क्षमता निर्माण का भी अनुभव है। राकेश ने आरटीयू यूनिवर्सिटी, कोटा से सिविल अभियांत्रिकी में स्नातक किया है।
- जूही मिश्रा आईडीआर में एडिटोरिएल एसोसिएट हैं। उन्हें पत्रकारिता का 14 साल का अनुभव है और उन्होंने पत्रिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, रोर मीडिया, दूता टेक्नोलॉजी और ग्राम वाणी के साथ काम किया है। जूही ने विकास संवाद संस्था से फेलोशिप पूरी की है, जहाँ उन्होंने बसोर समुदाय में खाद्य प्रणालियों और कुपोषण के कारणों पर शोध किया।



